मुगलकालीन गैर कृषीय उद्योग

मुगलकालीन गैर-कृषीय उद्योग

कृषि पर आधारित उद्योगों के अतिरिक्त धातु एवं खनिज उद्योग का स्थान महत्वपूर्ण था। इस तथ्य को उक्त पृष्ठों में दर्शाया जा चुका है कि मध्यकाल में बड़ी संख्या में कारीगर लोहे, ताम्बे, सोना जवाहरात, चमड़ा एवं लकड़ी के उद्योग में लगे हुए थे। चौदहवीं शताब्दी के दस्तकारों का वर्णन करते हुए सामयिक लेखक शिहाबुद्दीन अलउमरी लिखता है कि ‘उद्योगों में शिल्पकार एवं कारीगर भी हैं जैसे तलवार, धनुष, भाले तथा विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, कवच आदि बनाने वाले, सुनार व कढ़ाई का काम करने वाले, काठी बनाने वाले तथा हर प्रकार की हस्तकला में दक्ष लोग जिनमें पुरुष व स्त्रियाँ शामिल हैं, तथा तलवार बनाने वाले लेखकों तथा असंख्य साधारण लोगों के प्रयोग हेतु विशेष वस्तुएँ बनाते हैं इसी तरह दौलताबाद के सम्बन्ध में इब्नबतूता ने हीरों के उत्कृष्ट व्यापार का उल्लेख किया है।

धातु-उद्योग

जहाँ तक बहुमूल्य धातु का प्रश्न है, सोने का उत्पादन नहीं के बराबर था। यूरोपीय यात्रियों द्वारा दक्षिण में सोने के उत्पादन पर चुप्पी इस बात को दर्शाती है कि अकबर के समय मैसूर स्थित सोने की खान इस समय कार्य बन्द हो गया था। अबुल फजल से ज्ञात होता है कि उत्तरी भारत की कुछ नदियों में धातु साफ की जाती थी, यह व्यवस्था बाद में भी प्रचलन में आई। चाँदी का उत्पादन भी बहुत कम मात्रा में होता था।

जस्ते, ताम्बे एवं लोहे के उत्पादन के सम्बन्ध में प्राप्त उल्लेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उत्तरी भारत की खानों का उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। राजस्थान में जस्ते व ताम्बे की खाने की तथा उत्तरी भारत में अन्य स्थानों से भी ताम्बा निकाला जाता था। लोहे का स्थानीय उत्पादन ही आवश्यकता की पूर्ति के लिए काम में लाया जाता था।

हीरा

खनिज पदार्थों के उत्पादन में हीरों के उत्पादन का विशेष उल्लेख मिलता है। हीरे जमीन की ऊपरी सतह पर प्राप्त होते थे तथा इन्हें निकालने के लिए ईंधन के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती थी। लोहा खनन अपेक्षाकृत सरल था इन क्षेत्रों में जहाँ हीरे प्राप्त होते थे, बड़ी संख्या में मजदूर कार्यरत थे तथा यह उद्योग उच्च स्तरीय संगठन का प्रतीक था। टेवर्नियर ने जो स्वयं एक प्रशिक्षित जौहरी था, ने इस उद्योग के संगठन के विषय में विस्तार से लिखा है। यद्यपि टेवर्नियर का विवरण सत्रहवीं शताब्दी के मध्य का है तथापि यह विवरण मुगलकाल का प्रतिनिधि स्वरूप समझा जा सकता है। मुगलकाल में दक्षिण में हीरे दो क्षेत्रों से प्राप्त होते थे—वह क्षेत्र जहाँ कीचड़ होती थी और जहाँ पर हीरों को प्राप्त करने से पूर्व धोना पड़ता था। स्पष्टतः द्वितीय विधि में अधिक श्रम लगता था तथा इसके संगठन की परिपक्वता तत्कालीन औद्योगिक संगठन की दक्षता का उदाहरण प्रस्तुत करती है।

