लोक-सम्पर्क

लोक-सम्पर्क

लोक-सम्पर्क का अर्थ

(Meaning of Public Relations)

लोक-सम्पर्क के अर्थ को विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट किया है-

जे० एल० मैकेनी के अनुसार, “प्रशासन में लोक-सम्पर्क अधिकारी-वर्ग तथा नागरिकों के बीच पाए जाने वाले प्रधान एवं गौण सम्बन्धों तथा इन सम्बन्धों द्वारा स्थापित प्रभावों एवं दृष्टिकोणों की परस्पर क्रियाओं का मिश्रण है।”

चाइल्ड्स के अनुसार, “विभिन्न जन-समूहों के मत को प्रभावित करने के लिए एक संगठन जो भी कार्य करता है वह सब लोक-सम्पर्क है।”

पाल एपलबी ने लिखा है कि, “विभिन्न जन-समूहों के मत को प्रभावित करने लिए एक संगठन जो भी कार्य करता है वह सब लोक-सम्पर्क है।’

रेक्स होलो ने स्पष्ट किया कि, “लोक-सम्पर्क एक विज्ञान है जिसके द्वारा एक संगठन यथार्थ रूप में अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने का तथा सफलता के लिए आवश्यक जन-स्वीकृति एवं अनुमोदन प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।”

वेब्सटर डिक्शनरी के अनुसार, ”कोई उद्योग, यूनियन, कापरिशन, व्यवसाय, सरकार या अन्य संस्था जब अपने ग्राहकों, कर्मचारियों, हिस्सेदारों या जनसाधारण के साथ स्वस्थ और उत्पादक सम्बन्ध स्थापित करने या उन्हें स्थायी बनाने के लिए प्रयत्न करे, जिनसे वह अपने आपको समाज के अनुकूल बना सके अथवा अपना उद्देश्य समाज पर व्यक्त कर सके, उसके उन प्रयत्नों को लोक सम्पर्क कहते हैं।”

लोक-प्रशासन के एक प्रमुख विद्वान विलट ने लोक-सम्पर्क के उन मुख्य चार तत्वों को बताया है जिन पर प्रायः आम सहमति पाई जाती है- (1) जनता की इच्छाओं तथा आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना, (2) जनता को बतलाना कि उचित विचारधारा क्या है, उचित कार्य और आकांक्षाएँ क्या हैं, (3) अधिकारियों और जनसाधारण के बीच अच्छे सम्बन्ध बनाए रखना एवं (4) जनसाधारण को यह अवगत कराना कि शासन लोक-हित के लिए कौन-कौन से सम्पर्क कार्य कर रहा है।

बर्नेज का मानना है कि लोक-सम्पर्क के तीन मुख्य पहलू हैं-(1) जनता को दी गई सूचना, (2) जनता के दृष्टिकोण तथा कार्य को बदलने का प्रयास और (3) संस्था के दृष्टिकोण तथा कार्यों को जनता के साथ और जनता के दृष्टिकोणों एवं कार्यों को संस्था के साथ एकीकृत करने की चेष्टा करना।

सूचना, प्रसार और लोक-सम्पर्क

लोक-सम्पर्क को प्रायः सूचना और प्रचार का समानार्थक समझने की भूल लोग कर देते हैं, अतः आवश्यक है कि “सूचना, प्रसार और लोक-सम्पर्क किसी तथ्य का प्रकाशन अथवा प्रचार मात्र नहीं होता है वरन् इसका क्षेत्र तो ‘प्रकाशन’ या ‘सूचना’ का है। किसी भी जानकारी को अधिकाधिक प्रसारित करने के साथ-साथ जब यह प्रयल भी किया जाए कि जनता प्रसारित सन्देश को केवल सवीकार ही नहीं करे बल्कि उसके अनुरूप कोई कदम भी उठाए तो यह प्रक्रिया ‘सूचना’ या ‘प्रकाशन’ से एक कदम आगे ‘प्रचार’ कहलाती है। ‘प्रकाशन या सूचना’ और ‘प्रसार या प्रचार’ के सुव्यवस्थित, परिमार्जित एवं संवर्द्धित रूप को ही ‘लोक-सम्पर्क’ कहा जाता है।

