सल्तनत कालीन भारत में नगरीकरण का विकास 

सल्तनत काल में शहरीकरण

सल्तनत काल में इतने शहरी केन्द्रों का विकास हुआ कि उनकी संख्या को देखकर आश्चर्य होता है। अबुल फजल ने 3,200 कस्बों की गिनती की है। सल्तनत काल में उनकी संख्या उतनी ही रही होगी क्योंकि मुगल शासन के स्थापित होने के तुरंत बाद बसे नगरों की संख्या अधिक नहीं होती थी।

तथापि, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि भू राजस्व की वसूली की केंद्रीकृत व्यवस्था के परिणामस्वरूप नए शासकों के हाथ में संपदा का विशाल खजाना आ गया जिससे एक बड़ी सेना, एक वास्तव में प्रभावशाली और अच्छा वेतन पाने वाले उमरा वर्ग और खर्चीले रहन-सहन का खर्च उठाना संभव हो सका। इन सबके लिए पक्की इमारतों, वस्त्रों, विलास की सामग्री शस्त्रों आदि की माँग में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप, शिल्पियों और कुशल कामगारों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। अधिकतर निर्माण कार्य कस्बों में या कस्बों के आसपास होता था। अतः कस्बों का महत्व बढ़ गया और वे नए आर्थिक और सामाजिक संबंधों का केंद्र बन गए।

सय्यद नूरुल हसन ने हमें इस विषय में सावधान किया है। जिस प्रकार के सामंतवाद के आधार पर तर्क दिए जा रहे है वैसा सामंतवाद भारत में सन् 1200 के बाद विद्यमान नहीं था। तुर्की राज्य का ढाँचा बहुत केंद्रीकृत था, उसमें भूराजस्व की वसूली अक्तादारों और जमींदारों के द्वारा किए जाने के कारण, भूराजस्व की व्यवस्था एकीकृत थी जिससे नए प्रकार के ग्रामीण संबंध कायम हुए जिनके परिणामस्वरूप नगरों और कस्बों का विकास हुआ। अपना शासन स्थापित करने वाले और कब्जा करने वाले नए शासक वर्ग के रूप में तुर्क लोग मूलतः शहरों के निवासी थे और उनका हित भूमि से जुड़ा हुआ नहीं था। फलतः कब्जा जमाने वाले और शासन कायम करने वाले इस वर्ग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भारी शोषण किया। इरफान हबीब ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि शहरी विकास “मुख्यतः शासक वर्ग द्वारा भूमिकर (खराज अथवा माल) के रूप में वसूल किए गए अधिशेष पर आधारित था जिसको मुख्यतः नगरों में रहने वाले उस वर्ग के सदस्यों, उनके आश्रितों और उनके नौकर चाकरों में विभाजित किया जाता था।” इस शोषण के परिणामस्वरूप ऐसे शहरी केंद्रों की स्थापना हुई जो “स्वभाव से परजीवी” थे। अतः उनके तर्क के अनुसार परजीवी गाँवों की अपेक्षा शहरों की ओर (अर्थव्यवस्था का) झुकाव मध्यकालीन आर्थिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष है।

