नए शीत युद्ध का प्रादुर्भाव तथा स्वरूप

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नए शीत युद्ध का प्रादुर्भाव तथा स्वरूप

नए शीत युद्ध का प्रादुर्भाव तथा स्वरूप

बहुत से विद्वान् नए शीत युद्ध का प्रादुर्भाव सन् 1978 से मानते हैं जब इथियोपिया में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को संयुक्त राज्य अमरीका ने विफल बनाने का फैसला किया। संयुक्त राज्य के भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मि. व जन्सिकी ने अपनी पुस्तक “Power and Principle” में लिखा कि सन् 1978 में संयुक्त राज्य अमरीका (U.S.A.) तथा सोवियत यूनियन (U.S.S.R.) से सम्बन्ध बिगड़ने शुरू हो गये थे। इथियोपिया में सोवियत संघ द्वारा क्यूबा के लोगों को शामिल करना पहले तो अमरीका ने अनदेखा कर दिया परन्तु जब सोवियत संघ ने अमरीका के विरुद्ध अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने के प्रयलों को जारी रखा तो रीगन प्रशासन ने सोवियत शक्ति पर रोक लगाने का फैसला किया। परिणामस्वरूप क्यूबा-सोवियत ब्रिगेड के कार्य तथा SALT II का असफलता से दीतां को गहरा धक्का लगा। बाद में अफगानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप तथा अमरीका की इसके विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया ने दीतां के युग को प्रायः समाप्त कर दिया तथा एक बार फिर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नया शीत युग आरम्भ हो गया।

1980 ई. के दशक में निम्नलिखित घटनाओं ने नये शीत युद्ध को पुनः आरम्भ कर दिया।

  1. राष्ट्रपति रीगन के अधीन संयुक्त राज्य की विदेशी नीति में परिवर्तन

    संयुक्त राज्य द्वारा (i) अपने आप को प्रथम महाशक्ति की स्थिति पुनः हासिल करने का फैसला; (ii) निक्सन-किसिंगर के विचार को कि दीतां का मात्र विकल्प युद्ध है, अस्वीकार करने का फैसला; तथा (iii) दीतां पर अधिक बल देने के विचार का त्याग करने से दीतां के उद्देश्य को गहरा धक्का लगा।

  2. अनुत्तरदायी सोवियत दृष्टिकोण

    रीगन प्रशासन का यह विचार था कि अंगोला, मध्य पूर्व तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का व्यवहार, संयुक्त राज्य के हितों तथा दीतां के उद्देश्यों के प्रति गैर-जिम्मेवार तथा हानिकारक था।

  3. सोवियत प्रभाव को नियन्त्रित करने के विचार से संयुक्त राज्य के पूर्वी यूरोप तथा चीन के साथ सम्बन्ध बनाने के प्रयत्न

    1970 के दशक में भी संयुक्त राज्य की विदेश नीति में चीन के साथ सम्बन्ध बनाकर सोवियत संघ के विरुद्ध सामरिक लाभ प्राप्त करने के लिए सोवियत संघ तथा चीन के मध्य खाई को चौड़ा करने का प्रयत्न शामिल था। इसके अतिरिक्त निरन्तर बढ़ते आर्थिक सम्बन्धों द्वारा पूर्व-यूरोपीय समाजवादी राज्यों पर प्रभाव प्राप्त करना तथा परमाणु शस्त्रों के इस युग में यूरोपीय राज्यों को अपनी सुरक्षा के बारे में जागरूक करना तथा इसके साथ-साथ पोलैंड में उदारता को सुदृढ़ बनाने की नीति भी पूर्वी यूरोप पर सोवियत प्रभाव को कम करने के लिए ही बनाई थी। स्पष्ट है इस प्रकार की नीतियां सोवियत संघ को पसन्द नहीं आईं तथा इसने भी इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए प्रत्युपाय करने शुरू कर दिए।