लोक-सम्पर्ककर्ता जनता की शंकाओं, बाधाओं तथा कठिनाइयों को सरकार तक पहुँचाता है और सरकारी नीति में यथासम्भव सुधार करवा कर सम्बन्धित प्रोग्राम को एक बार फिर जनता के सामने रखता है। इस प्रकार सरकार और जनता दोनों पक्षों में तालमेल स्थापित करके किसी भी नीति या कार्यक्रम का मार्ग प्रशस्त करने के कार्य को लोक-सम्पर्क कहते हैं।

प्रकाशन हो या प्रचार-कार्य, उद्देश्य यही होता है कि जनता को कुछ तथ्यों से अवगत कराया जाए और समाज के सामने कोई विशेष सिद्धान्त या कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाए। स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया में ध्यान केवल इस बात पर केन्द्रित होता है कि जनता में क्या प्रकाशित या प्रचारित किया जा रहा है। जनता की इस सम्बन्ध में क्या प्रतिक्रिया है, उसे सरकार या नियोक्ताओं तक पहुँचाने का काम ‘लोक-सम्पर्क’ का है, विशुद्ध प्रकाशन’ या प्रचार’ का नहीं। लोक-सम्पर्क के काम में सफलता के लिए आवश्यक है कि जनमत की विभिन्न प्रवृत्तियों का विधिपूर्वक और यत्नतः अध्ययन किया जाए और उन्हीं के अनुरूप प्रचार के अपेक्षित दिशा, गति, मोड़ या रूप दिया जाए।

सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और सरकार को पृथक् माना जाता है, अतः सरकारी प्रचार मशीनरी को राजनीतिक दलों के प्रोपेगण्डा के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। सोवियत गणराज्य आदि देशों की अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में दल और सरकार में इस प्रकार का द्वैत नहीं माना जाता, अतः वहाँ प्रचार में कोई भेद या प्रतिबन्ध नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी सरकारी प्रचार या पब्लिसिटी में कई मौकों पर राजनीति एवं दलगत प्रचार के लिए प्रयुक्त करने की गुंजाइश रहती है।

सरकारी प्रचार और लोक-सम्पर्क पर सन्देह भी किया जाता है। कई लोग सरकारी प्रचार की समस्त गतिविधियों का विरोध भी करते हैं। जनसाधारण सरकार और दूसरी पब्लिसिटी कराने वाली अन्य संस्थाओं को दो परस्पर विरोधी मापदण्डों से आँकते हैं। कोई बड़ी पेट्रोल कम्पनी जब अपने माल की पब्लिसिटी के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है और यह रुपया भी ग्राहकों से वसूल करती है तो लोग इसको बुरा नहीं मानते, किन्तु यदि सरकार अपनी सेवाओं के बारे में जनता को अवगत कराए तो आपत्ति उठाई जाती है और कहा जाता है कि करदाता के रुपए को बर्बाद किया जा रहा है।

सरकारी लोक-सम्पर्क का विरोध उन राजनीतिक दलों द्वारा भी किया जाता है जो सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध करते हैं। उन्हें सदा यह सन्देह रहता है कि सरकारी पब्लिसिटी को शासक पार्टी के प्रोपेगण्डा के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। लोक-सम्पर्क का विरोध प्रेस प्रतिनिधियों और संवाददाताओं की ओर से भी होता है। वे समझते हैं कि समाचार के काम में लोक-सम्पर्ककर्ता उनके प्रतिस्पर्धी हैं अर्थात् प्रशासन की सफलता में लोक-सम्पर्क का विशिष्ट महत्व है।

