मुगलकाल में ‘उमरा’ (अमीर वर्ग) का उद्भव एवं संरचना

मुगलकाल में ‘उमरा’ (अमीर वर्ग) का उद्भव एवं संरचना

उमरा शब्द (“अमीर” का बहुवचन) मुगलकाल में सामान्यतः उन सभी अधिकारियों के लिए प्रयुक्त होता था जो एक हजार या उससे अधिक मनसब के हकदार थे अर्थात इसमें उच्च वर्ग के सभी अधिकारी सम्मिलित हो जाते हैं। एक हजार जात का ओहदा आमतौर पर साधारण मनसबदारों और अमीर वर्ग “उमरा” के बीच की विभाजन रेखा मानी जाती है। यद्यपि कुछ मामलों में पाँच सौ जात के छोटे ओहदे वाले मनसबदार भी कभी-कभी अमीर कहे जाते थे। अमीर शब्द की इतिहासकारों द्वारा गलत व्याख्या की पूरी संभावना बनी होने के बावजूद यह शब्द उच्च वर्ग के व्यक्तियों के लिए ही प्रयुक्त होता था जो बादशाह के अधीन अधिकारी होने के साथ-साथ राजनीतिक पदक्रम में भी बेहतर माने जाते थे। फिर भी मुगलकालीन अमीर वर्ग की रोमन साम्राज्य के “नोबल’ वर्ग से या यूरोप के “सामंती अभिजात वर्ग’ से तुलना करना गलता होगा।

उद्गम और संरचना

मुगलकालीन अमीर वर्ग अपने संस्थागत रूप में एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसकी जड़ें मध्ययुग के दौरान पश्चिमी एशिया में हुई राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल में, भारत की उस अनोखी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में जिसकी वजह से एक ताकतवर राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता ने जन्म लिया, भारत में तुर्की सुल्तानों के अनुभवों में, मुगल शासक इस देश में अपने साथ जो तुर्की-मंगोल परंपराएँ लेकर आए उनमें, तथा अंततः अकबर की राजनीतिक प्रतिभा और उसके शासनकाल की अन्य परिस्थितियों में खोजी जा सकती हैं जब बाबर ने भारत में मुगल सल्तनत की नींव रखी तो वह अपने साथ संस्था के रूप में उस “उमरा” परंपरा को भी साथ लाया जिसका विकास चगताइयों के बीच हुआ था और उसके मरने पर वही परंपरा सल्तनत के साथ-साथ उसके वारिस हुमायूँ को वसीयत के रूप में प्राप्त हुई। फिर भी दावे के साथ यह कहना मुश्किल होगा कि विजातीय “बाहरी” चरित्र वाली यह “उमरा” परंपरा तैमूर वंश के साथ किसी वफादारी के रिश्ते में बंधी थी या कि वह अपने साथ एक समान परंपरा या समान उद्देश्य की भावना लेकर आई थीं बहुजातीय और धार्मिक दृष्टि से विषमरूपी तत्वों में से एक समरूपी “उमरा” परंपरा का विकास करने का श्रेय तो अकबर को ही जाता है। उसके अधीन अमीर वर्ग शाही इच्छा का एक प्रभावशाली और विश्वसनीय माध्यम बन सका।

बाबर और हुमायूँ के शासनकाल में और अकबर के शासन काल के आरंभिक वर्षों में विकास के अपने पहले दौर में इस मुगलकालीन अमीर वर्ग में कुछ जाने माने जातीय वर्ग के लोग ही सम्मिलित थे। ये वर्ग थे-तूरानी (मध्य एशियाई) ईरानी (फारसी), अफगान शेखजादों (कुछ उपवर्गों में बँटे भारतीय मुसलमान) और राजपूत आदि। इक्तिदार आलम खान का कहना है कि 1560 और 1575 ईसवी के बीच जब मुगल शासन व्यवस्था में राजपूतों और भारतीय मुसलमानों का दखल हुआ और उच्च पदों पर फारसियों की तैनाती में बढ़ोत्तरी होने लगी तो इसका परिणाम यह हुआ कि अमीर वर्ग में तूरानी रंग क्रमशः फीका पड़ने लगा, साथ ही, शासन व्यवस्था में चगताई परंपराएँ और रस्मो-रिवाज धीरे-धीरे खत्म होने लगे। आगे चलकर सत्रहवीं शताब्दी में जब दकन में मुगल सत्ता ने जोर पकड़ा तो दकनियों अर्थात् बीजापुरियों, हैदराबादियों और मराठों का दखल भी बढ़ गया।

