अंग्रेज एवं फ्रांसीसियों का तृतीय कर्नाटक युद्ध

तृतीय कर्नाटक युद्ध 

तृतीय कर्नाटक युद्ध के शुरू होने का कारण यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध का प्रारम्भ होना था जिसमें इंग्लैण्ड और फ्रांस पुनः एक दूसरे बन गये थे। युद्ध आरम्भ होने के अवसर पर भारत में अंग्रेजों एक फ्रासीसियों के मध्य वही स्थिति थी जो दूसरे कर्नाटक युद्ध के समय थी।

डूप्ले के वापस लौट जाने के उपरान्त फ्रांसीसी कम्पनी में उसके समान कोई योग्य और दूरदर्शी व्यक्ति नहीं रहा। अंग्रेजी कम्पनी की स्थिति दिनोंदिन सुदृढ़ होती जा रही थी। 1757 से प्लासी के युद्ध मे विजय के फलस्वरूप बंगाल में कम्पनी का सिक्का जम चुका था। अतः फ्रांसीसी अत्यन्त उद्विग्न थे। 1754 में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच जो सन्धि हुई थी वह अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती थी और दोनों ही पक्ष भीतर ही भीतर एक दूसरे के विरुद्ध कार्यवाही करने में संलग्न थे। इसी पृष्ठभूमि में तृतीय कर्नाटक युद्ध हुआ।

तृतीय कर्नाटक युद्ध के आरम्भ होने का कारण यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध का आरम्भ होना था जिसमें इंग्लैण्ड और फ्रांस एक दूसरे के विरुद्ध थे। यूरोप में 1756 में युद्ध आरम्भ होते ही भारत स्थित दोनों कम्पनियों ने पैतरेबाजी शुरू कर दी। फ्रांसीसी त्रिचनापल्ली पर पुनः आक्रमण करने की योजना बना रहे थे। और अंग्रेज बुसी को हैदराबाद से निकालने के लिए उत्सुक थे। लेकिन 1756 में भारत में कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं घटी। 1757 में स्थिति एकदम बदल गयी जब अंग्रेज और फ्रांसीसियों ने त्रिचनापल्ली को लेने का असफल प्रयत्न किया, परन्तु कर्नाटक के अधिकांश भागों पर उनका अधिकार हो गया। उत्तर भारत में अंग्रेजों को अधिक सफलता मिली। उन्होंने 1/57 में बंगाल, फ्रांसीसियों के महत्वपूर्ण स्थान चन्द्रनगर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने बालासोर, कासिमबाजार और पटना की फ्रांसीसी फैक्टरियों पर भी अधिकार जमा लिया। परन्तु युद्ध का वास्तविक आरम्भ अप्रैल 1758 में तब हुआ जब फ्रांसीसी सरकार ने काउन्ट डी लैली को भारत के सम्पूर्ण फ्रांसीसी प्रदेशों का प्रमुख सेनापति तथा सम्पूर्ण सैनिक वर्ग असैनिक अधिकारों को प्राप्त करने वाला अधिकारी बनाकर भारत भेजा। लैली को जो कार्य दिये गये थे- अंग्रेजों को सम्पूर्ण भारत से निकाल बाहर करना तथा भारत में फ्रांसीसी शासन में सुधार करना।

लैली बड़ा ही वीर योग्य व्यक्ति था किन्तु उग्र स्वभाव होने के कारण उसे सफलता नहीं मिल सकी। उसने शासन में सुधार के लिए कई कदम उठाये जिससे फ्रांसीसी अधिकारी असन्तुष्ट हो गये। धन का अभाव भी बना रहा। फ्रांसीसी नौ-सेना से भी उसे पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकी। इन सब कारणों से आरम्भ में सफलता पाकर भी लैली अन्ततः असफल रहा। लैली के आते ही भारत में दोनों व्यक्तियों के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गया। उसने आते ही सेंट डेविड के किले पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। अब उसका इरादा मद्रास पर आक्रमण करने का था। लेकिन लैली के सम्मुख आर्थिक समस्या सबसे भयंकर थी। पांडीचेरी के गवर्नर ने कहा कि उसके पास धन बिल्कुल नहीं है। इसी समय अंग्रेजों की सैनिक सहायता आ जाने से लैली को कई युद्ध करने पड़े जिनमें उसके जल-बेड़े को भी क्षति उठानी पड़ी। लैली के क्रोधी स्वभाव एवं दुर्यवहार से क्षुब्ध होकर उसे नौ-सेनापति डी0 एचे भारत छोड़कर मारिशस चला गया। तब भी लैली ने साहस नहीं छोड़ा और धन की कमी को पूरा करने के लिए उसने तंजौर पर आक्रमण किया, पर असफल रहा।

