शीत युद्ध के उत्पत्ति के कारण

शीत युद्ध के कारण

शीत युद्ध के कारण

पश्चिमी शक्तियों तथा (भू.पू.) सोवियत संघ के बीच युद्धकालीन सहयोग तथा समझौते उस समय की, विशेषतया साझे शत्रु को पराजित करने की आवश्यकता थी। 1917 ई. से 1942 ई. के बीच सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीच सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण तो दूर, सहयोगपूर्ण भी नहीं थे। सन् 1917 में रूस में समाजवादी क्रांति को लोकतान्त्रिक पश्चिम ने बिल्कुल पसन्द नहीं किया था। सोवियत संघ में समाजवाद का आना, एक बड़ी भयानक घटना मानी गई थी। इसे पूंजीवाद तथा लोकतन्त्र के लिये एक खतरा समझा गया था। अन्तः युद्ध काल के दौरान पश्चिमी तुष्टिकरण की नीति का उद्देश्य था जर्मनी को सोवियत संघ की तुलना में खड़ा करना था। इन परिस्थितियों में 1917 ई. से 1939 ई. तक सोवियत संघ अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से अपनी इच्छा से दूर रहा । इस अलगाव का एक उद्देश्य यह भी था कि समाजवादी क्रांति के लाभों को आन्तरिक रूप से दृढ़ करना। जर्मनी के साथ आक्रमण न करने के समझौते का भी यही उद्देश्य था। जब दूसरा विश्व युद्ध छिड़ा तो सोवियत संघ ने इसे ‘साम्राज्यवादी युद्ध’- अर्थात् साम्राज्यवादी राष्ट्रों के बीच युद्ध माना तथा इसके दूर रहने का निश्चय किया। तथापि हिटलर की आये दिन बढ़ती हुई शक्ति एवं तदनन्तर 22 जून, 1942 को जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण ने इसे मित्र-राष्ट्रों की ओर से युद्ध में भाग लेने के लिए बाध्य कर दिया।

दूसरे विश्व युद्ध के दबाव के अधीन सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीच एक अनोखा समझौता हुआ तथा इस परिस्थिति के कारण पुराने दुश्मनों, साम्यवादियों तथा साम्यवाद-विरोधियों के बीच सहयोगपूर्ण सम्बन्ध कायम हो गए। सन् 1942 के बाद युद्धकाल में कई सम्मेलन जैसे याल्टा सम्मेलन (Yalta Conference), पोट्सडेम सम्मेलन (Potsdam Conference) आदि हुए, जिनमें सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों ने ध्रुवी शक्तियों को हराने के लिए अपने प्रयत्नों को समन्वित करने तथा सहयोग के लिए भाग लिया। इन सम्मेलनों में कितने ही मान्य निर्णय किए गये जिससे मित्र-राष्ट्र ध्रुवी शक्तियों को हराने में सफल हो सके। एक नई अन्तर्राष्ट्रीय संस्था, संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) की स्थापना से यह नई आशा बनी कि सोवियत संघ-पश्चिम सहयोग युद्धोत्तर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की विशेषता बना रहेगा। परन्तु ऐसा हो नहीं सका। युद्धकाल में उनके सहयोग के पीछे सोवियत संघ तथा पश्चिमी देशों ने एक दूसरे के प्रति अपने-अपने मतभेदों को तथा आशंकाओं को पनपने दिया। पश्चिमी शक्तियां सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति अर्थात् अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में साम्यवाद के बाद बढ़ते जोखिम से डरती रहीं। इसी तरह सोवियत संघ की भी यह धारणा बनी रही कि पश्चिमी लोकतान्त्रिक शक्तियां उसकी समाजवादी व्यवस्था को निर्बल तथा नियन्त्रित करने के लिए प्रतिबद्ध थीं। एक दूसरे के प्रति इस तरह की आशंकाओं ने युद्धोत्तर काल के सम्बन्धों से सोवियत संघ तथा पश्चिमी देशों के सहयोग पूर्ण सम्बन्धों को कठिन बना दिया। इसी कारण युद्धोत्तर काल में अमरीका तथा सोवियत संघ में शीत युद्ध आरम्भ हो गया जो 1990 ई. तक जारी रहा।

