विशिष्ट बालक

विशिष्ट बालक

विशिष्ट बालक का अर्थ (Meaning of Exceptional Child)

किसी भी सामान्य विद्यालय अथवा कक्षा में पढ़ने वाले बालक-बालिकाओं में से अधिकांश बालकों को सामान्य अथवा औसत बालक-बालिका कहा जा सकता है। इन बालकों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक विशेषतायें लगभग एक समान होती हैं जिसके कारण इनकी शैक्षिक समस्याओं की प्रकृति तथा प्रकार भी एक जैसा होता है। परन्तु विद्यालय अथवा कक्षा में कुछ बालक-बालिकायें ऐसे भी होते हैं जो इन सामान्य बालकों से शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक अथवा सामाजिक दृष्टि से पर्याप्त भिन्नता रखते हैं। प्रायः देखा गया है कि सौ बालकों के समूह में से लगभग पचास बालक किसी न किसी प्रकार की ऐसी समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं कि उनकी शिक्षा के लिए कुछ विशिष्ट प्रकार की शैक्षिक, मनोवैज्ञानिक, भौतिक, सामाजिक अथवा व्यक्तित्व सम्बन्धी परिस्थितियाँ सामान्य बालकों से कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं जिसके कारण इन बालकों पर अलग से विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इनमें से भी लगभग दस प्रतिशत बालक शारीरिक अथवा मानसिक दृष्टि से सामान्य बालकों से इतने भिन्न होते हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान करने लिए विशेष शैक्षिक प्रयासों की आवश्यकता होती है। इस तरह के बालकों की समस्याओं को भलीभाँति समझकर विशिष्ट ढंग से समाधान किया जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। क्योंकि ऐसे बालक सामान्य बालकों से शारीरिक, मानसिक अविा संवेगात्मक दृष्टि से पर्याप्त भिन्न होते हैं इसलिए इन्हें अपवादात्मक बालक (Exceptional Children), असाधारण बालक (Unusual Children) अथवा विशिष्ट बालक (Special Children) कहा जाता है।

विशिष्ट बालक की परिभाषा (Definition)

क्रो एण्ड क्रो (Crow and Crow) के अनुसार- ‘विशिष्ट शब्द कक्षा विशेष लक्षण के लिए अथवा ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है, जो विशेष लक्षणों से युक्त होता है, जिसके कारण ही एक व्यक्ति अपने साथियों का विशेष ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।”

ए. एडवर्ड ब्लैक हर्ट के अनुसार- “विशिष्ट बालक वे बालक हैं, जिनकी शारीरिक, मानसिक, व्यावहारिक या संवेगात्मक विशेषताएँ अधिकाँश बच्चों से इस रूप में भिन्न होती है, जिससे उसे अपनी अधिकतम क्षमता के अनुसार विकास करने के लिए विशेष शिक्षा तथा सम्बन्धित सेवाओं की आवश्यकता होती है।”

जे. ई. वालेन्स वालिन के अनुसार- “वालिन महोदय ने दो श्रेणियों के बालकों को विशिष्ट माना है- 1. जो शारीरिक मानसिक दृष्टि से सामान्य बालकों की तुलना में पिछडे होते हैं और जो सामान्य बालको की तुलना में उच्च बौद्धिक स्तर वाले हों।’

वालिन के विचार से- प्रारम्भिक विद्यालय के 1000 बालकों में से लगभग 500 बालकों में कुछ-न-कुछ विशेषताएँ पायी जाती हैं। इनमें लगभग 50 अर्थात् 100 प्रतिशत बालक मानसिकहीनता वाले होते हैं। शेष बालकों में विभिन्न प्रकार की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत विशिष्टताओं के कारण ही उनके लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता होती है।

शैक्षिक अध्ययन की राष्ट्रीय समिति के अनुसार- “विशिष्ट बालक वे होते हैं, जो कि औसत बालकों से शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक अथवा सामाजिक लक्षणों में इतनी मात्रा में भिन्न होते हैं कि अपनी अधिकतम क्षमता के विकास के लिए उन्हें विशेष शैक्षिक सेवाओं की आवश्यकता होती है।”

यहाँ पर विशेष शैक्षिक सेवाओं से अभिप्राय प्रत्येक प्रकार की सेवा से है, अर्थात् विशेष शिक्षा, विशेष कक्षा, विशेष शिक्षण प्रविधियाँ तथा शैक्षिक उपकरणों से हो सकता है।

