लोकपाल एवं लोकायुक्त

लोकपाल एवं लोकायुक्त

भारत में प्रशासन तथा राजनीति के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के निवारण तथा उस पर अंकुश लगाने के लिए स्वीडन की ओम्बुड्समैन संस्था की तरह ही लोकपाल एवं लोकायुक्त पदों की व्यवस्था की गई है। भारत में इस पद का प्रस्ताव प्रशासनिक सुधार आयोग ने सर्वप्रथम प्रस्तुत किया था। लोकसभा में इस पद का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1969 में प्रस्तुत किया गया जो कि पास हो सका। उसके बाद 1971, 1985, 1998 में पुनः इसे प्रस्तुत किया गया। लेकिन ये अभी तक संसद द्वारा पारित नहीं किया जा सका जिससे ये संवैधानिक कानून का रूप नहीं ले सका। भारत में लोकपाल केन्द्र के राजनीति एवं प्रशासनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार निवारण हेतु लोकपाल न बना, लेकिन राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना की जा चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने 3 जनवरी, 1999 को केन्द्र सरकार से इस बात का स्पष्टीकरण माँगा की उसने केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त के गठन हेतु क्या कदम उठाये हैं?

भारत में भ्रष्टाचार के निवारण हेतु केन्द्र सरकार ने इस सम्बन्ध में लोकसभा में एक ‘लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक’ 9 मई, 1968 को प्रस्तुत किया। इस विधेयक ने 1969 में अधिनियम का रूप धारण किया। ‘लोकपाल’ को मंत्रियों तथा सचिवों द्वारा किए गए कार्यों अथवा उनकी स्वीकृति से किए गये कार्यों से उत्पन्न शिकायतों या अभियोगों की जाँच करने का अधिकार दिया गया है। इसी प्रकार ‘लोकायुक्त’ को राजकीय पदाधिकारियों के कार्यों की जाँच-पड़ताल किये जाने का अधिकार दिया गया है। विधेयक के अनुसार लोकायुक्त, लोकपाल के प्रशासनिक नियन्त्रण में कार्य करेगा। लोकपाल को यह भी अधिकार होगा कि वह किसी भी लोकायुक्त के अधिकार-क्षेत्र में आने वाले कार्यों की स्वयं भी जाँच कर सकता है।

नियुक्ति, योग्यताएँ एवं कार्यकाल

लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 1969 में लोकपाल एवं लोकायुक्त पदों की नियुक्ति, क्षेत्राधिकार, कर्त्तव्य तथा दायित्वों का भी वर्णन किया गया है। जो इन पदों की विशेषताओं को स्पष्ट करते हैं। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. लोकपाल देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री तथा राज्यपाल के अतिरिक्त समस्त कार्यपालिका के विरुद्ध लगाए गए आरोपों तथा शिकायतों को सुनकर जाँच कर सकता
  2. लोकायुक्त लोकपाल की देखरेख में कार्य करेगा तथा यह केवल केन्द्रीय सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध शिकायतों की जाँच करेगा।
  3. लोकपाल एवं लोकायुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होगी, किन्तु लोकपाल को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा विपक्षी दल के नेता की सलाह लेगा। लोकायुक्त की नियुक्ति लोकपाल की सलाह से की जायेगी। लोकपाल को लोकायुक्तों के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं करेगा। यह केवल नकारात्मक रूप में यह व्यक्त कर सकेगा कि लोकायुक्त संसद् अथवा राज्य व्यवस्थापिका का सदस्य न हो।
  4. लोकपाल तथा लोकायुक्त की नियुक्ति 5 वर्ष के लिए की जायेगी तथा 5 वर्ष बाद उन्हें पुनः इस पद पर नियुक्त नहीं किया जायेगा।
  5. लोकपाल एवं लोकायुक्त पद से निवृत्त होने पर किसी भी सरकारी लाभ के पद पर नियुक्त नहीं किये जायेंगे।
  6. लोकपाल एवं लोकायुक्त का वेतन भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा न्यायाधीश के समान होगा। इसके अतिरिक्त भत्ते, आवास तथा पेंशन की सुविधा प्राप्त होगी।
  7. लोकपाल एवं लोकायुक्तों को दुर्व्यवहार तथा अक्षमता के आधार पर राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जाँच करवाने के बाद पदमुक्त कर सकता है।
  8. लोकपाल एवं लोकायुक्त को संसद के दो सदनों में लिखित बहुमत से समर्थित प्रस्ताव के आधार पर भी राष्ट्रपति पद मुक्त कर सकता है।
  9. लोकपाल तथा लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत की जायेगी।
  10. लोकपाल एवं लोकायुक्त को सरकारी हस्तक्षेप में संरक्षण प्राप्त होगा।
  11. लोकपाल एवं लोकायुक्त को अपनी कार्यवाही में स्टाफ कर्मचारियों की सहायता प्राप्त होगी।
  12. सरकार 3 माह के अन्दर लोकपाल तथा लोकायुक्त को यह सूचित करेगी कि उनकी सिफारिशों पर क्या कार्यवाही की गई है।