शीत युद्ध के कारणों का विश्लेषण

(Analysis of Causes of Cold War)

साम्यवादी सोवियत संघ तथा लोकतान्त्रिक पश्चिम (ऐंग्लो-अमरीकी ब्लॉक) के बीच शीत युद्ध के कारणों का दो भागों में अध्ययन किया जा सकता है :

(A) पूर्व के विरुद्ध पश्चिम की शिकायतें या सोवियत संघ के विरुद्ध ऐंग्लो-अमरीकी शिकायतें।

(B) पश्चिम के विरुद्ध पूर्व की शिकायतें या अमरीका, इंग्लैंड तथा फ्रांस के विरुद्ध सोवियत संघ की शिकायत।

(A) पूर्व के विरुद्ध पश्चिमी शिकायतें

(i) सामान्य शिकायतें

  1. विश्व राजनीति में सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति के प्रति पश्चिम का भय- दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी या ऐंग्लो अमरीकी शक्तियां सोवियत संघ के विभिन्न निर्णयों के प्रति असंतुष्ट थीं। इनके प्रति सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति ने भी उन्हें चेतावनी दे दी थी। सन् 1917 में सोवियत संघ में समाजवादी क्रान्ति के आने के कारण पश्चिमी शक्तियों को यह भय लगने लगा कि इस घटना का प्रभाव अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तथा दूसरे देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर पड़ेगा। सोवियत संघ की बढ़ती हुई शक्ति तथा दूसरे विश्व युद्ध में सोवियत संघ के शक्ति प्रदर्शन ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में साम्यवाद के बढ़ते खतरे के प्रति पश्चिमी देशों को और भी आशंकित कर दिया । युद्धकालीन सहयोग को उन्होंने आवश्यक बुराई मानकर स्वीकार किया तथा इसलिये युद्ध के बाद यह स्वाभाविक ही था कि वे सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति को नियन्त्रित करने का प्रयास करें। जब युद्ध चल रहा था तब भी कई ऐसी पश्चिमी नीतियां बनाई गई थीं जिनका अन्तर्निहित उद्देश्य सोवियत संघ की शक्ति को नियन्त्रित करना था।
  2. विचारधारा सम्बन्धी विरोध या साम्यवाद बनाम पूंजीवाद- समाजवादी तथा पूंजीवाद के बीच अनिवार्य विरोध की साम्यवादी विचारधारा तथा समाजवाद की अन्तिम जीत के सिद्धान्त ने लोकतान्त्रिक राज्यों को सोवियत संघ की बढ़ती शक्ति तथा दूसरे देशों में समाजवाद के प्रसार के प्रति आशंकित कर दिया। सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीत मतभेद साम्यवाद तथा पूंजीवाद की परस्पर विरोधी विचारधाराओं का प्रत्यक्ष परिणाम था। दोनों के बीच बहुत से प्राथमिक विरोधों का कारण दोनों का अपनी-अपनी विचारधाराओं पर अड़े रहना था।
  3. समाजवादी आन्दोलन के प्रति पश्चिम का भय- सोवियत संघ में समाजवादी क्रान्ति के आने के बाद यूरोप के प्रायः सभी राष्ट्रों में मजदूर आन्दोलन लोकप्रिय हो गये। यूरोप के विभिन्न राज्यों तथा यहाँ वहां समाजवादी दलों के प्रादुर्भाव ने पूंजीवादी राष्ट्रों को सचेत कर दिया। वे यह अनुभव करते थे कि समाजवादी आन्दोलन वास्तव में विध्वंसक आन्दोलन है क्योंकि इसके पीछे यह विचारधारा होती है कि वर्ग हित राष्ट्रीय-हित से बढ़कर होते हैं तथा यह कि दुनिया भर के मजदूरों का अपना कोई देश नहीं होता। विभिन्न राष्ट्रों के समाजवादी आन्दोलनों को सोवियत संघ का समर्थन मिला। जिससे पूंजीवादी राष्ट्र सोवियत संघ से रुष्ट हो गए। उनका विश्वास था कि सोवियत संघ दूसरे देशों में क्रांति फैला रहा था तथा इसलिए उन्होंने समाजवादी आन्दोलनों तथा उनके ‘जन्मदाता’ सोवियत संघ को सीमित करने के लिए उठाए गए कदमों को न्यायपूर्ण और आवश्यक माना।

