बहु-ध्रुवीकरण

बहु-ध्रुवीकरण

बहु-ध्रुवीकरण का अर्थ है अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में कई शक्ति केन्द्रों का अस्तित्व वासबी के शब्दों में, “बहु-ध्रुवीय व्यवस्था में बहुत से बड़े तथा सामान्य रूप में एक जैसी शक्ति या क्षमता वाले, कम से कम पांच राज्य शामिल होते हैं।” बहु-ध्रुवीकरण में महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं (राज्यों) का नियन्त्रित व्यवहार होता है। द्वि-ध्रुवीकरण के साधारण तथा कठोर विभाजन की तुलना में बहु-ध्रुवीकरण में शक्ति का ढाँचा जटिल तथा लचीला होता है। इसमें शत्रुओं तथा मित्रों के बीच कोई स्थायी रूप से कठोर बँटवारा नहीं किया जा सकता। प्रत्येक ध्रुव दूसरे सभी कार्यकर्ताओं को सम्भावित शत्रु या सम्भावित मित्र मानता है। महाशक्तियों की अधिक संख्या होने के कारण कोई भी राज्य अपने आपको किसी भी एक महाशक्ति के साथ भी जोड़ सकता है। बहुत सी अल्पकालीन तथा अन्तरिम सन्धियाँ समय-समय पर की जाती हैं। विरोधों को अधिक गहन नहीं होने दिया जाता। प्रतिद्वन्द्वी तथा विरोधियों के बीच वैर-भाव द्वि-ध्रुवीकरण में पाये जाने वाले वैर-भाव से कम होता है।

बहु-ध्रुवीकरण में, क्योंकि शक्तिशाली राज्यों की संख्या अधिक होती है, किसी भी एक कार्यकर्ता पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। स्पेनर जॉन के विचार में, “जहाँ द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था में संकट तथा युद्ध जल्दी उत्पन्न हो सकते हैं वहाँ बहु-ध्रुवीकरण अपने लचीलेपन तथा युक्तिचालकता के कारण शीघ्र शांति स्थापित कर सकता हैं।” इसी तरह के विचार कार्ल डब्लू डौश तथा जे. डेविड सिंगर ने भी दिये है। “बहु-ध्रुवीकरण में द्वि-ध्रुवीकरण की तुलना में कहीं कम विरोध उत्पन्न होते हैं।”

1945-55 के कठोर द्वि-ध्रुवीकरण के पश्चात अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में कुछ अन्य शक्तिशाली केन्द्रों की स्थापना हुई तथा इसे बहु-ध्रुवीकरण अथवा बहु-केन्द्रवाद का नाम दिया गया।

1955 के बाद द्वि-ध्रुवीकरण का बहु-ध्रुवीकरण में रूपान्तरण

दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात जो द्वि-ध्रुवीकरण स्थापित हुआ तथा जो पांचवें दशक में कठोर द्वि-ध्रुवीकरण बन गया था, वह 10 वर्षों तक चलता रहा। पांचवें दशक के अन्त में लचीली द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था में रूपान्तरण की ओर विभिन्न प्रवृत्तियाँ उभरने लगीं। पांचवें दशक के शुरू में दोनों महाशक्तियों की संधियाँ आन्तरिक विरोधों तथा प्रत्येक ब्लॉक के अन्दर पैदा होने वाले अविश्वासों के कारण ढीली होनी शुरू हो गई। 1950 के दशक के मध्य के आसपास जो मूलभूत परिवर्तन हुए उन्होंने संधियों को और कमजोर कर दिया तथा सन्धियों की भागीदारी की कठोरता गायब होने लगी। इससे कठोर द्वि-ध्रुवीकरण ढीला पड़ने लगा तथा बहु-केन्द्रवाद की उत्पत्ति होने लगी। ऐसे परिवर्तन को लाने में निम्नलिखित तत्वों ने योगदान दियाः

A. सोवियत ब्लॉक का कमजोर होना

  1. यूगोस्लाविया तथा सोवियत गुट के कुछ अन्य राज्यों में राष्ट्रवादी शक्तियों में वृद्धि:

    शुरू-शुरू में विभिन्न देशों में राष्ट्रवादी तत्त्व अपना दावा करने लगे। 1948 में यूगोस्लाविया अपने आप को सोवियत संघ की शक्ति में छुड़ाने में सफल हो गया। फ्रैंकल (Frankel) लिखते हैं कि “सोवियत-यूगोस्लाविया झगड़ा भ्रामक रूप से विचारों के जाल में लिपटा हुआ था लेकिन यह वास्तव में सोवियत संरक्षण के विरुद्ध राष्ट्रीय आकांक्षा का दावा था।” यूगोस्लाविया द्वारा अपनी विदेश नीति सम्बन्धी निर्णय करने की स्वतन्त्रता का दावा करना सोवियत गुट में पहली दरार थी। इसके अतिरिक्त सोवियत नियन्त्रण के प्रति पूर्वी यूरोपीय देशों में असन्तोष जो कुछ वर्ष पूर्वी जर्मनी में प्रतिबिम्बित हो गया था, 1956 में हंगरी के विश्वेह के कारण चरम सीमा पर पहुंच गया। चाहे सोवियत संघ इस विश्वेह को दबाने में सफल हो गया था, फिर भी इस घटना से सोवियत संघ के अपने गुट पर नियन्त्रण को काफी धक्का लगा।