टेवर्नियर के अनुसार बड़े स्तर पर होने वाले इस उद्योग का संगठन अद्वितीय था। एक व्यापारी लगभग आधी एकड़ क्षेत्र पर अपना अधिकार निश्चित करने के पश्चात् मजदूरों को हीरे ढूँढ़ने के कार्य में लगाता था, जिनकी संख्या अधिक से अधिक 300 (तीन सौ) तक होती थी। मजदूरों द्वारा सतह की मिट्टी खोदने तथा औरतों व बच्चों द्वारा इसे दीवार से घिरे हुए क्षेत्र में इकट्ठा किये जाने के पश्चात् मटकों से पानी लाकर उस पर डाला जाता था। पानी के बहाव के साथ दूसरी तरफ मिट्टी को दीवार के छेदों में से निकाल दिया जाता था और बची हुई मिट्टी सूख जाने के बाद छबड़ियों से हवा की सहायता से उड़ा दिया जाता था तथा कच्चा माल एक स्थान पर इकट्ठा हो जाता था। यह परम्परागत पद्धति थी जो अनाज को साफ करने में भी प्रयुक्त होती थी। जमीन पर इकट्ठे हुए माल को लकड़ी से कूटा जाता था और उसमें से हीरे निकाल लिये जाते थे। इस उद्योग में बड़ी संख्या में लोगों को काम मिला हुआ था। दस्तकार जो हीरे को निखारने व निश्चित आकार देने का कार्य करते थे; कार्य में पूर्ण प्रशिक्षित थे। हीरों के कार्य में लगे लोगों को जो मजदूरी दी जाती थी। वह बहुत कम थी। टेवर्नियर के अनुसार, एक कारीगर (प्रशिक्षित व्यक्ति) को साल में तीन पगोड़ा मिलते थे तथा हीरे चुनाने की लालसा इतनी अधिक होती थी कि इसकी रोकथाम के लिए 50 मजदूरों पर 12 से 15 चौकीदार नियुक्त किये जाते थे। पगोड़ा के सामयिक मूल्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मजदूरी की दर प्रतिमाह 1 रुपये से भी कम थी जिससे मात्र जीवन-यापन हो सकता था। वस्तुतः बहुमूल्य रत्नों को ढूँढ़ने पर अतिरिक्त राशि बोनस के रूप में दी जाती थी और सम्भवतः लाभप्रद सुअवसर तथा भाग्यशाली चोरी प्रमुख उद्देश्य थे जिनसे दस्तकार हीरे की खादानों में कार्य करने के प्रति आकर्षित होते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह उद्योग बड़ा लाभप्रद था। इस उद्योग का महत्व स्थानीय होने के अलावा बाह्य अधिक था। हीरों का निर्यात विदेशों में होता था तथा गोलकुण्डा इस कार्य के लिए काफी प्रसिद्ध था।

कृषि कार्य के उपरांत कृषक परिवार के सहयोग से उद्योग में क्रियाशील रहता था। इससे अतिरिक्त आय होने से जीवन में गुणात्मक सुधार के साथ राज्य को समृद्ध बनाने में सहायक होता था। कृषि पर निर्भर उद्योगों में धन कटाई तेल पेराई, रस्सी बटाई, डलिया बनाने रेशम पालन, कपास से बिनौल निकालने गुड़ अथवा शक्कर बनाने, नील बनाने, शोरा बनाने, सूत कताई आदि उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित होते थे। गाँव के जल एवं थल मार्गों के शहरों से जुड़ने के कारण कृषकों का प्रत्यक्ष रूप से बाहरी समाज से अवश्य था। गैर कृषि पर आधारित उद्योगों के तहत अनेक धातुओं चमड़ा, कागज, काष्ठ, शीशा, पत्थर, नमक, इत्र, तेल आदि से जुड़े हुए उद्योग सम्मिलित थे।