(ii) (भू.पू.) सोवियत संघ के विरुद्ध पश्चिम की विशिष्ट शिकायतें

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सोवियत संघ की भूमिका से पश्चिमी शक्तियों की असंतुष्टि के उपरिलिखित तीनों तत्त्वों के अतिरिक्त, सोवियत संघ के कई विशिष्ट निर्णयों ने पश्चिमी शक्तियों को सोवियत संघ से नाराज कर दिया। यह नाराज़गी शीत युद्ध के जन्म का कारण बनी। सोवियत संघ के विरुद्ध ऐसी शिकायतें निम्नलिखित थीं-

  1. सोवियत संघ पर याल्टा समझौतों को भंग करने का दोष था

    सोवियत संघ याल्टा में किए गए समझौतों को भंग करने का दोषी था। पश्चिमी शक्तियों ने यह दोष लगाया कि सोवियत संघ ने जानबूझ कर याल्टा समझौते की भावना को पोलैंड तथा दूसरे पूर्वी यूरोपीय राष्ट्रों से सम्बन्धित कई हानिकारक तथा नकारात्मक निर्णय अपना कर भंग किया था।

इस दोष के समर्थन में निम्नलिखित सोवियत निर्णयों को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया।

  • पोलैंड में सोवियत हस्तक्षेपपोलैंड में ल्यूबीनान सरकार की स्थापना में सोवियत संघ की भूमिका ने पोलैंड में चुनी हुई सरकार को शक्ति का स्थानान्तरण करने की शर्त को भंग किया था।
  • पोलैंड के नेताओं की गिरफ्तार पोलैंड के लोकतान्त्रिक नेताओं की गिरफ्तारी सथा पोलैंड में अमरीका तथा विटिश निरीक्षकों के प्रवेश की अनुमति देने से इन्कार।
  • पूर्वी यूरोप को साम्यवाद का निर्यातहंगरी, बुल्गारिया, रूमानिया तथा चैकोस्लोवाकिया में सोवियत संघ की पक्षधर सरकारों की स्थापना तथा पूर्वी यूरोप का सोवियतीकरण करना।
  • जापान के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने की सोवियत संघ की हिचकिचाहट जापान के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने तथा साइबेरिया के हवाई अड्डे को मित्र राष्ट्रों द्वारा प्रयोग करने की अनुमति देने में सोवियत संघ की हिचकिचाहट को शत्रुतापूर्ण कार्यवाही माना गया तथा पश्चिमी शक्तियां सोवियत संघ के इस असहयोगपूर्ण तथा हानिकारक व्यवहार के लिए उसकी आलोचना करने लगीं।
  • चीन के साम्यवादियों को सोवियत संघ की सहायता सोवियत संघ ने माओ की साम्यवादी सेना की सहायता के लिए मनचूरिया पर अपने नियन्त्रण का प्रयोग किया तथा राष्ट्रवादी सेनाओं को साम्यवादी शक्तियों के विरुद्ध लड़ने के लिए सहायता देने से इन्कार कर दिया। इस तरह चीन के गृह-युद्ध में सोवियत संघ की भूमिका बी असंतुष्टि का एक बड़ा कारण बनी।
  1. उत्तरी ईरान से फौजें हटाने से सोवियत संघ का इन्कार

