मुगल शासकों के काल में अमीर वर्ग की भूमिका

मुगल काल में अमीर वर्ग की भूमिका

अमीर वर्ग और राजनीति

मुगलिया शासनकाल के पूरे दौर में अमीर वर्ग का तत्कालीन राजनीति के क्षेत्र में बहुत बड़ा और महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके निर्धारण में शहंशाह और अमीरों के बीच स्थापित संबंधों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस प्रसंग में उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अमीरों के कुछ वर्ग-विशेष के साथ शहंशाह के संबंध कई बार मधुर या सदाशयतापूर्ण नहीं रहे।

अकबर के शासनकाल में

अकबर के समय शाही निरंकुशता उच्च शिखर पर थी। इसके लिए यह जरूरी था कि अमीरों की प्रभुता या शक्ति में सुव्यवस्थित रूप से काट-छाँट की जाए ताकि वे शाही ताज के प्रति आज्ञाकारी या ताबेदार रहें और शाही इच्छाओं को पूरा करने के लिए कारगर और भरोसेमंद साधन साबित हो सकें। अकबर के शासनकाल के आरंभिक वर्षों में तो लगभग चार साल तक साम्राज्य के ‘वकीलबैरम खाँ की तूती बोलती थी। इस अवधि में उसने अन्य सभी अमीरों को अपने कब्जे में रखा। किंतु जब अकबर ने स्वयं अपनी सत्ता आजमानी चाही तो बैरम खाँ ने बगावत कर दी। अकबर ने इस बगावत को कुचल दिया।

बैरम खाँ की बगावत के दिनों में कुछ अमीर स्वतंत्र रूप से अलग-अलग समूहों में राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हुए। अकबर की धाय-माँ माहम अनगा के बेटे अधम खाँ को जब मालवा पर चढ़ाई करने के लिए भेजा गया तो उसने अपनी अकड़ दिखाई। इसके लिए अकबर ने उसे कठोर दंड दिया और वह 1561 में मारा गया। फिर भी अकबर की अपनी संपूर्ण प्रभुता स्थापित करने में अनेक वर्ष लगे। उस समय अमीर वर्ग में उजबेकों का एक शक्तिशाली समूह बन गया था जिसने युवा शासक की अवमानना शुरू कर दी। सन् 1561 और 1567 के बीच उन्होने अनेक बार बगावत की। इसी बीच मिर्जाओं की बगावत से आधुतिक उत्तर-प्रदेश के पश्चिमी भाग में हलचल मच गई। इन बगावतों से बढ़ावा पाकर अकबर के सौतेले भाई मिर्जा हाकिम ने लाहौर को घेर लिया। उजबेकी बागियों ने औपचारिक रूप से उसे अपना शासक मानने की घोषणा कर दी। अकबर ने मिर्जाओं और उजबेक-दोनों की बगावतों को कुचल दिया। इस तरह बगावत पर उतर आए सभी अमीर (जिनमें वे लोग भी शामिल थे जो आजादी के ख्वाब देख रहे थे) हतोत्साहित हो गए। अमीर वर्ग के प्रति अकबर ने “जैसे के साथ तैसा” सिद्धांत अपनाया। जो विरोधी अकबर की अधीनता स्वीकार कर लेता था, उसके प्रति वह उदारता का व्यवहार करता था। उदाहरण के लिए बैरम खाँ की मौत के बाद अकबर ने उसकी बेवा (विधवा) से शादी कर ली और उसके बेटे का अपने बेटे की ही तरह पालन पोषण किया। वही बालक आगे चलकर अब्दुर्रहीम खाने-खाना के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसने मुगल साम्राज्य में कुछ महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और सेना की कमान भी सँभाली।

