अंग्रेजी फ्रांसीसी संघर्ष तथा द्वितीय कर्नाटक युद्ध एवं महत्व

द्वितीय कर्नाटक युद्ध 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध

एक्सा-ला-शापेल की सन्धि के बाद यह आशा की गयी थी कि भारत में अंग्रेज और फ्रांसीसी व्यापारी शान्तिपूर्वक रहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त ही हुआ था कि अंग्रेज और फ्रांसीसी पुनः युद्ध के लिए तत्पर गये। इस बार युद्ध का मुख्य कारण अंग्रेज और फ्रांसीसियों का भारतीय नरेशों की राजनीति में हस्तक्षेप करके अपने प्रभाव को बढ़ाना था। इस समय दक्षिण भारत में मराठों एवं मुस्लिम नवाबों का पूर्ण अवसर प्राप्त था। डूप्ले और क्लाइव दोनों ने देशी नरेशों के आंतरिक झगड़ों में हस्तक्षेप करने की नीति अपनायी। इस समय कर्नाटक हैदराबाद और तंजोर राज्य में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष चल रहा था कर्नाटक में नवाब अनवरुद्दीन राज कर रहा था परन्तु भूतपूर्व नवाब दोस्त अली का दामाद चाँद साहब कर्नाटक की गद्दी प्राप्त करना चाहता था क्योंकि वह दोस्त अली का सबसे निकट सम्बन्धी था जो जीवित बचा था, परन्तु चाँद साहब इस समय मराठों का बन्दी था तथा सतारा में कैद था। चाँद साहब ने मुजफ्फरजंग से, हैदराबाद की गद्दी का दावेदार था, सहायता माँगी। डूप्ले ने उचित अवसर देखकर चाँद साहब को सहायता का वचन दे दिया।

हैदराबाद में 1748 मे निजाम आसफजहाँ की मृत्यु हो यगी। इसके बाद ही उसके पुत्र नासिरजंग तथा धेवते मुजफ्फरजंग (मुजफ्फरजंग आसफजहाँ की पुत्री का बेटा था) में गद्दी के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया। मुजफ्फरजंग चाँद साहब के साथ मिल गया जो अर्काट का नवाब बनना चाहता था। चाँद साहब ने डूप्ले के साथ समझौते की बात आरम्भ की। डूप्ले भावी सफलता को ध्यान में रखकर चाँद साहब तथा मुजफ्फरजंग दोनों की सहायता करना चाहता था। डूप्ले ने मुजफ्फरजंग का पक्ष लिया। तंजोर में उत्तराधिकार के प्रश्न पर अंग्रेजों ने शाहजी को सहायता देकर गद्दी पर बैठा दिया तथा उसके बदले में उन्हें कई प्रदेश एवं धन प्राप्त हुआ जिससे अंग्रेजों की स्थिति दृढ़ हो गई।

चाँद साहब को सहायता देकर डूप्ले ने मराठों की कैद से मुक्त किया तथा चाँद साहब, डूप्ले एवं मुजफ्फरजग सेनाओं ने अर्काट के नवाब अनवरुद्दीन को अम्बर के युद्ध में पराजित किया। अनवरुद्दीन की हत्या हो गई तथा उसके पुत्र मुहम्मद अली के त्रिचनापल्ली भाग जाने पर कर्नाटक चाँद साहब के हाथ में आ गया। चाँद साहब ने इस सहायता के बदले-फ्रांसीसियों को पांडीचेरी के पास अस्सी गाँव भेंट में दिये तथा डूप्ले की नीति सफल होती हुई प्रतीत होने लगी।