    सन् 1942 के समझौते के अनुसार जर्मनी के आत्मसमर्पण के छः महीने के अन्दर सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों ने ईरान से अपनी फौजें हटाना स्वीकार कर लिया था। जैसा कि स्वीकार किया गया था, युद्ध के बाद अमरीका तथा ब्रिटेन ने ईरान से अपनी सेनाएं शीघ्रता से हटा लीं और उन्हें यह भी आशा थी कि सोवियत रूस भी ऐसा ही करेगा। परन्तु सोवियत संघ ईरान से अपनी फौजें हटाने को बिल्कुल इच्छुक नहीं था। इससे ईरान में विद्रोह गया तथा ईरान को सोवियत संघ के साथ एक सन्धि करने के लिए तथा 25 वर्षों तक उत्तरी ईरान के तेल साधनों पर सोवियत संघ को अधिकार देने के लिए बाध्य होना पड़ा। यह पूर्व-पश्चिमी समझौते के बिल्कुल विपरीत था।

इसलिए पश्चिमी शक्तियों ने इसका कड़ा विरोध किया। बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप के बाद ही सोवियत संघ ईरान से अपनी सेनाएं हटाने के लिए सहमत हुआ। इस घटना से पूर्व-पश्चिम सम्बन्धों में विद्यमान शंका की दरार बढ़ गई।

  1. सोवियत संघ का यूनान पर दबाव

    सोवियत संघ तथा इसके गुट अनुयायियों के द्वारा यूनान तक टर्की में वामपंथी (Lefist) सरकार तथा साम्यवादी पक्षधर या साम्यवादी सरकार की स्थापना के लिए किए गए प्रयलों का भी पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा कड़ा विरोध हुआ। जब, यूनान में गृह-युद्ध आरम्भ होने के बाद, यूनानी सेनानों तथा साम्यवादी गुरिल्लों के मध्य युद्ध के परिणामस्वरूप, सोवियत संघ ने यूनान के साम्यवादियों को समर्थन देना आरम्भ कर दिया तो पश्चिमी शक्तियां, विशेषकर अमरीका, यूनान की सरकार को सहायता देने के लिए आगे आई। यूनान के गृह-युद्ध ने सोवियत संघ तथा अमरीका को अप्रत्यक्ष रूप में आपस में विरोधी बना दिया तथा इस परिस्थिति से पूर्व-पश्चिम सम्बन्धी को बड़ा धक्का लगा।

  2. सोवियत संघ द्वारा टर्की को वश में करने के प्रयत्न

    युद्ध के बाद, सोवियत संघ ने टर्की पर दबाव डाला तथा टर्की के कुछ क्षेत्रों को सोवियत संघ को हस्तान्तरण करने की मांग की। विशेषतया, सोवियत संघ बॉसफेयरस में अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहता था। टर्की तथा पश्चिमी शक्तियों ने इन मांगों का विरोध किया। अमरीका ने टर्की का बड़े पैमाने पर समर्थन किया। अमरीका के राष्ट्रपति ट्रूमैन (Truman) ने प्रसिद्ध ‘ट्रूमैन सिद्धान्त’ का प्रतिपादन किया जिसमें उन्होंने उन सभी राष्ट्रों को, जो अपनी इच्छा की सरकार बनाने के लिए संघर्षरत थे, सब प्रकार की सहायता देने का वायदा किया। उन्होंने इस सिद्धान्त का यूनान तथा टर्की को बड़े पैमाने पर आर्थिक तथा सैनिक सहायता देकर उसका अनुसरण भी किया। सोवियत संघ के टर्की पर दबाव ने पश्चिमी शक्तियों को टर्की में साम्यवाद के प्रसार के भय से अवगत करवा दिया तथा वे नियन्त्रण नीति अपनाने के लिए बाध्य हो गई।