लोक-सम्पर्क स्थापित करने के माध्यम

प्रचार के सभी माध्यम जन-सम्पर्क के माध्यम हैं। प्रचार के मुख्यतः तीन माध्यम होते हैं- दृष्टि-मूलक, श्रवण-मूलक तथा दोनों का योग । प्रथम श्रेणी में पोस्टर, प्रदर्शनी, मूक चित्रपट आदि आते हैं। द्वितीय श्रेणी में आकाशवाणी के प्रसारण, गोष्ठी, भाषण आदि शामिल हैं तथा तृतीय श्रेणी में बोलते हुए चित्रपटों को लिया जा सकता है। इन सभी माध्यमों का प्रयोग करके प्रशासन जनता तक अपनी बात पहुँचाता है। लोक-सम्पर्क स्थापित करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम स्वयं कर्मचारी है। यह आवश्यक है कि सरकारी कर्मचारी विनीत और शिष्ट हों तथा अभिकरण के कार्य-संचालन की प्रकृति से सुपरिचित हों। व्यक्तिगत साक्षात्कार जितना अधिक प्रभावशाली होगा, प्रशासन की सफलता उतनी ही सुरक्षित होगी। एक अभिकरण द्वारा जिस रूप में रिका रखे जाते हैं उनका भी जन-सम्पर्क पर प्रभाव रहता है। व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से रखे गए रिकार्ड्स जनता के लिए सुविधाजनक रहते हैं और इसीलिए अधिक लोक-सम्पर्क हो पाता है अन्यथा जनता प्रशासन के बारे में भ्रामक धारणाएँ बना लेती हैं। सरकारी अभिकरणों को अपने ऐसे विशिष्ट लेख प्रकाशित करने चाहिए जिनमें उनके उद्देश्यों,लक्ष्यों, कार्यों आदि का वर्णन हो। लोक-प्रतिवेदन(Public Reporting) के साधनों का भी समुचित विकास किया जाना चाहिए और ऐसे नियतकालीन प्रगति विवरण (Periodic Progress Reports) प्रकाशित किए जाने चाहिए जिनमें सरकारी अभिकरणों की उपलब्धियों का संक्षिप्त वर्णन हो। लोक-सम्पर्क के इन सभी आधुनिक साधनों के साथ-साथ महत्वपूर्ण परम्परागत माध्यमों, जैसे लोक-नृत्य, नाटक और कठपुतलियों का भी उपयोग किया जा सकता है। सरकार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर व्यापार-मेले आयोजित करके जनता को अपनी उपलब्धियों से निरन्तर परिचित करा सकती है।

भारत में लोक-सम्पर्क मशीनरी

(Public Relations Machinery in India)

भारत में सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के पास लोक-सम्पर्क की प्रशासनिक व्यवस्था है। जिसके क्षेत्रीय तथा शाखा कार्यालय और चलते-फिरते केन्द्र सम्पूर्ण देश में फैले हुए हैं। आकाशवाणी, पत्र-सूचना कार्यालय, फिल्म प्रभाग, विज्ञान तथा दृश्य प्रचार निदेशालय, प्रकाशन विभाग, गीत और नाटक प्रभाग, भारत के समाचार-पत्रों के रजिस्ट्रार का कार्यालय, केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड, भारतीय फिल्म तथा दूरदर्शन संस्थान, राष्ट्रीय संग्रहालय, गवेषणा तथा संदर्भ प्रभाग, क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय, फिल्म समारोह निदेशालय, फोटो प्रभाग तथा मुख्य सेंसर का कार्यालय समूचे देश के लोगों को सरकार की नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी कराते हैं। ये सरकार की नीतियों और गतिविधियों के प्रति जनसाधारण में हुई प्रतिक्रियाओं को सरकार तक भी पहुँचाते हैं। इसके अलाव ये राज्य सरकारों तथा संचार से सम्बन्धित उनके विभिन्न संगठनों से भी सम्पर्क रखते हैं। मन्त्रालय इन प्रचार माध्यमों एककों के कार्यों में समन्वय करता है और नीति सम्बन्धी मामलों में इनका मार्गदर्शन करता है।

विदेश मन्त्रालय का विदेश प्रचार विभाग विदेशियों को भारत सरकार की नीतियों की विस्तृत जानकारी देता है और उनकी व्याख्या करता है। यह विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के विवरण के लिए प्रचार सामग्री देता है और उनसे प्राप्त सामग्री भारतीय समाचार-पत्रों को दी जाती है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अन्तर्गत भारतीय पत्रकारों को विदेश भेजा जाता है और विदेशी पत्रकारों को भारत में इस सम्बन्ध की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के अधीन मूल्यांकन निदेशालय की स्थापना की गई है ताकि विभिन्न प्रचार माध्यमों की पहुँच के अनुपात में उस पर हुए व्यय तथा प्रभाव का अध्ययन किया जा सके। विभाग कार्यक्रमों के सुधार, नीति आयोजन तथा लागत के अधिक अच्छे उपयोग निमित्त आवश्यक सूचना प्रदान करने के लिए सर्वेक्षण भी करता है। सूचना और प्रसारण मन्त्रालय तथा भारत सरकार के अन्य मन्त्रालयों के लिए तत्कालीन परिणाम और दीर्घकालीन लाभ पर मूल्यांकन अध्ययन आरम्भ करने तथा समन्वय करने के लिए भारतीय जन-सम्पर्क संस्थान का मूल्यांकन अध्ययन विभाग एक श्रेष्ठ आधार का काम देता है।

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