डूप्ले की इस सफलता को देखकर अंग्रेजों ने भी युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया तथा मुहम्मद अली को अर्काट की गद्दी पर बैठाने का निश्चय किया। उन्होंने हैदराबाद में नासिरजंग का पक्ष लिया। चाँद साहब को समय नष्ट किये विना त्रिचनापल्ली पर आक्रमण करके मुहम्मद अली की शक्ति का विनाश करना चाहिए था परन्तु इससे पूर्व वह तंजोर पर अधिकार करना चाहता था। उसने अपनी अधिकांश सेना तंजोर विजय के लिए भेज दी। दूसरी ओर अंग्रेजों ने मुहम्मद अली को सहायता भेजनी आरम्भ कर दी। इसी समय नासिरजंग अंग्रेजी सेना की सहायता से एक सेना लेकर मुजफ्फरजंग को पराजित करने के लिए कर्नाटक आ पहुंचा। उसने चाँद साहब को पराजित करके पांडीचेरी भागने के लिए विवश किया। डूप्ले ने रक्षार्थ सेनाएँ भेजी किन्तु कुछ सैनिकों के विश्वासघात के कारण उसकी सेनाएँ पराजित हुई तथा मुजफ्फरजंग ने अपने चाचा नासिरजंग के सम्मुख समर्पण कर दिया। किन्तु इस पराजय से डूप्ले हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने मछलीपट्टम विल्लूपुरम् तथा जिन्जी पर अधिकार स्थापित करके पुनः नासिरजंग पर आक्रमण किया तथा 1750 में उसकी हत्या कर दी गई। अतः जब मुजफ्फरजंग को बन्दीगृह से मुक्त किया गया और उसे हैदराबाद का नवाब बना दिया गया। कृतज्ञ मुजफ्फरजंग ने फ्रांसीसियों को बहुत-से प्रदेश तथा धन देकर संतुष्ट किया।

डूप्ले की इस सफलता से भयभीत होकर मुहम्मद अली ने फ्रांसीसियों से मित्रता स्थापित करनी चाही तथा वह कर्नाटक पर चाँद साहब का अधिकार भी मानने को प्रस्तुत हो गया। यह समय डूप्ले के उत्थान की पराकाष्ठा थी। मुहम्मद अली की इस नीति से अंग्रेज बड़े निराश हुए तथा उन्होंने गुप्त रूप से मुहम्मद अली की सहायता पहुँचाना आरम्भ किया और उसे कर्नाटक की गद्दी दिलाने का आश्वासन दिया। इस समय मुहम्मद अली दोहरी चाल चल रहा था। वह फ्रांसीसियों से सन्धि की वार्ता भी कर रहा था और अंग्रेजों की सहायता लेने को भी प्रस्तुत था। डूप्ले ने इस चाल को समझकर चाँद की सहायता से त्रिचनापल्ली का घेरा और भी सुदृढ़ कर दिया। दूसरी और हैदराबाद में मुजफ्फरजंग की मृत्यु हो गई तथा बुरी ने तत्काल ही भूतपूर्व निजाम के तीसरे पुत्र सलाबत को निजाम घोषित किया तथा उससे उन सभी शर्तों को स्वीकार करा लिया जो मुजफ्फरजंग ने की थी।

