सल्तनतकालीन राजनीति में अमीरों की भूमिका

सल्तनतकालीन राजनीति में अमीरों की भूमिका

अमीर वर्ग व राजनीति

सल्तनत काल के शुरुआती वर्षों में अमीर वर्ग आधार लाभ की भाँति कार्य करता था। बरनी ने तत्कालीन राज्यों के वैभव तथा विकास हेतु अमीर वर्ग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि- “सुलतान गयासुद्दीन ने अनेक बार सबके सामने घोषणा की थी कि मैं किस तरह खुदा सामने अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सकता हूँ क्योंकि उसने मुझे ऐसे सहायक तथा मित्र प्रदान करके सम्मानित किया है जो मुझसे हजार गुना अच्छे हैं। सुलतानों के निश्चित किये गय, नियमों के अनुसार वे मेरे आगे-पीछे फिरते रहते हैं, मेरे सामने अपना हाथ फैलाते हैं और मेरे सामने दरबार में खड़े रहते हैं। मुझे प्रतिष्ठा तथा सम्मान के कारण लज्जा आती है तथा मेरी यह इच्छा करती है कि राजसिंहासन से नीचे उतरकर उनके हाथ-पैर चूम लूँ।”

अमीर वर्ग का सल्तनत के विस्तार तथा उसके सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान रहा। कुछ अमीर राज्य में अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं, वे सुलतान के हुक्म के मातहत नहीं थे। इल्तुतमिश के शासनकाल में ही इन्हें एक सुसंगठित दल के रूप में पहचाना गया। यह गुट “चालीस अमीरों के दल” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इल्तुतमिश ने अपनी कार्य क्षमता तथा जागरूकता से अमीर वर्ग पर अपना नियन्त्रण बनाये रखा था, लेकिन उसके मृत्योपरंत सत्ता हथियाने हेतु आपाधापी मच गयी। चालीसा अमीरों का दल अब और शक्तिशाली गुट बन गया। इन सभी ने एक-एक क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया तथा क्षेत्र विशेष के सर्वेसर्वा बन गये, लेकिन उनमें अब ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी, कोई भी एक दूसरे के आगे सिर न झुकाता, न ही एक दूसरे का आधिपत्य स्वीकार करता। प्रत्येक व्यक्ति अपने शुभचिंतक को गद्दी पर देखना चाहता था। इस प्रकार खिलजी के शासनकाल से पूर्व ही अमीर वर्ग की शक्ति तथा उनके संगठन का उदभव आरम्भ हो गया था, लेकिन सुलतान गयासुद्दीन बलबन ने इल्तुतमिश काल के अमीरों के स्वच्छन्द व्यवहार तथा कार्यों से राज्य को होने वाली हानि की ओर ध्यान दिया, उसने सुलतान बनने तक ‘चालीस अमीरों के दल’ को प्रभावहीन बना दिया था, परन्तु वह उमरा लोगों के पद तथा प्रतिष्ठा की महत्ता को न नकार सका। यही कारण है कि उसने अपनी वसीयत में लिखा था, तथा अपने पुत्र खाने शहीद को ताकीद किया था कोई भी साम्राज्य अमीर वर्ग के सहयोग के बिना समृद्ध नहीं बन सकता। बरनी के शब्दों में, “यदि कुलीन तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति अपमानित हो जायेंगे तो इससे जो उन्हें दुःख पहुँचेगा उसकी पूर्ति -किसी प्रकार नहीं हो सकेगी। यदि कुलीन तथा प्रतिष्ठित लोगों का अनादर करेगा तो तेरे राज्य में खराबी पैदा हो जायेगी। दूसरों की आलोचना करने वालों तथा अन्य लोगों के कार्यो में त्रुटियाँ ढूँढ़ने वालों को कोई उच्च पद प्रदान न कर, उन्हें अपने निकट न फटकने दे, स्पष्ट है कि बलबन अमीरों के अस्तित्व का विरोधी न होकर, उनके सामूहिक संगठन का पनपना तथा उनके राज्य हित के विरोधी कार्यो का विरोध था। बलबन की मृत्यु के पश्चात् अमीर वर्ग पुनः प्रभावी हो गया, इस प्रकार एक अस्थायी अवधि के लिए अमीरों की शक्ति पर अंकुश लगा रहा।

