भारत में पुर्तगाली का आगमन, विकास तथा असफलता के कारण

भारत में पुर्तगाली आगमन

भारत में जो यूरोपीय जातियाँ व्यापार करने के उद्देश्य से आई उनमें सबसे पहला स्थान पुर्तगालियों का था।उन लोगों ने यहाँ के व्यापार पर अधिकार करने और अंततः यहाँ की राजनीति में हिस्सा लेकर अपने लिए सुविधाएँ प्राप्त करने की चेष्टा की, परन्तु अपने इस प्रयास में वे सफल नहीं हो सके।

भारत में पुर्तगाली शक्ति की स्थापना और विकास

भारत में पुर्तगालियों का आगमन 17 मई 1498 को तब हुआ जब एक साहसी पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा कालीकट के तट पर पहुंचा। वहाँ के तत्कालीन शासक जमीरन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया और उसके अनुरोध पर कालीकट में बसने और व्यापार करने की सुविधा प्रदान की। इससे अरबों के व्यापारिक हितों को क्षति पहुँची; क्योंकि भारतीय व्यापार पर अरबों का एकाधिकार था। अतः, अरबों और पुर्तगालियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा आरम्भ हो गई। पुर्तगाली अरबों के विरोध के बावजूद अपनी शक्ति बढ़ाते चले गए। भारत में पुर्तगाली शक्ति का विकास विभिन्न चरणों में हुआ।

प्रथम चरणः सशस्त्र व्यापार की नीति-

आरम्भ में पुर्तगालियों ने ‘सशस्त्र व्यापार’ की नीति अपनाई। 1505 ई0 तक वे इसी नीति का अनुसरण करते रहे। इस नीति के अनुसार, प्रतिवर्ष एक सशस्त्र पुर्तगाली व्यापारिक बेड़ा भारत आकर और यहाँ से माल लेकर पुर्तगाल चला जाता। इसके साथ ही साथ पुर्तगालियों ने भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास भी किया। अरबों के विरोध के बावजूद उन लोगों ने कालीकट, कोचीन तथा कन्नानोर में व्यापारिक केन्द्र कायम कर लिए। इतना ही नहीं, उन्होंने कालीकट की पुर्तगाली बस्ती की किलेबन्दी कर ली तथा कोचीन के शासक के साथ, जो जमोरिन का शत्रु था, अपने निकट संबंध कायम करने प्रारम्भ कर दिए। पुर्तगालियों के अरब व्यापारियों को तंग करने तथा उन्हें सताने भी आरम्भ कर दिए। कालीकट के शासक जमोरिन की अरब व्यापारियों से अच्छी घनिष्ठता थी; क्योंकि अरब व्यापारियों के बल पर ही उसकी आर्थिक संपन्नता टिकी हुई थी। अतः, अरबों का विश्वास जीतने के लिए उसने पुर्तगालियों को सेना के बल पर दबाने का प्रयास किया, परन्तु इस प्रयास में वह असफल रहा। जमोरिन की असफलता ने पुर्तगालियों के हौसले बुलंद कर दिए और वे नए जोश-खरोश के साथ अपनी शक्ति-विस्तार के प्रयास में लग गए।