अतहर अली के मतानुसार मुगलकालीन अमीर वर्ग और इन विभिन्न वर्गो का समागम मोटे तौर पर ऐतिहासिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुआ और आंशिक रूप से “विशेषकर राजपूतों का सम्मिलित होना” नियोजित शाही नीति के फलस्वरूप। अकबर ने शाही सेवा में इन सभी तत्वों के एकीकरण की नीति का अनुसरण किया। उसने जिस उदार धार्मिक नीति का पालन किया, उसके फलस्वरूप अमीर वर्ग में काबिल हिंदुओं को लाने में उसे सफलता मिली। इनमें अधिकतर राजपूत राजा था जिन्होंने अकबर के साथ विवाह-संबंध बढ़ाए। अन्य लोगों को उनकी योग्यतानुसार मनसबदारियाँ दी गई। इस वर्ग में टोडरमल और बीरबल आते हैं। टोडरमल सबसे काबिल और प्रसिद्ध व्यक्ति थे, जो राजस्व संबंधी मामलों के विशेषज्ञ थे और दीवान के पद तक पहुंचे। बीरबल तो अकबर के बहुत ही मुंह लगे थे। अकबर ने “सुलह-ए-कुल” की नीति चलाई, जिसका आंशिक उद्देश्य था- विभिन्न धार्मिक मान्यताओं-सुन्नी ‘तूरानी और अधिकांश शेखजादों से संबंधित), शिया (जिसमें बहुत से ईरानी सम्मिलित हैं) और हिंदू (मुख्यतः राजपूतों को) मिलाना और उनमें पाए जाने वाले सांप्रदायिक मतभेदों को दूर करना ताकि वे मतभेद शाही तख्त के प्रति वफादारी में बाधा न डाल सकें।

अमीर वर्ग के संगठन के बारे में जे0 एफ0 रिचर्ड्स सारा श्रेय अकबर को देते हैं। उनके अनुसार इससे न केवल “नृजातीय और गुटबंदी वाले हितों में” संतुलन स्थापित हुआ अपितु अमीरों को भी एक अलग व्यक्तिगत और वर्गीय पहचान मिली। यह पहचान थी-शाही “मनसबदारी” या अमीरी की, अर्थात् एक फौजी कमांडर और शाही प्रशासक की। जो लोग मुगल मनसबदार बने, उनकी राजनीतिक पहचान, मान्यताओं और आकांक्षाओं में आए परिवर्तनों की ओर रिचर्ड्स ध्यान आकृष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि इस तरह अकबर के अधीन अमीर अपना रुतबा और अभिप्रेरणा मुगल साम्राज्य में अपनी भागीदारी से प्राप्त करते हैं न कि वंश-परंपर या किसी अपने सांप्रदायिक जुड़ाव से।

अकबर की असांप्रदायिक (non sectarian) नीति का बहुत हद तक जहाँगीर और शाहजहाँ दोनों ने ही अमीर वर्ग की भर्ती में अनुपालन किया। इन दोनों बादशाहों के अधीन जो “उमरा” थे, उनमें से बहुतेरे हिंदुस्तान में ही पैदा हुए थे। साथ ही अमीर वर्ग में अफगानों, भारतीय मुसलमानों “हिंदुस्तानियों’ और हिंदुओं का अनुपात निरंतर बढ़ता ही गया। इन दिनों जो हिंदू अमीर वर्ग में सम्मिलित हुए उनमें एक नया वर्ग मराठों का भी था।

औरंगजेब के अधीन अमीर वर्ग की संरचना में कुछ अंतर दिखाई देता है। कुछ इतिहासवदों का मत है कि औरंगजेब के वक्त हिंदू अमीरों की स्थिति में गिरावट आई और इसका कारण था कि वे बादशाह की हिंदू विरोधी धार्मिक नीति को मानते हैं। श्री राम शर्मा एक हजार जात और उससे ऊपर वाले 160 हिंदू मनसबदारों की सूची के आधार पर यह मानते हैं कि शाहजहाँ की तुलना में औरंगजेब के वक्त हिंदू मनसबों के प्रतिशत में कमी आई। फिर भी इस बारे में सही स्थिति की जानकारी अतहर अली द्वारा प्रस्तुत “नोबिलिटी अंडर औरंगजेब” नामक अध्ययन से प्राप्त की गई है।

अतहर अली बताते हैं कि शर्मा द्वारा प्रस्तुत सूची अपूर्ण है और इसका कारण वे यह मानते हैं कि “जवाबित-ए-आलमगीरी” को ठीक से नहीं पढ़ा गया है। अतहर अली द्वारा प्रस्तुत मात्रात्मक विश्लेषण यह बताता है कि औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्ध में हिंदुओं की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई। उस समय अमीर वर्ग में मराठों को मिलाकर हिंदुओं का प्रतिशत 1/3 था, जबकि शाहजहाँ के शासनकाल में यह प्रतिशत केवल 1/4 ही था।

