सल्तनत कालीन प्रमुख व्यावसायिक एवं व्यापारिक केंद्र

सल्तनत कालीन प्रमुख व्यावसायिक एवं व्यापारिक केंद्र

प्रमुख व्यावसायिक एवं व्यापारिक केंद्र

राजनीतिक दृष्टि से प्रशासन संबंधी कार्यों के सुचारू संचालन के लिए प्राचीन काल से ही नगरों व शहरों तथा कस्बों की स्थापना एवं विकास होता रहा है। इसके अतिरिक्त इन शहरों में स्थानीय लोगों एवं यात्रियों को सुविधाएँ प्रदान करने के लिए अनेक बाजारों धार्मिक-स्थलों,उद्यानों, सरायों अदि का वर्णन मिलता है। धीरे-धीरे वही शहर एवं नगर व्यावसायिक दृष्टि से अनेक वस्तुओं का केंद्र बनने लगे। व्यापारी लोग भी समय-समय पर इन शहरों की खपत से अधिक तैयार माल को ले जाकर दूसरे स्थानों पर बेचने लगे। इन नगरों को परस्पर सुरक्षित मार्गो द्वारा जोड़ने का प्रयास जारी रहा। समकालीन अनेक धार्मिक स्थान भी व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। कई शहर नदियों के मुहानों पर स्थित होने के कारण व्यापारिक कार्यो की दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हुए। कई प्राचीन नगर अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र बन गए। इस काल की व्यापक व्यावसायिक भूमिका को समझने के लिए कुछ समकालीन व्यावसायिक एवं व्यापारिक नगरों का उल्लेख अपेक्षित है।

पंजाब व सिंध प्रदेश में स्थित नगरों एवं कस्बों में लाहौर, मुल्तान, उच्छ, अजोधन, दीपालपुर, सुनाम, समाना, सरहिंद, हाँसी, सरसुती, देबल, धट्टा, भक्खर आदि प्रमुख थे। ये सभी नगर एक-दूसरे से अनेक मार्गो द्वारा आपस में जुड़े हुए थे। साथ ही देश के अन्य भागों में स्थित अनेक नगरों से भी इनका संबंध रहता था।

इन नगरों में सबसे पहले नगर मुल्तान था। इसके कई कारण थे। विदेशी व्यापारी प्राय: यहाँ आकर रुकते थे। दूसरे, कंधार-क्वेटा मार्ग पर स्थित होने के कारण इस नगर का स्थल-व्यापार में काफी योगदान रहा। तीसरे, इस नगर में स्थित सूर्य मंदिर के कारण प्राचीन काल से ही देश-विदेश से यात्रियों का तांता लगा रहता था। मुख्यतः इन कारणों से यह नगर कावसायिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ बन गया। मध्यकाल में शेख बहाउद्दीन जकारिया की खानकाह स्थापित होने से मुल्तान का आकर्षण और अधिक बढ़ गया। मुल्तान नदी मार्ग द्वारा लाहौर, धट्टा, आजोधन, देबल से जुड़ा हुआ था जिससे आंतरिक व्यापार में भी वह पीछे नहीं रहा। अंत में मुल्तान सीमाप्रांत की राजधानी एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था जिससे इसकी सुरक्षा के हर संभव उपाय किए जाते थे। इसे आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होने के कारण ही दिल्ली के अमीर वहाँ का गर्वनर बनने के लिए सदैव लालायित रहते थे। व्यापारियों को किसी प्रकार का कोई खतरा न था। वहाँ के व्यापारी अपनी ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे। मुल्तान में हर देश की हर वस्तु आसानी से उपलब्ध थी। यहाँ के मंदिर सराय, गलियाँ, बाग-बगीचे सब मिलाकर यात्रियों एवं व्यापारियों को खुश रखने के लिए पर्याप्त थे।