वस्त्र-उद्योग

मुगलकाल में कपड़ा उद्योग की समृद्धता फलस्वरूप भारत के अनेक क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कपड़ों का उत्पादन किया जाता था। ढाका का निर्मित मलमल विदेशों में विख्यात था और एक थान मलमल अंगूठी के बीच से निकल सकता था। उत्तम श्रेणी के मलमल के अन्तर्गत मलमलेखास, आवेरणां शबनम, गंगाजल को रखा जा सकता था। बंगाल में कसीदाकारी युक्त मलमल निर्मित किये जाते थे। अबुल फजल आईन-ए-अकबरी में खानदेश एवं गुजरात के सूती कपड़ों का उल्लेख करता है। सूती कपड़ों में दक्षिण भारत का खासा, लाहौर एवं लखनऊ का चिकन सुविख्यात था। रेशम उद्योग मुर्शिदाबाद मालदा कासित बजार पटना एवं बनारस में स्थापित किये गये थे। सूरत और बनारस में रेशमी कपड़ों पर सोने चांदी के जरी के कार्य सम्पादित होते थे। अकबर कश्मीर के रेशम से अत्यधिक प्रभावित था और उसने रेशम पर राज्य के एकाधिकार को अपने नियंत्रण में ले लिया था। विदेशी यात्री वर्नियर उल्लेख करता है कि हॉलैण्ड के व्यापारियों ने कासिम बाजार में एक रेशम का कारखाना स्थापित किया था जिसमें सात से आठ सौ तक कारीगर कार्यरत थे। इस प्रकार दक्षिण भारत में अनेक स्थानों पर रेशम उद्योग स्थापित किये गये थे। उत्तर प्रकार के ऊन का आयात तिब्बत से किया जाता था, कश्मीर में उत्तम किस्म की कम्बल, शालें और ऊनी वस्त्रों का उत्पादन किया जाता था। इस काल में छपाई उद्योग विकसित था और देश के अनेक क्षेत्रों में इसके केन्द्र विद्यमान थे। नील उत्पादन से छपाई रंगीन एवं चमकीले वस्त्रों को निर्मित करने में अत्यधिक सहायता मिली।

टकसाल

वस्त्र उद्योग के साथ ही साथ धातु उद्योग मुगल काल में अत्यंत समृद्ध था। टकसाल टालने के कार्य में शासक रूचि लेता था। सिक्कों के ऊपर उपाधियों सहित अपना नाम खुदवाना सिक्का ढालने का वर्ष एवं स्थान आदि अंकित कराता था। अकबर ने 1577 ई० में टकसालों में सुधार हेतु ख्वाजा अब्दुससमद शिराजी नामक प्रसिद्ध कलाकार और सुलेखक को दिल्ली की शाही टकसालों का सुपरिटेन्डेन्ट नियुक्त किया। टकसाल में सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे। सोने का प्रचलित सिक्का इलाही, ताँबे के दाम अथवा पैसा या फलूस और चाँदी का सिक्का जो रुपया कहलाता था, व्यापारिक लेन-देन में लाया जाता रहा होगा। अबुल फजल के अनुसार, “धातु से दस गुना अधिक मूल्य प्राप्त होता था’ जड़ाऊ आभूषण एवं सोने व चाँदी के बर्तनों के लिए बनारस, दिल्ली, गुजरात और आगरा विशेष प्रसिद्ध थे। भारतीय कारोबार में लोहा, पीतल, चाँदी काँसा आदि धातुओं का निर्माण बड़ी सफलता के साथ क्रियान्वित किया जाता था। युद्ध में काम आने वाले सामान देश के अनेक क्षेत्रों में निर्मित किये जाते थे अपितु सोमनाथ और पंजाब विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। मेवाड़ तथा सियालकोट में तोड़ेदार बंदूक निर्मित की जाती थी। अकबरनामा के अनुसार, यांत्रिक अनुसन्धान में अकबर व्यक्तिात रूप से रुचि रखता था। जैसे वह बन्दूक की नलिकाओं का निर्माण के विभिन्न पद्धति का निरीक्षण करता था और उसके निर्माण के विभिन्न सोपानों पर उनका परीक्षण करता था। यहाँ तक कि अपने शिकार के दौरे के समय भी वह लाहौर की दुकान पर जाकर कुछ बन्दूक बनाने के काम को देखने में व्यतीत करता था।

