आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन में अम्बेडकर जी की भूमिका

आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन में अम्बेडकर जी की भूमिका

डॉ० अम्बेडकर के पास एक प्रखर ऐतिहासिक हर्षत थी वे इतिहास की प्रक्रिया को पूर्ण रूप से समझते थे। ये भारतीय समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था के घोर विरोधी थे। वे वर्ण व्यवस्था को अस्पृश्यता का मूल कारण मानते थे। उनका मानना था कि अस्पृश्यता समाज के लिए कोढ़ है, और जब तक इस कोढ़ को समूल नष्ट नहीं किया जायेगा तब तक दलितों का उद्वार सम्भव नहीं है।

अछुतोद्धार के लिए सबसे पहली लड़ाई उन्होंने सवर्ग हिन्दुओं के विरूद्ध शुरू की। इस विषय में उनकों महत्मा फुले के विचारों से सहायता मिली। सवर्ण हिन्दुओं का विरोध वे आवश्यक मानते थे और बराबर यही कहते थे कि जब तक हर क्षेत्र में समानता न हो जाय यह विरोध जारी रहना चाहिए, उन्होंने बम्बई विधान-सभा के गैर-ब्राह्मण दल के नेता एस-के० बोले से सम्पर्क स्थापित किया और बम्बई सरकार से इस बात मनवा ली कि जितने भी कुँए और जलाशय हैं उनका उपयोग करने की अनुमति सब को दी जाय और हर सार्वजनिक संस्था में उनके प्रवेश की आजादी हो, मार्च 1927 के एक दिन एक सत्याग्रह का आयोजन किया गया और प्रसिद्ध महान बावड़ी में अछूतों ने प्रवेश किया, इससे उच्च जाति के लोगों में एक आक्रोश की भावना उत्पन्न हो गई, समीप के एक मंदिर में प्रवेश की भी अफवाह थी, इस पर दंगा भड़क गया, कई लोग घायल हो गये, स्वयं अम्बेडकर को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी, इसके बाद एक विशाल सत्याग्रह की योजना बनाई गई। अम्बेडकर का आह्वान था कि जोर-जबरदस्ती से भी काम लिया जाय, इस पर सवर्णों ने भी अपनी एकता का प्रदर्शन करने की बात सोची, अम्बेडकर ने स्वयं सत्याग्रह की बागडोर अपने हाथ में ले ली बम्बई सम्मेलन में कई ब्राह्मण विरोधी प्रस्ताव पास किए गये और “मनुस्मृति’ जिसे दासता और ब्राह्मणवाद का प्रतीक माना गया, की एक प्रति जला दी गई, इन सारी घटनाओं का गहरा प्रभाव हुआ, एक सुसुप्त जाति में जागृति की लहर तो अवश्य फैली, किन्तु एक हिंसायुक्त, विघटनकारी वातावरण का भी श्रीगणेश हो गया।

इस घटना के तुरन्त बाद मंदिर-प्रवेश से सम्बन्धित सत्याग्रह शुरू हो गया यह लगभग तीन वर्ष तक चलता रहा, इसकी शुरूआत कालाराम मंदिर में प्रवेश से आरम्भ हुई दोनों समुदायों में कई झडपें हुई और वातावरण तनावपूर्ण हो गया, ऐसी स्थिति में अम्बेडकर ने गाँधी के शांति प्रयास की भी अवहेलना कर दी और वे (प्रत्यक्ष) रूप से सवर्ण-विरोधी के क्षेत्र में कूद पड़े, भले ही उन्होंने हिंसा की आवश्यकता को नकारा अवश्य।

सन 1928 में अम्बेडकर ने ‘महार वतन‘ की प्रणाली को लेकर संघर्ष किया, इस प्रणाली के अनुसार महारों को, एक बहुत छोटी रकम के एवज में, बंधुआ मजदूरों की तरह काम करना पड़ता था, उन्होंने कहा कि अगर इस प्रणाली का अंत न किया गया तो वे देशव्यापी आन्दोलन शुरू कर देंगे इसके सम्बन्ध में एक बिल भी पेश किया गया किन्तु बाद में आम्बेडकर ने यह कह कर बिल वापस ले लिया कि प्रवर समिति के सदस्यों ने बिल के महत्वपूर्ण अंशों को निकाल दिया है। आम्बेडकर ने बम्बई सरकार से बारबार कहा कि यदि वह इस समस्या का समुचित निदान नहीं करेगी तो वे कानून का सहारा लेंगे, इस तहर की बातें बराबर चलती रहीं और “महार वतन’ प्रथा का अन्त हुआ सन 1959 में जब आम्बेडकर की मृत्यु हो चुकी थी।

