सल्तनत काल में विदेशी व्यापार की क्या स्थिति थी?

सल्तनत काल में विदेशी व्यापार की स्थिति

सल्लनतकालीन विदेशी व्यापार

भारत का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रमुख स्थान था। पर देश को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इस काल में अनेक प्रकार की वस्तुओं का आयात करना पड़ता था, जिनका संक्षिप्त व्यौरा इस प्रकार से है।

घोड़े

विभिन्न देशों से मंगाए जाने वाले व्यापारिक माल में घोड़ों का आयात सर्वोपरि था। इसका कारण यह था कि दिल्ली के शासकों की सेना का मुख्य अंग घुड़सवार सेना थी। ऐसी स्थिति में वे सदा विदेशों से घोड़े मँगाते रहते थे। तत्कालीन ग्रंथों से पता चलता है कि अरब देशों, तुर्किस्तान, ईरान, खाड़ी के देशों से घोड़े मंगाए जाते थे। इब्ने बतूता वर्णन करता है कि तुर्किस्तान में अजक के लोगों ने भारत लिए घोड़ों के निर्यात की एक विशेष नस्ल तैयार की थी। वे लोग घोड़ों को चार-चार, पाँच-पाँच हजार की तादाद में झुंड-बनाकर लाते थे। मार्ग में उनकी देखभाल, चारे आदि की व्यवस्था का पूरा प्रबंध किया जाता था। प्रत्येक प्रधान घोड़ा पर एक वाहक होता था जिसे कशी कहते थे। इस व्यापार में उन्हें पर्याप्त लाभ होता था। मार्कोपोलो भी ईरान से भारत के घोड़ो के निर्यात का उल्लेख करता है। घोड़े भारत में जल एवं समुद्री दोनों मार्गो से लाए जाते थे। दिल्ली के सुल्तानों ने विदेशों से घोड़े मँगाने का कार्य विशेष व्यापारियों को सौंपा हुआ था जो राज्य के धन से ही व्यापार करते थे। तत्कालीन फारसी ग्रंथों से यह पता चलता है कि अफगान लोग घोड़ों का व्यापार करते थे। वे विदेशी अश्व-व्यापारी भारत में घोड़ों को लाने के बाद जालंधर के निकट स्थित वजवारा में रखकर उन्हें खूब खिलाते-पिलाते थे। वजवारा में अनाज एवं चारा आदि सस्ता था। तदुपरांत वे अश्व व्यापारी अपने आयातित घोड़ों को भारत के विभिन्न भागों में बेचने के लिए ले जाते थे।

अस्त्र-शस्त्र

घोड़ों के बाद हथियारों का विशेष स्थान था। ऐसा प्रतीत होता है कि ईरान व ट्रासआक्सिवाना के शहरों में हथियार बनाने के कई केंद थे जहाँ से भारत के अतिरिक्त अन्य देशों को इन हथियारों का निर्यात होता था। मार्कोपोलों ने किरमान में बनी तलवारों का उल्लेख किया है। वे तलवारें भारत से आयातित इस्पात से ही बनाई जाती थी। मुहम्मद तुगलक के काल में सैयद अबुल-हसन-अल इबादी राज्य के पैसे से अस्त्रों का व्यापार करता था। इब्ने बतूता भी अपने साथ ऊंटों पर तीर लादक भारत लाया था।

दास

शासक वर्ग दासों में विशेष रुचि रखता था। इल्तुतमिश के दरबार में चीनी व्यापारियों द्वारा तुर्की दास लाने का उल्लेख मिलता है। अदन तथा मिस्र से बराबर दासों का व्यापार होता रहता था। अलाउद्दीन खलजी के काल में खिताई एवं तुर्की दास लड़कों तथा लड़कियों के आयात का प्रसंग मिलता है। इसी प्रकार अनेक ग्रंथों में किपचाक, रूस तथा ईराक से भी दासों का आयात किए जाने का वर्णन है। दिल्ली के सुल्तान लाखों की संख्या में दास रखते थे क्योंकि इनसे सैनिक कार्यों के अतिरिक्त अन्य काम भी कराए जाते थे। ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं कि विदेशों से मंगाए गए दास अधिक चुस्त व फुर्तीले होते थे।

वस्त्र

भारत में हर प्रकार के उत्तम कोटि के कपड़ों का उत्पादन होता था, फिर भी कुछ विशेष प्रकार के वस्त्रों का आयात किया जाता था। तारीखे तबरिस्तान में अमूल नामक स्थान पर भारतीय व्यापारियों द्वारा विभिन्न किस्म के कपड़ों को क्रय करने का उल्लेख है। अलसी नामक कपड़ा मंहगा था। इस कारण इसका केवल वे ही लोग उपयोग कर पाते थे, जिन्हें सुल्तान ने इसे भेंट अथवा इनाम में दिया हो। यह वस्त्र रुस तथा सिकंदयिा से मंगाया जाता था। विदेशी ऊनी कपड़े की भारत में काफी माँग थी। दिल्ली के सुल्तान, खान, अमीर तथा उच्चाधिकारी तुर्की टोपियाँ, ख्वारिज्म की कमीजों व रेशमी पगड़ियाँ पहनते थे। मुहम्मद तुगलक के राज्यकाल में शीत ऋतु के वस्त्रों का विदेशों से मंगाए जाने का विवरण है। ग्रीष्म ऋतु में वस्त्रों की मांग शाही कारखानों से अथवा चीन तथा ईराक से आयातित वस्त्रों से पूरी की जाती थी।