  4. निकारागुआ, ऐलसैल्वाडोर तथा ग्रीनाडा में संयुक्त राज्य की भूमिका

    इन सभी राज्यों पर बलपूर्वक अपना उच्च प्रभाव बनाए रखने के संयुक्त राज्य के प्रयत्नों का सोवियत संघ ने कड़ा विरोध किया। उसने इसे समाजवाद के प्रसार को दबाने के लिए अमरीका के नये प्रयत्न कहा।

  5. अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप

    अफगानिस्तान में वामपन्थियों को सत्ता में बनाए रखने के प्रयत्न तथा परिणामस्वरूप अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप को संयुक्त राज्य ने दीतां को तोड़ने का प्रत्यक्ष तथा बड़ा प्रमाण कहा और इसे खाड़ी क्षेत्र में सोवियत शक्ति को बढ़ाने के लिए ही किया प्रयास माना गया । अमरीका को एक बार फिर विश्वास हो गया कि पश्चिमी एशिया में सोवियत संघ की नीति का मुख्य उद्देश्य फारस की खाड़ी तक पहुँचना है। इसे इस क्षेत्र में अमरीका हितों के साथ-साथ खाड़ी देशों के साथ अमरीका के सम्बन्धों के लिए गम्भीर चुनौती माना गया। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप से निश्चय ही 1970 के दशक के दीतां को गहरा धक्का लगा और यह प्रायः मृतप्राय ही हो गया।

  6. सोवियत प्रभाव को विफल करने के लिए संयुक्त राज्य की नीतियां

    एशिया में अमरीकी हितों तथा शक्ति को सोवियत संघ की गम्भीर चुनौती मानते हुए रीगन प्रशासन ने यह निर्णय किया कि:

    • डियागो गार्शिया को नौ-सैनिक परमाणु अड्डा बनाकर तथा इसके साथ-साथ फारस की खाड़ी में अपनी सुरक्षा और प्रतिरक्षा को मजबूत बनाने तथा संगठित करने के लिए यहां अपना नौ-सैनिक अड्डा मजबूत करना।
    • पश्चिमी एशिया में सोवियत संघ के विस्तारवाद की चुनौती के विरुद्ध पाकिस्तान को शस्त्र देना तथा इसे अपने अग्नि सीमा-राज्य के रूप में सुदृढ़ करना।
    • फारस की खाड़ी में शीघ्र तैनात बल को संगठित करना तथा तैनात करना।
    • एशिया में सोवियत संघ की भूमिका को नियन्त्रित करने के लिए वाशिंगटन-बीजिंग-इस्लामाबाद-टीकियो सहयोग को सुदृढ़ करना तथा बढ़ते हुए भारत-सोवियत तथा सोवियत-वियतनाम सम्बन्धों तथा मास्को-काबुल सहयोग को नियन्त्रित करना।
    • सितारा युद्ध प्रोग्राम या अन्तरिक्ष का सैन्यीकरण प्रोग्राम या सामरिक प्रतिरक्षा उपक्रम बनाना।
    • SALT II समझौते को लागू न करना।
    • सोवियत संघ के भय विरुद्ध पश्चिमी यूरोप में जल, थल तथा वायु में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र (Missiles) की स्थापना करना।
    • शस्त्र-दौड़ में उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिए शस्त्रों का अधिक उत्पादन करना तथा निशस्त्रीकरण पर जेनेवा बातचीत (Geneva Talk on Disarmament) से दूर रहना।
    • हिन्द महासागर में अमरीकी शक्ति तथा उपस्थिति को बढ़ावा देना तथा इसे और शक्तिशाली बनाना।
    • केनिया तथा सोमालिया (Kenya and Somalia) को बड़े पैमाने पर सहायता देना।
    • सन् 1980 में मास्को ओलम्पिक खेलों में भाग न लेना तथा सोवियत संघ पर अनाज अविरोध (Grain Embargo) लगाना।

