विकलांग बालक (दिव्यांग बालक)

विकलांग बालक

विकलांग बालकों की शिक्षण पद्धतियाँ

  • बुनियादी शिक्षण विधि-

    श्री टी० एस० अविनाश लिंगम केअनुसार महात्मा गाँधी ने राष्ट्र को एक अनमोल उपहार दिया है ‘बुनियादी शिक्षा’ । यह एक व्यवहारिक पद्धति है जो विभिन्न विषयों के साथ आधारभूत उद्योग को माध्या मानकर बालक को आत्मनिर्भर बनाकर उसे समाज से जोड़ती है।

  • खेल विधि-

    विकलांग बालकों में संगीत, शारीरिक व्यायाम, मनोरंजन| अभिनय, कृषि, बागवानी तथा अन्य उद्योगों के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है। विकलांगों हेतु अति आवश्यक व रुचिपूर्ण विधि है। इसमें सीखने के प्रति स्थायी उत्साह तथा स्फूर्ति की प्राप्ति होती है ।

  • आगमन व निगमन विधि-

    आगमन विधियों के अन्तर्गत उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं, तत्पश्चात् निष्कर्ष प्रतिपादित किये जाते हैं। जबकि निगमन विधि में सिद्धान्तों को प्रस्तुत करके उनके आधार पर विषय या कार्यों का स्पष्टीकरण किया जाता है।

  • क्रियात्मक विधि-

    क्रियात्मक विधि के अन्तर्गत सहज प्रवृत्तियों को प्रेरक शक्ति के साथ मिलाकर शिक्षण में कठिनाइयों को समाप्त करती है । विकलांग बालक इस माध्यम से स्वाभाविक अनुभवों को ग्रहण करने लगता है।

  • व्यक्तिगत व कक्षा शिक्षण विधियाँ-

    व्यक्तिगत तथा कक्षा शिक्षण विधियों के द्वारा बालकों को भली प्रकार शिक्षा प्रदान की जा सकती है। जबकि कक्षा शिक्षण विधि अमनोवैज्ञानिक विधि है । इन बालकों की शिक्षा में ‘करके सीखने’ (Learning by doing) पर भी बल दिया जाता है । इसमें किण्टर गार्टन विधि, खेल विधि, प्रोजेक्ट विधि, मॉन्टेसरी विधि तथा बुनियादी शिक्षण विधि पर भी बल दिया गया है।

  • ह्यूरिस्टिक विधि-

    यूरिस्टिक विधि का शाब्दिक अर्थ हैं. ‘स्वयं बोलना’। स्पेन्सर के शब्दों में, “यूरिस्टिक विधि एक ऐसी विधि है जो विद्यार्थी को अधिकाधिक सीखने के लिए अभिप्रेरित करती है।” यह विधि स्वयं में ही करके सीखने की विधि है । अत: यह विकलांगों में सीखने के प्रति विश्वास की भावना को मजवून करके अनुकूल परिणाम देने वाली विधि है।

  • प्रोजेक्ट विधि-

    जॉन ड्यूवी तथा डब्ल्यू. एच. किलपैट्रिक ने प्रोजेक्ट विधि को उचित विधि बताया । इन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट विधि में एक बड़ी इकाई। माध्यम से सामाजिक वातावरण में सम्पन्न किया जाने वाला कार्य. प्रोजेक्ट कहलाता है। यह बाल केन्द्रित प्रक्रिया है तथा इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत विभिन्नताओं का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। जब कार्य पूर्णत: समाप्त हो जाता है, तब अभिलेख तैयार करना ही इस पद्धति की मुख्य विशेषता है।

  • मान्टेसरी व किंडर-गार्टन पद्धति-

    मान्टेसरी तथा किंडर-गार्टनपद्धति भी शिक्षा की महत्वपूर्ण पद्धतियाँ हैं। कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण के लिए इन दोनों ही विधियों के अध्ययन की तत्परता एवं अभ्यास की निपुणता अध्यापकों की तत्परता तथा उनके निर्देशन पर निर्भर करती है। मान्टेसरी विधि की जन्मदाता डॉ. मान्टेसरी स्वयं एक चिकित्सक थीं। उन्होंने अपनी विधि को मूलत: मन्दबुद्धि बालकों हेतु प्रारम्भ किया था पर आज यह जगत प्रसिद्ध विधि हो गई है। सभी प्रकार के छात्र चाहे वह विशिष्ट हों अथवा नहीं, उनके लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इस विधि में प्रशिक्षण द्वारा इन्द्रिय चेतना जागृत की जाती है । यथा-त्वचा से स्पर्श,नाक से सूंघना, आँखों से देखना, जीभ से स्वाद लेना तथा कानों से सुनना इन्द्रिय ज्ञान के अंतर्गत आता है।