द्वितीय चरण : नीले पानी की नीति-

इसी समय डी-अल्मेडा भारत में पुर्तगाली अधिकृत क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त होकर भारत आया। वह एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति था और भारत में पुर्तगाली शक्ति का विस्तार करना चाहता था। इसके लिए उसने पहले की नीति त्यागकर ‘नीले पानी की नीति’ का अनुसरण किया जिसका उद्देश्य हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का प्रभुत्व स्थापित करना था। उसने पुर्तगाली सम्राट को कहा था, “यह निश्चित है कि जबतक पुर्तगाल समुद्र पर शक्तिशाली रहेगा, तबतक भारत पर आपका अधिकार रहेगा और यदि आपकी यह शक्ति निर्बल होगी तो आप समुद्रतट के दुर्ग से अधिक सहायता प्राप्त न कर सकेंगे।” इस नीति के अनुसार डी-अल्मेडा ने काम भी किए। उसने मालाबार तट तथा अफ्रीका के पूर्वी तट पर पुर्तगालियों का आधिपत्य कायम कर दिया। अरबों की शक्ति को भी उसने काफी क्षति पहुँचाई, परन्तु अपने प्रयास में वह पूरी तरह सफल नहीं हो सका। 1509 ईo में वह वापस पुर्तगाल चला गया, जहाँ मिस्र-पुर्तगाल युद्ध में पराजय के कारण उसकी हत्या कर दी गई।

तृतीय चरण : साम्राज्यवादी नीति-

डी-अल्मेडा के पश्चात पुर्तगाली गवर्नर बनकर अलफांसो डी-अल्बुकर्क 1509 ई० में भारत आया। भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक अल्बुकर्क ही था। उसने एक नई नीति का पालन किया। उसकी नीति साम्राज्यवादी थी। उसका विचार था कि चूंकि भारत पुर्तगाल से दूर था और आवश्यकता पड़ने पर शीघ्र पुर्तगाली सहायता उपलब्ध नहीं हो सकती थी, इसलिए भारत में ही पुर्तगाली शक्ति को सुदृढ़ करना आवश्यक था। इसके लिए उसने अनेक प्रयास किए। 1510 ई० में उसने गोवा के बंदरगाह पर जो बीजापुर साम्राज्य के अंतर्गत था, बलात् अधिकार कर लिया तथा इसके व्यापारिक महत्व को बढ़ाने का सफल प्रयास किया। गोवा के अतिरिक्त उसने मलक्का तथा फारस की खाड़ी के द्वीप होरमुज को भी जीत लिया और कोचीन में पुर्तगाली दुर्ग का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त पुर्तगालियों की स्थिति मजबूत करने के लिए उसने अन्य कदम भी उठाए। गोवा को पुर्तगाली शक्ति का केन्द्र बनाने का प्रयास किया गया। वहाँ पुर्तगालियों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से उन्हें भारतीय (हिन्दू) स्त्रियों से विवाह करने को प्रोत्साहित किया गया। यही नीति अन्य पुर्तगाल अधिकृत क्षेत्रों में भी अपनाई गई। बड़ी संख्या में भारत में पुर्तगाली अधिकारी भी नियुक्त किए गए। उसके इन कार्यों ने पुर्तगालियों की स्थिति अत्यधिक मजबूत कर दी, परन्तु उसकी धार्मिक नीति विद्वेषपूर्ण थी। हिन्दू-मुसलमान प्रजा में विभेद कर उसने पुर्तगाली शक्ति की जड़े भी कमजोर कर दी। इसके बावजूद अल्बुकर्क की नीति के कारण भारत में पुर्तगाली शक्ति सुदृढ़ हो गई। 1515 ई0 तक पुर्तगाली भारत में सुदृढ़ नौ शक्ति के रूप में प्रकट हो चुके थे। भारत के पश्चिमी किनारे पर उनकी स्थिति मजबूत हो चली थी।

