अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शांति तथा युद्ध के विषय

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शांति तथा युद्ध के विषय

शांति को कैसे सुरक्षित किया जा सकता है?

अंतरराष्ट्रीय शांति की सुरक्षा के लिए पहली तथा प्राथमिक आवश्यकता युद्ध को दूर रखना है तथा अगर युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के किसी भाग में आरम्भ हो जाये तो इसे सीमित रखना तथा इसे समाप्त करना है। विद्वान् शान्ति की सुरक्षा के लिए कई एक सुझाव देते हैं। इससे मार्गेथो ने अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों में राजनीति’ के आधे भाग में शान्ति को सुरक्षित करने की समस्या का विश्लेषण किया है। इस उद्देश्य के लिए वह तीन विकल्पों का सुझाव देता है :

  1. प्रतिबन्धों से शांति: इसके अधीन मार्गेथो ने निःशस्त्रीकरण, सामूहिक सुरक्षा, न्यायिक सुलझाव, शांतिपूर्ण परिवर्तनों तथा अन्तर्राष्ट्रीय सरकार (संयुक्त राष्ट्र संघ) की धारणाओं का वर्णन किया है।
  2. बदलाव से शांति: इसके अधीन उसने विश्व राज्य, विश्व समुदाय तथा कार्यात्मकता का वर्णन किया है; तथा
  3. परस्पर साझ के द्वारा शान्ति अर्थात् कूटनीति द्वारा शांति की सुरक्षा। इन सभी साधनों में से मार्गेयो कूटनीति द्वारा शांति की सुरक्षा को प्राथमिक महत्व देता है।

आज तक कुछ अन्तर्राष्ट्रीय उपकरण सौभाग्यवश युद्ध को दूर रखने में हमारे सहायक बने हैं, परन्तु इन अर्धविकसित उपकरणों जैसे शक्ति संतुलन, परस्पर निवारक, विरोध-प्रबन्धन तथा वीटो वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् पर हम पूर्णतया निर्भर नहीं रह सकते।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में युद्ध को रोकने तथा शांति को दृढ़ बनाने के लिए विशिष्ट उपकरण

युद्ध की अनुपस्थिति शांति की पूर्व-शर्त है। फिर भी हम युद्ध को पूर्णतया समाप्त नहीं कर सकते। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास का रिकार्ड हमें यह बतलाता है कि शांति के युगों में भी स्थानीय युद्ध, सीमित युद्ध तथा जातीय युद्ध होते रहे हैं। युद्धोत्तर काल में भी अरब-इस्राइल युद्ध, खाड़ी युद्ध, हिन्द-चीन में युद्ध, वियतनाम युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध, भारत-चीन युद्ध और यह सूची काफी लम्बी है, ऐसे युद्ध हमने देखे हैं। इस धारणा को हम अधिक से अधिक युद्ध के अवसरों को सीमित करने के साधनों का ही उपकरण कह सकते हैं। कई एक उपकरण, विशेषकर वे जो प्रत्येक राष्ट्र की राष्ट्रीय शक्ति को प्रतिबन्धित करते हैं, ऐसे माने जा सकते हैं कि जो युद्ध के निवारण में योगदान दे सकते हैं और इनके साथ-साथ विरोध समाधान के शांतिपूर्ण ढंग भी युद्ध निवारण के उपकरणों के रूप में स्वीकृत किये जा सकते हैं क्योंकि अपने हितों की पूर्ति तथा दूसरों पर अपने हितों को लादने के लिए एक राष्ट्र द्वारा अपनी राष्ट्रीय शक्ति का असीमित प्रयोग ही अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में विरोधों, झगड़ों, तनावों, दबावों तथा युद्ध का स्रोत बनता है, अतः राष्ट्रीय शक्ति के प्रयोग को नियमित एवं नियंत्रित करके भी युद्ध के अवसरों को कम किया जा सकता है।