जब डूप्ले को केवल मुहम्मद अली को पराजित करना शेष था। वह त्रिचनापल्ली में था जिसका घेरा डूप्ले डाले हुए था। मुहम्मद अली के साथ अंग्रेजों की कुछ सेना भी बन्द थी। इस समय चारों ओर डुप्ले की धाक जमीं हुई थी तथा त्रिचनापल्ली के पतन की भी सम्भावना हो रही थी। ऐसे समय में अंग्रेजों को अपनी प्रतिष्ठा स्थापित रखने के लिए मुहम्मद अली को निरन्तर सहायता देना आवश्यक था परन्तु इस सहायता के उपरान्त भी त्रिचनापल्ली को सुरक्षित रखना कठिन रहा था क्योंकि चाँद साहब की भी सम्पूर्ण सेना त्रिचनापल्ली लेने का प्रयास कर रही थी। इस समय अंग्रेजों पर भयंकर आपत्ति आई हुई थी। उसको दूर करने के लिए रॉबर्ट क्लाइव ने कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर घेरा डालने का सुझाव दिया। क्लाइव एक क्लर्क की हैसियत से कम्पनी की सेवा में आया था किन्तु उसने ला-बर्डिनो द्वारा मद्रास पर आक्रमण करने के अवसर पर सेंट डेविड किले की सुरक्षा के अवसर पर एक स्वयंसेवक सैनिक के रूप में में भाग लिया था। स्वयं मुहम्मद अली ने भी त्रिचनापल्ली के घेरे पर दबाव कम करने के लिए अर्काट पर आक्रमण करने का सुझाव दिया था। क्लाइव ने इस सुझाव का समर्थन किया और अंग्रेज गवर्नर सौंडर्स से इस कार्य की स्वीकृति प्राप्त कर ली। अगस्त 1751 में केवल पाँच सौ सैनिकों के साथ क्लाइव ने अचानक अर्काट पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया। इसके उपरान्त क्लाइव की योजना पूरी होती हुई दिखाई पड़ी। अर्काट के पतन का समाचार सुनकर चाँद साहब ने डूप्ले के मना करने पर भी अपने पुत्र रजा खाँ के नेतृत्व में अपनी आधी सेना को आर्काट को पुनः प्राप्त करने के लिए भेज दिया। इस प्रकार त्रिचनापल्ली के घेरे की दृढ़ता कम हो गई। अंग्रेजों की दूसरी सेना त्रिचनापल्ली के रक्षार्थ जा पहुंची तथा 9 जून, 1752 को फ्रांसीसियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। चाँद साहब भागकर तंजोर पहुंचा जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी। अर्काट के क्लाइव ने बड़ी वीरतापूर्वक रजा खाँ को तिरपन दिनों तक रोके रखा तथा उसकी योजना पूर्णतया सफल रही।

उपर्युक्त घटनाओं ने डूप्ले की स्थिति को डावाँडोल कर दिया। उसके पास न तो प्रबल सेना थी न कोई मित्र था तथापि डूप्ले ने एक बार पुनः प्रयास किया। उसने मराठों तथा मैसूर की जनता को मुहम्मद अली के विरुद्ध करके युद्ध पुनः जारी रखा तथा कई स्थानों पर अंग्रेजों को पराजित किया परन्तु उसके सहायकों के असहयोग के कारण उसकी स्थिति क्रमशः गिरती गई। धनाभाव के कारण उसे महती कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। विभिन्न स्थानों पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों का झगड़ा चलता रहा परन्तु अब फ्रांसीसी कर्नाटक में एक हारे हुए युद्ध के लिए लड़ रहे थे। 1753 में विवश होकर डूप्ले ने सन्धि की वार्ता आरम्भ की, किन्तु जूप्ले मुहम्मद अली को कर्नाटक का नवाब मानने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण वार्ता असफल हो गयी और युद्ध पुनः आरम्भ हो गया। फ्रांसीसियों को इस युद्ध में भी पराजय का ही मुंह देखना पड़ा। इसी समय फ्रांसीसी सरकार ने डूप्ले को वापस बुलाने का निश्चय किया 1754 में गोडयू को नवीन फ्रांसीसी गवर्नर नियुक्त करके भेजा गया। वह सन्धि के लिए आदेश लेकर आया था। अतः दिसम्बर 1754 में अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच पांडीचेरी की सन्धि हो गयी। इस सन्धि के द्वारा निम्नलिखित बातें तय हुई-

