मंद बुद्धि बालकों की पहचान एवं शैक्षिक प्रावधान

मंद बुद्धि बालकों की पहचान एवं शैक्षिक प्रावधान

मंद बुद्धि बालकों की पहचान (Identification of the Mentally Retarded Children)

मंद बुद्धि बालकों को पहचानने के उपरान्त ही उनकी विशिष्ट आवश्यताओं के अनुरूप शैक्षिक देखभाल करना संभव हो सकता है। मंदबुद्धि बालकों की पहचान करने के लिए भी विधिवत अवलोकन (Systematic Observation) तथा प्रमापीकृत परीक्षणों (Standardized Tests) का प्रयोग किया जा सकता है। व्यक्तिगत व सामूहिक बुद्धि परीक्षणों, सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा व्यक्तिगत परीक्षणों के द्वारा मंदबुद्धि बालकों को पहचाना जा सकता है। अध्यापकों, सहपाठियों, परिवारजनों तथा इष्ट मित्रों के द्वारा बालकों के सम्बन्ध में की गयी अवलोकनात्मक टिप्पणियों से भी मंदबुद्धि बालकों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त होती हैं। प्रमापीकृत परीक्षणों का प्रयोग प्रायः तब ही किया जाता है जब कतिपय बालकों की बुद्धि के सामान्य होने के सम्बन्ध में संदेह होता है। यह संदेह निश्चय ही बालक के द्वारा घर, परिवार, पड़ोस, विद्यालय था खेलकूद में किए जाने वाले व्यवहार के अवलोकन से ही परिलक्षित होता है। किसी भी बालक के मंदबुद्धि होने पर उस पर प्रमापीकृत परीक्षणों को प्रशासित करके उसकी बुद्धि लब्धि का निश्चय करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।

मंदबुद्धि बालकों की शिक्षा (Education of Mentally Retarded Children)

मंदबुद्धि बालकों को किस प्रकार से शिक्षा प्रदान की जाये, इस प्रश्न पर विचार करना अत्यन्त आवश्यक है। यद्यपि भारतवर्ष में मंदबुद्धि बालकों के प्रशिक्षण तथा शिक्षा व्यवस्था के लिए विशिष्ट शैक्षिक कार्यक्रमों का अभाव-सा दृष्टिगोचर होता है, परन्तु विकसित राष्ट्रों में मंद बुद्धि बालकों की शिक्षा के लिए अनेक सार्थक तथा प्रभावी प्रयास किये जा रहे है। निम्नलिखित उपायों को दृष्टिगत रखकर मंद बुद्धि बालकों के लिए विशेष उपाय अपनाकर उनको शिक्षित किया जा सकता है-

  1. शिक्षा का उद्देश्य (Aims of Education)-

    मंद बुद्धि बालकों की शिक्षा व प्रशिक्षण का उद्देश्य उनके दैनिक जीवन में आने वाली व्यक्तिगत सामाजिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए उन्हें तैयार करना है। दूसरे शब्दों में शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति, स्वस्थ आदतों का निर्माण, दिनचर्या का स्वतः निर्वहन, सुरक्षा की भावना, प्राथमिक चिकित्सा तथा मनोरंजन की शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से उनकी शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।

  2. स्वयं देखभाल का प्रशिक्षण (Training for Self-Care)-

    मंद बुद्धि बालक अपनी देखभाल स्वर्थ कर सकें, इसके लिए उन्हें शिक्षित व प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है। कपड़े पहनने, भोजन करने, सफाई करने, अपनी वस्तुओं की रक्षा करने, अपना मनोरंजन करने आदि का प्रशिक्षण ऐसे बालकों को दिया जाना चाहिए जिससे वे अपने दैनिक कार्यों को स्वयं कर सके।

  3. सामाजिक प्रशिक्षण (Social Training)-

    मंदबुद्धि बालकों को उचित ढंग से सामाजिक व्यवहार करने के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। सामहिक कार्यों, खेलों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा सामाजिक शिष्टाचार का प्रशिक्षण देने के साथ-साथ मंदबुद्धि बालकों को विभिन्न सामाजिक क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

  4. आर्थिक प्रशिक्षण (Economic Training)-

    मंद बुद्धि बालकों को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐसे प्रशिक्षण की आवश्यकता है कि वे अपने जीवनयापन के लिए आवश्यक न्यूनतम धन अर्जित करने में समर्थ हो सके। छोटे-छोटे घरेलू कार्यों, हस्तशिल्पों आदि का प्रशिक्षण देकर ऐसे बालकों को स्वावलम्बी बनाया जा सकता है।

  5. विशिष्ट कक्षायें (Special Classes)-

    मंद बुद्धि बालक अपनी मानसिक सीमाओं के कारणा सामान्य कक्षाओं का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाते हैं। अतः उनके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों के द्वारा संचालित विशिष्ट कक्षाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए। हमारे देश में मन्दबुद्धि बालकों के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकार की आर्थिक सहायता से एवं अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से विशेष प्रकार की व्यवस्थाओं से युक्त आवासीय तथा दिवसीय शिक्षा संस्थायें खोली गयी हैं। इनमें मन्द बुद्धि बालकों की विशिष्टा आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए उनके प्रशिक्षण का ध्यान दिया जाता है।

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