  3. सोवियत संघ का जर्मनी पर दबाब

    पश्चिमी शक्तियों का विश्वास था कि सोवियत संघ जर्मनी पर मित्र-राष्ट्रीय सेनाओं के नियन्त्रण तथा क्षेत्र के बारे में हुए युद्धकालीन समझौते को जानबूझ कर भंग कर रहा था। सोवियत नियन्त्रण के अधीन पूर्वी जर्मनी के लिए सोवियत संघ कीई नीतियों को पोट्सङम समझौता भंग करने वाली समझा गया। पश्चिमी शक्तियों ने जर्मनी के बारे में सोवियत संघ की निम्नलिखित नीतियों का कड़ा विरोध किया।

  4. बर्लिन के बारे मतभेद

    सोवियत संघ अमरीका, इंग्लैंड तथा फ्रांस के बर्लिन आधिपत्य का स्वरूप भी युद्धोत्तर काल के पूर्व-पश्चिम सम्बन्धों के बीच तनाव का एक बहुत बड़ा कारण बना। सोवियत संघ का पूर्वी-बर्लिन तथा बर्लिन तक जाने वाली सड़कों पर नियन्त्रण एवं पश्चिमी बर्लिन पर ऐंग्लो-अमरीकी शक्तियों का नियन्त्रण भी सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीच कलह का कारण बना। पश्चिमी शक्तियों द्वारा बर्लिन के अपने अधिकृत क्षेत्र में नई मुद्रा को शुरू करने के फैसले का सोवियत संघ ने कड़ा विरोध किया। यह तनाव और भी बढ़ गया जब सोवियत संघ ने जून, 1948 में बर्लिन की नाकाबन्दी कर दी तथा इसके जवाब में पश्चिमी शक्तियों ने पश्चिमी बर्लिन में वायुयानों द्वारा माल भेजने का निर्णय किया। सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियां बर्लिन के बारे में अपनी नीतियों को लेकर अन्तिम बिन्दु (Dead end) तक पहुँच गई तथा इससे पूर्व तथा पश्चिम में शीत युद्ध तनावों में वृद्धि की गई।

  5. सुरक्षा परिषद् में सोवियत वीटो का बारबार प्रयोग

    सोवियत संघ द्वारा सुरक्षा परिषद् में निरन्तर वीटो के प्रयोग से पश्चिमी शक्तियां बड़ी उत्तेजित हो गईं। सोवियत संग ने ऐसा इसलिए किया ताकि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् किसी भी ऐसे मामले पर निर्णय न दे सके जो सोवियत सरकार के हितों के पक्ष में न हो या हानिकारक हो। पश्चिमी शक्तियों का यह मत था कि सोवियत संघ वीटो शक्ति का प्रयोग केवल पश्चिमी शक्तियों की नीतियों का विरोध करने तथा सुरक्षा परिषद् को अन्तर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा की दिशा में कोई प्रभावशाली कदम उठाने से रोकने के लिए कर रहा था।

  6. शान्ति सन्धियों पर मतभेद

    पश्चिमी शक्तियां सोवियत संघ से इसलिए भी नाराज थीं क्योंकि सोवियत संघ ने पराजित राष्ट्रों के साथ शांति सन्धियों पर विचार-विमर्श करते समय अपने लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करने के बहुत प्रयल किये थे। उदाहरण के लिए, इटली के साथ शांति-सन्धि पर विचार-विमर्श करते समय इटली-यूगोस्लाविया सीमा, ट्रीस्टे (Trieste) तथा क्षतिपूर्ति की समस्या के प्रश्नों पर सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के मध्य गम्भीर मतभेद पैदा हो गए थे। लन्दन सम्मेलन के समय तथा दूसरे सम्मेलनों के समय जो मतभेद पैदा हुआ उनसे पूर्व-पश्चिमी सम्बन्धों को गहरा धक्का लगा।