संयुक्त राज्य की इन सभी नीतियों की सोवियत संघ ने यह कहकर कड़ी आलोचना की कि ये नीतियां सोवियत सभी हितों को हानि पहुँचाने वाली तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध को और अधिक भड़काने वाली हैं।

  1. विश्व के विभिन्न भागों में संयुक्त राज्य का प्रभाव घटाने के लिए सोवियत नीतियां

    बहुत-सी सोवियत नीतियों का अमरीका ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उसके अनुसार ये सभी नीतियां विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य की भूमिका को सीमित करने वाली थीं। निम्नलिखित कुछ सोवियत नीतियां अमरीका द्वारा कई विरोध का कारण बनीं-

  • अंगोला में सोवियत संघ द्वारा उत्साहित क्यूबियों की भूमिका।.
  • अफगानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप तथा एशिया के इस सामरिक महत्व वाले क्षेत्र में बने रहने का उनका फैसला।
  • इथियोपिया में सोवियत संघ द्वारा उत्साहित क्यूबा की भूमिका ।
  • क्यूबा में सोवियत ब्रिगेड की उपस्थिति
  • पूर्वी यूरोपीय देशों में नई प्रकार की SS-20 मध्यम दूरी की मारक सोवियत मिसाइलों को लगाना।
  • लैटिन अमरीका के विभिन्न राज्यों के वामपंथी दलों को सोवियत संघ की सहायता तथा समर्थन।
  • पश्चिमी यूरोप में सोवियत संघ का बढ़ता प्रभाव व मास्को तथा नई दिल्ली एवं मास्को तथा हेनोई के बीच बढ़ती मित्रता ।
  • अफ्रीका में अपने सैनिक आधारों को सुदृढ़ करने का सोवियत संघ का निर्णय ।
  • हिन्द महासागर में सोवियत संघ की बढ़ती उपस्थिति।
  • पश्चिमी एशिया में तथा खाड़ी क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए सोवियत संघ की नीति।

ये सभी नीतियां अमरीका की नजर में भयानक थीं क्योंकि ये सभी विश्व राजनीति में अमरीकी हितों की साधारणतया तथा एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमरीका के सम्बन्ध में विशेषरूप से गम्भीर चुनौती थी। अमरीकी यह मानते थे कि एशिया में सोवियत संघ की नीतियां एशिया में संयुक्त राज्य के विरोधी देशों के समूह का निर्माण करने वाली थीं तथा पाकिस्तान एवं चीन जैसे अमरीकी मित्रों के घेराबंदी करने वाली थीं।

इन सभी बातों के साथ-साथ, निशस्त्रीकरण की ओर NAM की असफलता, निरन्तर जारी इराक-ईरान युद्ध के परिणामस्वरूप पश्चिमी एशिया में शान्ति की अस्थिरता, निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर असफलता, जेनेवा बातचीत में बड़ी धीमी तथा बहुत कम प्रगति, अमरीकी राष्ट्रपति रीगन तथा मिखाईल गोर्बाच्चोव के बीच पहले दो शिखर सम्मेलनों की असफलता, दोनों महाशक्तियों के बीच शस्त्र-दौड़ में बढ़ोतरी, संयुक्त राज्य द्वारा पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्यीकरण, अफगानिस्तायों के बीच शस्त्र-दौड़ में बढ़ोत्तरी, संयुक्त राज्य द्वारा पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्यीकरण, अफगानिस्तान में सोवियत संघ की निरन्तर उपस्थिति, एशिया की सुरक्षा सम्बन्धी सोवियत योजना के प्रति अमरीकी आशंकाएं तथा निर्धन विकासशील राष्ट्रयों को प्रतिस्थापित करने की धनवान राष्ट्रों की अक्षमता आदि इन सभी ने मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध को पुनः जीवित कर दिया गया। नया शीत युद्ध, जैसा कि इसे नाम दिया गया था, विश्व-शान्ति, सुरक्षा तथा विकास के लिए कहीं अधिक भयानक था।

