सल्तनत कालीन केन्द्रीय प्रशासन

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सल्तनत कालीन केन्द्रीय प्रशासन की रूपरेखा

सल्तनत कालीन प्रशासन

सल्तनत कालीन भारत में सुल्तान प्रशासकीय यंत्र का शिखर था। वह महासेनानायक, सर्वोच्च न्यायिक एवं कार्यकारिणी शक्ति था। वह सहधर्मियों का नेता (अमीरुल मोमिनीन) होने के साथ ही अपनी सम्पूर्ण प्रजा का शासक भी था। वह स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि स्वीकार करने के कारण अपने कार्यों के लिए केवल उसी के प्रति उत्तरदायी था। प्रजा का कर्तव्य उसके आदेशों का निःसंकोच पालन करना था। वह निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी होते हुए भी शरा के विरुद्ध जाने का दुस्साहस न करता था। सल्तनत में निरंकुश शक्ति का उपयोग करते हुए वह शासनतंत्र के संचालन में अनेक मंत्रियों का सहयोग प्राप्त कर अपनी शक्ति-प्रतिष्ठा एवं शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने का प्रयास करता था।

केन्द्रीय प्रशासन

सुल्तान के सहायतार्थ केन्द्रीय स्तर पर अनेक मंत्रिगण एवं उच्च अधिकारी थे जिनमें चार महत्वपूर्ण मंत्रियों को प्रशासन रूपी भवन के चार स्तम्भों की संज्ञा दी जा सकती है। इन प्रमुख चार मंत्रियों के अंतर्गत दीवाने विजारत, दीवाने अर्ज, दीवाने इंशा एवं दीवाने रिसालत नामक विभाग थे। इनके अतिरिक्त केन्द्र में कुछ अन्य मंत्री एवं महत्वपूर्ण अधिकारी भी थे जिनकी चर्चा हम उपरोक्त विभागों के पश्चात करेंगे।

दीवाने विजारत :

इस विभाग का अध्यक्ष ‘बजीर’ कहलाता था। जियाउद्दीन बरनी अपनी पुस्तक ‘फतवा-ए-जहाँदारी’ में लिखता है। कि “सुल्तान के लिए एक बुद्धिमान वजीर से बढ़कर गर्व की कोई वस्तु नहीं होती है। क्योंकि बुद्धिमान वजीर के बिना सल्तनत के कार्य भलीभाँति सम्पन्न नहीं हो पाते।” मुस्लिम विधिवेत्ता अलमावर्दी ने दो प्रकार के वजीर बताए हैं वजीर तनफीज एवं वजीरे तफवीद। वजीरे तनफीज सीमित अधिकारों वाले होते हैं जिनका कार्य राज्यादेशों को कार्यान्वित करना होता हैं यह अपनी इच्छानुसार कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकते हैं। परन्तु वजीरे तफवीद के अधिकार असीमित होते हैं तथा वह सुल्तान के आदेश के बिना ही महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने में सक्षम होता है। केन्द्रीय प्रशासन के अन्य मंत्रियों की तुलना में उसका स्थान उच्चतर होता था जिसके कारण उसे प्रधानमंत्री कहा जा सकता है। वजीर मुख्य रूप से राजस्व एवं अर्थ व्यवस्था का प्रभारी होता था। लसा भूमि से भू- राजस्व एवं करद राजाओं से राजस्व वसूल करता था। वह प्रान्तपतियों के राजस्व-लेखा का निरीक्षण करता तथा प्रान्तों से अतिरिक्त राजस्व की वसूली करता था जिसमें कभी-कभी बल का भी प्रयोग करना पड़ता था। उसके कर्तव्य निर्वाह में अनेक अधिकारी एवं लिपिक उसकी सहायता करते थे। उसके विभाग में लेखा-परीक्षा अनुभाग का संचालन ‘मुशरिफे मुमालिक’ एवं ‘मुस्तौफिए मालिक’ नामक अधिकारियों द्वारा होता था। आमिल, कारकुन एवं मुतसर्रिफ उसके वित्तीय तथा लिपिक वर्गीय कर्मचारी थे। ‘दीवाने विजारत’ की कार्य प्रणाली विस्तृत एवं जटिल थी। सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का समकालीन लेखक अफीफ अपनी पुस्तक ‘तरीखे-ए-फिरोजशाही’ में लिखता है कि “यदि दीवान के अधिकारियों के कर्तव्यों का उल्लेख किया जाय तो उसके लिए एक पृथक ग्रंथ की आवश्यकता हो जायेगी। सुल्तान अलाउद्दीन खलजी ने बकाया राजस्व की वसूली हेतु ‘दीवाने विजारत के अधीन ‘दीवाने मुस्तखराज’ नामक विभाग की स्थापना की थी।