इन सभी कारणों से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सोवियत संघ के व्यवहार से पश्चिमी शक्तियां बड़े पैमाने पर असंतुष्ट हो गईं। वास्तव में, सन् 1917 से जो साम्यवादी विस्तार का भय लोगों के मन में पैदा हो गया था परन्तु जो कुछ सीमा तक 1942-45 ई. तक धीमा पड़ गया था, एक बार फिर पश्चिमी शक्तियों के दिलों में उभर आया। वे विश्व राजनीति में सोवियत व्यवहार के बारे में काफी आशंकित हो गईं और इसलिए उन्होंने साम्यवादी सोवियत संघ के प्रति कठोर नीति का पालन करने का निश्चय किया। इसी प्रक्रिया में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों ने पूर्व तथा पश्चिमी के बीच राजनीतिक शीत युद्ध का रूप ले लिया।

(B) पश्चिम शक्तियों के विरुद्ध सोवियत शिकायतें

(i) सामान्य शिकायतें

विभिन्न पश्चिमी नीतियों पर सोवियत संघ की नाराज़गी- जैसे पश्चिमी शक्तियों को सोवियत संघ से कई शिकायतें थीं बिल्कुल वैसे ही सोवियत संघ को भी पश्चिमी शक्तियों के विरुद्ध कई सामान्य शिकायतें थीं। सोवियत संघ पश्चिमी शक्तियों की विभिन्न नीतियों तथा कार्यवाहियों से बड़ा रुष्ट और उत्तेजित था। उसके मत में ये नीतियां अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सोवियत संघ की शक्ति तथा भूमिका को सीमित करने के लिए बनाई गई थीं। पहले पहल तो समाजवादी सोवियत संघ में एक प्रति क्रान्ति (Counter Revolution) को उत्साहित करने के पश्चिमी शक्तियों के प्रयलों का सोवियत लोगों द्वारा भारी विरोध किया गया। बाद में हिटलर के जर्मनी को तुष्ट करने की पश्चिमी नीति को सोवियत संघ ने, साम्यवाद के विरुद्ध इटली तथा जर्मनी को खड़ा करने वाली पश्चिमी रणनीति माना। सोवियत संघ यह विश्वास करता था कि पश्चिमी शक्तियां हिटलर को सोवियत संघ की ओर विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करती रही थीं। अतः इसने जर्मनी के साथ अनाक्रमण सुरक्षा समझौता किया ताकि इस तरह की सम्भावना को रोका जा सके। जर्मनी तथा पश्चिमी देशों के बीच युद्ध के समय अलग रहने का इसका निर्णय भी इसी तरह के विचारों का परिणाम था। परन्तु जब जर्मनी ने इस पर आक्रमण किया तो सोवियत संघ के पास ध्रुवी शक्तियों के विरुद्ध पश्चिमी शक्तियों के साथ मिल जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। तथा उसे नाजीवादी तथा फासीवादी सेनाओं को हटाने के लिए पश्चिम के साथ सहयोग करना ही पड़ा था।

(ii) पश्चिम के विरुद्ध सोवियत संघ की विशिष्ट शिकायतें

युद्ध काल में सोवियत संघ ने बहुत से पश्चिमी निर्णयों को ऐसे निर्णय पाया जो दोहरे उद्देश्य वाले थे; ध्रुवी शक्तियों को हराना तथा सोवियत संघ को कमजोर करना। ऐसे निर्णयों का सोवियत नेताओं द्वारा कड़ा विरोध किया गया।