जहाँगीर के शासनकाल में

जहाँगीर के शासनकाल में कुछ अमीर वर्गों ने अपेक्षाकृत अधिक महत्व प्राप्त कर लिया। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि नूरजहाँ ने अपने पिता एतमादउद्दौला और भाई आसफ खाँ के साथ खुर्रम (शाहजहाँ) की मिलीभगत से एक ऐसा गुट बना लिया था, जिसके पंजे में जहाँगीर इतना अधिक फँस गया था कि सारे मामलों का निपटारा खुद नूरजहाँ ही करने लगी थी। इससे राज-दरबार दो भागों में बँट गया। ये थे नूरजहाँ का गुट और विरोधी गुट । सतीश चंद्र ने इस मत का खंडन किया है. उन्होंने जहाँगीर की आत्मकथा तुजुक-ए-जहाँगीरी का हवाला दिया है जिसमें बताया गया है कि जहाँगीर 1622 तक, अर्थात उसके शारीरिक दृष्टि से टूट जाने तक, सभी महत्वपूर्ण निर्णय खुद ही किया करता था।सतीश चंद्र के अनुसार जहाँगीर एक गुट विशेष या नूरजहाँ पर आश्रित नहीं था। यह बात इस तथ्य से साबित होती है कि जो अमीर उस गुट के पक्ष में नहीं थे, उन्हें भी बराबर सामान्य रूप से ही उच्च स्थितियाँ और पदोन्नतियाँ प्राप्त होती रहीं। जो भी हो, यह तो सच है कि जहाँगीर के शासनकाल प्रतिद्वंद्वी अमीर दलों के झगड़े प्रकाश में आए।

कभी-कभी मुगल सम्राट की परम सत्ता को किसी महत्वाकांक्षी शाहजादे से चुनौती भी मिली जो कुछ प्रभावशाली अमीरों से मिलकर विद्रोह के स्तर पर उतर आया।

खुसरो और खुर्रम (शाहजहाँ) दोनों ने ही जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया। जहाँगीर इनके विद्रोह को दबाने में सफल हुआ। शाहजहाँ की बगावत में उसके ससुर आसफ खाँ और कुछ अन्य महत्वपूर्ण दरबारी अमीरों ने साथ दिया। आसफ खाँ जिसे जहाँगीर ने अपने दरबार में “वकील” मुकर्रर किया था, जहाँगीर की मौत के बाद मुगल तख्त पर शाहजहाँ की गद्दीनशीनी के लिए मैदान साफ करने वालों में खासतौर पर जिम्मेदार था।

शाहजहाँ के शासनकाल में

शाहजहाँ का शासनकाल अमीर वर्ग के बीच खुली गुटबंदी से यथोचित रूप में मुक्त रहा लगता है। उसके शासनकाल के अंतिम वर्षों में जब संकट शुरू हुआ और उत्तराधिकार का युद्ध शुरू हुआ तो उसके सभी बेटे अपने लिए समर्थन जुटाने में लग गए। इससे निश्चय ही गुटबंदी बढ़ी। सामूगड़ की लड़ाई में गद्दी के दावेदार शाहजादों की मदद करने वाले अमीरों की संख्या का ब्यौरा देने वाली सारणी का विश्लेषण करके अतहर अली ने यह निष्कर्ष निकाला कि दारा, शुजा, मुराद और औरंगजेब के बीच छिड़े और लड़े गए उत्तराधिकार के युद्ध मे अमीरों के जो दल बले, उनका आधार आनुवांशिकता या धर्म नही था, अर्थात, हर वर्ग में हर वंश और धर्म के लोग सम्मिलित थे। दलों का निर्माण इस बात को लेकर हुआ कि किस शाहजादे ने किस अमीर के साथ क्या-क्या वादे किए या किस अमीर को शाहजादे के साथ व्यक्तिगत स्तर पर कैसा संबंध था। औरंगजेब को अनेक अमीरों का समर्थन मिला जिनमें हिंदू भी सम्मिलित थे।