  • डाल्टन विधि-

    डाल्टन विधि विकलांगों हेतु अति उपयोगी विधि है। इस विधि में सीखने व सिखाने की क्रियाओं में एकता स्थापित की जाती है। यह विधि विकलांगों की दृष्टि से हितकर है क्योंकि वह अपनी वैयक्तिक इच्छा या सुविधा के अनुसार कार्य करने में स्वतन्त्र है । इसमें औपचारिकता से अलग साथी बालकों के साथ रहकर, विकलांग बालक इस विधि द्वारा अपने परिश्रम का पुरस्कार प्राप्त कर सकता है।

डाल्टन विधि के अन्तर्गत बालकों को सामूहिक दायित्व सौंपा जाता है, जिससे एक ही प्रकार के विकलांग वर्ग में सहयोग, स्वार्थहीनता, सहायता तथा कार्य विभाजन जैसे सामाजिक मूल्यों का विकास सम्भव है । इस विधि में सम्पूर्ण कार्य एक निश्चित अनुबन्ध के अन्तर्गत चलता है।

  • इकाई योजना विधि-

    डॉ. श्याम लाल कौशिक के शब्दों में, “इकाई योजना विधि वैयक्तिक विभिन्नता, उद्देश्य, विषय वस्तु एवं पूर्ण अभ्यास से सम्बन्धित एक संगठनात्मक स्थिति है, जो सीखने में कठिनाई और कुशलता का स्तर दर्शाती है।” यह विधि अपने ठोस परिणामों के फलस्वरूप सर्वाधिक अपनाई जा रही है।

  • हरबर्ट विधि-

    शारीरिक दृष्टि से विकलांग एवं मानसिक दृष्टि से स्वस्थ बालकों हेतु यह विधि अच्छी है। इस विधि में निश्चित व्यवस्था, पूर्व ज्ञान से शिक्षण का सम्बन्ध जोड़ते हुए नवीन विषय का स्वरूप स्पष्ट होता है । भारत में सभी शिक्षा महाविद्यालयों में यह पद्धति प्रचलित है, इसमें पाँच पद हैं-

  1. प्रस्तावना,
  2. विषय प्रवेश,
  3. तुलना,
  4. सामान्यीकरण,
  5. अर्जित ज्ञान का उपयोग।

यह ज्ञानार्जन की अत्यन्त प्रचलित विधि है।

  • स्पिंग फील्ड विधि-

    सामाजिक विकलांगता को समाप्त करने की यह अत्यन्त ही प्रचलित विधि है । इसमें असांस्कृतिक, जनतान्त्रिक तथा अन्य विभिन्नताओं को ग्रहण किए बिना वर्ण, जाति व रंग भेद आदि के बालक एक साथ अध्ययन करते हैं।

विकलांग बालक की शिक्षा में दृश्य-श्रव्य सामग्री का महत्व

विकलांग बालकों की शिक्षा प्रणाली को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ विशिष्ट सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें दृश्य-श्रव्य सामग्री कहते हैं । अगर हम सिर्फ बहरे बालकों को छोड़ दें, तो अन्य परिस्थितियों में भारत में श्रवण उद्दीपन ही शिक्षण का आधार है । दृश्य-श्रव्य सामग्रियों के द्वारा ज्ञान का बोध ज्ञानेद्रियों के माध्यम से होता है । विकलांग बालकों की शिक्षा में यह एक उत्प्रेरक तथा अभिप्रेरक का कार्य करते हैं

प्रमुख दृश्य-श्रव्य उपकरण

(Equipments of Audio-Visual Aids)

दृश्य-श्रव्य सामग्रियों को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है-

  1. दृश्य उपकरण-

    दृश्य उपकरण सस्ते तथा शिक्षण हेतु उपयोगी होते हैं इनका प्रयोग छात्र तथा शिक्षकों की सुविधानुसार किया जा सकता है। कई बार छात्र भी इनका निर्माण स्वयं कर सकते हैं।

  2. श्रव्य उपकरण-

    श्रव्य सामग्री में मुख्यतः टेप रिकार्डर व ग्रामोफोन आदि आते हैं। यह सामग्री अन्धे बालकों हेतु प्रयोग की जाती है।

  3. दृश्य-श्रव्य सामग्री-

    दृश्य-श्रव्य सामग्री के अन्तर्गत वह सामग्री आती है जिनसे हम देख व सुन (दोनों) सकते हैं । यह उपकरण सस्ते तथा टिकाऊ होते हैं इनका प्रयोग अध्यापक तथा छात्र अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं । मुख्यतः टेलीविजन, कम्प्यूटर, चार्ट तथा पोस्टर आदि इस सामग्री के अन्तर्गत आते हैं।

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