दीवाने अर्जः

इस विभाग का अध्यक्ष ‘आरिजे मुमालिक’ होता था जिसका प्रमुख कार्य सैनिकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण तथा वेतन की व्यवस्था करना था। वह सैनिकों की सज्जा की भी व्यवस्था करता था। वह इक्कादारों की नामावली भी रखता था तथा इक्कादारों अथवा प्रान्तपतियों के सैनिक दलों को भी ग्रहण करता थ। वह समय समय पर सैनिक निरीक्षण भी किया करता तथा उनमें अनुशासन बनाये रखने काप्रयास करता था। वह सैनिकों के लिए खाद्य सामग्री एवं यातायात की व्यवस्था भी स्थापित करता था। वह सैनिकों के लिए खाद्य सामग्री एवं यातायात की व्यवस्था भी स्थापित करता था। वह युद्ध में प्राप्त लूट की सम्पत्ति को अपनी सुरक्षा में रखता था। उसे सैनिक अभियानों पर भी नियुक्त किया जाता था, क्योंकि प्रत्येक अभियान का सेनापति सुल्तान द्वारा ही नियुक्त किया जाता था। जियाउद्दीन बरनी ‘आरिजे मुमालिक‘ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए लिखता है कि “यदि आरिजे मुमलिक उत्कृष्ट गुणों एवं निष्ठा से परिपूर्ण होता है तो बादशाह की सेना में वृद्धि होती रहती है और वह सुव्यवस्थित होती है। सेना के समस्त छोटे बड़े कार्य उससे सम्बन्धित होते हैं।”

दीवाने इंशा :

यह शाही सचिवालय था जिसका प्रधान ‘दबीरे मुमालिक’ कहलाता था। मिनहाज इस विभाग को ‘दीवाने अशराफ’ के नाम से सम्बोधित करता हैं इस विभाग का प्रमुख कार्य शाही घोषणाओं एवं पत्रों का पाण्डु-लेख तैयार करना तथा स्थानीय प्रशासकीय अधिकारियों से सम्पर्क रखना था। राजकीय अभिलेख भी इस विभाग में रखे जाते थे। दबीरे मुमालिक (प्रधान सचिव) के अंतर्गत अनेक दबीर अथवा सचिव होते थे। सुल्तान के व्यक्तिगत दबीर को ‘दबीरे खास’ कहा जाता था जो सुल्तान की सेवा में रहता तथा उसके पत्र-व्यवहार का कार्य देखता था। इसके अतिरिक्त वह विजय-विवरणों को भी संकलित करता था। ‘दीवाने इंशा’ में सुल्तान की मुहर भी होती थी जो अनुदान सम्बन्धी आदेशों पर लगाई जाती थी। इस विभाग का कार्य अति गोपनीय होता था जिसके कारण दबीरे मुमालिक का पद बहुत महत्वपूर्ण होता था।

दीवारे रिसालत :

इस विभाग के कार्यों के सम्बन्ध में कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। डॉ0 आई0 एच0 कुरेशी के अनुसार यह विभाग धार्मिक एवं पवित्र कार्यों से सम्बन्धित था तथा सद्र इसका अध्यक्ष होता था। परन्तु प्रो० ए० बी० एम० हबीबुल्ला का कथन है कि यह विदेश मंत्रालय के समकक्ष था। यह विभाग पड़ोसी राज्यों को भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारूप तैयार करता तथा विदेशों को जाने वाले तथा देश में आने वाले राजदूतों से निकट सम्पर्क रखता था। डॉ० के० एस० लाल लिखते हैं कि “ऐसा प्रतीत होता है कि खलजी सुल्तान स्वयं इस मंत्रालय का कार्य देखता था तथा इस पद पर किसी अमीर को नियुक्त नहीं किया।