लाहौर गजनवी शासकों की राजधानी रहा था। व्यापारिक दृष्टि से वह नगर गजनी के रास्ते मध्य-एशिया से जुड़ा हुआ था, इसके अतिरिक्त रावी के तट पर स्थित होने के कारण वह जलमार्ग से मुल्तान, धट्टा, भक्खर आदि से जुड़ा हुआ था। इस कारण नौकाओं द्वारा इन शहरों के मध्य व्यापारिक माल का यातायात होता रहता था। मिनहाज के वर्णन से पता चलता है कि यहाँ के अधिकतर निवासी व्यापार ही करते थे। परंतु 1241 ई0 में मंगोलों के आक्रमण के बाद लाहौर का व्यापारिक महत्व कम होने लगा। खोखरों के कबीलों ने इस नगर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया था और वे अधिकतर लूट-पाट का कार्य करते थे। इस कारण वे व्यापारी अधिकतर नीचे मुल्तान की ओर से ही जाना उचित समझते थे। पर बल्बन एवं अन्य सुल्तानों ने लाहौर को पुनः पूर्वस्थिति में लाने की चेष्टा की पर असफल रहे। यहाँ तक कि खोखरों ने 1341-42 ई० में लाहौर के ‘मुक्ता’ का वध कर डाला और फिरोजशाह तुगलक के काल में इन्होंने अजोधन एवं मुल्तान के बीच के मार्ग को अपने उत्पातों के द्वारा आतंकित किया। अतः उक्त समय के बाद लाहौर व्यापारिक दृष्टि से प्रायः उपेक्षित ही रहा।

धट्टा सिंधु नादी के बीच स्थित एक टापू था। यह अरब एवं ईराक से आने वाले व्यापारियाँ के लिए एक प्रमुख आकर्षण था। अनेक अरब यात्रियों, मिनहाज, इब्नबतूता आदि ने इस नगर का रोचक वर्णन किया हैं, इसके बड़े-बड़े बाजार, उद्यान व सराय यात्रियों को हर प्रकार का आराम देते थे। यह नगर मुल्तान तथा अन्य नगरों से जल-मार्ग के द्वारा जुड़ा था और वहाँ नौकाओं द्वारा व्यापार होता था।

देबल व्यापारिक दृष्टि से मध्यकाल में समृद्ध माना गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह का कार्य करता था। तत्कालीन ग्रंथो के अध्ययन से पता चलता है कि यहाँ के निवासी देश-विदेश की अनेक व्यापारिक वस्तुओं का संग्रह करते थे और बाद में उनको ऊंचे दामों पर बेचकर काफी लाभ कमाते थे। शेष नगरों में सरसूती आंतरिक व्यापार की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। वहाँ सर्वोत्तम प्रकार के चावल पैदा होते थे। जिसकी माँग दूर-दूर तक थी। इब्नेबतूता के आगमन के समय यह एक बड़ा नगर था यहाँ का चावल दिल्ली जाता था।

भक्खर सिंधु नदी की एक शाखा पर स्थित था। शहर के बीच में एक सुंदर खानकाह थी जहाँ पर यात्रियों को भोजन मिलता था। उच्छ भी सुंदर नगर एवं व्यापार का केंद रहा था। अजोधन में शेख फरीद की खानकाह थी जिसमें यात्रियों के रहने तथा भोजन आदि का प्रबंध था।

दिल्ली इस देश की राजधानी होने के नाते प्राचीन काल से ही व्यावसायिक एवं व्यापारिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ नगर था। यह नगर देश के अन्य भागों तथा बड़े-बड़े राजमार्ग से भी जुड़ा हुआ था। साथ ही यमुना नदी के तट पर स्थित होने के कारण यह जल-मार्ग से भी अनेक नगरों से जुड़ा था। इस नगर की सुंदरता का वर्णन तत्कालीन ग्रंथों में तो होता ही रहा है। सरायों, बाजारों, जलाशयों, उद्यानों की दृष्टि से यह मिस्र की तुलना करता था। यह पूर्व के इस्लामी नगरों में सबसे बड़ा था। शहर की चहार-दीवारी विश्व में अद्वितीय थी। इस शहर में प्रवेश करने के लिए अनेक द्वार थे जिनमें बदायूँ दरवाजा, गजनी दरवाजा, पालम दरवाजा आदि मुख्य थे। दिल्ली के सुल्तानों ने अपनी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं का निर्माण कार्य स्वयं अपने ही संरक्षण में आरंभ किया था जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली में विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन का कार्य शुरू हुआ। शाही कारखानों में अनेक सामग्रियों के कारीगरों के अतिरिक्त केवल रेशम बुनकरों की संख्या ही 4000 हजार से अधिक थी। दिल्ली के बाजारों में देश-विदेश की अनेक वस्तुएँ खरीदी जा सकती थी। दिल्ली में पुस्तक-विक्रेताओं के नियमित बाजारों का उल्लेख अमीर खुसरों एवं बरनी ने अपने ग्रंथों में किया है। अलाउद्दीन खिलजी के काल में तो दिल्ली की विभिन्न मंडियों में अनेक स्थानों का सबसे अच्छा माल लाया जाता था तथा इसका क्रय केवल दिल्लीवासियों तक ही सीमित था। दिल्ली में विदेशी घोड़ों का बाजार सर्वदा रहता था। दिल्ली विदेशी व्यापारियों का प्रमुख अड्डा था।