क्षेत्राधिकार पर सीमाएँ

(Limitations on Jurisdiction)

विधेयक की तीसरी अनुसूची द्वारा लोकपाल एवं लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार पर कुछ सीमाएँ लगाई गई हैं। इन सीमाओं के तहत लोकपाल और लोकायुक्त द्वारा निम्नलिखित कार्यों के विषय में शिकायतों की जाँच-पड़ताल नहीं की जा सकती है-

  1. विदेश अथवा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से सम्बन्धित विषय, जिसे सचिव ने इस हेतु प्रमाणित किया है।
  2. प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 तथा विदेशी अधिनियम, 1964 के अन्तर्गत की गई कार्यवाही।
  3. अपराधों की खोज अथवा राज्य की सुरक्षा हेतु किए गए कार्य ।
  4. ऐसा निर्णय जो कि इस बात के निर्धारण के लिए लिया गया है कि मामला न्यायालय में जायेगा अथवा नहीं।
  5. ऐसे कार्य जो किसी संविदा से सम्बन्धित हों और जिसमें प्रशासन तथा क्रेता और विक्रेता के व्यावसायिक सम्बन्धों का उल्लेख हो, किन्तु जिसमें वैज्ञानिक अपेक्षाओं को पूर्ण करने में उत्पीड़न अथवा विलम्ब करने सम्बन्धी आरोप न हों।
  6. सम्मान अथवा पुरस्कार प्रदान करने सम्बन्धी मामले।
  7. सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों से सम्बन्धित मामले।
  8. विवेक शक्ति के आधार पर किए गए कार्य अथवा निर्णय जब तक निर्णय का आधार गलत सिद्ध न हो जाए।
  9. ऐसे मामले जिनके सम्बन्ध में शिकायतकर्ता को न्यायालय में जाने का अधिकार प्राप्त हो। जब तक कि लोकपाल यह अनुभव न करे कि न्यायालय न्याय नहीं कर सकेगा।
  10. एक वर्ष पूर्व के घटित मामले ।
  11. लोकपाल के क्षेत्र में समस्त न्यायाधीश, न्यायालयों के समस्त कर्मचारी तथा अधिकारीगण, भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष एवं सदस्य, चुनाव आयोग के सभी आयुक्त, संसद के दोनों सदनों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं एवं दिल्ली महानगर परिषद् का सचिवालय स्टॉफ आते हैं।

लोकपाल एवं लोकायुक्त के दायित्व और कार्य

(Responsibility/Functions)

लोकपाल एवं लोकायुक्त अपने पद पर रहते हुए निम्नलिखित दायित्वों (कार्य) को पूर्ण करते हैं-