दीवारे बरीदः

यह गुप्तचर विभाग था जिसका अध्यक्ष ‘वरीदे मुमालिक कहलाता था। वह राज्य का प्रमुख समाचार लेखक भी होता था। उसके अंतर्गत अनेक बरीद शहरों बाजारों एवं प्रत्येक आबादी वाले स्थानों में नियुक्त थे। सल्तनत के विभिन्न भागों से बरीद सूचनायें बरीदे मुमालिक को भेजते थे जिसे वह सुल्तान की सेवा में प्रेषित करता था। इस पद की महत्ता का उल्लेख करते हुए जियाउद्दीन बरनी अपनी पुस्तक ‘फतावा-ए-जहाँदॉरी’ में लिखता है कि “यदि सुल्तान जनता की स्थिति से अनभिज्ञ है तो वह उसकी समृद्धि के लिए साधन खोजने में सफल नहीं हो सकता।” अतः बरीद सल्तनत के विभिन्न स्थानों पर सुल्तान के कान एवं आँख की भाँति थे। बरनी सुल्तान अलाउद्दीन खलजी के शासनाकाल में इस विभाग की कुशलता का वर्णन करते हुए ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ में लिखता है कि “गुप्तचरों का कार्य इस सीमा’ तक पहुँच गया था कि मलिकों को हजार सुतून (राजमहल) के भीतर भी किसी बात कहने का साहस नहीं होता था। यदि वे कोई बात करते तो सेंत द्वारा करते थे। अपने घरों में रात दिन गुप्तचरों के भय से काँपा करते थे। वे कोई बात अथवा कार्य ऐसा न करते जिससे दण्ड एवं सजा का भय होता।

दीवाने कजा :

इस विभाग का प्रधान ‘काजी-ए-मुमालिक’ था जो कभी-कभी शेख-उल-इस्लाम (जो ‘सद्रेजहाँ’ अथवा सद्र-उस-सुदूर भी कहलाता था) के पद पर भी आसीन होता था तथा न्याय विभाग के साथ ही साथ धार्मिक मामलों का भी प्रभारी होता था। वह ‘काजी-ए-मुमालिक’ अथवा ‘काजी-उल-कुज्जात’ के रूप में न्याय विभाग में प्रधान न्यायाधीश के रूप में कार्य करता था। उसके अधीन नायब काजी एवं ‘अदल’ होते थे जो न्याय निष्पादन का कार्य करते थे। नियमों की व्याख्या तथा गूढ़ विषयों पर मत देने के लिए ‘मुफ्ती’ भी होते थे। यदि कोई अभियुक्त इतना शक्तिशाली होता था कि काजियों द्वारा उस पर नियंत्रण रखना कठिन हो जाता था तो ‘अमीरदाद’ नामक अधिकारी का कर्तव्य था कि वह उसे दरबार में प्रस्तुत करे। काजी-ए-मुमालिक’ न्याय विभाग के अधिकारियों की नियुक्ति एवं न्यायपालिका के संचालन के लिए भी उत्तरदायी था। ‘सद्र-उस-सुदूर’ धार्मिक मामलों में सुल्तान का प्रमुख परामर्शदाता होता था। इसके अतिरिक्त वह शैक्षिक संस्थाओं का संचालन करता तथा स्थानीय मस्जिदों में इमामों एवं खतीबों की नियुक्ति भी करता था।

अमीरे हाजिब :

इस पदाधिकारी को बारबक के नाम से भी सम्बोधित किया जाता था, जो दरबार के शिष्टाचार को कार्यन्वित करता तथा उसके वैभव को बनाए रखने का प्रयास करता था। उसकी अनुमति के बिना कोई व्यक्ति सुल्तान तक नहीं पहुंच सकता था और न ही प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर सकता था। उसकी सहायता के लिए अनेक हाजिब होते थे तथा सुल्तान के वैयक्तिक हाजिब को ‘हाजिब खास’ कहा जाता था। सुल्तान के निकट होने कारण वह तानाशाही शक्तियों का भी प्रयोग कर सकता था और विशेषकर जब सुल्तान के अल्पावस्था अथवा शक्तिहीन होता था। अतः इस पद पर सुल्तान अपने निकटतम सम्बंधी अथवा अति विश्वसनीय व्यक्ति को नियुक्त करता था। वह प्रशिक्षित सैनिक होता था जिसके कारण उसे सैनिक अभियानों पर भी भेजा जाता था। सुल्तान जब स्वयं किसी अभियान का नेतृत्व करता था तो ‘अमीरे हाजिब उसके व्यक्तिगत सचिव के रूप में कार्य करता था। यह पद दरबार के प्रतिद्वन्द्वी अमीर गुटों के लिए झगड़े का मूल बन गया।