अतहर अली का सुझाव है कि औरंगजेब के अधीन अमीर वर्ग के इतिहास का अध्ययन दो स्पष्ट विभाजक खंडों में किया जाना चाहिए, एक उसकी गद्दीनशीनी से 1678 तक ओश्र दूसरा 1678 से उसकी 1707 में हुई मृत्यु तक। राजपूतों के साथ हुए युद्ध से पहले, और आगे चलकर उसके दकन की ओर अभियान से पहले, अकबर के काल से चली आ रही अमीर वर्ग की आंतरकि संरचना की परंपरा में जातीय और धार्मिक आधार पर न तो कोई परिवर्तन दिखाई दिया और न ही मनसबदारों की संख्या में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि ही हुई। इस अवधि में “विदेशी अमीर वर्ग” जिसमें वे अमीर आते हैं जो या तो खुद बाहर से हिंदुस्तान में आए या वे जो हिंदुस्तान में तो पैदा हुए पर उन परिवारों से संबंधित थे जो बाहर से हिंदुस्तान में आए थे, निरंतर उच्च पदों पर बने रहे। ऐसे लोगों में तूरानियों की अपेक्षा ईरानियों की संख्या अधिक थी। पहले तो राजपूतों को भी उच्च पदों पर बिठाया गया, पर 1678 तक आते-आते उनकी संख्या में कुछ कमी आई, अर्थात 1658 और 1678 के बीच ऊपर के ओहदे वाले अमीरों का प्रतिशत शाहजहाँकालीन 18.7 प्रतिशत की तुलना में घटकर 14.6 प्रतिशत हो गया। इसी दौरान औरंगजेब ने अपने पूर्ववर्ती बादशाहों की तुलना में अफगानों की भर्ती को अधिक तरजीह दी। 1658 और 1678 के बीच औरंगजेब के अमीरों की कुल संख्या के लगभग आधे अमीर “खानजादे’ थे, अर्थात् वे लोग जिनके पिता या निकट संबंधी शाही हुकूमत में थे।

राजपूत-युद्ध (1678-79) और दीर्घकालीन दकन अभियान ने अमीर वर्ग की संरचना पर गहरा प्रभाव डाला। दकन अभियान के फलस्वरूप मुगलिया अभियान तंत्र में दकनी अमीरों के दाखिले में भारी वृद्धि हुई। संख्या की दृष्टि से अमीर वर्ग बहुत बढ़ गया, जिसमें दकनियों को (बीजापुरियों, हैदराबादियों और मराठों को) थोक के भाव भर्ती किया गया और उन्हें विशेष रूप से ऊँचे-से-ऊँचे पदों पर बिठाया गया, जबकि अन्य पुराने ओहदेदारों को इस वजह से बहुत नुकसान पहुँचा। ममूरी ने खानजादों (पुराने परिवारों के अमीरों) की हताश स्थिति के बारे में लिखा है। एक पीढ़ी पहले मराठों की कहीं गिनती ही नहीं थी, अब उन्हीं मराठों ने राजपूतों को पीछे छोड़ दिया। औरंगजेब के शासनकाल के उत्तरार्ध में राजपूत अमीर वर्ग की बदलती स्थिति के बारे में अतहर अली का कहना है कि यह परिवर्तन शहंशाह की “एक नई धार्मिक और राजपूत नीति” का सूचक है। इसके अनुसार विद्रोह के उस युग में शहंशाह की रुचि मुस्लिम कट्टरपंथियों से सहयोग प्राप्त करने की रही थी। इसीलिए उसने उस समय इस तरह की कट्टरपंथी धार्मिक नीति अपनाई। राजपूतों के अवसान और शहंशाह की उग्र कट्टरपंथी इस नई स्थिति में संगति बैठ जाती है। दकनी अमीर वर्ग की संख्या में वृद्धि के लिए औरंगजेब को आय के नए रास्ते भी ढूँढ़ने थे, उसे “अल्पसंख्यक’ राजपूतों की उन्नति के रास्ते बंद करने पड़े।

सिद्धान्त रूप से तो मुगलिया “उमरा” उन सभी लोगों के लिए खुला था जो शहंशाह की संतुष्टि को ध्यान में रखते हुए योग्यता और क्षमता के कुछ मानदंडों पर खरा उतरें। पर वस्तुतः चाहे भारतीय हों या विदेशी, अभिजात कुल से संबंधित व्यक्ति ही निश्चित लाभ की स्थिति में रहते थे। जिन राजपूतों को अमीर वर्ग में भर्ती किया जाता था, वे या तो वंश-परंपरा से राजा होते थे या राजाओं से ही संबंधित अभिजात परिवारों के सदस्य होते थे। राजपूतों को छोड़कर विभिन्न क्षेत्रों के कुछ जमींदारों को, जैसे कि बुंदेलों, पहाड़ी, राजाओं और जाटों को भी अमीर वर्ग में प्रवेश मिला था। इस प्रकार अमीर वर्ग में इनके प्रवेश ने “उमरा’ के अभिजात चरित्र को ही मजबूत किया। बावजूद इसके अमीर वर्ग में पदोन्नति और महत्वपूर्ण पदों पर पहुँचने के रास्ते साधारण वंश-क्रम के अनेक व्यक्तियों के लिए भी खुले अवश्य रहे। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि वंश-परंपरा के बिना भी अमीर वर्ग में प्रवेश के लिए छोटे पदों पर तैनात व्यक्तियों को स्वयं अपनी राह बनानी होती थी और उन्हें पदोन्नतियाँ पाने के लिए अपनी विशेष योग्यता प्रदर्शित करनी पड़ती थी।

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