नये शीतयुद्ध की प्रकृति (1980-87 ई.)  अथवा  नए और पुराने शीतयुद्ध में अन्तर

1980वें दशक के नए शीत युद्ध की प्रकृति और क्षेत्र पुराने शीत युद्ध से कई बातों में भिन्न थे।

  1. नया शीत युद्ध पुराने शीत युद्ध से कहीं अधिक भयंकर था।
  2. नये शीत युद्ध का मुख्य केन्द्र एशिया था न कि यूरोप। पुराने शीत युद्ध का मुख्य केन्द्र यूरोप था।
  3. नये शीत युद्ध में चीन भी शामिल हो गया था।
  4. पुराने शीत युद्ध में दोनों महाशक्तियों के बीच बराबरी बनाए रखना प्रमुख था जबकि नए शीत युद्ध में प्रत्येक महाशक्ति विश्व राजनीति में अपना प्रभुत्व बनाए रखने की कोशिश में थी।
  5. पहले, दोनों महाशक्तियां यह मानती थी कि परमाणु युद्ध वास्तव में लड़ा नहीं जा सकता क्योंकि इससे दोनों राज्यों की पूर्ण तबाही हो जाएगी। जबकि नई तकनीकों के विकास से दोनों महाशक्तियां विशेषतः संयुक्त राज्य यह स्वीकार करने लगा था कि सफलतापूर्वक लड़े गये सीमित परमाणु युद्ध हो सकते थे। दोनों महाशक्तियों द्वारा बनाए गए परमाणु शस्त्रागार के आकार में न केवल वृद्धि हुई बल्कि दोनों तरफ के सामरिक युद्ध-शास्त्री भी ये सभी सोचने लगे थे कि परमाणु युद्ध लड़ा भी जा सकता था और जीता भी जा सकता था। परमाणु साधनों की मात्रा, उनकी नई तकनीक की जटिलता तथा अभिज्ञान या खोज (Detection) के पूर्व-चेतावनी साधनों के आधुनिकीकरण ने भी परमाणु शस्त्रों के अचानक या योजनाबद्ध ढंग से सामयिक प्रयोग की सम्भावना को बढ़ावा दिया था।
  6. पुराने शीत युद्ध के तंग द्वि-ध्रुवीकरण का स्थान अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बहु-केन्द्रवाद या द्वि-बहु-केन्द्रवाद या कम से कम बहुत ही ढीले द्वि-ध्रुवीकरण ने ले लिया था।
  7. नए शीत युद्ध में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में भाग लेने वाली देशों की संख्या में वृद्धि ने निश्चय ही नए शीत युद्ध की नीतियों को पुराने शीत युद्ध के युग से अलग कर दिया था।
  8. एक बड़ी परमाणु शक्ति के रूप में उभर कर आए चीन तथा फ्रांस ने नए शीत युद्ध को एक नया आयाम दिया।

इस प्रकार नया शीत युद्ध पुराने शीत युद्ध से कई बातों से भिन्न था। यह पुराने शीत युद्ध से कहीं अधिक भयानक था।

नये शीत युद्ध का ह्रास

(Decline of the New Cold War)