वकीलेदरः

यह राजपरिवार विभाग से सम्बन्धित अधिकारी था। प्रो० हबीबुल्ला के अनुसार वह राजपरिवार व्यवस्था का प्रशासनिक प्रधान होता था। मिनहाज इस पद की महत्ता का वर्णन करते हुए लिखता है कि इस पद को प्राप्त कर रेहान ने राजमहल के आन्तरिक मामलों का संचालन अपने हाथ में ले लिया। वकीले दर का एक नायब अथवा सहायक भी होता था। “वास्तव में, वकीलेदर सुल्तान का प्रबंधक अर्थात राजपरिवार विभाग का नियन्ता तथा मुगल कालीन मीरसामाँ का पुरोगामी था। उसके हाथ में बहुत शक्ति होती थी जिसका प्रयोग कर वह महमूद अथवा कैकुबाद जैसे शक्तिहीन सुल्तानों के राज्यकाल में तानाशाह बन सकता था।

दीवाने रियासतः

सुल्तान अलाउद्दीन खलजी ने बाजार नियंत्रण व्यवस्था को कार्यान्वित करने के लिए ‘दीवाने रियासत’ नामक एक नये विभाग की स्थापना की। इस व्यवस्था के संचालन के लिये एक प्रमुख बजार नियंत्रक की नियुक्ति की जिसके अंतर्गत विभिन्न बाजारों में शहना, मुनही एवं बरीद नामक अधिकरियों की नियुक्त की। जब तक सुल्तान अलाउद्दीन जीवित रहा उसकी बाजार नियंत्रण व्यवस्था सुचारूरूप से चली परन्तु उसकी मृत्यु के साथ ही यह व्यवस्था भी समाप्त हो गई और इस विभाग का भी अंत हो गया।

दीवाने अमीरे कोही :

सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने कृषि विकास के लिए इस विभाग की स्थापना की थी। जिसका प्रधान अमीरे दीवाने कोई कहलाता था। इस विभाग के 60 वर्ग मील के भू-क्षेत्र में विभिन्न फसलों के उत्पादन का प्रयोग किया परन्तु निकृष्ट श्रेणी की भूमि के कारण प्रयोग सफल नहीं हो सका। इस प्रयोग में राजकोष का सत्तर लाख रुपया व्यय हुआ।

दीवाने बन्दगान :

सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में दासों की संख्या बढ़कर एक लाख अस्सी हजार तक पहुंच गई। अतः सुल्तान ने दीवाने विजारत के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर एक पृथक ‘दीवाने बंदगान’ नामक विभाग की स्थापना की। इस विभाग का कार्य दासों को विभिन्न व्यवसायों में प्रशिक्षित कर उन्हें शाही कारखानों तथा अन्य स्थानों पर सेवा में लगाना था। फलस्वरूप अब दास सभी मंत्रालयों विभागों, कारखानों में कार्यरत थे तथा चालीस हजार दास शाही महल के घुड़सवार प्रहरी के रूप में थे। इस विभाग के अन्तर्गत अर्ज-ए-बन्दगान, मजमुआदार, चाउशगोरी, दीवान आदि अधिकारी होते थे।

दीवाने खैरात :

सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने श्दीवाने शैरात’ नामक विभाग की स्थापना की थी। इस विभाग का कारऋय निर्धन एवं निःसहाय लोगों का पुत्रियों के विवाह के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करना था। समकालीन लेखक अफीफ लिखता है। कि “सुल्तान ने आदेश दिया कि जिसकी पुत्री व्यस्क हो जाय वह दीवाने खैरात में सूचना दे दें और अपना दुःख एवं हाल सविस्तार ‘दीवाने खैरात’ के अधिकारियों को बता दें।” प्रत्येक व्यक्ति की दशा के अनुसार 50 तंके, 30 तंके तथा 25 तंके कन्या के विवाह हेतु दिये जाते थे। अफीफ लिखता है कि सुल्तान की दया एवं उदारता से कई हजार सुशील कन्याओं का विवाह हो गग।

दीवाने इमारात :

सुल्तानं फिरोजशाह तुगलक ने ‘दीवाने इमारात’ अथवा लो निर्माण विभाग की स्थापना की थी। अफीफ इस विभाग को ‘इमारतखाना’ के नाम से संबोधित करते हुए लिखता है कि “इस प्रकार का ‘इमारतखाना’ किसी अन्य सुल्तान के राज्यकाल में न था क्योंकि ‘इमारतखाने’ में लाखों व्यय होता था। इस विभाग का प्रमुख अधिकारी ‘मीरे इमारत था जिसके अंतर्गत अनेक ‘शहना’ नियुक्त किए गए। इस विभाग के द्वारा अनेक नगरों, भवनों, मदरसों, मकबरों, मस्जिदों, बाँधों, नहरों सरायों इत्यादि का निर्माण किया गया। समकालीन इतिहासकार अफीफ लिखता है कि “देहली के राजसिंहासन पर जितने भी सुल्तान आरूढ़ हुए तथा जिन्होंने अन्य राज्यों को विजित किया उनमें से किसी ने भी भवन निर्माण के विषय में इतना प्रयत्न नहीं किया।”

शाही कारखाने :

सल्तनत काल में शाही कारखानों की भी व्यवस्था थी जहाँ विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था। सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने शाही कारखानों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जिसके कारण उसके शासनकाल में इन कारखानों की संख्या छत्तीस हो गई थी। इन्हें रातिबी कारखानों एवं गैर-रातिबी कारखानों में विभाजित किया गया। रातिबी कारखानों का वार्षिक अनुदान निश्चित था जिसके अंतर्गत मतबख (रसोई), शराबखाना (सुरागार), शमाखाना (प्रकाश की व्यवस्था से सम्बन्धित), पीलखाना (गजशाला), पायगाह (अश्वशाला), शुतुरखाना (ऊँटाशाला), आबदारखाना (जल के प्रबंध से सम्बन्धित) तथा अन्य कारखाने थे। गैर रातिबी कारखा नों का अनुदान निश्चित नहीं था जिसके अंतर्गत जामदारखाना (वस्त्रों से सम्बन्धित) अलमखाना (पताकाओं से सम्बन्धित) फर्राशखाना (कालीनों से सम्बन्धित), रिकाबखाना (घोड़े की जीन आदि) तथा अन्य कारखानें थे। प्रत्येक कारखाना की औपचारिक व्यवस्था उच्चकोटि के खान अथवा मलिक करते थे परन्तु शाही कारखानों का महानिदेशक ‘मुतसरिफ’ कहलाता तथा तथा उसी के पास पहले शाही आदेश जाते थे। इन कारखानों के लिए एक पृथक दीवान की भी व्यवस्था थी।

केन्द्र में इन उपरोक्त प्रमुख विभागों एवं मंत्रियों के अतिरिक्त कुछ अन्य अधिकारी भी थे जो महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वाह करते थे। प्रथम, सुल्तान के अंगरक्षकों का प्रधान ‘सरेजानदार’ कहलाता था। दूसर, अमीर आखुर था जो अश्वाधीक्षक था। तीसरा, अमीरे ‘सरेजानदार’ कहलाता था। दूसरा, अमीर आखुर था जो अश्वाधीक्षक था। तीसरा, अमीरे शिकार था सुल्तान के लिए शिकार खेलने का प्रबंध करता था। चौथा, अमीरे मजलिस था जो सुल्तान की सभाओं एवं गोष्ठियों की व्यवस्था देखता था। पाँचवा, दीवाने इस्तेहकाक था जो आलिमों (विद्वानों) एवं हाफिजों (मुस्लिम धर्मशास्त्रियों) को वृत्ति प्रदान करता था।

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