औरंगजेब के शासनकाल में

औरंगजेब के शासनकाल में जागीरदारी प्रथा पर संकट की बौछारें तेज होती गई जिसका सीधा परिणाम यह होना ही था कि अमीरी की इमारत की नींव कमजोर हो जाए। उसके शासनकाल के उत्तरार्ध में सैनिक और राजनयिक आवश्यकताएँ इतनी बढ़ गई कि उसे और उसके वजीरों को नवागत मराठों और अन्य दकनी अमीरों को मनसबदारियाँ देनी पड़ीं। लेकिन एक ऐसी भी अवस्था आई जब मनसबें तो दी जा सकती थीं, पर जागीरें नहीं । इसका कारण यह था कि जागीरें पाने के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या तो बहुत बड़ी थी किंतु खजाने पर वित्तीय दवाव बढ़ जाने के डर ने “खालिसा’ से “जागीरों” में भूमि के हस्तांतरण को असंभव-सा बना दिया। इस तरह जागीरें तो थीं पर वहाँ अशांति फैली होने के कारण ठीक तरह से मालगुजारी उगाहना संभव नहीं था, तो अमीरों से भी यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वे अपनी मनसबों के अनुसार फौज का रख-रखाव कर सकें। इसका परिणाम यह हुआ कि मुगलिया सल्तनत की फौजी ताकत कमजोर पड़ गई और नई-नई बगावतों को शह मिलने लगी और अशांति में बढ़ोत्तरी हुई। अमीरों मे अच्छी-अच्छी जागीरे पाने की प्रतिस्पर्द्धा तीव्र हुई, जिसकी वजह से उनके बीच गुटबंदी भी बढ़ गई। गाजीउद्दीन खाँ फिरोज जंग और जुल्फिकार खाँ के गुट एक बड़ी सीमा तक इसी परिस्थिति के परिणाम थे। अमीर वर्ग में इस प्रकार की गुटबंदियों और आपसी रंजिशों के इजाफे की वजह से ही शाही और सैनिक अभियानों में जिस मेंल-मिलाप और एकता की आवश्यकता थी, उसमें दरार पड़ गई।

औरंगजेब की मृत्यु (1707 में) हो जाने पर उसके तीनों बेटों के बीच गद्दी के लिए संघर्ष हुआ, जिसमे बहादुरशाह विजयी हुआ। यद्यपि उसकी नीति समझौते और सुलह की रही, किंतु वह प्रशासन की हालत में सुधार नहीं ला सका। उसने अंधाधुंध जागीरें बाँटी और पदों में इजाफे किए। इससे जागीरदारी प्रथा की हालत बद से बदतर गई। 1712 में उसकी मृत्यु हो जाने पर साम्राज्य एक बार फिर लड़ाई की आग में झोंक दिया गया। उस समय मुगल राजनीति और आगामी उत्तराधिकार की लड़ाइयों में एक नई बात पैदा हुई। पहले सत्ता हथियाने के लिए शाहजादों में झगड़ा होता था और अमीर लोग केवल गद्दी पाने के इच्छुक किसी खास शाहजादे की मदद करते थे, लेकिन अब महत्वाकांक्षी अमीर स्वयं सत्ता हथियाने के लिए प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धी बन कर सामने आए। उन्होंने सत्ता के शिखर पर पहुँचने के लिए शाहजादों का केवल बंधकों या सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया। अमीरो के अलग-अलग गुटों के नेताओं के बीच दरबार के उच्च पदों, विशेषकर वजीर और मीर बक्शी के पदों पर कब्जा जमाने के लिए होड मच गई।

मुगलिया अमीर वर्ग के गठन तथा प्रशासन एवं राजनीति और सामाजिक-आर्थिक जीवन में उसकी भूमिका के बारे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर हम इसके स्वरूप का विश्लेषण कर सकते हैं अमीर वर्ग हर दृष्टि से साम्राज्य का शासक वर्ग था। इस वर्ग की सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों और अठारहवीं शताब्दी वाला फ्रांसीसी कुलीन तंत्र से कदापि नहीं की जा सकती क्योकि इस यूरोपीय तंत्र का प्रशासनिक व्यवस्था से किसी तरह का लेना-देना नहीं था। मोटे तौर पर देखें तो मुगलिया अमीर वर्ग ने प्रशासन पर अपनी पकड़ बराबर बनाए रखी। शक्तिशाली पादशाहो के अधीन अमीर अपने प्रशासनिक कार्यों को भली-भाँति अंजाम देते थे। किंतु मुगल शासक वर्ग में कुछ कमजोरियाँ इसलिए घर कर गई, क्योकि उस समय अपने अधीन कार्य करने वालों से भेट स्वीकार करने की प्रथा चालू थी। इस प्रथा ने आगे चलकर अमीरों के बीच भारी घूसखोरी और भ्रष्टचार को बढ़ावा दिया।

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