द्वि-ध्रुवीकरण- अर्थ, स्वरूप एवं स्थापना

द्वि-ध्रुवीकरण- अर्थ, स्वरूप एवं स्थापना

दूसरा विश्व युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में बहुत गहरे तथा व्यापक परिवर्तनों का कारण बना। इससे अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में परम्परागत शक्ति संरचना समाप्त हो गई तथा एक नई शक्ति संरचना बन गई जो शांति संधियों के तत्काल बाद ही द्वि-ध्रुवीय बन गई। पहले वाले शक्तिशाली राष्ट्रों जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, आस्ट्रिया, जापान, स्पेन आदि की शक्ति के कमजोर होने से तथा अमरीका तथा सोवियत संघ जैसे दो अति शक्तिशाली राष्ट्रों के उदय से, जिनके बीच शीत युद्ध की राजनीति चल रही थी, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में द्वि-ध्रुवीकरण का आरम्भ हुआ जो 1955 तक एक कठोर द्वि-ध्रुवीकरण में बदल गया। तथापि पांचवें दशक के अन्त तक तथा छठे दशक शुरू में दोनों ब्लॉकों के अन्दर विभिन्न दरारें पैदा हो गई तथा कई गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों तथा कई शक्ति-केन्द्रों के प्रादुर्भाव के कारण द्वि-ध्रुवीकरण में कुछ लचीलापन आ गया जिसका परिणाम यह हुआ कि 1969वें दशक में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बहु-ध्रवीकरण तथा बहु-केन्द्रीयवाद स्थापित हो गया। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में ये परिवर्तन कैसे हुए? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें संक्षेप में द्वि-ध्रुवीकरण की धारणा का परीक्षण तथा मूल्यांकन करना होगा। इसके साथ ही हमें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भ में ध्रुव तथा ध्रुवीकरण का अर्थ समझना होगा।

ध्रुव तथा ध्रुवीकरण

(Pole and polarity)

द्वि-ध्रुवीकरण की अवधारणा का परीक्षण करने से पहले ‘ध्रुव’ (Pole) तथा ‘ध्रुवीय व्यवस्था’ (Polar System) का अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के सन्दर्भ में अर्थ जानना आवश्यक है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में ध्रुव का लोकप्रिय अर्थ महान् या उच्च शक्ति है तथा इस स्तर के निर्धारण का मापदण्ड साधारणतया सैन्य शक्ति होता है।

“ध्रुवीकरण व्यवस्था (Polar System)” जैसा कि राबर्ट ई. ऑसगुड तथा राबर्ट डब्ल्यू टक्कर कहते हैं, से हमारा अभिप्राय “सैन्य शक्ति के केन्द्रों से है (चाहे व्यक्तिगत राज्य हो या साझी राज्य-व्यवस्था) जो विश्व के बड़े भागों में शक्ति सन्तुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं जो स्वतन्त्र रूप से दूसरे राज्यों के हितों से भिन्न अनिवार्य हितों के समर्थन के लिए वचनबद्ध हों तथा जो दूसरे केन्द्रों पर निर्भर न रहकर स्वयं युद्ध कर सकें।”

द्वि-ध्रुवीकरण- अर्थ तथा स्वरूप

द्वि- ध्रुवीकरण या द्वि-ध्रुवी व्यवस्था का अर्थ है वह व्यवस्था जिसमें दो महाशक्तियों का अस्तित्व होता है तथा जिनकी क्षमताएं प्रायः तुलनात्मक होती हैं। इनकी शक्ति व्यवस्था के अन्दर किसी अन्य राज्य से अधिक होती है तथा प्रत्येक का अपना शीर्ष-शक्ति ढाँचा होता है जो एक दूसरे के शक्ति ढांचे के प्रतिकूल होता है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो प्रतिपक्षी राज्य का ब्लॉक होते हैं तथा जिसमें प्रत्येक दूसरे को शत्रु समझता है। प्रत्येक दूसरे को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा समझता है।

द्वि-ध्रुवीकरण, जो दूसरे विश्वयुद्ध के तत्काल बाद ही अस्तित्व में आया, की मुख्य विशेषता दो ऐसी महाशक्तियों का अस्तित्व था, जिनकी शक्ति दूसरे राष्ट्रों की शक्ति से कहीं अधिक श्रेष्ठ थी। प्रत्येक महाशक्ति दूसरी महाशक्ति को हानि पहुँचाने तथा उसकी शक्ति को सीमित करने की प्रक्रिया में कार्यरत थी, तथा सन्धियों के जाल द्वारा प्रत्येक महाशक्ति ने अपनी शक्ति-स्थिति को सुदृढ़ कर लिया था तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में अपना-अपना ब्लॉक स्थापित कर लिया था। प्रतिपक्षी के मित्रों को शत्रु समझा जाता रहा। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के बीच विरोध की व्याख्या दोनों गुटों के बीच विरोध के रूप में की जाती रही।