गुजरात का राज्य अपने उत्पादनों, व्यावसायिक नगरों तथा बंदरगाहों के लिए प्रसिद्ध रहा है। इनमें भड़ौच, खंभात, सोमनाथ, पट्टन तथा अहमदाबाद आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

संभात समुद्र के किनारे स्थित था। यहाँ समुद्री जहाज बड़ी आसानी से आ-जा सकते थे। हमें इस नगर की सुंदर बनावट का वर्णन मिलता है। यहाँ के अधिकतर निवासी समुद्री व्यापारी थे। वे बड़े भव्य भवनों एवं मस्जिदों का निर्माण करते थे। विदेशी यात्री वार्थेमा ने विभिन्न देशों से प्रति-वर्ष संभात आने वाले लगभग तीन सौ विदेशी जहाजों का उल्लेख किया है। संभात का रेशम मूल्यवान वस्तुओं में से एक था जिस पर अलाउद्दीन खिलजी ने नियंत्रण लगा दिया था।

सोमनाथ पट्टन नगर की समृद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। इस मंदिर में आराध्य-देव को धन स्वर्ण एवं आभूषण खूब अर्पित किए जाते थे, इस कारण वह भारत के समृद्धतम मंदिरों में से एक था।

15वीं शताब्दी के आरंभ में अहमदाबाद की स्थापना से गुजरात का व्यापार धीरे-धीरे इस नगर से होना आरंभ हुआ। यहाँ के बड़े-बड़े बाजारों का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। यहाँ से गुजरात में बना सूती कपड़ा बाहरी देशों को निर्यात होता था। बंगाल के मुर्शिदाबाद से लाए गए रेशम से अहमदाबाद में रेशमी कपड़ा बनाया जाता था और हालैंड, जापान आदि देशों को भेजा जाता था। अहमदाबाद का पटोला नामक कपड़ा फिलीपींस, बोनिर्यो, जावा, सुमात्रा आदि देशों को जाता था।

अन्हिलवाड़ का नगर व्यापारियों के लिए तीर्थ-स्थान के समान था, जहाँ बड़ी संख्या में मुसलिम व्यापारी रहते थे। वह शहर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी तक एक व्यावसायिक केंद्र रहा था। मालवा का उज्जैन नगर भी एक प्रमुख व्यावसायिक नगर था। वहाँ की आबादी घनी थी। यह शहर भी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था। इसका वर्णन अनेक ग्रंथों में उपलब्ध है।

धार मालवा की राजधानी तथा उस प्रांत का सबसे बड़ा नगर था। यहाँ कृषि का कार्य उत्तम ढंग से होता था। विशेषकर गेहूँ का उत्पादन अच्छा था। यहाँ से दिल्ली के लिए पान भेजे जाते थे। यहाँ पर मुहम्मद तुगलक ने एक विशाल खानकाह के निर्माण का आदेश दिया था। साथ ही वहाँ पर हर प्रकार के यात्रियों को भोजन वितरित किया जाता था।

दक्षिण में देवगिरि एक मुख्य नगर था। दिल्ली एवं देवगिरि के बीच मार्ग पर डाक चौकियाँ स्थापित की गई थीं। यहाँ के निवासी अधिकतर व्यापारी थे जो रत्नों का व्यापार करते थे। यहाँ अनार तथा अंगूर बहुत पैदा होता था। यह सूती वस्त्रों के निर्माण का भी केंद्र था। यहाँ के रंग-बिरंगे वस्त्रों की तुलना अमीर खुसरो ने रंग-बिरंगे फूलों से की है। यहाँ की अनेक प्रकार की व्यापारिक बस्तियों का भी तत्कालीन साहित्य में उल्लेख है।

