अंग्रेज़ एवं फ्रांसीसी संघर्ष का कारण 

अंग्रेज़ एवं फ्रांसीसी संघर्ष का कारण 

18वीं सदी के प्रथम अर्द्ध-भाग में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के सम्बन्ध भारत में बहुत अच्छे रहे। इसी कारण यद्यपि यूरोप में स्पेन के उत्तराधिकार के युद्ध के अवसर पर इंग्लैण्ड और फ्रान्स ने एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध लड़ा परन्तु भारत में कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण दोनों कम्पनियों ने कोई झगड़ा नहीं किया। अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही व्यापार करने के लिए भारत आये थे और धन प्राप्त करना दोनों का लक्ष्य था। युद्ध उनके व्यापार और आर्थिक लाभ में बाधा उपस्थित करता था। इस कारण युद्ध की अपेक्षा शांति एवं मित्रता दोनों के लिए लाभदायक थी। उस समय दोनों ही कम्पनियों की स्थिति दृढ़ न थी और दोनों को अपने देश से बाहर निकल जाने के आदेश दे देगा। इस कारण अंग्रेज और फ्रान्सीसियों के सम्बन्ध पर्याप्त समय तक अच्छे रहे, यहाँ तक कि जैसा लिखा गया है, “अंग्रेज और फ्रांसीसियों के सम्बन्ध इतने अच्छे रहे कि फ्रांसीसी अपना व्यक्तिगत और व्यापारिक सामान सुरक्षा की दृष्टि से पाण्डिचेरी से मद्रास भेजा करते थे।”

परन्तु अंग्रेज और फ्रांसीसियों के सम्बन्ध बहुत लम्बे समय तक अच्छे नहीं रह सकते थे। दोनों कंपनियों का उद्देश्य भारत से व्यापार करके आर्थिक लाभ कमाना था। इस कारण दोनों की आर्थिक प्रतिद्वन्द्विता अनिवार्य थी और इसी कारण बाद में राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हुई।

भारत में पुर्तगाली और डचों की शक्ति क्षीण होने के बाद अंग्रेजों के मुख्य प्रतिद्वन्द्वी फ्रांसीसी ही रह गये थे। जैसे ही मुगल साम्राज्य पतनोन्मुख हुआ वैसे ही इन विदेशी जातियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग उठी। उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा ने तुरन्त ही यह स्थिति पैदा कर दी कि दो में से किसी एक के लिये ही भारत में स्थान सकता है। उस समय स्थिति फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेजों के अधिक अनुकूल थी। पश्चिमी तट पर अंग्रेजों की प्रसिद्ध बस्ती कलकत्ता और मद्रास थे तथा फ्रांसीसियों की चन्द्रनगर एवं पांडिचेरी। बम्बई, कलकत्ता और मद्रास की अंग्रेजी बस्तियों की तुलना में फ्रांसीसी बस्तियों का महत्व बहुत कम था। अंग्रेजों की सामुद्रिक शक्ति की श्रेष्ठता ने भी अनेक प्रतिद्वन्द्वी फ्रांसीसियों को बहुत पीछे छोड़ दिया था। अंग्रेजों के  व्यापार का पलड़ा भी भारी था। उनके जहाज अपेक्षाकृत विशाल थे तथा उनका व्यापार नियमित था जबकि फ्रांसीसी कम्पनी का व्यापार अनियमित तथा अनिश्चित था। अंग्रेजी कम्पनी व्यक्तिगत व्यापारियों की एक महान निजी संस्था थी जिसे व्यक्तिगत साहस का आधार और सहयोग प्राप्त था, परन्तु फ्रांसीसी कम्पनी प्रायः स्वाभाविक व्यापारिक प्रेरणा और उत्साह की अपेक्षा राजकीय संरक्षण की ही सन्तान रही। अंग्रेज कम्पनी का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए उसके कर्मचारी निरन्तर उसकी उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहते थे। अंग्रेजी कम्पनी भारतीय व्यापार से होने वाले मुनाफे पर निर्भर करती थी और वह राजकीय सहायता का मुँह नहीं ताकती थी। पर फ्रांसीसी कम्पनी निरन्तर देशी युद्धों में व्यस्त हो गई तथा व्यापार के प्रति उदासीन होने के कारण वह फ्रांसीसी सरकार के ऋण भार से बोझिल हो गई। अंग्रेजी कम्पनी इसके विपरीत अपने व्यापारिक कौशल के कारण इंग्लैण्ड की सरकार को आवश्यकता पड़ने पर ऋण उधार देने की स्थिति में थी। इसलिए कहने को तो अंग्रेजी कम्पनी कानूनी अथवा औपचारिक रूप से सरकार से सम्बद्ध न थी परन्तु अपने डायरेक्टों (जो पार्लियामेंट के भी सदस्य होते थे), पर धन और साधनों के कारण वह राष्ट्रीय नीति पर असाधारण प्रभाव डाल सकती थी। अपने उपनिवेशों की स्थिति, आर्थिक सम्पन्नता, जल-शक्ति, व्यावसायिक सम्पत्ति और भौतिक साधनों की दृष्टि से अंग्रेजी कम्पनी की स्थिति अधिक उत्तम थी।