इस प्रकार फ्रांसीसियों की स्थिति दुर्बल हो रही थी। परन्तु तब भी लैली साहसपूर्वक दिसम्बर, 1758 में मद्रास का घेरा डाल दिया। इस अवसर पर उसने फ्रांसीसियों की सम्पूर्ण शक्ति को एकत्रित करने का इरादा किया और इस उद्देश्य से बुसी को भी हैदराबाद से बुलाया। यद्यपि बुसी लैली की इसी नीति से सहमत न था परन्तु तक भी उसने लैली का आज्ञा पालन किया। बुसी के हैदराबाद से चले आने से फ्रांसीसियों की काफी हानि हुई। इस अवसर पर क्लाइव ने एक सेना बंगाल से भेज दी थी जिसने आते ही मछलीपट्टम पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। हैदराबाद के निजाम सलाबतजंग, जो डरपोक था, भयभीत हो गया और उसने मछलीपट्टम तथा एक अन्य भू-भाग अंग्रेजों को देकर उनसे सन्धि कर ली। इस प्रकार बुसी के हटते ही हैदराबाद से फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया। इसके अतिरिक्त भी बुसी राजनीति कूटनीति, सन्धियों और वार्ता से हैदराबाद में ही रहकर फ्रांसीसी प्रभाव को बढ़ाने के पक्ष में था। इसके विपरीत, लैली एक सैनिक था जो शक्ति और युद्धों के आधार पर अंग्रेजों को भारत से निकालकर फ्रांसीसी प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। उसने स्वयं बुसी को लिखा था कि “राजा और कम्पनी ने मुझे अंग्रेज कम्पनी को भारत से बाहर निकालने के लिए भेजा है……मुझे इनसे मतलब नहीं है कि किस राजा का किससे क्या झगड़ा है और कौन कहाँ नवाब।”

मद्रास के घेरे में फ्रांसीसी पूरी तरह असफल रहे और फरवरी, 1759 में उन्हें घेरा हटाना, पड़ा। वस्तुतः मद्रास पर घेरा डालना ही एक मूर्खतापूर्ण कार्य था, क्योंकि नौसेना के अभाव में मद्रास विजय का कोई महत्व नहीं था। दूसरी ओर अंग्रेजों को सैनिक सहायता प्राप्त हो गई जिससे लैली को पराजय का ही मुँह देखना पड़ा। इस समय लैली की दशा अत्यन्त शोचनीय हो रही थी। 1761 में अंग्रेज जनरल सर आयरकूट ने डीवास नामक स्थान पर लैली को भीषण रूप से पराजित किया। बुसी बंदी बना लिया गया तथा 1760 में पॉडीचेरी पर अधिकार कर अंग्रेजों ने वहाँ की किलेबन्दी को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। एन० के० सिन्हा ने लिखा है कि “इस सुन्दर और सम्पन्न नगर में एक भी छत नहीं छोड़ी गई।” इस प्रकार फ्रांसीसियों की शक्ति का आधार ही नष्ट हो गया। लैली को बन्दी बनाकर फ्रांस भेजा गया जहाँ देश-द्रोह का आरोप लगाकर उसे 1766 में मृत्यु-दंड मिला।

वैंडीवास का युद्ध एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ। इसने सदा के लिए फ्रांसीसियों के भाग्य का फैसला कर दिया। इस युद्ध के महत्व पर टिप्पणी करते हुए मैलेसन ने लिखा है। “वैंडीवास के युद्ध ने उस महान भवन का, जिसे मार्टिन, डयूमा तथा डूप्ले ने निर्मित किया था, ध्वस्त कर दिया। उसने लैली की सभी आशाओं पर पानी फेर दिया। उसने पांडीचेरी के भाग्य पर मुहर लगा दी।” डाडवेल के अनुसार बैंडीवास के युद्ध ने पिछले नौ वर्षों के कार्य को समाप्त कर दिया और उस डूप्ले तथा बुसी के कार्य को एक पक्ष के लिए केवल यादगार और दूसरे पक्ष के लिए आशाएँ बनाकर छोड़ दिया।”

1763 में पेरिस की संधि के द्वारा यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध का अन्त हुआ। भारत के सम्बन्ध में भी इस सन्धि में व्यवस्थाएँ थीं । फ्रांसीसियों को पांडीचेरी और चन्द्रनगर वापस मिल गये परन्तु अब वे वहाँ किलेबन्दी नहीं कर सकते थे।

तृतीय कर्नाटक युद्ध का महत्व

कर्नाटक का तृतीय युद्ध निर्णयात्मक साबित हुआ। युद्ध में पराजय के फलस्वरूप भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना के सारे अवसर नष्ट हो गये। पेरिस की सन्धि के द्वारा पांडीचेरी तो फ्रांसीसियों को वापस मिल गया लेकिन अब उसका कोई महत्व नहीं रहा। फ्रांसीसियों में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने की क्षमता भी समाप्त हो गई। यह ठीक है कि इस युद्ध के बाद भी फ्रांसीसी भारतीय नरेशों की सहायता करके कहीं-कहीं अंग्रेजों के विरुद्ध कार्य करते रहे परन्तु वह सहायता एक स्वतन्त्र शक्ति के रूप में नहीं थी। फ्रांसीसी या तो उस समय सैनिक या अधिक-से-अधिक सेना-शिक्षकों की स्थिति में थे। इस प्रकार, तृतीय कर्नाटक युद्ध के बाद फ्रांसीसी शक्ति भारत में लगभग समाप्त हो गई। कर्नाटक के तीन युद्धों ने पूर्ण रूप से भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना की सब संभावनाएँ नष्ट कर दी।

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