सौभाग्य से अपने आगमन से सात वर्षों के भीतर ही नए शीत युद्ध का ह्रास आरम्भ हो गया तथा मानवता ने शीत युद्ध की व्यर्थता तथा भय को पूर्णतया अनुभव कर लिया। दोनों ही महाशक्तियों ने एक बार फिर शीत युद्ध को सीमित तथा बाद में समाप्त करने का निर्णय किया। सोवियत नेता मिखाईल गोर्बाच्योव द्वारा उठाये गए निर्भीक उपक्रमों के रूप में यह प्रशंसनीय परिवर्तन आया। परैसट्राइका तथा ग्लासनॉस्ट की धाराओं के अधीन कार्य करते हुए, विश्व जनमत का सम्मान करते हुए, गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों और तीसरे विश्व के देशों कीई मांग का ध्यान रखते हुए तथा अपने घरेलू वातावरण के प्रभावाधीन सोवियत संघ के नेता शस्त्र-नियन्त्रण एवं निःशस्त्रीकरण की दिशा में कुछ प्रस्तावों को स्वीकार करने के लिए आगे आए। अमरीका की ओर से इसकी स्वैच्छिक स्वीकृति ने ऐतिहासिक INF संधि (1985) पर हस्ताक्षर करने जैसे सकारात्मक परिवर्तन के लिए जगह बना दी जिसके अन्तर्गत अमरीका तथा सोवियत संघ दोनों ने अपनी-अपनी निगरानी अधीन यूरोप में लगाए गए मध्यम दूरी के प्रक्षेपास्त्रों को नष्ट करने के लिए एक समझौता किया। इस ऐतिहासिक समझौता तथा जिस गति के साथ वास्तव में यह लागू हुआ से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सकारात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन कुछ घटनाओं से प्रतिबिम्बित हुए : जैसे ईरान-इराक युद्ध की समाप्ति, अफगानिस्तान से सोवियत रूस का हटना, नाम्बिया की स्वतन्त्रता के लिए चतुर्पक्षीय समझौता, सोवियत रूस द्वारा घोषित शस्त्रों में कटौती, नाटो (NATO) शक्तियों में अमरीका द्वारा शस्त्र कटौती की स्वीकृति, मई 1989 में रूस के राष्ट्रपति गोर्बाच्योव की चीन यात्रा के परिणामस्वरूप चीन-रूस पुनर्मिलन, कम्बोडिया से वियतनामी सेनाओं को हटाने पर समझौते की दिशा में प्रगति, कोरियाई एकता की बढ़ती सम्भावनाएं, फिलीस्तीन द्वारा इस्राइल को मान्यता तथा फिलिस्तीन के प्रश्न पर अमरीका तथा फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के बीच सीधी बातचीत, साइप्रस (Cyprus) के यूनानी तथा तुर्क समुदायों के नेताओं के बीच सीधी वार्ता, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में संकट के समय संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका में पुनः पैदा होता विश्वास, पूर्व-पश्चिम दीतां, “नई दिल्ली घोषणा’ आदि। इन सभी परिवर्तनों ने विश्व राजनीति में शीत युद्ध के युग को प्रायः समाप्त ही कर दिया।

अतः नये शीत युद्ध की उत्पत्ति के सात वर्षों के अन्दर ही अन्दर एक नये दीतां का प्रादुर्भाव हुआ। सोवियत संघ में गोर्बाच्योव के नेतृत्व के अधीन हुए गहन विचारात्मक परिवर्तनों तथा सोवियत राजनीतिक व्यवस्था में उत्पन्न उदारवाद तथा विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों ने तथा घरेलू आर्थिक समस्याओं के प्रभावाधीन सोवियत नीतियों में बहुत गम्भीर परिवर्तन हुए। इसकी विदेश नीति में भी एक खुलापन आया। इसने अमरीका तथा पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्धों को मित्रतापूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्ध स्थापित करने के लिये प्रयत्न आरम्भ कर दिया। इसने समाजवादी देशों पर अपने नियन्त्रण तथा भूमिका को कम तथा समाप्त करने का निर्णय किया। इसने पूर्वी और यूरोपीय देशों तथा अफगानिस्तान से अपनी सेनाओं को वापिस बुलाने का निर्णय किया। अमरीका ने भी सोवियत संघ द्वारा किये गये प्रयत्नों को सराहा तथा दोनों देशों में मित्रता तथा सहयोग स्थापित करने के लिए कार्य करना आरम्भ किया। दोनों देशों में एक नये दीतां का प्रारम्भ हुआ तथा जिसे समस्त संसार से समर्थन मिला और इसके कारण नये शीत युद्ध का अन्त आरम्भ हो गया।

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