क्रूजक (Cruichashank) के अनुसार- “विशिष्ट बालक वह होता है, जो शारीरिक, बौद्धिक संवेगात्मक एवं सामाजिक रूप से सामान्य बुद्धि एवं विकास से स्पष्ट रूप से इतना विचलित होता है कि नियमित कक्षा के कार्यक्रमों से लाभान्वित नहीं हो सकता, उसे विद्यालय में विशेष रूप से देखरेख करने की आवश्यकता होती है।”

डॉ. एच.बी. के अनुसार- “प्रत्येक मनुष्य जब किसी को विशेष कहकर वर्णित करता है, तो वह औसत या सामान्य लोगों से किसी-न-किसी प्रकार से भिन्न होता है। यदि हम विद्यालय के सन्दर्भ में देखें, तो हर बालकों से कुछ हटकर इन बालकों की शिक्षा व्यवस्था करनी होती है।

हैलहन और कैफमैन के अनुसार- विशिष्ट बालकों को एक भिन्न दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया है। उनके अनुसार- “विशिष्ट बालक वे हैं, जिन्हें अपनी सम्पूर्ण मानवीय संभावनाओं का अनुभव करना है तथा विशेष शिक्षा तथा सम्बन्धित सेवाओं की आवश्यकता होती है।”

इन परिभाषाओं का अध्ययन कर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विशिष्ट बालक अपने विशेष लक्षणों के कारण ही सामान्य बालकों से भिन्न दिखायी देता हैं तथा दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। विद्यालय के नियमित और सामान्य कार्यक्रमों से वे समुचित लाभ नहीं उठा पाते हैं। अतः उनकी शिक्षा-दीक्षा व पालन-पोषण के लिए विशेष या अतिरिक्त सेवाओं का प्रबन्ध करना पड़ता है। यद्यपि सामान्य एवं विशिष्ट बालकों के मध्य कोई विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं है। फिर भी विशिष्ट बालकों की विशेषताएँ चाहे एक क्षेत्र से सम्बन्धित हो या कई क्षेत्रों से, उनका प्रभाव बालक के कार्य , व्यवहार एवं सामाजिक समायोजन में स्पष्ट दिखायी पड़ता है।

विशिष्ट बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Exceptional Children)

विशिष्ट बालकों की विशेषताओं का सम्बन्ध कई क्षेत्रों से होता है, अतः अनेक प्रकार के आधार पर ही उनकी विशेषताओं को स्पष्ट किया जा सकता है। विशिष्ट बालकों में कई बालकों को सम्मिलित किया जाता है, जैसे- पिछड़े बालक , प्रतिभाशाली बालक, सृजनात्मक मन्द-

बुद्धि, विकलांग तथा समस्यात्मक और अपराधी बालक। ये सभी बालक विशिष्ट बालक कहलाते हैं। ये बालक शारीरिक, मानसिक, क्रियात्मक और भावात्मक सभी दृष्टिकोण से एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इतना ही नहीं विशिष्ट बालक सामान्य बालकों से भी भिन्न या अलग दिखायी पड़ते हैं। ये बालक सामान्य बालकों की तुलना में अधिक या कम गुण वाले होते हैं। इनके पालन-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा के लिए विशेष प्रबन्ध की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे बालकों की विशेषताएँ किसी एक क्षेत्र या कई क्षेत्रों से सम्बन्धित हो सकती हैं।

इसके विपरीत, विशिष्ट बालक समुचित शिक्षा-दीक्षा और निर्देशन पा कर, ख्याति प्राप्त विद्वान, वैज्ञानिक, प्रशासक, राजनेता, लेखक आदि बन जाते हैं, जो भारत के अमूल्य धरोहर एवं कर्णधार होते हैं।

विशिष्ट बालकों के प्रकार (Types of Exceptional Children)

  1. पिछड़े बालक (Backward Children)