इसी समय डूप्ले नामक व्यक्ति भारत में फ्रांसीसी प्रदेशों का डाइरेक्टर जनरल नियुक्त हुआ। उस समय अंग्रेजों की शक्ति निरन्तर बढ़ रही थी। डूप्ले ने बड़ी सावधानी से भारतीय स्थिति का अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि व्यापार के क्षेत्र में वह अंग्रेजों को पराजित नहीं कर सकता है। अतः फ्रांसीसी व्यापार को अधिक प्रोत्साहन देने के स्थान पर फ्रांसीसी राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की ओर वह अधिक आकर्षित हुआ। उसने इस बात का अनुभव कर लिया कि अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उसे अंग्रेजों से संघर्ष करना पड़ेगा। अतएव उसने भारत में फ्रांसीसी शक्ति को संगठित करने का निश्चय किया। उसने पांडिचेरी की किलाबन्दी की। अंग्रेजों ने भी अपनी सैनिक शक्ति बढ़ानी शुरू की। इन दोनों विदेशी जातियों का यह विश्वास जम गया कि उनकी राजनीतिक और व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति कूटनीतिक तथा सैनिक शक्ति के बल पर ही हो सकती थी। अतः उन्होंने अपनी-अपनी सैनिक शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी। अंगेजों ने भारतीयों को भरती करके उन्हें अंग्रेजी ढंग से सैनिक शिक्षा देना आरम्भ किया और फ्रांसीसियों ने उन्हें फ्रेन्च सैनिक पद्धति का प्रशिक्षण दिया। उस समय भारतीय सैनिकों की कोई राष्ट्रीय आकांक्षा नहीं थी। वे अधिकांशतः केवल आर्थिक लाभ के लिए ही विदेशी सेना में भरती होते थे।

ऐसी परिस्थिति में अंग्रेज और फ्रांसीसियों के मध्य संघर्ष का होना अवश्यम्भावी गया। इस संघर्ष के प्रमुख मौलिक कारण निम्नलिखित थे-

  1. अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष का पहला कारण उनकी आपसी व्यापारिक स्पर्धा थी। दोनों ही कम्पनियों की आकांक्षा थी कि वे भारत के विदेशी व्यापार पर एकाधिकार कायम कर लें।
  2. दोनों कम्पनियों का उद्देश्य एक दूसरे को भारत से निकालकर अपनी-अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएँ पूरी करना था। भारत की राजनीतिक अवस्था से अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों अधिकाधिक लाभ उठाना चाहते थे।
  3. यूरोपीय राजनीति की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रतिध्वनि भारतीय क्षेत्रों में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों को अप्रभावित नहीं छोड़ती थी यद्यपि इसमें भारत की तत्कालीन परिस्थितियों का भी योग रहता था। वाल्तेयर ने कहा था कि “हमारे देश में चलने वाली पहली गोली अमेरिका और एशिया के सब तोपखानों में मानों दियासलाई दिखा देती थी।’ इस समय ये दोनों राष्ट्र यूरोप में एक-दूसरे के प्रबल विरोधी थे। फ्रांस यूरोप में प्रभुत्व स्थापित करने की उद्धिग्न था और इंग्लैण्ड शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए फ्रांसीसी प्रयत्नों का विरोधी था। इन दोनों के बीच गहरी औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा थी। उत्तरी अमेरिका में दोनों ही देशों के उपनिवेश थे तथा दोनों ही की इच्छा थी कि दूसरे उपनिवेश भी उसके अधिकार में आ जाय। अतः उनमें युद्ध छिड़ना अनिवार्य हो गया था। दोनों राष्ट्रों का आपसी बैर विरोध उन्हें हर जगह संघर्ष के लिए मजबूर कर रहा था।

1740 में फ्रांसीसी सरकार ने अनिवार्य भावी घटनाओं को पहले से ही समह कर, दोनों राष्ट्रों की भारत में स्थित बस्तियों को तटस्थ बनाने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्मुख कुछ प्रस्ताव रखे। इस समझौते को कार्यान्वित कराने में डुप्ले असफल रहा। आस्ट्रिया के उत्तराधिकार के युद्ध में अंग्रेज और फ्रांसीसी उलझ गये। यूरोपीय युद्ध की प्रतिक्रिया भारत में अंग्रेज़ और फ्रांसीसी शक्ति पर पड़ना स्वाभाविक था। अतः 1740 में यहाँ भी युद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों के बीच जो युद्ध हुए वे कर्नाटक प्रदेश में लड़े गये थे। अतः इतिहास में उनका नाम कर्नाटक युद्ध पड़ा। दोनों कम्पनियों में तीन कर्नाटक युद्ध हुए। इन युद्धों से दक्षिण में फ्रांसिसियों का प्रभुत्व सदा के लिए लुप्त हो गया और भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने के उनके सपने चूरचूर हो गये।

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