मेवे तथा फल

12वीं शताब्दी के एक अरब वृतांत से ज्ञात होता है कि उस काल में पूरे भारत और चीन में अंगूर और अंजीर पैदा नहीं होते थे। ईरान से भारत में अंगूर आता था। इब्नबतूता लिखता है कि भारत आने वाले विदेशी यात्रियों द्वारा भेंट में लाई गई वस्तुओं में सूखे मेवे प्रमुख थे क्योंकि इनसे यहाँ के अधिकारीगण प्रसन्न हो जाते थे। उसने स्वयं मुल्तान के गर्वनर को सूखे मेवे व बादाम भेंट-स्वरूप दिये थे। वह ख्वारिज्म के तरबूजों के आयात का भी विशेष रूप से उल्लेख करता है जिसे भारत लाया जाता था। एक अन्य ग्रंथ में बुखारा से पीले रंग के तरबूजों का भारत में आने का उल्लेख मिलता है।

मसालिक उल अबसार के वर्णन से ज्ञात होता है कि विदेशी व्यापारी भारत में काफी मात्रा में सोना लाते थे जिसके बदले में वे यहाँ से दवाइयाँ, जड़ी, बूटियाँ आदि ले जाते थे। अन्य वस्तुओं में मार्कोपोलो के यात्रा-वृतांत से ताँबें, चाँदी, तूतिया आदि के आयात का पता चलता है। ऊंट, जैतून का तेल, गुलाब-जल व खजूर एवं शीशा भी विदेशों से आता था।

लोहा व हथियार

अरब यात्रियों ने हिंदुस्तान में बनी तलवारों की प्रशंसा और विदेशों में इनकी माँग का उल्लेख किया है। तत्कालीन ग्रंथों में इसे हिदवी तलवार कहा गया है जो अपनी तेज धार के लिए अतुलनीय थी। ताजुल नासिर में भारत में बने खंजर की प्रशंसा की गई है। मार्कोपोलों मे लाहौर से इस्पात का निर्यात किए जाने का उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त भाले तथा तीरों के बनाए जाने और उन्हें बाह्य देशों को भेजने का उल्लेख भी मिलता है।

सूती वस्त्र

भारत में सूती कपड़ा उत्तम किस्म का होता था जिसे अनेक देशों में निर्यात किया जाता था। मंगोलों ने लाहौर पर आक्रमण के अवसर पर बड़ी मात्रा में निर्यात के लिए इकट्ठे किए गए कपड़े को जब्त किया था। खाड़ी के देशों में भारत में बना हुआ सूती कपड़ा पहना जाता था। बाबरनामा में भारतीय श्वेत वस्त्रों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। बंगाल व गुजरात के बंदरगाहों द्वारा इन प्रदेशों का सूती कपड़ा समुद्री मार्ग से अनेक देशों को भेजा जाता था।

शक्कर

भारत में बनी शक्क व मिश्री का निर्यात सिंध के रास्ते अनेक अरब देशों को होता था। मध्यकाल के चीनी यात्रियों ने भी भारत में गन्ने के उत्पादन का उल्लेख किया है। गन्ने के रस तथा शीरे से क्रमशः चीनी एवं शराब बनाई जाती थी। एक अन्य ग्रंथ में दिल्ली व लाहौर से मुल्तान में चीनी ले जाने का उल्लेख है जहाँ इसे काफी ऊंचे-ऊंचे दामों पर बेचा जाता था। संभवतः मुल्तान से चीनी थल मार्ग द्वारा विदेशों को भेजी जाती थी। बंगाल की शक्कर का भी विभिन्न देशों को भेजे जाने का वर्णन मिलता है।

नील

भारत में नील का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। इसका निर्यात विभिन्न देशों में किया जाता था। लाहौर और बयाना नील के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। ईरान में नील का उत्पादन बंद हो जाने से इसकी पूर्ति भारतीय नील से ही होती थी। बगदाद के मार्ग से नील को सिसली (इटली) भी भेजा जाता था।

जड़ी-बूटियाँ व मसाले

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, भारत से सोने के बदले अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ विदेशों को ले जाई जाती थी। ईरान के शासक गजन खाँ के प्रधानमंत्री रशीउद्दीन द्वारा भारत भ्रमण का मुख्य उद्देश्य इस देश की जड़ी-बूटियाँ प्राप्त करना भी था। चीनी यात्रियों ने भी इस देश की जड़ी-बूटियों का हवाला दिया है। बाबर भी इसका वर्णन करता है। भारत में गर्म मसाले जल तथा थल दोनों ही मार्गो से विदेशों को निर्यात होते थे। समरकंद की मंडियों में भारतीय मसालों की बहुतायत का वर्णन मिलता है।

