अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन का आदर्शवादी एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का आदर्शवादी एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन के एक विश्वसनीय दृष्टिकोण के रूप में आदर्शवाद तथा यथार्थवाद दोनों दृष्टिकोण परस्पर प्रतिद्वन्द्वी रहे हैं। दोनों अन्तर्राष्ट्रीय वास्तविकता के पूर्ण स्वरूप के विशिष्ट विचार की वकालत करते हैं तथा यह विश्वास रखते हैं कि इनको अलग-अलग मान कर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के सभी पहलुओं को समझने तथा उनका वर्णन करने के लिए आधार तथा साधन के रूप में अपनाया जा सकता है। दोनों अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की पुरातन परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा दोनों के सार आदर्शक हैं।

आदर्शवादी दृष्टिकोण के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार के पुराने प्रभावहीन तथा हानिकारक तरीकों को जैसे युद्ध, शक्ति प्रयोग आदि को छोड़ देना चाहिए तथा इसके स्थान पर ज्ञान, तर्क, संवेदनशील तथा आत्म संयम के नये तरीकों तथा साधनों को अपनाना चाहिए। यथार्थवादी दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को शक्ति के लिए संघर्ष मानता है तथा राष्ट्रों के हित के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शक्ति प्रयोग को स्वाभाविक मानता है। इस तरह दोनों दृष्टिकोण परस्पर विरोधी तथा प्रतिस्पर्द्धक दृष्टिकोण हैं। दोनों का अलग-अलग अध्ययन तथा दोनों में विद्यमान विरोध का अध्ययन दोनों के वास्तविक स्वरूप एवं विरोध को स्पष्ट कर सकता है।

आदर्शवाद अथवा आदर्शवादी दृष्टिकोण

(Idealism or the Idealistic Approach)

आदर्शवादी दृष्टिकोण यथार्थवाद के बिल्कुल विपरीत है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण को विकृत, प्रतिक्रियात्मक, मानव-द्वेषी तथा स्वयंसेवी विचार मानता है जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शक्ति-राजनीति को अनुचित तथा अनैतिक तौर पर अस्वाभाविक मानकर इनको अनुचित ठहराता है। आदर्शवाद अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को सुधारने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति से युद्ध, भूख, असमानता, तानाशाही, शक्ति, दबाव तथा हिंसा को समाप्त करने के पक्ष में है। यह शिक्षा, तर्क तथा विज्ञान के द्वारा इन बुराइयों से मुक्त विश्व की स्थापना की सम्भावना को मानता है। बर्टेन्ड रस्सल (Bertrand Russell) ने आदर्शवाद के आशावाद का सार तब दिया जब उसने यह मत दिया कि “मानवीय सुखों से भरपूर एक विश्व का निर्माण मानव शक्ति से प्राप्ति के लिए असम्भव नहीं है।” आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनी शक्ति, समाज में विकास के सामान्य विचार तथा विशेषतया युद्धकालीन अमरीकी नीतियों में निहित उदार आदर्शवाद से प्राप्त करता है। 1919-1994 में संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) आदर्शवाद के सबसे बड़े प्रवक्ता रहे।

यह दृष्टिकोण विश्व को एक आदर्श विश्व बनाने के उद्देश्य को प्राप्त करने के 3लिए साधन के रूप में नैतिकता की वकालत करता है। इसमें यह विश्वास किया जाता है कि आपसी सम्बन्धों में नैतिकता तथा नैतिक मूल्यों को मानकर राज्य न केवल अपना विकास कर सकते हैं बल्कि ये विश्व में से युद्ध, असमानता, हिंसा तथा शक्ति को समाप्त करने में भी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। आदर्शवादी विचारधारा का वर्णन करते हुए कोलोम्बिस तथा वुल्फ लिखते हैं, “आदर्शवादियों के लिए राजनीति एक अच्छी सरकार की कला है न कि सम्भावित सरकार की कला। एक अच्छा राजनीतिक व्यक्ति वह नहीं करता जो सम्भव होता है बल्कि वह करता है जो अच्छा है : वह अपने सह-मानवों को आन्तरिक तथा अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर, अच्छा जीवन तथा सम्मान प्रदान करवाता है।”

आदर्शवाद के प्रमुख लक्षण हैं:

  1. मनुष्य स्वभाव से अच्छा तथा परोपकारी है तथा वह परोपकार कर सकता है।
  2. मानव कल्याण तथा सभ्यता का विकास सभी व्यक्ति करना चाहते हैं।
  3. बुरा मानव स्वभाव बुरे वातावरण तथा बुरी संस्थाओं की उपज होता है।
  4. युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की सबसे बुरी विशेषता है।
  5. युद्ध समाप्त किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए ।
  6. युद्ध की समाप्ति के लिये विश्वव्यापी प्रयत्नों की आवश्यकता है।
  7. अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को उन विश्व व्यवस्थाओं तथा प्रवृत्तियों की समाप्ति करनी चाहिए, जो युद्ध को बढ़ावा देती हैं।
  8. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून का ऐसा विकास किया जाना चाहिए जिससे विश्व जीवन में शान्ति, सुरक्षा, समृद्धि तथा विकास आए तथा युद्ध, भूख और दूसरी बुराइयों की समाप्ति हो।

आदर्शवाद के प्रमुख समर्थक महात्मा गांधी, बर्टेन्ड रसल, वुडरो विल्सन, अल्डस हक्सले, विलियम लैड, रिचर्ड कॉबडन (Richard Cobden), माटुट मीड तथा कई दूसरे हैं।

यथार्थवाद या यथार्थवादी दृष्टिकोण

(Realism or Realistic Approach)

राजनीतिक यथार्थवाद मुख्यता मैक्स वैबर, ई. एच. कार, फ्रेड्रिक शूमेन, निकोलस स्पाइकमैन, रेनहोल्ड नेबुर, आर्नोल्ड वुल्फर्स, केत्रिय थाम्पसन परिभाशित करता है। वह शक्ति-संघर्ष को स्वाभाविक तथा न समाप्त होने वाली अवस्था मानता है। इसे समाप्त तो नहीं किया जा सकता परन्तु शक्ति प्रबन्ध के विभिन्न साधनों को अपना कर इसे युद्ध में परिवर्तित होने से रोका जा सकता है तथा इस प्रकार विश्व शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखा जा सकता है।

  1. आदर्शवादियों के यथार्थवादियों के विरुद्ध तर्क

    यथार्थवादियों की इस धारणा कि शक्ति के लिए संघर्ष स्वाभाविक तथा इसे समाप्त नहीं किया जा सकता, की आदर्शवादी कठोर आलोचना करते हैं। वह यथार्थवादियों के चिरस्थायी झुकाव का खण्डन करते हैं तथा शक्ति-राजनीति को अस्वाभाविक, असामान्य तथा इतिहास का अस्थायी युग मानने की वकालत करते हैं। वे ये विश्वास करते हैं कि व्यवहार में पूर्णतया नैतिक मूल्यों के मानने तथा इच्छुक प्रयत्न द्वारा शक्ति के लिए संघर्ष तथा युद्ध को समाप्त किया जा सकता है। वे कहते हैं कि यथार्थवादियों का राजनीति को ‘सम्भावित की कला मानना, दार्शनिक गलती तथा पापी स्वीकृति पर आधारित है जो किसी के व्यक्तिगत हितों की प्राप्ति के लिये शक्ति प्रयोग को प्राकृतिक मानकर गलत तर्क प्रस्तुत करता है।

आदर्शवादियों के लिए राजनीति का अर्थ है शक्ति का परित्याग, शिक्षा को प्रोत्साहन, मानव कल्याण के लिए विज्ञान का विकास तथा लोकतान्त्रिक तथा प्रबुद्ध नियमों के अधीन सभी राज्यों का सह-अस्तित्व। इस तरह आदर्शवादी यथार्थवाद को अस्वीकार करने की वकालत करते हैं क्योंकि यह युद्ध को उचित मानता है। आदर्शवादी यह दावा करते हैं कि जब युद्ध-कालीन वर्षों में वे अन्तर्राष्ट्रीय, शान्ति तथा विकास के पक्ष में थे तब यथार्थवादी राष्ट्रवाद, युद्ध तथा विनाश के पक्ष में थे। उनके अनुसार यथार्थवादी अन्तार्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नैतिकता की भूमिका को नहीं मानते तथा हितों की प्राप्ति के लिये अनुचित से शक्ति प्रयोग का समर्थन करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि विश्व को युद्ध के अनिष्ट तथा हिंसा से किया जाये न कि इसे युद्ध के अनिष्ट तथा हिंसा में लिप्त रखा जाए।

  1. यथार्थवादियों के आदर्शवादियों के विरुद्ध तर्क

    दूसरी ओर यथार्थवादी आदर्शवाद की जोरदार आलोचना करते हैं तथा उसे खोखला आदर्श-राज्यवाद कहते हैं जिसमें मानवीय स्वभाव तथा राजनीति दोनों की अवहेलना की जाती है। यथार्थवादी यह विश्वास करते हैं कि व्यक्तिगत स्वहित स्वाभाविक भी है एवं उचित भी। बुद्धिमत्ता ही सब कार्यों के लिए सबसे अच्छी मार्गदर्शक हो सकती है और है भी।