    पिछड़े बालक की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताएँ साधारण तथा प्रतिभाशाली बालक से भिन्न होती है। अध्ययनों से पता चला है कि इनमें अपनी आयु से कम योग्यता होती है, इनमें मौलिकता भी कम होती है, आत्महीनता एवं विचार-शून्यता की ग्रन्थियाँ होती है, जिसका प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ता है। कुछ बालक मनोविकार युक्त होते हैं। इनकी बौद्धिक रुचियाँ तथा अभिरुचियाँ सीमित एवं भाषा-विकास अन्य बालकों की अपेक्षा कम होता है। विशिष्ट बालक सामान्य बालकों से प्रत्येक कार्य में किसी-न-किसी तरह से भिन्न होते हैं तथा इनकी कार्य-कुशलता, कार्यक्षमता अन्य बालकों से कम या अधिक होती है।

  2. प्रतिभाशाली बालक (Gifted Children)-

    प्रतिभाशाली बालक प्रत्येक समाज में कुछ स्थानों पर पाये जाते हैं। अध्ययनों से पता चलता हैं कि इनमें अपनी आयु से अधिक योग्यता होती है, परन्तु जिन प्रजातियों की पृष्ठभूमि (आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति) अच्छी होती है, उनमें प्रतिभाशाली बालकों के उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है।

‘टरमन’ महोदय ने सन् 1915 में अपने अध्ययनों से पता लगाया की प्रतिभाशाली बालक उन परिवारों में पाये जाते हैं, जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त लोग होते हैं, जिनका आर्थिक स्तर अच्छा होता है।

  • प्रतिभाशाली बालक सामान्य बालकों से अपेक्षाकृत लम्बे एवं स्वस्थ होते हैं।
  • जन्म के समय प्रतिभाशाली बच्चे सामान्य बालकों से एक या डेढ़ इंच लम्बे और एक या डेढ़ पौण्ड वजन अधिक होते हैं।
  1. सृजनशील बालक (Creative Children)-

    आइजनेक महोदय का विचार है कि सृजनशीलता वह योग्यता है, जिनके द्वारा नवीन सम्बन्धों की जानकारी होती है। इसके द्वारा चिन्तन के प्रतिमानों से हटकर असाधारण विचारों का उदय होता है। वास्वत में सृजनशील बालक अपने व्यवहार, क्रियाकलाप और तार्किक क्षमता में सामान्य बालकों से अलग ही दिखायी देता है। इनके द्वारा सम्पादित कार्यों में मौलिकता और नवीनता के दर्शन होते हैं।

ऐसे बालक में साहसी कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। इनमें जिज्ञासा आत्मविश्वास, स्वानुशासन, बौद्धिक स्थिरता और समायोजन करने का गुण पाया जाता है। ये बालक उच्च महत्त्वाकांक्षी, स्वतन्त्र विचार के, विनोदी स्वभाव वाले तथा स्पष्ट वक्ता होते हैं। गिलफोर्ड महोदय ने सृजनशील बालकों में निम्नलिखित 6 गुणों का उल्लेख किया है-

  • अभिव्यक्ति प्रवाहता (Expressional fluency)
  • चिन्तन की प्रवाहता (Fluency of thinking)
  • विचारों की प्रवाहता (Fluency of Ideas)
  • शब्दों की प्रवाहता (Fluency of words)
  • साहचर्य की प्रवाहता (Fluency of Association)
  • समस्या का सामान्यीकृत संवेदन (Generalised sensitivity of the problem)
  1. मन्द-बुद्धि बालक (Mentally Retarded)-

    मन्द-बुद्धि बालक औसत बालक से भिन्न नहीं होता, परन्तु वातावरण के कारण व्यक्तिगत विभिन्नता पायी जाती है। सफलता एवं असफलता का प्रभाव बालक पर सहज देखा जा सकता है। मन्द-बुद्धि बालक शरीर से रोगी, निरुत्साही और शिथिल दिखायी पड़ते हैं। इनके अंग संचालन का मस्तिष्क से ताल-मेल नहीं बैठ पाता। गहन अभ्यास के कारण उनकी गलती करना एक आदत-सी बन जाती है।

  2. विकलांग बालक (Disabled Children)-

    विकलांगता प्रायः दो प्रकार की होती है-

    • शारीरिक विकलांगता
    • मानसिक विकलांगता

इन दोनों प्रकार के विकलांग बालकों में कुछ अपनी विशेषताएँ होती हैं, शारीरिक विकलांगता से ग्रसित बालक के सामने समायोजन की समस्या होती है। दूसरे प्रकार के मानसिक रूप से विकलांग बालक वे होते हैं, जिनकी कल्पना एवं रचनात्मक शक्ति न्यून होती है।

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