  2. सोवियत संघ तथा चीन के बीच विचारधारा सम्बन्ध विरोध:

    खुश्चेव तथा माओ के बीच विचारधारात्मक विरोध तथा परिणामस्वरूप सोवियत संघ तथा चीन के बीच होने वाले विरोध ने सोवियत संघ के प्रभाव को काफी धक्का पहुँचाया। चीन सोवियत सीमा विवाद का प्रभाव, वह गति जिससे चीन ने अपनी परमाणु क्षमता को विकसित किया, 1970 के शुरू-शुरू में चीन-अमरीका का पुनर्मिलन, संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रवेश तथा इसे वीटो शक्ति का मिलना, तथा अफगानिस्तान, कम्पूचिया और सिक्यांग के सम्बन्ध में दोनों देशों के मतभेद सोवियत संघ पर दबाव डालने वाले साधन बने। इसके भार के नीचे दबा सोवियत संघ अपनी सन्धियों के भागीदारों पर नियन्त्रण खोने लगा।

  3. पूर्वी यूरोप में मुक्ति लहर:

    चीन के अनुभवों ने सोवियत संघ को पूर्वी यूरोपीय मित्र राष्ट्रों से अधिक उदारतापूर्वक व्यवहार करने की आवश्यकता के प्रति सचेत कर दिया। पोलैंड तथा चैकोस्लोवाकिया में उदारवादी आन्दोलन ने तथा रूमानिया द्वारा प्रदर्शित कार्य करने की स्वतन्त्रता ने सोवियत धड़े को और भी कमजोर कर दिया। पश्चिमी यूरोप तथ पूर्वी यूरोपीय राष्ट्रों के बीच सहयोग की निरन्तर बढ़ती भावना ने तथा यूरोपीय साम्यवाद के उदय ने साम्यवादी राष्ट्रों पर सोवियत संघ का नियन्त्रण और भी कम कर दिया।

सोवियत धड़े में आने वाली इस कमजोरी ने द्वि-ध्रुवीकरण व्यवस्था को कमजोर कर दिया तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बहु-ध्रुवीकरण के प्रादुर्भाव के लिए भूमिका तैयार कर दी।

B. अमरीकी ब्लॉक का कमजोर होना

  1. स्वेज संकट तथा अमरीका:

    बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक के मध्य में अमरीकी धड़े में भी दरारें पड़ गई। 1956 में ब्रिटेन तथा फ्रांस अमरीका को सूचना दिये बिना या उससे सलाह किए बिना स्वेज अभियान में जुट गए। यह घटना अमरीकी धड़े में पहली दरार सिद्ध हुई।

  2. फ्रांसीसी नीतियाँ:

    जनरल डिगॉल के नेतृत्व में फ्रांस विश्व राजनीति में स्वतन्त्र शक्ति केन्द्र बनने का प्रयत्न करने लगा तथा फ्रांस की यह नीति स्पष्ट रूप से अमरीका के अपने मित्र राष्ट्रों पर नियन्त्रण की कमजोरियों को प्रकट करने लगी। साम्यवादी देशों तथा चीन के साथ अपने सम्बन्ध बढ़ाने के फ्रांस के निर्णय से अमरीका के साम्यवाद की विलगता के विचारों को गहरा धक्का लगा। इसके अतिरिक्त वियतनाम में अमरीकी नीति के प्रति पनपे घोर विरोध, कामन मार्किट में ब्रिटेन का प्रवेश तथा सारे यूरोप द्वारा बड़े स्तर पर नाटो (NATO) राष्ट्रों में पालारिस मिसाइलों को लगाकर सैन्यीकरण करने के अमरीका के प्रयत्नों का विरोध, इन सब के कारण जनरल डि गॉल ने फ्रांस को अमरीका के नियन्त्रण से स्वतन्त्र रखने का निर्णय लिया। फ्रांस द्वारा दक्षिण-पूर्वी एशिया को स्वतन्त्र करने तथा 1966 में नाटो (NATO) से निकल जाने की धमकी ने इस विचार को और भी स्पष्ट कर दिया। फ्रांस को एक स्वतन्त्र शक्ति केन्द्र बनाने के लिए जनरल डि गॉल ने स्वतन्त्र परमाणु क्षमता का विकास करने का निर्णय किया। 1969 में जनरल डि गॉल युग के समापन तक फ्रांस ने विश्व राजनीति में बड़ी परमाणु शक्ति बनने के मार्ग पर चलने का अपना निर्णय दृढ़ कर लिया था। छठे दशक के अन्त में फ्रांस की नीति ने अमरीकी ब्लॉक में बड़ी-बड़ी दरारें पैदा कर दी।

