अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र एवं विषय वस्तु

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र एवं इसकी विषय वस्तु 

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र

अध्ययन के विषय के रूप में, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति अपेक्षाकृत एक नया विषय है। इसलिए अभी तक इसका क्षेत्र अच्छी तरह निर्धारित नहीं हुआ है। विद्वानों ने इसका क्षेत्र परिभाषित करने के लिए विभिन्न आधार अपनाए हैं। मार्गेन्थो कहते हैं कि राष्ट्रों के मध्य शक्ति के लिए संघर्ष अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र का निर्माण करता है।

इसमें शक्ति के रूप में परिभाषित राष्ट्रीय हितों का विश्लेषण किया जाता है। फेलिक्स ग्रास तथा रसेल फाईफील्ड आदि विद्वानों ने वास्तव में राष्ट्रों की विदेश नीतियों के अध्ययन को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति माना है। फ्रैंड ए० साण्डरमान इस विचार का खण्डन करते हैं तथा उनके विचार में विदेश नीतियों का अध्ययन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केवल एक भाग है। वह इसकी परिभाषा इस तरह देते हैं, “अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति एक ऐसी प्रक्रिया का अध्ययन है जिसमें राष्ट्रों अथवा राष्ट्र समूहों के साथ भी विरोध की दशा में राष्ट्र अपना लाभदायक स्थान प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।’ स्प्राउट तथा स्प्राउट अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की परिभाषा देते हुए लिखते हैं कि “यह राष्ट्रों के उन सम्बन्धों तथा अन्तक्रियाओं का अध्ययन है जो राष्ट्रों के मध्य विरोधों का समाधान करते समय संघर्ष की प्रक्रिया से पैदा होती है।” पामर तथा पर्किन्स इसे राज्य प्रणाली का अध्ययन कहते हैं। बर्टन (Burton) के विचार में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में अन्य बातों के अतिरिक्त वे सभी तत्व तथा शर्ते शामिल हैं जो एक से अधिक राज्यों के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। ये सभी विचार विद्वानों के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र से सम्बन्धित विचारों की भिन्नता की ओर संकेत करते हैं।

1947 में ग्रेसन किर्क ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के पांच संघटकों के अध्ययन की वकालत की है :

  1. राज्य-प्रणाली का स्वरूप तथा संचालन,
  2. राज्य की शक्ति को प्रभावित करने वाले तत्व,
  3. बड़ी शक्तियों की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति तथा उनकी विदेश नीतियाँ,
  4. आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का इतिहास तथा
  5. अधिक स्थिर विश्व-व्यवस्था का निर्माण।

विनसैंट बेकर ने 1954 में अपनी एक रिपोर्ट में निम्नलिखित संघटक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में शामिल किए :

  1. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की प्रकृति एवं प्रमुख शक्तियाँ,
  2. अन्तर्राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक संगठन,
  3. राष्ट्रीय शक्ति के तत्व,
  4. राष्ट्रीय हितों को लागू करने वाले उपकरण,
  5. राष्ट्रीय शक्ति की सीमाएँ तथा नियंत्रण,
  6. मुख्य शक्तियों की विदेश नीतियाँ, तथा
  7. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का इतिहास।

बेकर (Baker) ने आगे कहा, “अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन करने वाले विद्वानों में सिद्धान्त-निर्माण तथा नीति-निर्धारण पर बल देने के प्रयत्न अधिक लोकप्रिय होते जा रहे हैं।”

विषय-वस्तु

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की विषय-वस्तु में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:

  1. राज्यप्रणाली या राज्य कर्ता के रूप में

    अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति दो या दो से अधिक राज्यों के सम्बन्धों तथा आपसी क्रियाओं का अध्ययन है। प्रत्येक राज्य अपने भूगोल, जनसंख्या, कूटनीति, राष्ट्रीय हितों की सीमाओं द्वारा सीमित होता है। इसलिए अन्तर्राज्य-सम्बन्धों के अध्ययन में इन अभिनेताओं तथा इन तत्वों का अध्ययन भी शामिल होना आवश्यक है। पामर तथा पर्किन्स के शब्दों में, “क्योंकि इसका आधार राज्य या राज्य प्रणाली है। यहीं से एक विश्व समुदाय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन अवश्य शुरू हो जाना चाहिए।”

  2. राष्ट्रीय हित

    क्योंकि राष्ट्रीय हित एक ऐसा उद्देश्य है जिसे प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के सम्बन्धों के द्वारा प्राप्त करना चाहता है, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। राष्ट्रों के मध्य सम्बन्धों का स्वरूप प्रत्यक्ष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय कार्य-व्वयहार में संलग्न राष्ट्रों के राष्ट्रीय हितों की संगति एवं असंगति की मात्रा द्वारा निश्चित होता है। इससे राष्ट्रीय हित अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।

  3. राष्ट्रीय शक्ति-

    अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए राष्ट्रीय शक्ति की अवधारणा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। राष्ट्र कार्यकर्ता है परन्तु वे हमेशा अपनी राष्ट्रीय शक्ति के आधार पर कार्य करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि राष्ट्रों के मध्य सम्बन्ध शक्ति-संघर्ष की प्रकृति की तरह के होते हैं। मार्गेन्यो का कहना है कि, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को तभी समझ सकते हैं कि यदि हम हित को शक्ति के रूप में परिभाषित करें।’ राष्ट्रीय शक्ति ही किसी राष्ट्र की विदेश नीति के उद्देश्यों को लागू करने के लिए उसकी योग्यता तथा भूमिका का निर्धारण करती है। राष्ट्रों को महाशक्तियाँ, मुख्य शक्तियाँ, बड़ी शक्तियाँ, छोटी शक्तियाँ, कमजोर शक्तियाँ कहना एक परम्परा है और इससे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय शक्ति के महत्व का पता चलता है। सभी अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार शक्ति होता है इसलिए यह अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विषय का एक महत्वपूर्ण अंग बन जाती है।