अल्बुकर्क के पश्चात पुर्तगालियों की स्थिति-

1515 ई0 में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई। उसे गोवा में ही दफनाया गया। अल्बुकर्क के पश्चात भी पुर्तगाली शक्ति का निरंतर विकास होता चला गया। उसके उत्तराधिकारी लोपोसारस के समय में (1518 ई0) पुर्तगालियों ने श्रीलंका (कोलंबो) में किलेबंदी कर ली तथा चटगाँव तक जा पहुँचे। धीरे-धीरे उनकी शक्ति का विस्तार होता रहा। शीघ्र ही पुर्तगाली आधिपत्य डियू, डामन, सालिसेट, बेसीन, चौल, बम्बई, मद्रास, हुगली आदि जगहों पर कायम हो गया। उन्होंने अंगरेजों के समान भारत के अन्दर प्रवेश करने की चेष्टा नहीं की, बल्कि वे विजयनगर तथा मुगल साम्राज्य की सीमा में अपने व्यापारिक और धार्मिक कार्यों में व्यस्त रहे। यद्यपि पुर्तगालियों ने भारत में सर्वप्रथम यूरोपीय व्यापारियों के रूप में प्रवेश किया और लगभग एक शताब्दी के अन्दर अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली, परन्तु उनका आधिपत्य स्थायी सिद्ध नहीं हो सका। 17वीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण से उनकी शक्ति कमजोर पड़ने लगी और धीरे-धीरे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्र उनके हाथों से निकल गए। भारत में पुर्तगाली शक्ति के कमजोर पड़ने के अनेक कारण थे।

भारत में पुर्तगालियों की असफलता के कारण

जिस तीव्रता से पुर्तगाली शक्ति का विस्तार हुआ था, उसी तेजी के साथ उसका पतन भी हुआ। पुर्तगालियों के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

पुर्तगाल पर स्पेन का अधिकार-

पुर्तगालियों के पतन का सबसे महत्वपूर्ण कारण था 1580 ई० में पुर्तगाल पर स्पेन के राजा फिलीप द्वितीय का अधिकार हो जाना। स्पेन के शासक ने भारतीय व्यापार और उपनिवेशों में कोई दिलचस्पी नहीं ली। इतना ही नहीं, पुर्तगालियों पर अनेक व्यापारिक प्रतिबंध भी लाद दिए गए। स्पेनी पुर्तगाली बस्तियों की व्यवस्था ठीक ढंग से नहीं कर सके। चारों तरफ अव्यवस्था और अराजकता फैल गई। स्पेन की सहायता के अभाव में भारत में पुर्तगालियों की स्थिति खतरे में पड़ गई। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अपने राजा की सहायता नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप, पुर्तगालियों की व्यापारिक एवं सैनिक शक्ति दिनोदिन कमजोर पड़ती चली गई। एक-एक कर सारे अधिकृत क्षेत्र उनके हाथों से निकलते चले गए। सर्वप्रथम डचों ने एम्बोयना पर अपना अधिकार जमा लिया। इसी प्रकार, मलक्का (1640 ई०), श्रीलंका (1656 ई0) और बेसीन (1739 ई0) क्रमशः डचों और मराठों ने पुर्तगालियों से छीन लिए, परन्तु गोवा, डामन और डियू पर उनका अधिकार बहुत दिनों तक कायम रहा। इन्हें भारत की स्वतंत्रता के पश्चात ही पुर्तगाली नियंत्रण से वापस लिया जा सका।

विजयनगर साम्राज्य का पतन-

विजयनगर साम्राज्य के पतन ने भी पुर्तगाली शक्ति को धक्का पहुँचाया। वहाँ के हिन्दू शासकों ने पुर्तगालियों को अनेक व्यापारिक सुविधाएं प्रदान कर रखी थीं। विजयनगर का राज्य पुर्तगाली व्यापार का एक प्रमुख केन्द्र था, परन्तु इस राज्य के पतन के पश्चात उनका व्यापार लगभग नष्ट हो गया। वहाँ के नए शासकों ने पुर्तगालियों को प्रश्रय नहीं दिया।

अयोग्य अधिकारी-

प्रारम्भिक पुर्तगाली अधिकारी देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर भारत में अपनी शक्ति का विस्तार करने के प्रयास में लगे रहे। अल्मेडा, अल्बुकर्क जैसे योग्य और महत्वाकांक्षी गवर्नरों के अधीन पुर्तगालियों की शक्ति का निरंतर विकास होता रहा, परन्तु अल्बुकर्क के पश्चात जो पदाधिकारी भारत भेजे गए वे अयोग्य थे। उनमें राजनीतिक दूरदर्शिता और व्यक्तिगत शौर्य का सर्वथा अभाव था। फलताः, वे साम्राज्य के हितों की ठीक से रक्षा नहीं कर पाए। परिणामस्वरूप, पुर्तगाली शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई।

दोषपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था-

पुर्तगालियों की प्रशासनिक व्यवस्था भी दोषपूर्ण थी। उनके अधिकारी भ्रष्ट, विलासी, लालची और रिश्वतखोर थे। अधिकृत क्षेत्रों में शांति-सुव्यवस्था तथा न्याय की समुचित व्यवस्था नहीं की गई थी। इसमें पुर्तगालियों को जनसमर्थन प्राप्त नहीं हो सका। इसके अतिरिक्त पदाधिकारी भी भ्रष्ट थे। चूंकि, उन्हें सरकार से वेतन कम मिलता था इसलिए वे व्यक्तिगत हितसाधना में संलग्न रहे। धन प्राप्त करने के लिए उन्होंने प्रत्येक संभव प्रयास किए। धन प्राप्त होने से उनमें विलासिता की भावना आ गई। प्रशासनिक कार्यों से तटस्थ रहकर वे भोग-विलास में लिप्त हो गए। ऐसी अवस्था में उनका पतन अनिवार्य था।

पुर्तगाल के सीमित साधन-

एक छोटा देश होने के कारण पुर्तगाल के साधन अत्यंत सीमित थे। इसके पास इतनी शक्ति या इतने विकसित साधन नहीं थे कि वह भारत जैसे विशाल देश पर अपना आथिपत्य जमा सके।

ब्राजील की खोज-

नए देशों की खोज के क्रम में पुर्तगाल ने ब्राजील का भी पता लगाया। फलस्वरूप, उसका ध्यान ब्राजील की तरफ भी मुड़ गया। उसकी औपनिवेशिक गतिविधियाँ ब्राजील में अधिक बढ़ गई। ग्राजील में पुर्तगालियों को कम प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। फलतः भारत से ज्यादा उनका ध्यान ब्राजील की तरफ चला गया।

मुगलों और मराठों का प्रतिरोध-

पुर्तगालियों को भारत में मुगलों की शक्ति का भी कोपभाजन बनना पड़ा। जिस समय पुर्तगाली भारत आए यहाँ की राजनीतिक स्थिति अस्थिर थी, परन्तु शीघ्र ही मुगलों ने समस्त भारत पर अपना एकछत्र राज्य कायम कर लिया। वे पुर्तगालियों की गतिविधियों को शंका की दृष्टि से देखते थे और उनके बढ़ते प्रभाव को नष्ट करने को कटिबद्ध थे। अकबर की धार्मिक नीति के कारण मुगलों और पुर्तगालियों के बीच संबंध मैत्रीपूर्ण रहे। जहाँगीर के शासनकाल में पुर्तगालियों को मुगलों का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी धृष्टता से क्रुद्ध होकर जहाँगीर ने डामन के विरुद्ध सेना भेजी तथा ईसाई मिशनरियों प्रचार-कार्यों पर प्रतिबंध लगा दिया। शाहजहाँ के समय में अनेक पुर्तगाली मारे गए तथा हुगली उनसे छीन लिया गया। पुर्तगाली मुगलों की शक्ति का सामना नहीं कर सके। इसी प्रकार, पुर्तगालियों को मराठों की शक्ति से भी लोहा लेना पड़ा। मराठों ने उनसे बेसीन हस्तगत कर लिया। इन दो जबर्दस्त शक्तियों का मुकाबला पुर्तगाली नहीं कर पाए और उन्हें भारत में पाँव जमाने का मौका नहीं मिल सका।