बंगाल चावल तथा रेशम के लिए प्रसिद्ध था। यात्री माहुआन वहाँ पर रेशम के कीड़े पाले जाने का उल्लेख करता है। इस काल में वहाँ पर दैनिक उपयोगिता की वस्तुएँ काफी सस्ती थी। बंगाल में सतगाँव, ढाका, सोनारगाँव, चिटगाँव आदि भी प्रमुख नगर थे जहाँ से बंगाल के उत्पादनों का देश-विदेश अनेक भागों में निर्यात होता था।

सतगाँव पूर्वी भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक नगर था। उड़ीसा, तेलंगाना, श्रीलंका, महाराष्ट्र व गुजरात से आने वाले व्यापारियों को माल खरीदने के लिए अन्यत्र कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं थी। सतगाँव की रेशमी रजाइयों का आगरा एवं पटना भेजे जाने का वर्णन मिलता है। परंतु 1538 ई0 में पुर्तगालियों द्वारा हुगली की स्थापना के बाद सतगाँव का महत्व कम हो गया था।

सोनारगाँव बंगाल के उत्पादनों का निर्यात केंद्र था जहाँ से सूती कपड़ों को लंका, मलक्का, सुमात्रा आदि देशों को भेजा जाता था। चिटगाँव समुद्रतट पर एक विशाल नगर था। वहाँ दिल्ली, लाहौर, आगरा के व्यापारी आते थे। ढाका की मलमल देश-विदेश में सब जगह प्रसिद्ध थी। बंगाल के अन्य प्रसिद्ध नगरों में गौड़, पंडुवा, नगर, श्रीपुर आदि विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के लिए प्रसिद्ध थे।

आगरा लोदी शासकों के राज्यकाल में एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक एवं व्यापारिक केंद्र बन गया था। यह यमुना नदी पर स्थित होने के कारण अनेक नगरों से जुड़ा हुआ था। इसके अतिरिक्त आगरा से सभी दिशाओं के लिए मार्ग निकलते थे। आगरा के आस-पास के क्षेत्रों में नील का उत्पादन होता था, जिसका आगरा से ही निर्यात होता था। बंगाल में पैदा होने वाला माल आगरा में नदी मार्ग से आता था। यहाँ से यह माल आगे गुजरात की ओर भेजा जाता था ताकि विदेशों को निर्यात किया जा सके।

बनारस (वाराणसी) में सोने-चाँदी तथा जरी का काम होता था। यहाँ पर हर प्रकार की व्यापारिक वस्तुएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थी। यहाँ से सोने तथा चाँदी की बार्डर वाली विशेष प्रकार की पगड़ियों का निर्यात तुर्की, फारस, खुरासान आदि देशों को होता था।

बनारस के साथ-साथ पटना भी प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। इन दोनों स्थानों से बंगाल के उत्पादन संपूर्ण उत्तरी भारत में लाहौर तथा विदेशों में काबुल के रास्ते फारस, समरकंद तथा काशगर आदि भेजे जाते थे।

इसके अतिरिक्त बयाना, कोल, अलीगढ़, कड़ा-मानिकपुर, कन्नौज, धौलपुर, संभल, ग्वालियर, चंदेरी जैसे समकालीन प्रमुख नगरों का भी तत्कालीन ग्रंथों में उल्लेख आता है। बयाना नील, कन्नौज इत्र एवं शक्कर, कड़ा-मानिकपुर चावल, गेहूँ एवं शक्कर आदि के लिए प्रसिद्ध थे। उत्तर में हिसार-फीरोजा के आस-पास का क्षेत्र तिलहन व दालों के लिए प्रसिद्ध था, जिन्हें के भागों में भी भेजा जाता था। राजपूताना में अजमेर, बीकानेर, आबेर, जोधपुर, चित्तौड़, रणथंभौर, भेड़ता, कोटा, बाँसवाड़ा, नागौर, जालौन आदि अनेक नगर थे जो स्थल-मार्ग द्वारा आपस में जुड़े होने के साथ-साथ प्रमुख व्यापारिक मार्गो पर स्थित थे। जोधपुर के अनारों की प्रशंसा तत्कालीन ग्रंथों में बार-बार की गई है।

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