द्वि-ध्रुवीकरण में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था दो स्पष्ट ब्लॉकों में बँटी होती है जिसमें प्रत्येक का नेतृत्व एक महाशक्ति करती है तथा ऐसे दूसरे कई राज्य उसका समर्थन करते हैं जो अपने-अपने ब्लॉक की नीतियों का समर्थन करने के लिए वचनबद्ध होते हैं। द्वि-ध्रवीकरण अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय विरोध हमेशा प्रगाढ़ होते हैं क्योंकि प्रत्येक प्रतिद्वन्द्वी शत्रु के शक्ति लाभ तथा सुरक्षा को अपनी शक्ति का नुकसान समझता है तथा ऐसे परिणामों को रोकने की कोशिश करता है। दोनों ध्रुव हल्के से शक्ति परिवर्तन के प्रति भी अतिसंवेदनशील होते हैं। प्रत्येक दूसरे की सभी चेष्टाओं का विरोध करता है। प्रत्येक द्वारा अपनी-अपनी स्थिति को निश्चित बनाने के लिए दबावों तथा प्रति दबावों को निरन्तर डाला जाता है। अपने-अपने प्रभाव के क्षेत्रों के बीच रेखा खींचना तथा फिर इस भू-क्षेत्रीय स्थिति को निर्धारित करना, द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था का केन्द्र बन जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि द्वि-ध्रुवीकरण के अन्तर्गत राजनीति, परस्पर टकराव की राजनीति होती है तथा वह संकटों के बार-बार घटित होने की राजनीति होती है जिसमें बल का खुला प्रयोग होता है। द्वि-ध्रुवीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में अपने प्रभाव का प्रयोग करने का दूसरे समूहों तथा राष्ट्रों को बहुत कम अवसर मिलता है।

द्वि-ध्रुवीकरण की स्थापना

युद्धोत्तर काल के वर्षों में द्वि-ध्रुवीकरण का जन्म दूसरे विश्व युद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की शक्ति-संरचना में प्रत्यक्ष रूप से बड़े तथा गहरे परिवर्तनों तथा इसके साथ-साथ अमरीका तथा सोवियत संघ के छिड़ने वाले शीत युद्ध का प्रत्यक्ष परिणाम था।

  1. महाशक्तियों की संख्या में कमी:

    महाशक्तियों की संख्या में कमी (सात बड़ी शक्तियों के स्थान पर दो महाशक्तियों का अस्तित्व) ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में द्वि-ध्रुवीकरण के लिए मंच तैयार कर दिया। जर्मनी, इटली, फ्रांस, आस्ट्रिया आदि ध्रुवीय शक्तियां अपनी पराजय के कारण बुरी तरह बिखर गई तथा मित्र-राष्ट्र शक्तियों ने चाहे विजय प्राप्त कर ली पर उनकी जान-माल की बहुत हानि हुई। केवल अमरीका तथा सोवियत संघ ही शक्तिशाली राज्य बने रहे।

  2. अमरीकी अलगाववाद का अन्त:

    यूरोप में अपनी पहले वाली भूमिका निभाने में इंग्लैंड की अक्षमता, जो यूनान तथा टर्की में उठने वाले संकट के समय में उसकी दुर्बलता के रूप में प्रकट हुई, ने अमरीका के लिए यह आवश्यक कर दिया कि वह अलगाववाद की नीति को छोड़कर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शामिल हो जाए।

  3. राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की सुदृढ़ भावना:

    (भू.पू.) साम्यवादी सोवियत संघ तथा लोकतन्त्रीय अमरीका के बीच जो राजनीतिक तथा आर्थिक प्रतियोगिता की सुदृढ़ भावना मौजूद थी उसने दोनों को विश्व राजनीति में एक दूसरे के बढ़ते प्रभाव को सन्तुलित रखने के लिए यूरोप तथा विश्व के दूसरे भागों में अपने-अपने प्रभाव में वृद्धि करने के लिए बाध्य कर दिया।

  4. शीत युद्ध तथा गठजोड़राजनीति:

    इसका परिणाम यह निकला कि दोनों में शीत युद्ध छिड़ गया जिसमें अमरीका ने मार्शल योजना द्वारा तथा सोवियत संघ ने कोमीकॉन (COMECON) द्वारा यूरोप में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रयत्न शुरू कर दिये। पूर्वी यूरोप में, जहाँ समाजवादी साम्राज्य स्थापित किया जा सकता था, सोवियत संघ की सफलता तथा पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा मार्शल योजना तथा लोकतान्त्रिक शक्ति (अमरीकी छतरी S. Umbrella) बनवाने में अमरीका की सफलता ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में द्वि-ध्रुवीकरण स्थापित करने के लिए अनुकूल स्थिति पैदा कर दी।

  5. परमाणु शस्त्रदौड़:

    जब सोवियत संघ की परमाणु क्षमता का दुनिया को पता चला तथा दोनों महाशक्तियों के बीच शस्त्रों की होड़ लग गई तो समस्त विश्व के लिए दो विरोधी गुटों में बंटवारे के लिए अनुकूल स्थिति पैदा हो गई जिसमें प्रत्येक दूसरे से डरने लगा। वास्तव में शीत युद्ध की सीमाओं को ही, जो 1947 में निश्चित हो गई थीं, द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था का आधार माना गया था। इस समय के आसपास अमरीका ने साम्यवाद को नियन्त्रित करने के लिए बड़े स्तर पर नीति बनाई तथा प्रत्युत्तर में सोवियत संघ ने दुनिया के बाकी भागों में साम्यवाद को फैलाने के लिए कठिन परिश्रम करने का निर्णय किया।

द्वि-ध्रुवीकरण दशक (1945-55)

1945 से 1955 के मध्य दोनों ही महाशक्तियाँ विश्व राजनीति में अपने-अपने गुट बनाने की स्थिति में हो गई। इन दस वर्षों को हम न केवल द्वि-ध्रुवीकरण का दशक कह सकते हैं बल्कि एक कठोर द्वि-ध्रुवीकरण का दशक भी कह सकते हैं। इस समय सभी राज्यों की (गुट-निरपेक्ष राष्ट्र अपनी तटस्थतता के स्वरूप तथा क्षेत्र के बारे में स्पष्ट रूप से जानने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहे थे) दोनों महाशक्तियों में से किसी एक पर निर्भरता अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का कठोर सत्य बन गई थी। इस स्थिति का वर्णन करते हुए इतिहासकार टॉयनबी (Toynbee) विश्व राजनीति को द्वि-राजनीति (Bi-Politics) कहा जिसमें सोवियत संघ तथा अमरीका ने समस्त विश्व को दो भागों में बाँट कर अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। उसके अनुसार इन दोनों ब्लॉकों के देश या तो दो महाशक्तियों के सहायक या फिर आश्रित बन गए थे। टॉयनबी (Tyonbee) के शब्दों में “आज विश्व के सभी दूसरे राज्य किसी न किसी सीमा तक आश्रित हैं जिनमें से ज्यादातर अमरीका पर आश्रित हैं तथा कुछ सोवियत संघ पर, परन्तु कोई भी इन दोनों में से किसी एक से पूर्णतया स्वतंत्र नहीं है।

दो धुवों की सन्धियाँ

(The Alliances of two Poles)

बहुत से लेखकों, जैसे स्टीवन रोजन (Steven Rosen) तथा वाल्टर एस. जोनस (Walter s. Jones) का कहना है कि हम 1945 से 1955 तक के समय को कठोर द्वि-ध्रुवीकरण का काल कह सकते हैं जिसमें बहुत सी अविस्मरणीय घटनाएं घटी जैसे परमाणु शक्ति के सैनिक प्रयोग के सामर्थ्य की उत्पत्ति, सोवियत संघ द्वारा परमाणु क्षमता प्राप्त करना, विभिन्न सुरक्षा सन्धियों का होना-विशेषतया नाटो (NATO) तथा सीटो (SEATO) तथा वार्सा पैक्टबर्लिन समस्या, साम्यवादी शक्ति के रूप में चीन का प्रादुर्भाव, कोरिया का युद्ध, तथा कई दूसरे महत्वपूर्ण घटनाएं। इसी युग में सोवियत संघ अमरीका की गहरी दुश्मनी तथा शीत युद्ध की अन्तक्रियाएं भी हुई। इस काल के दौरान अमरीका ने मुख्य निम्नलिखित द्वि-पक्षीय, त्रि-पक्षीय तथा बहुपक्षीय सुरक्षा सन्धियाँ की:

  1. A.S. 1947 (22सदस्य),
  2. A.T.O.1949 (15 अब 19 सदस्य),
  3. जापान के साथ सुरक्षा सन्धि 1951, (द्वि-पक्षीय),
  4. N.Z.U.S 1951 (त्रिपक्षीय),
  5. फिलीपाइन के साथ परस्पर प्रतिरक्षा समझौता 1951, (द्वि-पक्षीय),
  6. रिपब्लिक ऑफ (दक्षिणी) कोरिया के साथ परस्पर प्रतिरक्षा समझौता 1953,
  7. E.A.T.0 1954 (आठ सदस्य) तथा
  8. रिपब्लिकन चीन (Taiwan) के साथ परस्पर प्रतिरक्षा सन्धि 1954 (द्वि-पक्षीय)।

सोवियत संघ ने 1949 की चीन-सोवियत सां सन्धि के अतिरिक्त साम्यवादी राष्ट्रों से एक व्यापक सन्धि की जिसे वार्सा पैक्ट (Warsaw Pact 1955) का नाम दिया गया। सोवियत संघ तथा अमरीका ने 60 राज्यों तथा 30 स्व-शासित राष्ट्रों के साथ सन्धियाँ कीं। इन सन्धियों की लोकप्रियता का तथा इन महाशक्तियों के दूसरे राज्यों पर नियन्त्रण का ज्ञान इस तथ्य से हो सकता है कि जब संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या 59 थी तो इन दोनों ब्लॉकों में 90 राज्य शामिल थे।

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