राज्य सिंहासन पर बैठने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने विदेशी अमीरों के आक्रमण के डर से भारतीय अमीरों को शासक वर्ग में स्थान दिया। इसी तरह की नीति का पालन खिलजी के उत्तराधिकारी ने भी किया। वास्तव में यदि देखा जाय तो यह पता चलेगा कि राजदरबार में भारतीय उमरा लोगों के गुट के अतिवादी आचरण तथा खुसरों खाँ तथा उसके अन्य सहयोगियों के व्यवहार ने सामान्य मुस्लिम मानस के दिलो-दिमाग में असन्तोष की भावना भर दी। यह सामान्य मुस्लिम मानस भारतीय मुस्लिम प्रधानता से भयभीत होकर उनके विरुद्ध कार्य करने के लिए तत्पर हो गये। इन्हीं परिस्थितियों के कारण गयासुद्दीन तुगलक को अपना राज्य स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुई। तुगलक ने यह भाप लिया कि भारतीय उमरा और विदेशी तुर्क दोनों ही सत्ता के लोलुप हैं अतः इसके सामधान स्वरूप उसने भारत के बाहर के लोगों को आमन्त्रित करना प्रारम्भ किया और उन्हें उच्च पद प्रदान करने की नीति अपनाई। तुगलक ने उच्च पदों को प्रदान करते समय केवल यही ध्यान में रख कि उच्च पदों पर आसानी होने वाले लोग भारत की सीमा के बाहर के होने चाहिए। इसी कारण उसने साधारण बुद्धि तथा कम विद्वान लोगों को भी अपने दरबार में इसलिए उच्च पद प्रदान किये कि ये लोग भारत नहीं, बल्कि भारत की सीमा के बाहर के लोग थे। यदि विदेशियों को उसने अपने दरबार में उच्च पदों पर बैठाया, लेकिन इनका आचरण प्रशंसनीय नहीं था क्योंकि ये लोग स्वार्थी तथा धनलोलूप थे। इन विदेशियों के आचरण को देखते हुए तुगलक ने अपनी अपनायी गई नीति को बदलने पर विचार किया। इन बातों को देखते हुए उसने यह निर्णय लिया कि उच्च पदों को प्रदान करते समय नस्ल या धर्म को आधार बनाना उचित नहीं है, बल्कि इसके लिए इस तरह के चुनाव के लिए उस व्यक्ति की कुशलता तथा गुण को आधार बनाना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि सभी व्यक्तियों के लिए उचच्तम सैनिक तथा प्रशासनिक पदों पर आसीन होने के मार्ग सुलभ हो गए यदि वे कुशल एवं गुणी हों। तुगलक ने अमीरों को चिन्ता किये बिना एक गवैये के

पुत्र नंजवा को मुल्तान, गुजरात तथा बदायूँ का कर्ताधर्ता बना दिया था। तुगलक ने फिरोज हज्जाम, मनका तब्बाख (बावर्ची), लद्धामाली, मसऊद खम्भार आदि निम्नवर्ग के लोगों को राज्य में उच्च पद प्रदान किये। मुहम्मद तुगलक की इस नीति से पीड़ित उमरा लोगों को फीरोज शासनकाल में सांत्वना प्राप्त हुई थी, जबकि उन्हें धीरे-धीरे पुनः महत्ता होने लगी थी।

उस समय के मुसलमानों तथा उमरा लोगों के मध्य सम्बन्धों की कड़ी किसी कानूनी आधार पर निहित न होकर सुलतान की सैनिक तथा संगठन शक्ति पर निर्भर करती थी। सुल्तान के कमजोर होने पर ‘मुक्तों’ द्वारा अपना आधिपत्य बढ़ाना तथा राज्य विरोधी कार्य करना कोई बड़ी बात न थी। इसके फलस्वरूप सुल्तानों द्वारा अब अमीर वर्ग के उच्च आकांक्षा के गुण को समाप्त करने तथा अंकुश लगाने के उद्देश्य से प्रशासनिक शक्तियों का वे केन्द्रीकरण प्रारम्भ हो गया था। सुल्तान स्वयं अपनी नीतियों को कार्य रूप देने के लिए नौकरशाही की रचना करता था। खिलजी के शासनकाल के बाद दो अफगान शासकों के शासनकाल को छोड़कर सभी राज्य अधिकारियों की स्थिति सुल्तान के सेवक के रूप में ही बनी रहीं।

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