यहाँ दो बातें स्पष्ट करने की आवश्यकता है। पहली यह कि शहरीकरण की प्रक्रिया तुर्कों के आने से बहुत पहले ही तेज हो गई थी। निस्संदेह, स्वयं शहरी होने के कारण, तुर्को ने शहरीकरण की इस प्रक्रिया को गति प्रदान की। लेकिन उन्होंने शहरीकरण का सृजन स्वयं नहीं किया जैसा कि मोहम्मद हबीब अथवा एच0 के0 नकवी हमसे विश्वास करने की अपेक्षा करते हैं। शहरी विकास की प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि उसको प्रोत्साहित करने का श्रेय शासकों को नहीं दिया जा सकता। भारतीय किसान इतनी अधिक मात्रा में अधिशेष का उत्पादन करते थे कि उससे व्यापक शहरी विकास का पोषण करना संभव था और भारत में ऐसे बहुत लोग थे जो शासकों और अन्य लोगों द्वारा पैदा की गई माँग की पूर्ति के लिए नए शिल्प सीखने और उन्हें अपनाने को तैयार थे। इसी विशेषता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सन् 1200 से पूर्व के भारत का तुर्कीकालीन भारत के रूप में संक्रमण वस्तुतः क्रांतिकारी घटना थी। अन्य कारणों से न सही, लेकिन केवल इसी कारण उसे क्रांतिकारी कह सकते है कि वह परिवर्तन बहुत तेजी से हुआ और बड़े पैमाने पर हुआ जो समाज सामंतवादी राजनीतिक दृष्टि से विकेंद्रित प्रधान रूप से ग्रामीण और छोटे-मोटे शिल्प उत्पादों का समाज था उस समाज का एक अत्यधिक केंद्रीकृत शहरी और बड़े शिल्पों के उत्पादक के रूप में परिवर्तन होना अभूतपूर्व घटना थी। विस्मय की बात तो यह है कि समाज में ये परिवर्तन अचानक और तेजी से आए, उनको आने में शताब्दियाँ नहीं लगी। यूरोप और अन्य देशों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन लाने में लोगों को अनेक शताब्दियाँ लगी। भारत में, एक राजनीतिक घटना, अर्थात् तुर्की शासन की स्थापना के कारण व्यापक परिवर्तन हुए। स्पष्टतः ऐसी परिस्थिति में ग्रामीण जनता ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया होगा। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि नए राज्य का कोई सक्रिय अथवा निश्चेष्ट विरोध नहीं हुआ। प्रसंगवश, इससे यह कथन भी गलत साबित होता है कि भारत में शहरी विकास का स्वरूप परजीवी था।

सल्तनत काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विकास समान रूप से नहीं हुआ। तेरहवीं शताब्दी में तुर्की राज्य अपने स्थायित्व के विषय में आश्वस्त नहीं था। अमीर वर्ग के संवाद नरेश तंत्र की स्थिति विकसित हो रही थी, शासक वर्ग का अभी निर्माण हो रहा था, अवतावारी प्रथा का अभी भी परीक्षण हो रहा था, तुर्की शासन से पूर्व के जमींदार बिचौलियों की सत्ता अभी भी कायम थी। अच्छी सड़क बहुत कम थी शिल्प उत्पादों की प्रारम्भिक अवस्था में थी और बाजारों का विकास धीमी गति से और अव्यवस्थित ढंग से हो रहा था। चौदहवीं शताब्दी आन पर परिस्थिति में सुधर आया। तुर्कों की युद्धों में निर्याणक विजय हुई जिससे विस्तृत क्षेत्रों पर अधिकार हुआ और बहुत धन की प्राप्ति हुई। अमीर वर्ग को लेकर किया जाने वाला प्रयास सफल हो रहा था, अक्तादारी प्रणाली से राजस्व वसूली के काम में और सेना को संगठित करने के काम में सहायता मिली। अलाउद्दीन खलजी के राज्य में राजस्व की वसूली और शिल्प उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। राजमार्गों पर आना-जाना सुरक्षित और सुगम हो गया, परिवर्तन व्यवस्था सुचारु हुई और सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि शहरी माँगों की पूर्ति के लिए बाजार कायम हुए। जैसा कि एच0 सी0 वर्मा ने कहा है, वह सच है कि दिल्ली सल्तनत ने पंद्रहवी शताब्दी में और सोलहवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अनेक बार अपनी दिशा बदली लेकिन चौदहवीं शताब्दी ने जो दिशा दिखाई थी उसका शेष डेढ़ शताब्दी में भी अनुसरण हुआ। इरफान हबीब ने इसके तीन कारण बताए हैं शहरों के आकार और संभवतः संख्या में भारी वृद्धि हुई, शिल्य उत्पादों का उल्लेखीय विस्तार हुआ और उसके अनुरूप वाणिज्य का भी विस्तार हुआ। निस्संदेह ये तीनों कारण एक दूसरे के थे।

जहाँ तक शिल्प उत्पादों में हुई वृद्धि का संबंध है, कागज, भवन निर्माण और वस्त्र उद्योगों से संबंधित नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग शुरु किए जाने के अतिरिक्त तीन अन्य घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण थे-उनमें दो प्रारंभिक कारण थे जिन्हें एक तीसरे कारण से विस्तार मिला