फल

भारत में उत्पन्न नीबू तथा संतरों का विदेशों में काफी नाम था। 10वीं शताब्दी से यहाँ के फल अरब के रास्ते यमन, ईराक व सीरिया ले जाए जाते रहें हैं। इसके अतिरिक्त फारस मेसोपोटामिया आदि देशों में भी इन फलों का उत्पादन तब तक शुरु नहीं हुआ था। अतः यह सब भारत से ही निर्यात होता था।

अन्य वस्तुओं में हीरे,कागज, पुस्तकें, चंदन, अंबर, लाल मोती (अकीक) मुख्य थें। समरकंद में तैमूर के दरबार की स्त्रियों को मुल्तान के जौहरियों द्वारा निर्मित आभूषण पहनने का बड़ा शौक था। काला नमक, पान, सुपारी आदि भी भारत से बाहर जाते थे।

दूसरे देशों को भेजे जाने पाले जानवरों में हाथी प्रमुख थें। तैमूर के दरबार में इनका विशेष उल्लेख मिलता है। एक समकालीन ग्रंथ में भारतीयों द्वारा मंगोल राज्यों में हाथी भेजे जाने का वर्णन है। मुल्तान के हाथी दाँत के बाजार में सदा विदेशी व्यापारियों की भीड़ लगी रहती थी। मंगोल शासक हाँथी-दाँत का अधिक से अधिक मूल्य चुकाते थे। भारतीय मोरों का भी विदेशों में निर्यात का उल्लेख है भारतीय गैडे के सींग चीन में जाते थें । यहाँ इनसे कई प्रकार की वस्तुओं का निर्माण होता था जिनमें चाकुओं के दस्तें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मालवा में बनी एक प्रकार की मलहम का भी उल्लेख मिलता है जिसे विदेशी यात्री ले जाते थे। बाबरनामा कश्मीर के लोगों के केसर कास्तूरी व तांबे के व्यापार में संलग्न होने का पता चलता है।

संभवतः यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि विदेशी व्यापार कितने बड़े पैमाने पर होता था किंतु यह तथ्य स्पष्ट है कि व्यापारिक कार्य लगातार होता रहता था और काफी मात्रा में माल आता तथा जाता था। समकालीन ग्रंथों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह कहना असंभव है कि विदेशी व्यापार में व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था अथवा नहीं। आयात व्यापार का ध्यान से अध्ययन करने पर पता चलता है कि घोड़े तथा दास बहुत अधिक संख्या में भारत आए थे और इनके बदले स्वाभाविक है कि विदेशी व्यापारी भारत से काफी धन ले जाते होंगे भारत से बाहर भेजे जाने वाले पादार्थो में मुख्यतः सूती कपड़ा ही था जिसके बदले में वहाँ से हथियार आदि आ जाते थे। ऐसे उल्लेख भी प्राप्त हैं कि भारतीय व्यापारी सोने के बदलें विदेषी वस्तुएँ भी लातें थे। केवल इनता ही कहा जा सकता है कि भारत में सोने का विशाल भंडार था जिसके कम होने का आभास इस काल में कभी भी नही हुआ।

व्यापारियों की दशा

भारत में व्यापारी वर्ग को सम्मानीय दृष्टि से देखा जाता था। भारतीय शासकों ने उन्हें सदैव उचित सम्मान प्रदान किया, क्योंकि व्यापारी वर्ग न केवल देश-विदेश की वस्तुएँ ही लाते थे अपितु वहाँ के समाचार भी लाते थे। इसके अतिरिक्त समय-समय पर व्यापारिक काफिला व बाजारों से शासकों को अनेक मार्गो का भी ज्ञान हुआ हैं। वे अपने शत्रुओं का पीछा करते-करते जब मार्ग से भटक जाते थे तो उधर से गुजरने वाले व्यापारिक काफिले उनका मार्गदर्शन करते थे। बलबन द्वारा तुगरिल का पीछा करते समय बंजारों ने ही उसका मार्गदर्शन किया था। भारत में व्यापारी वर्ग सब सुविधाओं से परिपूर्ण सुखी एवं संपन्न जीवन विता रहा था। इसका आभास विदेशी व्यापारियों द्वारा समय-समय पर इस देश में बस जाने से मिलता है। उनके लिए इस देश के विभिन्न मार्गों में अलग से बस्तियाँ बनी थी। अलाउद्दीन खिलजी के राज्य-काल के अतिरिक्त समस्त सल्तनत काल में व्यापारी वर्ग समृद्धि की ओर अग्रसर होता रहा। समकालीन ग्रंथों में उनकी दानशीलता तथा उनके भवनों के निर्माण का भी उल्लेख है। इस काल में व्यापार से बढ़कर और कोई व्यवसाय नहीं था। व्यापारी वर्ग अपने व्यापारिक हितों एवं समय की गम्भीरता का ध्यान रखते हुए समकालीन राजनीति से प्रायः दूर ही रहते थे।

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