  4. विदेश नीती

    किसी भी राज्य का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवहार सदैव उसकी विदेश नीति द्वारा नियंत्रित तथा निर्देशित होता है। विदेश नीति राज्य के राष्ट्रीय हित के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले कार्यों की एक विचारपूर्ण दिशा होती है। किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय शक्ति ही उसकी विदेश नीति का आधार होती है। इस विदेश नीति के द्वारा ही प्रत्येक राष्ट्र राष्ट्रीय हितों के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी राष्ट्रीय शक्ति का प्रयोग करता है। भिन्न-भिन्न राज्यों की विदेश नीतियों का अध्ययन ही राष्ट्रों के आपसी सम्बन्धों का विवरण दे सकता है। कोई भी विद्यार्थी बड़ी शक्तियों की विदेश नीतियों के अध्ययन के बिना अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को समझने की आशा नहीं कर सकता। बहुत-से विद्वान् तो बड़ी शक्तियों की विदेश नीतियों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं की प्रक्रिया को ही अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का नाम दे देने की सीमा तक चले जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की यह विचारधारा बिल्कुल ठीक तो नहीं है फिर भी यह अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में राज्यों की विदेश नीतियों के अध्ययन के महत्व को प्रकट करती है।

  5. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के आर्थिक उपकरण

    अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते हुए आर्थिक तथा व्यापारिक सम्बन्धों की भूमिका के महत्व को कम महत्वशाली नहीं समझा जा सकता। राष्ट्रों के आपसी आर्थिक सम्बन्ध अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध का बहुत महत्वपूर्ण अंग होते हैं। आज, आर्थिक उपकरण-विदेशी सहायता, कर्जा, व्यापार आदि राज्यों के आपसी सम्बन्धों की दिशा को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण साधन हैं। इसलिए आर्थिक उपकरणों का अध्ययन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का अटूट अंग है।

  6. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं एवं क्षेत्रीय संगठन

    राष्ट्रों के मध्य सम्बन्धों को बनाने के लिए संस्थागत साधनों के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की तेजी से हो रही वृद्धि आज के युग की उत्कृष्ट विशेषता है। इसमें से कुछ तो वास्तव में काफी व्यापक संगठन हैं, जैसे नाटो (NATO), सीटो (SEATO), ओएस (OAS), ओएयू (OAU), ओपेक (OPEC), ऐसियान (ASEAN), सार्क (SAARC), इको (ECO), इयू (EU) आदि। ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगठन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका अदा करने वाले महत्वपूर्ण अभिनेता हैं। ये सदस्य राज्यों के आपस के सम्बन्धों की दिशा में काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में शामिल किया जाता है।

  7. गैरराजकीय कार्यकर्ता जैसे बहुराष्ट्रीय निगम

    वर्तमान समय में राज्यों के साथ-साथ असंख्य पार-राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय संगठन, गैर-सरकारी तथा अर्द्ध-सरकारी संगठन भी अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनका अध्ययन भी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में शामिल है।

  8. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के नियंत्र

    राष्ट्रों के आपसी व्यवहार को निर्देशित व नियंत्रित करने के लिए कुछ अवधारणाओं का प्रचलन रहा है। जैसे शक्ति संतुलन की अवधारणा (Concept of Balance of Power), क्षत्रवाद (Regionalism), निशस्त्रीकरण तथा शस्त्र नियंत्रण (Disarmament and Arms Control), सामूहिक सुरक्षा (Collective Security), अन्तर्राष्ट्रीय कानून (International Law), विश्व जनमत (World Public opinion), कूटनीति (Diplomacy) आदि अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। ये एक राष्ट्र की विदेश नीति के वास्तविक रूप में लागू हाने को प्रभावित करती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्यार्थी के लिए इन अवधारणाओं तथा सिद्धान्तों का अध्ययन करना भी आवश्यक है।

  9. अध्ययन के प्रमुख विषय

    आजकल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उन सभी तत्वों तथा शक्तियों का अध्ययन किया जाता है जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के कार्यों तथा व्यवहार को निर्देशित, संचालित तथा नियंत्रित करती है। 1945 से पहले के समय की तुलना में वर्तमान समय में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया है तथा अभी और बढ़ रहा है। आजकल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में, राष्ट्रों का व्यवहार तथा सभी शक्तियों तथा तत्वों का अध्ययन शामिल है जो उनके व्यवहार को निर्देशित, संचालित तथा नियंत्रित करती है। मुख्य विषय हैं- राष्ट्रीय शक्ति (National Power), राष्ट्रीय हित (National Interest), विचारधारा (Ideology), विदेश नीति (Foreign Policy), कूटनीति (Diplomacy), निशस्त्रीकरण (Disarmament), अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की समस्या (Problem of International Peace and Security), क्षेत्रीयता तथा क्षेत्रीय संगठन (Regionalism and Regional Organisations), नीति के आर्थिक उपकरण (Economic Instruments of Policy), राष्ट्रवाद (Nationalism), अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ (International Institutions), विश्व जनमत (World Public Opinion), विश्व सरकार (world Government), शक्ति संतुलन (Balance of Power), सामूहिक सुरक्षा (Collective Security), साम्राज्यवाद (Imperialism) तथा नव-उपनिवेशवाद (Neo-colonialism) ।

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