  • श्रेष्ठतर अवसरों की खोज ने बड़ी संख्या में शिल्पकार और व्यापारी आए जो अपने सभी नए शिल्प और तकनीक लाए।
  • लोगों को बड़ी संख्या में दास बनाने के परिणामस्वरूप आज्ञाकारी और प्रशिक्षित करने योग्य श्रमिक उपलब्ध हो गए।
  • नए राजस्व प्रशासन के द्वारा कृषि के अधिशेष पर कब्जा करना संभव हो गया जिसको अंततः शहरी लोगों द्वारा उपयोग किया जाता था।

यह प्रक्रिया अलाउद्दीन खलजी के शासनकाल में जितनी पूर्ण हुई उतनी किसी अन्य काल में नहीं हुई। उसने राजस्व प्रणाली, सेना अमीर वर्ग और बाजारों का सफलतापूर्वक पुनर्गठन किया जो बहुत विश्वसनीय था। किसानों को 50% कर के रूप में अदा करने चराई और धारी के रूप में दो नए प्रकार के कर देने और अपने बिक्री योग्य अधिशेष को निश्चित मूल्य पर व्यापारियों को बेचने के लिए विवश किया गया। शहरों में आकस्मिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए अनाज के भंडार बनाए गए। शहर के निवासियों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के लिए बाजार (कम से कम) दिल्ली में स्थापित किए गए और व्यापारियों को बाजार में माल लाने के लिए मजबूर किया गया अथवा इसके लिए उन्हें ऋण दिए गए। शहरों में सर्वाधिक परिवर्तन चौदहवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में

शहरों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बाँटा जा सकता है :

  1. प्रशासनिक शहर जैसे दिल्ली, पटना आदि तथा अन्य सरकार या पाकपट्टन के नगर जहाँ मुख्यतः प्रशासनिक कर्मचारी रहते थे,
  2. धार्मिक शहर, जैसे अजमेर, बनारस, पाकपट्टन आदि जो अपने धार्मिक महत्व के कारण या तो पहले से बसे हुए थे या किसी धार्मिक व्यक्तित्व से संबंधित होने के कारण बस गए थे। उदाहरणार्थ, अजमेर और पाकपट्टन में पर्यटन का महत्व इस कारण बढ़ा किया वे क्रमश: ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और बाबा फरीद से संबंधित थे।
  3. शिल्पकारी से संबंधित नगर जो एक या दो प्रमुख शिल्पों पर निर्भर जैसे बयाना नील पर निर्भर था, ढाका मलमल पर निर्भर था आदि-आदि।
  4. बंदरगाहों पर बसे शहर जो माल के आयात और निर्यात के कारण समृद्ध थे। इनमें भड़ौच, मसूलीपत्तनम् आदि नगर शामिल थे।

लेकिन यह वर्गीकरण पूर्ण पृथकता का द्योतक नहीं है। इससे केवल वही जानकारी मिलती है कि किसी शहर की स्थापना या उसके महत्व का प्रमुख कारण संभवतः क्या था और कोई भी शहर किसी भी रूप में अनन्य नहीं था। वस्तुतः उनकी स्थापना होने के बाद उनमें सभी प्रकार की गतिविधियाँ होती थी। दिल्ली जैसे प्रशासनिक नगर में व्यापारी, सूफी तथा अन्य धार्मिक संत आते थे और वहां मूल्यवान वस्तुओं का निर्माण भी होता था। इसी प्रकार, अजमेर, महान चिश्ती संत के वहाँ आकर रहने के पूर्व से ही बसा हुआ शहर था और वहाँ बड़ी संख्या में व्यापारी तथा सौदागर दरगाह के पास आकर अपना कारोबार करने लग थे और वहाँ आने वाले हजारों लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। अंततः यह शहर शिल्प उत्पादों का एक बड़ा केन्द्र बन गया और प्रशासन का भी केंद्र था। अतः हम देखते हैं कि एक बार स्थापित होने के बाद शहर में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ होने लगती थीं और उसमें बड़े परिवर्तन आते थे।

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