निम्नलिखित उपकरणों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में युद्ध को रोकने अथवा सीमित करने तथा शांति को दृढ़ करने के उपकरण कहा जा सकता है :

  1. शक्ति सन्तुलन

    अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शक्ति प्रबन्ध तथा युद्ध को रोकने के उपकरण के रूप में शक्ति सन्तुलन परम्परागत उपकरण रहा है। इसका आधारभूत सिद्धान्त यह है कि पांच या सात बराबर के प्रमुख शक्तिशाली कर्ताओं की शक्ति तथा स्रोत इनकी शक्ति का परिसीमन करते हैं। ये प्रमुख कर्ता अपने शक्ति सम्बन्धों में एक विशेष सन्तुलन बनाये रखते हैं। शक्ति सन्तुलन के बिगड़ने के खतरे से किसी भी देश को अनुचित रूप में शक्तिशाली बनने की आज्ञा नहीं होती। यदि कोई राज्य अनुचित रूप में शक्तिशाली बनता है अथवा बनने का यत्न करता है तो दूसरे राज्य अकेले तथा सामूहिक रूप से अपनी शक्तियों को इकट्ठा करके उस राज्य के विरुद्ध एक शक्ति की प्रबलता खड़ी कर देते हैं। इस प्रकार ये शक्ति-सन्तुलन युद्ध अथवा दूसरे साधनों द्वारा चुनौती देने वाले राज्य की शक्ति कम करके शक्ति सन्तुलन को बनाये रखते हैं। किसी भी राज्य को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जाता किन्तु सन्तुलन के नाम पर राज्य की शक्ति को नियंत्रित रखा जाता है। शक्ति सन्तुलन व्यवस्था के सदस्य देशों की असंगत विधि से शक्ति बढ़ोत्तरी को नियंत्रित कर शक्ति संतुलन को बनाये रखा जाता है। इस सिद्धांत को 19वीं सदी में प्रमुख यूरोपीय राज्यों द्वारा अपने सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए प्रयोग में लाया गया था। 1815-1914 ई0 के दौरान बड़े युद्धों को रोक रखने के लिए यह व्यवस्था सफल रही। परन्तु युद्धोत्तर काल में शक्ति संतुलन व्यवस्था ने कई प्रकार के संरचनात्मक परिवर्तनों से अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में इतनी शक्ति एवं शक्ति-प्रबन्ध में अपने महत्व को खो दिया है। फिर भी क्षेत्रीय स्तर पर यह अभी भी राज्यों के आपसी सम्बन्धों को बनाने में यह व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है तथा इसमें एक क्षेत्र के राज्यों में शक्ति संघर्ष को सीमित रखने की क्षमता है।