यूरोपीय प्रतिद्वद्वियों का सामना-

पुर्तगालियों के पतन का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह था कि उन्हें अन्य यूरोपीय जातियों, डचों, अंगरेजों और फ्रांसीसियों के बढ़ते प्रभुत्व और व्यापारिक एवं राजनीतिक गतिविधियों का मुकाबला करना पड़ा। पुर्तगालियों की अपेक्षा डच, अंगरेज तथा फ्रांसीसी ज्यादा कुशल एवं साधन संपन्न थे। 16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इन विकासशील, व्यापारिक और नौसैनिक शक्तियों ने विश्व व्यापार पर स्पेन तथा पुर्तगाल के एकाधिकार के विरुद्ध भीषण संघर्ष आरंभ कर दिया। इस कारण पुर्तगाली शक्ति कमजोर पड़ गई। उन्हें अपनी-अपनी सरकार का पूरा समर्थन भी प्राप्त था, जो पुर्तगालियों को उपलब्ध नहीं था। फलतः, पुर्तगाली नवागंतुक यूरोपीय शक्तियों का सफलतापूर्वक सामना नहीं कर सके।

पुर्तगालियों की धार्मिक नीति-

पुर्तगालियों के पतन के लिए उनकी धार्मिक नीति भी काफी हद तक उत्तरदायी थी। अपने धर्मप्रचार के क्रम में उन लोगों ने भारतीय जनता को जबर्दस्ती ईसाई धर्म अपनाने को बाध्य किया। पुर्तगालियों ने जनता के सामने ईसाई धर्म या तलवार को एक-दूसरे के विकल्प रूप में रखकर अपनी धार्मिक असहिष्णुता का परिचय दिया। इसके लिए धार्मिक न्यायालयों की स्थापना भी की गई। गैर-ईसाई प्रजा की धार्मिक भावना पर कठोर आघात किए गए। फलस्वरूप, पुर्तगाली जन-समर्थन प्राप्त नहीं कर सके और उन्हें स्थानीय जनता का कोपभाजन बनना पड़ा।

अन्य कारण-

ऊपर वर्णित कारणों के अतिरिक्त अन्य अनेक कारणों ने भी पुर्तगालियों की शक्ति को क्षति पहुँचाई। वे भारतीयों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे। उन्होंने भारतीयों पर अनेक सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिबंध लाद रखे थे। वे निर्दोष जनता को तंग करते थे तथा लूट खसोटकर संपत्ति अर्जित करते थे। बर्नियर स्पष्ट शब्दों में कहता है कि “हाट के दिनों में तथा जब लोग विवाह का उत्सव करने अथवा किसी त्योहार कर को मनाने एकत्रित होते थे, वे गाँव की प्रायः सारी आबादी को पकड़ ले जाते थे।” उनकी धृष्टता तथा उदंडता इतनी कि बढ़ गई थी कि उन लोगों ने मुगल व्यापारिक जहाजों पर हमला किए तथा बेगम मुमताज महल की दो दासियों को बंदी बना लिया। फलतः, उन्हें मुगलों की क्रोधाग्नि झेलनी पड़ीं। पुर्तगालियों में दूरदर्शिता का सर्वथा अभाव था और वे मानसिक जड़ता से पीड़ित थे। उन्होंने अन्य यूरोपीय जातियों की तरह अपनी युद्धकला को विकसित करने का प्रयास नहीं किया। उनकी व्यापारिक नीति भी दोषपूर्ण थी।

इस प्रकार, पुर्तगालियों की चारित्रिक और प्रशासनिक दुर्बलताएँ, उनकी धर्माधता की नीति, पुर्तगाल की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति, भारतीय शक्तियों का प्रतिरोध और भारत में नई यूरोपियन जातियों के आगमन ने पुर्तगाली शक्ति को नष्ट कर दिया। भारत के व्यापार और राजनीति पर एकछत्र प्रभुत्व कायम करने का उनका स्वप्न भंग हो गया और उनका प्रभुत्व भारत के कुछ द्वीपों तक ही सीमित कर दिया गया।

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