मुगलकाल में चमड़ा उद्योग विकसित अवस्था में था। इस काल में चमड़े से अनेकों प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती थीं। जैसे घोड़े की काठी एवं लगाम, पानी के लिए मशक, घी एवं तेल के लिए कुप्पे और इत्र के लिए कुप्पियाँ आदि थीं। गुजरात से चमड़े की वस्तुएँ अरब देशों को निर्यात की जाती थीं। इसलिए यह कहना उचित प्रतीत होता है कि मुगलकाल में चर्म उद्योग अपने सर्वोच्चता को प्राप्त किया था। समकालीन इतिहासकारों के विवरणों से मालूम होता है कि मुगलकाल में चमकीले कागज भी निर्मित किये जाते थे। कश्मीर, लाहौर, सियालकोट, आगरा, पटना, गया, दिल्ली, राजगीर, अवध, शाहजहाँपुर, इलाहाबाद आदि कागज उद्योग के महत्वपूर्ण केन्द्र थे। लाहौर और आगरा में शाही कारखानों में भी कागज का उत्पादन किया जाता था। चीनी उद्योग भी विकसित था और यह उद्योग देश के सभी क्षेत्रों में फैला था। परन्तु बंगाल, पटना, आगरा, बयाना, दिल्ली और लाहौर प्रमुख केन्द्र थे। इस काल में अत्यधिक मात्रा में चीनी विदेशों को निर्यात की जाती थी।

मुगल शासक बाबर ने केवल आगरा में 680 तथा दूसरे शहरों में 1391 राजगीर इमारतों के बनवाने में लगाया था। मुगलकाल और मुख्य रूप से शाहजहाँ का शासनकाल स्थापत्य कला की दृष्टि से स्वर्णयुग था, उसके समय में ही ताजमहल जैसी विश्वविख्यात कलाकृति का निर्माण हुआ था। इसके अतिरिक्त आगरे के किले में दीवाने आम, दीवाने-खास तथा मोती मस्जिद। दिल्ली की इमारतों में सर्वप्रथम राजधानी शाहजहाँबाद का निर्माण, लालकिला और इसी के अन्तर्गत लाहौरी दरवाजा एवं दिल्ली दरवाजा का निर्माण दिल्ली के किले में निर्मित दीवाने खास की एक अनूठी विशेषता है अन्दर की छत चाँदी की बनी हुई तथा उस पर सोने, संगमरमर तथा बहुमूल्य पत्थर की मिली जुली सजावट से निर्मित है। इस पर अमीर खुसरो वर्णन करता है कि “अगर फिरदौस वर रूबी जमीनस्त हमी अस्त हमी अस्त’ अर्थात् “अगर दुनियाँ में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है।” इस प्रकार मुगलकाल के भवनों में रंग-बिरंगे पत्थरों का प्रयोग पत्थरों में जड़ाऊ का कार्य अपनी अनुपम विशेषता थी।

मुगलों के काल में जहाज निर्माण उद्योग विकसित था और इस काल में अत्यधिक संख्या में छोटे तथा बड़े जहाज का निर्माण किया गया था। सूरत इस उद्योग का प्रमुख केन्द्र और गोवा, भड़ौच, लाहौर, ढाका, चटगाँव, मछलीपट्टनम जहाज निर्माण के अन्य केन्द्र थे। मुगलों की नियमित नौ सेना नहीं थी। लेकिन औरंगजेब के काल में गंज-ए-सवाई की तरह अनेक जहाज होते थे और प्रत्येक जहाज में अस्सी तोपें तथा चार सौ तोड़ेदार बंदूकें रहती थीं। मुगलों का पुर्तगालियों से पराजित होना नौसेना का अभाव माना जा सकता है।

मुगलकाल के उद्योगों की उपयोगिता संसार में अत्यधिक थी। सूती वस्त्र, नील रेशम और शोरे की माँग विदेशों में होने के कारण इनका निर्यात अधिक होता था। 1600 ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित होने के बाद इन वस्तुओं के निर्यात की गतिविधियों में अधिक बढ़ोत्तरी हुई। सूती वस्त्र एवं नील को कम मूल्य पर खरीदकर उससे अधिक लाभ करते थे।

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