  2. अन्तर्राष्ट्रीय कानून

    अन्तर्राष्ट्रीय कानून एक ऐसी व्यवस्था है जिसके नियमों को राष्ट्र-राज्यों ने स्वीकार किया है और इसे मानने के लिए बाध्य हैं। इसी से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उनका व्यवहार नियंत्रित होता है। किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय शक्ति पर यह महत्वपूर्ण अंकुश है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार में जो देश लगे हुए हैं यह कानून उनके व्यवहार को नियंत्रित करता है और उन्हें निर्देश देता है। युद्ध और शांति में सुचारु रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चलाने के लिए इस व्यवस्था के पास एक कानूनी ढांचा है। जनमत, प्राकृतिक कानून, अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता, विश्व जनमत तथा उपयोगिता की भावना से बने अन्तर्राष्ट्रीय कानून किसी भी राज्य द्वारा शक्ति के दुरुपयोग पर एक बहुत बड़ा अंकुश है। यह राज्यों के लिए कुछ करणीय एवं अकरणीय नियमों का निर्धारण करता है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून अपने हितों की पूर्ति के लिए युद्ध को गैर-कानूनी घोषित करता है। कूटनीतिक सम्बन्ध बनाने के लिए इसमें नियम बनाये गये हैं। अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने वाले राज्यों के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं। इसने उन सीमाओं को परिभाषित किया है जिनके अंदर ही राज्य अपने हितों की सुरक्षा के लिए शक्ति प्रयोग कर सकता है। इस कानून का मुख्य आधार अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता तथा विश्व जनमत है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून के नियमों को स्वीकार कर उनका पालन करके युद्ध को रोका जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अच्छे स्वरूप तथा युद्ध की जगह शान्ति के उपकरण के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय कानून की महत्ता का विश्लेषण करते हुए पामर तथा पर्किन्स ने उचित ही कहा है कि, “अन्तर्राष्ट्रीय कानून की कमजोरियों तथा उल्लंघनाओं के प्रति सचेत होते हुए विश्व में शांति तथा व्यवस्था के लिए कार्य करने वाले लोग इसे प्रगति का सूचक मानते हैं। यह कागज पर शब्द लिखकर राज्यों को न्याय तथा मित्रता के मार्ग का अनुसरण करने के लिए विवश तो नहीं कर सकता परन्तु यह राज्यों को ऐसे साधन अवश्य उपलब्ध करवाता है जिससे वह उत्तम अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को प्राप्त कर इससे लाभ उठा सकते हैं।’

  1. अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता

    जिस प्रकार समाज में मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए कुछ नैतिक सिद्धान्त अथवा नियम होते हैं, उसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में राज्यों के व्यवहार को परिसीमित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता होती है। शांति-व्यवस्था, बराबरी, अच्छाई, आपसी सहयोग, सभी लोगों के जीवन और उनकी स्वतन्त्रता का सामना ऐसे मूल्य हैं जिन्हें प्रत्येक राज्य को एक अधिकार अथवा अच्छे मूल्यों के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए और उनको व्यावहारिक रूप देना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता व्यवहार की एक नैतिक संहिता है जिसका पालन प्रायः सभी देश अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में करते हैं। यह नैतिक भावना प्रत्येक देश की राष्ट्रीय शक्ति का परिसीमन करने वाला एक तत्व बनती है। युद्ध के विरोध में इसने मानवीय चेतना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून को बनाने में यह महत्वपूर्ण तत्व है। इस प्रकार यह राष्ट्रीय शक्ति परिसीमन के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। युद्ध के विरुद्ध शांति के उपकरण के रूप में इसका सफलता से प्रयोग किया जा सकता है। शांति के पक्ष में युद्ध के विरुद्ध जागृति लाने में यह सक्षम है।

  2. विश्व जनमत

    विदेश नीति का लोकतंत्रीकरण तथा संचार क्रांति के समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने एक संगठित तथा शक्तिशाली विश्व जनमत को जन्म दिया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह एक महत्वपूर्ण तत्व बनकर उभरा है। संसार में शांति आन्दोलन, परमाणु शस्त्रों के नियंत्रण के लिए आन्दोलन, पृथ्वी के पर्यावरण सन्तुलन की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली तथा स्वस्थ आन्दोलन के लिए ऐसे ही अनेक दूसरे आन्दोलन हैं जिनसे विश्व जनमत के अस्तित्व का पता चलता है। रुशदी को ईरान द्वारा दोषी ठहराये जाने के विरोध में, चीनी विद्यार्थियों द्वारा शान्तिमय ढंग से लोकतंत्रीय अधिकारों की बहाली के लिए चलाये गये आन्दोलन में दोषी पाये गये विद्यार्थियों को फांसी देने के विरोध में, हवाई जहाजों का अपहरण करने के विरोध में विश्व में उत्पन्न स्वाभाविक प्रतिक्रिया तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरोध में उभरा दृढ़ आन्दोलन तथा सैनिक कार्यवाही (अक्टूबर, 2001), विश्व जनमत की शक्ति को प्रदर्शित करती है। राष्ट्रीय शक्ति को परिसीमन करने के लिए यह बड़ी तेजी से उभरती हुई एक शक्ति है। विपरीत जनमत के डर से कई बार किसी देश को एक विशेष नीति पर चलने से रुकना पड़ जाता है तथा निर्णय लेने और उद्देश्य की प्राप्ति के निर्णय पर रोक लगानी पड़ती है। शस्त्र नियंत्रण और निःशस्त्रीकरण के पीछे शक्ति विश्व जनमत ही है। इसी जनमत के कारण अमेरिका तथा भू० पू० सोवियत संघ को आई0 एन0 एफ0 सन्धि तथा ‘स्टार्ट’ सन्धि और जेनेवा में शस्त्र-नियंत्रण और निःशस्त्रीकरण पर बातचीत करनी पड़ी थी।