1930 में “दलित जाति एसोसिएशन” की स्थापना हुई और डाक्टर आम्बेडकर इसके सदस्य नियुक्त हुए, उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी को यह कार्य सौंपा गया कि वह दलित जाति की समस्याओं का अध्ययन करें, किन्तु आम्बेडकर इससे भी संतुष्ट नहीं थे, इसी समय इस समस्या के निदान के लिए गाँधी जी ने बीड़ा उठाया, पूना पैक्ट के अनुसार गाँधी जी ने हरिजन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया और इसे राजनैतिक वैधता दिलाई, इसमें भी आम्बेडकर असन्तुष्ट हो गए, उनका ख्याल था कि ‘हरिजन’ नाम देकर दलितवर्ग को और अधिक एकाकी बनाया जा रहा है और इस कदम को उन्होंने कांग्रेस द्वारा दलितों को अपनी पार्टी में मिलाने की एक चाल कहा, आम्बेडकर पर यह आरोप लगाया गया कि वे केवल अपनी जाति का कल्याण चाहते हैं, देश का नहीं, उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया कि यही सच है और उन्होंने वह कभी नहीं कहा कि वे सारे समुदायों के ठेकेदार हैं, इससे गाँधी जी को गहरी पीड़ा का अनुभव हुआ, अंत तक आम्बेडकर दलितों, विशेषकर महार जाति की समस्याओं से जूझते रहे और अंत तक यह कहते रहे कि उनको मीठी बातें नहीं, संवैधानिक अधिकार चाहिए।

इन समस्त कार्य-कलापों से क्या निष्कर्ष निकलता है? डाक्टर आम्बेडकर ने अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित कर लिया था, उस समय की परिस्थितियों में इस ध्येय की प्राप्ति एक अत्यन्त कठिन कार्य था, उन्होंने हिम्मत से इस कार्य को अपने ऊपर ले लिया, कुछ लोगों की सहायता भी उनको मिली, किन्तु प्रायः वे अकेले ही इस कार्य में जुटे रहे, यह उनकी कर्मठता का एक स्पष्ट प्रमाण है किन्तु एक बात और भी स्वीकार करनी होगी, अगर वे इस परिस्थिति में अपने को सम्पूर्ण देश के संदर्भ में रख सकते तो उनकी उपलब्धियाँ और भी महान होती दलितोंद्वार का उनका सारा संघर्ष एक संकीर्ण दायरे में ही सीमित हो गया, उन्होंने कई बार अपने को संदेहास्पद स्थिति में डाल दिया और अपने संघर्ष को एक वर्ग के संघर्ष के रूप में चलाने का प्रयास किया, ऐसा नहीं है कि इस महत्वपूर्ण कार्य को करने की आवश्यकता नहीं थी, बिना इसका बीड़ा उठाए, सामाजिक समानता या सामाजिक न्याय की बात करना, बेईमानी के अतिरिक्त और कुछ न होता, आवश्यकता तो सिर्फ इस बात की थी कि इस संघर्ष को एक राष्ट्रीय रूप दिया जाता और आम्बेडकर अपने इस पूर्वाग्रह को त्याग देते कि जो भी आंदोलन दलितोंद्वार के लिए, गैरदलित वर्गों के लोगों द्वारा संचालित होंगे अनिवार्यतः धोखा या चाल होगी, उनके अन्दर एक ऐसी अविश्वास की भावना घर कर गई थी कि वे अपने सवर्ण-विरोध को तर्कसंगत नहीं बना सके, वे यह तो मानते थे कि सभी सवर्ण दलितों के विरोधी नहीं हैं किन्तु इस मान्यता के आधार पर उन्होंने अपने कार्यक्रम का निर्धारण नहीं किया सम्भवतः यह उनकी व्यक्तिगत मजबूरी थी, या यह भी हो सकता है कि उस समय की परिस्थितियों में इसकी सार्थकता रही, इसका निर्णय करना सहज नहीं है।

ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट है कि आम्बेडकर का अछूतोंद्वार सम्बन्धी कार्यक्रम सामाजिक एकता के सिद्धान्त पर आधारित था। वे अछूतों तथा दलितों का उद्वार इसलिए चाहते थे क्योंकि बिना इस आवश्यकता की पूर्ति किये भारतीय समाज में सामाजिक न्याय संभव नहीं था। उनकी यह मान्यता आज के संदर्भ में भी उतनी ही सही प्रतीत होती है जितनी उनके समय में थी। अगर उन्होंने अछूतोद्वार का बीड़ा न उठाया होता तो भारतीय समाज के इस तिरष्कृत वर्ग को वह संवैधानिक संरक्षण न मिल पाता जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय इस वर्ग को दिया गया।

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