  1. जर्मनी के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलने में देरी

    जब जर्मनी की सेनाएं तेजी से सोवियत संघ में बढ़ रही थीं तो स्टालिन (Stalin) के विचार में जर्मनी के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलने की बड़ी आवश्यकता थी। स्टालिन का विचार था कि केवल ऐसा करने से ही जर्मनी की सेनाओं को सोवियत संघ में आने से रोका जा सकता है तथा इसके साथ सोवियत सुरक्षा पर बड़े दबाव को कम किया जा सकता था। स्टालिन के ऐसे विचारों के विरुद्ध चर्चिल तथा रूज़वैल्ट का कहना था कि जर्मनी के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलना अभी इतनी जल्दी सम्भव नहीं था क्योंकि उसके लिए पूरी तैयारी चाहिए थी। बाद में पश्चिमी शक्तियां दूसरा मोर्चा खोलने के लिए सहमत भी हो गईं परन्तु ऐसा करते समय उन्होंने मध्य यूरोप की ओर से युद्ध करने का निश्चय किया न कि पश्चिम की तरफ से, जैसा को सोवियत संघ चाहता था। दूसरा मोर्चा खोलने में देरी तथा पश्चिम का जर्मनी के विरुद्ध युद्ध के लिए भिन्न दिशा के चुनाव के निर्णय से सोवियत संघ बड़ा बड़ा उत्तेजित हो गया। सोवियत संघ ने इस देरी को जानबूझ कर की जाने वाली देरी माना । उसके विचार में पश्चिमी शक्तियों ने ऐसा इसलिए किया ताकि सोवियत संघ के लोगों को भारी हानि उठानी पड़े। इससे सोवियत संघ को यह विश्वास हो गया कि पश्चिमी शक्तियां अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सोवियत संघ की सक्रिय तथा शक्तिशाली भागीदारी को मानने के लिए तैयार नहीं थीं।

  2. फासीवादी इटली से पश्चिमी सम्बन्ध

    सोवियत संघ का विचार था कि इटली में फांसीवाद के उत्थान के पीछे पूंजीवादियों का हाथ था क्योंकि वे इसे साम्यवाद के विरुद्ध प्रभावशाली विरोध समझते थे। इटली के साथ शांति सन्धि करते समय पश्चिम की सौम्यता तथा अमरीका, इंग्लैण्ड तथा फ्रांस का इटली के साथ सम्बन्ध बढ़ाने की उत्सुकता से सोवियत संघ को और भी अधिक विश्वास हो गया कि साम्यवाद के शत्रु विश्व राजनीति में सोवियत संघ की भूमिका को सीमित करने पर तुल हुए थे।

  3. सोवियत संघ को अपर्याप्त पश्चिमी सहायता

    युद्ध के दौरान पश्चिमी सहायता में देरी तथा अपर्याप्तता से सोवियत संघ, बहुत उत्तेजित हुआ। वह यह अनुभव करता था क्योंकि जर्मनी द्वारा इतने बड़े आक्रमण के कारण उसे इतनी हानि हो रही थी इसलिए पश्चिम का यह कर्त्तव्य बन जाता था कि वह उसे आक्रमण का सामना करने के लिए पर्याप्त सहायता दे। परन्तु उसकी निराशा और भी बढ़ गई जब पश्चिमी देशों ने उसकी कुल आवश्यकताओं का केवल 4% ही सहायता के रूप में दिया और वह भी धीरे-धीरे। इस तरह की पश्चिमी नीति को सोवियत संघ ने जानबूझ कर सोवियत संघ को कमजोर करने वाली नीति माना।

  4. लेंडलीस समझौते का आकस्मिक समापन

    सोवियत संघ को लेंड-लीस समझौते के अन्तर्गत दी जाने वाली सहायता को समाप्त करने के पश्चिमी शक्तियों के निर्णय को सोवियत नेताओं ने बहुत नापसन्द किया। पहले ही सोवियत संघ पश्चिमी शक्तियों द्वारा दी जाने वाली थोड़ी-सी सहायता से असंतुष्ट था। अमरीका के इस निर्णय ने, जो जर्मनी के आत्म-समर्पण से थोड़े ही देर बाद किया गया, आग में घी का काम किया। पराजित देशों से सोवियत संघ द्वारा भारी क्षतिपूर्ति की मांग के पश्चिमी विरोध ने पूर्व-पश्चिम सम्बन्धों को और भी अधिक तनावपूर्ण बना दिया।