  3. अन्तर्राष्ट्रीय संगठन

    1919 से लेकर आज तक विश्व में एक विश्व संस्था विद्यमान रही है। 1945 से संयुक्त राष्ट्र संघ कार्यरत है। इस संगठन के अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के सभी देश सदस्य हैं। इसके चार्टर में कुछ उद्देश्यों की चर्चा की गई है जिन्हें प्राप्त करने के लिए सदस्य देश वचनबद्ध हैं। इसमें सदस्य देशों के मध्य झगड़े को हल करने की कई विधियों का उल्लेख है। यह अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को शान्तिमय तथा व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए एक भूमंडलीय मंच है। राष्ट्रों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी शक्तियों का प्रयोग संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में दिये गये आदेशों के अनुसार करेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर युद्ध को गैर-कानूनी घोषित करता है तथा सदस्यों को अपने झगड़ों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने का आह्वान करता है। विश्व शांति तथा व्यवस्था की प्रतिष्ठा के लिए यह सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का भी उल्लेख करता है। बहु-उद्देश्यीय राष्ट्र संघ के अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर अब अनेक संगठन स्थापित हो चुके हैं जो अपने सदस्य देशों को मार्गदर्शन तथा दिशा-निर्देश देते हैं और कई क्षेत्रों में उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण भी रखते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय अन्तःनिर्भरता के युग में, जिसका निर्माण शक्तिशाली अराज्यीय कर्ताओं के अस्तित्व से है, अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा आधुनिक राष्ट्र-राज्य अपनी शक्तियों पर अंकुश पाते हैं। शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए यह तथ्य भी एक स्रोत है, भले ही इसका क्षेत्र बड़ा संकुचित है। अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण तथा विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग व्यवस्थाएं भी राष्ट्रों को युद्ध की बात सोचने से रोकती है। युद्ध से सभी के हितों को हानि होती है।

  4. सामूहिक सुरक्षा

    यह शक्ति प्रबन्धन तथा शांति का एक साधन है। यह भी युद्ध को रोकने का साधन तथा युद्ध समाप्त करने का एक साधन है। यह भी राष्ट्र की शक्ति पर अंकुश लगाता है। सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को एक सभी साझा उद्देश्य स्वीकार करती है। अगर एक देश किसी दूसरे पर आक्रमण करता है तो इसे अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा का उल्लंघन माना जाता है। इस स्थिति में सभी देश मिल कर सामूहिक कार्यवाही (सामूहिक सुरक्षा युद्ध) के द्वारा ऐसे आक्रमण की समाप्ति के लिए कार्य करते हैं। आक्रमण का सामना सभी देश मिल कर सामूहिक सुरक्षा कार्यवाही द्वारा करते हैं। इस प्रकार जो देश किसी दूसरे देश की स्वतन्त्रता, प्रभुसत्ता तथा क्षेत्रीय अखण्डता की अवमानना करता है वह अपने बल प्रयोग को इस डर से नियंत्रित करता है कि उसके वर्चस्व को कोई चुनौती नहीं दे सके।

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