  1. प्रशासनिक कार्यवाही यदि न्यायिक कार्यवाही के क्षेत्र का अतिक्रमण करती है तो लोकपाल तथा लोकायुक्त प्रशासनिक कर्मचारी तक ही सीमित रहेंगे।
  2. लोकपाल एवं लोकायुक्त पर विधेयक में निर्दिष्ट प्रतिबन्ध के अतिरिक्त और कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
  3. लोकपाल एवं लोकायुक्त अपनी जाँच-पड़ताल सम्बन्धी कार्यवाही अत्यन्त गोपनीय रखेंगे। कोई भी न्यायालय उनसे इस सम्बन्ध में सूचना नहीं माँग सकता है।
  4. लोकपाल और लोकायुक्त द्वारा शिकायतों के निवारण हेतु सुझाई गई पद्धति पर सम्बन्धित अधिकारी एक माह में उसकी पूर्ति करेगा। यदि कार्यवाही पूरी तरह ठीक रहती है जाँच समाप्त कर दी जायेगी।
  5. कार्यवाही समाप्त न होने पर लोकपाल तथा लोकायुक्त अपने प्रतिवेदन के अनुसार राष्ट्रपति तथा शिकायतकर्ता को इसकी सूचना देंगे।
  6. प्रत्येक जाँच से सम्बन्धित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जायेगा।

उपयोगिता / महत्व (Utility)

भारत में लोकपाल तथा लोकायुक्त के पदों पर नियुक्ति करने का उद्देश्य प्रशासन पर जनता के नियन्त्रण को प्रभावी बनाना है। केन्द्र के साथ-साथ राज्यों में भी इस प्रकार की नियुक्ति की जानी चाहिए। यह खेद का विषय है कि लोकपाल पद पर नियुक्ति सम्बन्धी प्रस्ताव पाँच बार लोकसभा में प्रस्तुत हो चुका है, लेकिन राजनैतिक दलों की इसके प्रति उदासीनता के कारण यह पद अभी तक प्रभाव में नहीं आ पाया है। जनवरी, 1996 में देश में भ्रष्टाचार से सम्बन्धित उठे हवाला काण्ड के कारण फिर से लोकपाल के प्रति माँग उठी है। इस बार अनेक दलों के बड़े-बड़े राजनीतिक तथा उच्च अधिकारी इस काण्ड में सम्मिलित होने के कारण अब देश के प्रमुख राजनैतिक दल लोकपाल के पद को स्थापित करने का मानस बना रहे हैं।

केन्द्र और राज्य के उच्च अधिकारियों की भ्रष्टाचार से सम्बन्धित जाँच के लिए लोकायुक्त के पद पर नियुक्ति सर्वप्रथम राजस्थान राज्य ने 1973 में की। इसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक और आसाम में भी लोकायुक्तों की स्थापना हो चुकी है। राजस्थान में इसकी नियुक्ति तीन वर्ष के लिए तथा अन्य राज्यों में 5 वर्ष के लिए की जाती है।

लोकपाल और लोकायुक्त पदों की उपयोगिता को निम्न आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. ये जनता की शिकायतों के निराकरण के लिए सुगमता और स्वतन्त्रतापूर्वक सहज उपलब्ध हो सकते हैं।
  2. यह न्याय प्राप्त करने का सुगम, मितव्ययी और शीघ्रगामी साधन है।
  3. यह प्रशासनिक अकुशलता तथा भ्रष्टाचार के निवारण हेतु सुधारात्मक तथा अवरोधात्मक दोनों प्रकार के प्रयास करता है।
  4. यह एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष संस्था है, जो कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका तीनों से स्वतन्त्र होकर कार्य करती है।
  5. इनमें मध्यस्थों की आवश्यकता नहीं होती है।
  6. इनके द्वारा सभी विषय पर न्यायपूर्ण और निष्पक्ष विचार किया जाता है।
  7. ये पद न्यायोचित हितों की अतिरिक्त गारन्टी हैं।
  8. ये उत्तरदायित्व और सन्तुलित निर्णय के साथ कार्य करते हैं, क्योंकि यह संसद के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। इनके द्वारा शक्ति के दुरुपयोग किये जाने की दशा में संसद् द्वारा उचित कार्यवाही की जाती है।
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