  1. अंग्रेज और फ्रांसीसियों ने मुगल बादशाह अथवा अन्य भारतीय नरेशों द्वारा दिये गये सभी पदों को छोड़ दिया और वादा किया कि वे भारतीय नरेशों की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  2. अंग्रेजों का अधिकार सेंट जॉर्ज और सेंट डेविड के किले तथा देवीकोटा पर स्वीकार कर लिया गया।
  3. फ्रांसीसियों ने मछलीपट्टम से अपने अधिकार को वापस ले लिया।
  4. कुछ नदियों में जहाजरानी और कुछ सीमा सम्बन्धी अन्य समझौते भी किये गये।
  5. दोनों ने वादा किया कि वे गृह-सरकारों से इस सन्धि को स्वीकार करायेंगे और जब तक इसे स्वीकृत प्राप्त नहीं हो जाती तब तक वे आपस में कोई झगड़ा नहीं करेंगे और न कहीं किलेबन्दी करेंगे।
  6. युद्ध की क्षतिपूर्ति के विषय में भी समझौता किया गया।
  7. ऐसी व्यवस्था की गई जिससे दक्षिण में दोनों कम्पनियों के पास प्रायः समान भू-क्षेत्र रहे।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध का महत्व

कुछ इतिहासकारों का कथन है कि 1754 की सन्धि के द्वारा गोडयू ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया जिसके लिए डूप्ले ने संघर्ष किया था। इस सन्धि को फ्रांसीसी हितों के विरुद्ध कहा गया हैं स्वयं डूप्ले के अनुसार, “गोडयू ने अपने देश के विनाश और असम्मान पर हस्तक्षेप किये थे।” मेलसन के अनुसार भी यह सन्धि फ्रांसीसियों के लिए अपमानजनक थी। फ्रांसीसी इतिहासकार कल्ट्र का भी सही मत था। मिल ने भी लिखा था कि अंग्रेजों ने वह सभी कुछ जिसके लिए वह युद्ध कर रहे थे, इस सन्धि के द्वारा प्राप्त कर लिया और फ्रांसीसियों ने वह सब कुछ छोड़ दिया जो लाभ अंग्रेज अभी तक प्राप्त कर चुके थे।”

परन्तु उपर्युक्त विचार पूर्णतया सही नहीं माने जा सकते। अर्काट के घेरे के पश्चात फ्रांसीसियों की स्थिति सैनिक दृष्टि से कर्नाटक में बहुत दुर्बल हो गयी थी और फ्रांसीसियों के पास धन की बहुत कमी थी। ऐसी स्थिति में युद्ध को जारी रखना असम्भव था। इसके अतिरिक्त भी इस सन्धि से जो भूमि अंग्रेजों को प्राप्त हुई थी उसकी वार्षिक आय केवल एक लाख रूपये थी जबकि फ्रांसीसियों के पास अब भी आठ लाख रुपये वार्षिक आय की भूमि थी।फिर भी इस सन्धि से एक बात निश्चित हो गयी। अंग्रेज काफी शक्तिशाली हो गये। उन्हें काफी आम मिल गया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। अतः राजनैतिक दृष्टि से कर्नाटक का द्वितीय युद्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा। सुन्दरलाल के शब्दों में, “यह वह चट्टान है जिससे टकराबर इस देश के अन्दर डूप्ले और फ्रांसीसियों की समस्त आकांक्षाएँ चूर-चूर हो गयीं।” इस युद्ध से यह स्पष्ट हो गया कि व्यापार की आड़ में अंग्रेज और फ्रांसीसी भारत की राजनीति में खुलकर खेलना चाहते हैं। वस्तुतः भारतीय राजनीति में अब उसका हस्तक्षेप निश्चित रूप से हो चुका था और एक बार शुरू हो जाने पर यह क्रम अब रुकने वाला नहीं था। लेकिन अब यह प्रश्न था कि इस संघर्ष में अन्ततः कौन विजयी होगा। तत्काल के लिए फ्रांसीसी अवश्य हार गये थे, लेकिन वे चुपचाप बैठने के लिए तैयार नहीं थे। कभी-न-कभी अन्तिम और निर्णायक फैसला होने वाला ही था कि भारत पर कौन शसन करेगा अंग्रेज या फ्रांसीसी । 1757 के प्लासी की लड़ाई ने यह निर्णय कर दिया।

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