  3. लैटिन अमरीका में राष्ट्रवाद का मजबूत होना:

    लैटिन अमरीका में राष्ट्रवादी शक्तियों ने जो सफलता प्राप्त की थी उससे भी दूसरे राष्ट्रों पर अमरीका का नियन्त्रण और भी कम हो गया। चाहे अमरीकी महाद्वीप के देशों पर अमरीका अपना प्रभाव बनाये रखने में लगातार सफल रहा, फिर भी उसके इन प्रयत्नों का काफी विरोध हुआ। क्यूबा (Cuba) के साम्यवादी देश के रूप में उभरने से इस महाद्वीप पर अमरीका का नियन्त्रण कम हो गया।

C. गुटनिरपेक्षता तथा तीसरे विश्व का उदय

भारत तथा कई दूसरे देशों का दोनों महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने, शीत युद्ध में तटस्थ रहने तथा अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में स्वतन्त्र भूमिका निभाने के निर्णय ने भी द्वि-ध्रुवीकरण के बहु-ध्रुवीकरण में बदलने में काफी सहायता की। कल के शब्दों में “विशेषता भारत का निर्णय महत्वपूर्ण था जिसमें परम्परागत सहनशीलता तथा ध्रुवीयता तथा सैन्यवाद के प्रति घृणा विद्यमान थी। इसी के अनुसार भारत ने दोनों प्रतिद्वन्द्वी गुटों से अलग रहने का निर्णय किया। उसने तथा यूगोस्लाविया ने मिल कर एशिया में तथा बाद में अफ्रीका में भी, विकासशील दूसरे राज्यों के लिए, उन्होंने निर्गुट रहना अधिक श्रेष्ठ समझा, एक व्यवहार संहिता पेश की।” नासिर का मिस्र तथा नकरूमा का घाना नए उभरने वाले राज्यों में प्रमुख थे जिन्होंने निर्गुट रहने का निर्णय किया। धीरे-धीरे गुटनिरपेक्षता की अवधारणा अधिक से अधिक समर्थन प्राप्त करती गई तथा 1961 तक यह एक अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन बन गई। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों तथा तीसरे विश्व का उभरना शीत युद्ध तथा द्वि-ध्रुवीकरण के विरोध के प्रतीक बने। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों तथा तीसरे विश्व का उभरना शीत युद्ध तथा द्वि-ध्रुवीकरण के विरोध के प्रतीक बने। गुटनिरपेक्षता की सफलता ने द्वि-ध्रुवीकरण व्यवस्था को बहुत क्षीण कर दिया क्योंकि कम से कम आधी मानवता ने दोनों प्रतिद्वन्द्वी धड़ों में शामिल होने के विरुद्ध निर्णय किया।

D. परमाणु क्लब का विस्तार

महाशक्तियाँ अपना परमाणु एकाधिकार केवल कुछ समय तक ही कायम रख सकी। कैनेडा परमाणु क्षमता प्राप्त करने वाला तीसरा राष्ट्र बन गया। सातवें दशक में फ्रांस तथा चीन भी परमाणु क्षमता प्राप्त करने में सफल हो गये और तब से दोनों तेजी से परमाणु शस्त्रा का विकास करने लग पड़े। 1974 में भारत भी पूर्णतया नियन्त्रित शान्तिपूर्ण परमाणु विस्फोट (PNE) करके इस परमाणु क्लब में शामिल हो गया परन्तु इसके साथ ही भारत ने परमाणु तकनीक का केवल शान्तिपूर्ण तथा असैनिक कार्यों के लिए प्रयोग करने के लिए प्रण भी किया। इस समय कई अन्य देश भी परमाणु शस्त्रों का उत्पादन करने की स्थिति में आ गये। परमाणु क्लब में विस्तार के कारण भी बहु-ध्रुवीकरण का विकास हुआ। 1945-90 के मध्य चाहे इन दोनों महाशक्तियों के अतिरिक्त दूसरे देशों द्वारा बनाए जाने वाले हथियार अमरीका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ की परमाणु श्रेष्ठता को प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं थे फिर भी अपने स्वामियों को इन्होंने विदेश नीति में और अधिक लचीलापन तथा स्वतन्त्रता लाने के लिये बाधित किया।