  5. अणुबम पर अमरीका की गोपनीयता

    अपनी अणु क्षमता पर अमरीका का गोपनीयता रखने का निर्णय तथा सोवियत नेताओं को विश्वास में लिए बिना जापान पर अणु-बम गिराने का निर्णय भी सोवियत संघ को बहुत कष्टप्रद लगा। सोवियत संघ यह महसूस करता था कि युद्ध का भागीदार होने के कारण युद्ध में प्रयुक्त होने वाले सभी शस्त्रों तथा युद्ध तकनीक पर उसका भी अधिकार है परन्तु अमरीकी ऐसा नहीं सोचते थे। ब्रिटेन तथा कैनेडा को अणु-बम के बारे में बताने के बावजूद अमरीका ने यह बात सोवियत संघ से गुप्त रखी। स्टालिन ने इसे महा-विश्वासघात माना जिससे सोवियत मैत्री तथा सहयोग पर पश्चिम का अविश्वास झलकता था। वह अमरीका के अणु-बम एकाधिकार से बहुत अधिक दुःखी हो गया था इसे सोवियत हितों के लिए भयानक समझने लगा। परमाणु तत्त्व ने पूर्व तथा पश्चिम को दो विरोधी गुटों में बांट दिया।

  6. विभिन्न पश्चिमी निर्णयों पर सोवियत संघ की अस्वीकृति

    पश्चिमी नेताओं द्वारा किये जाने वाले विरोधी प्रचार ने सोवियत संघ को बहुत दुःखी कर दिया। चर्चिल के फल्टन, भाषण, टूमैन सिद्धान्त, मार्शल योजना तथा अमरीकी सीनेट द्वारा खुले रूप से सोवियत विदेशी नीति की आलोचना तथा विस्तारवादी नीति सम्बन्धी दोषारोपण से सोवियत संघ पश्चिमी शक्तियों से अत्यन्त रुष्ट हो गया।

इन सभी तत्त्वों ने सोवियत संघ को पश्चिमी शक्तियों से बेहद असन्तुष्ट कर दिया। सोवियत संघ अपने आप को मानसिक तथा भावनात्मक रूप से पश्चिम से अलग मानने लगा। समाजवादी शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए उसने पूर्वी यूरोप में साम्यवादी राज्यों को एक बनाने का प्रयत्न करने का निर्णय किया। इस जोखिम के कार्य में जो सफलता उसे मिली इससे पश्चिमी शक्तियों तथा सोवियत संघ के बीच मतभेद और भी बढ़ गए। इसी प्रक्रिया में सोवियत संघ ने अपने भूतपूर्व मित्र राष्ट्रों के साथ अपने आप को शीत युद्ध में लिप्त पाया।

निष्कर्ष

इस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बात अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में जो शीत युद्ध शुरू हुआ उसके कई कारण थे। पूर्व तथा पश्चिम के बीच परस्पर शिकायतों से सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीच अविश्वास तथा विरोध का वातावरण पैदा हो गया। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध का आग्भ सन् 1945 के बाद पूर्वोक्त तत्वों द्वारा पैदा किए गए दूषित वातावरण के कारण हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के समापन को अप्रशस्त्र कहा जा सकता है क्योंकि इसने सोवियत संघ तथा पश्चिमी शक्तियों के बीच शीत युद्ध को जन्म दिया। विभिन्न युद्धकालीन दुर्भाग्यपूर्ण निर्णयों तथा युद्धोत्तर परिस्थितियों ने युद्ध समाप्त होने के बाद भी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर तथा ऐसे वातावरण में खड़ा कर दिया जो बहुत समय तक खतरों तथा तनावों से भरा रहा।

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