E. नए राज्यों का प्रादुर्भाव

एक अन्य तत्व जिसने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में द्वि-ध्रुवीकरण को बहु-ध्रुवीकरण में रूपान्तरित किया, वह था विश्व राजनीति में नए राष्ट्रों का प्रादुर्भाव। 1947 में शुरू होकर, लेकिन 1960 में और अधिक तेजी से, नये प्रभुसत्ता-सम्पन्न राष्ट्रों के प्रादुर्भाव में काफी वृद्धि हुई। केवल एक वर्ष में अर्थात् 1960 में, करीब-करीब 17 नए प्रभुसत्ता-सम्पन्न राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश किया। यह प्रक्रिया दस साल तक चलती रही। ये नए राष्ट्र अपनी मेहनत से प्राप्त की गई स्वतन्त्रता को बनाये रखने के लिए वचनबद्ध थे तथा शक्तिशाली राष्ट्रों, विशेषकर दोनों महाशक्तिों के प्रति बहुत अधिक संशयी थे। परिणामस्वरूप वे किसी भी ब्लॉक में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि वे यह महसूस करते थे कि इससे अप्रत्यक्ष रूप में उनके काम करने की स्वतन्त्रता सीमित हो जाएगी। गरीबी, कम-विकास तथा सामान्य मुश्किलें जो उन्होंने साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के पंजे में रह कर भुगती थीं, इन सब ने उन्हें शक्ति गुटों का विरोधी बना दिया था। अमरीका तथा सोवियत संघ द्वारा इन्हें अपने-अपने गुटों में शामिल होने के लिए फुसलाने ने इन्हें शक्ति गुटों के प्रति और अधिक शंकित कर दिया तथा उनहोंने अलग रहने का तथा किसी भी एक गुट के साथ अपने आपको न बाँधने का निर्णय कर लिया। उन्होंने दोनों से अथवा एक से सहायता लेना तो स्वीकार किया परन्तु राजनीतिक बंधनों से मुक्त रहकर अपना अलग अस्तित्व बनाये रखने के लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र तथा दूसरी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं में अपनी भूमिकाओं में सामंजस्य स्थापित करना शुरू कर दिया। इन राज्यों ने धीरे-धीरे एक बहुराज्यीय समूह बनाना शुरू कर दिया जिसमें सामूहिक प्रभाव की क्षमता थी।

F. पश्चिमी यूरोप का आर्थिक एकीकरण

पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा संगठित क्षेत्रीय आर्थिक संस्थाओं जैसे E.C.M. द्वारा बड़े पैमाने पर तथा तेजी से किए जाने वाले विकास ने भी पश्चिमी यूरोप के राष्ट्रों को अमरीकी नियन्त्रण तथा प्रभाव से स्वतन्त्र कर दिया। ये राष्ट्र अपने आर्थिक विकास द्वारा इतने सक्षम हो गए कि इन्होंने द्वि-ध्रुवीय राजनीति के प्रति अधीनता छोड़ने की क्षमता प्राप्त कर ली। आर्थिक मेल-मिलाप द्वारा प्राप्त आर्थिक समृद्धि ने, पश्चिमी यूरोप के राष्ट्रों विशेषतया फ्रांस ने, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अमरीका की प्रधानता को चुनौती देने तथा कमजोर करने में सहायता की। वर्तमान समय में यूरोपीय संघ शक्ति का एक दृढ़ तथा संगठित केन्द्र है।

G. मुख्य आर्थिक शक्तियों के रूप में जापान तथा पश्चिमी जर्मनी का उदय

दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने से तीस साल के अन्दर-अन्दर जापान तथा पश्चिमी जर्मनी (अब जर्मनी) दोनों न केवल युद्ध के मध्य बड़े पैमाने पर हुई आर्थिक क्षति पर काबू पाने में सफल हुए बल्कि इन्होंने औद्योगिक उत्पादन तथा तकनीकी विकास में अभूतपूर्व सफलता भी पाई। जापान तथा पश्चिमी जर्मनी के दो बड़ी आर्थिक शक्तियाँ बनने ने बहु-ध्रुवीकरण के प्रादुर्भाव की प्रक्रिया को बहुत अधिक प्रभावित कर दिया। चाहे सैन्य शक्ति के रूप में ये शक्तियाँ कमजोर थीं, परन्तु फिर भी ये राज्य विश्व राजनीति के मुख्य कार्यकर्ता बने। तकनीकी रूप से तो ये अमरीका के साथ जुड़े रहे हैं, परन्तु वास्तव में दोनों अपने विदेश सम्बन्धों के संचालन में काफी स्वतन्त्र रहे। जापान तथा पश्चिमी जर्मनी की आर्थिक शक्ति के प्रभाव अधीन 1970-90 के बीस वर्षों में द्वि-ध्रुवीकरण की व्यवस्था बहु-ध्रुवीकरण की व्यवस्था भी बन गई।

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