नैतिकता महत्वपूर्ण तो है परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्थों में इसका कोई काम कम ही होता है। जब हम व्यावहारिक होते हैं और मानवीय व्यवहार के अनुरूप कार्य करते हैं तब हम राजनीति को समझ सकते हैं एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शक्ति के लिए संघर्ष का संचालन कर सकते हैं। युद्ध की सम्भावनाएं कम की जा सकती हैं, समाप्त नहीं। शक्ति के लिए संघर्ष का विभिन्न उपायों, जैसे कूटनीति, निशस्त्रीकरण, शस्त्रनियन्त्रण आदि, से प्रबन्ध तो किया जा सकता है परन्तु इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

आदर्शवाद की यथार्थवादियों द्वारा अस्वीकृति का मूल्यांकन करते हुए कोलोम्बिस तथा जुल्फ लिखते हैं, “यथार्थवादी यह तर्क देते हैं कि राजनीति में कानूनी, नैतिक तथा आदर्शवादी व्यवहार प्रकृति की शक्तियों के विरुद्ध चलता है तथा परिणामस्वरूप एक ओर तो शान्तिवाद तथा पराजयवाद एवं दूसरी ओर कठोरता, अकेलेपन तथा युद्ध की भावना को बढ़ावा देता है। आवश्यकता तो इस बात की है कि मानवीय स्वभाव की उपेक्षा तो न की जाये बल्कि इसकी शक्तियों के अनुरूप कार्य किया जाए। युद्ध के विरुद्ध शान्ति की सम्भावनाओं को सुदृढ़ किया जाए तथा इसे प्राप्त किया जाए।” “आदर्शवाद का अव्यावहारिक तर्क विश्वसनीय नहीं है।”

  1. आदर्शवाद तथा यथार्थवाद में विवाद का मूल कारण

    आदर्शवाद तथा यथार्थवाद दोनों एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। इस विरोध का केन्द्रीय बिन्दु हैं ‘राजनीति में शक्ति का स्थान’ । यथार्थवादी शक्ति की भूमिका को मानते हैं तथा इसके प्रबन्ध की वकालत करते हैं। आदर्शवादी शक्ति की भूमिका का खण्डन करते हैं जिसको वे अनचाहे तत्व के रूप में मानते हैं तथा जिसे समाप्त किया जा सकता है और जिसे समाप्त करना ही चाहिए। यथार्थवादियों के विपरीत आदर्शवादी समस्त अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार नैतिक मूल्यों को मानने को महत्व देते हैं। यथार्थवादी वर्तमान पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते हैं तथा सभी तत्वों तथा शक्तियों को समझाने की आवश्यकता की वकालत करते हैं, विशेषता राष्ट्रीय हित तथा शक्ति जो राष्ट्रों के मध्य शक्ति के लिए संघर्ष को निश्चित करते हैं। वे यह मानते हैं कि शक्ति प्रबन्ध के साधनों जैसे, शक्ति सन्तुलन, सामूहिक सुरक्षा, निशस्त्रीकरण, कूटनीति आदि का प्रयोग करके युद्ध से दूर रहने के लिए संघर्ष को नियन्त्रित किया जा सकता है।.

  2. आदर्शवाद तथा यथार्थवाद दोनों मत ही अतिवादी हैं

    इस तरह हम पाते हैं कि आदर्शवाद तथा यथार्थवाद में गहरे अन्तर है। निस्सन्देह दोनों चरम सीमा के विरोधी विचार हैं। यथार्थवादी राष्ट्रीय सम्बन्धों में हितों की असंगति तथा शक्ति की प्रमुखता को अनुचित रूप से अधिक मानते हैं। आदर्शवादी बिल्कुल अज्ञानी तथा छिछोरे हैं क्योंकि वे शक्ति की भूमिका की बिल्कुल उपेक्षा करते हैं तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सभी राष्ट्रीय हितों की संगति को पूरी तरह मानते हैं। दोनों में से कोई भी दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय वास्तविकता के सच्चे स्वरूप का उचित प्रतिनिधित्व नहीं करता। राष्ट्रों के राष्ट्रीय हित न तो इतने असंगत हैं जितना यथार्थवादी मानते हैं तथा न ही इतने संगत तथा एकात्मक हैं जितना आदर्शवादी कल्पना करते हैं। शक्ति-संघर्ष का गुणगान जितना यथार्थवाद में किया गया है, वह अनचाहा है पर उसी के साथ शक्ति-संघर्ष को गुजरती अवस्था का कहना, जैसा कि आदर्शवादियों ने कहा है, भी उतनी ही गुमाराह करने वाली बात है। इस तरह हम दोनों, आदर्शवाद तथा यथार्थवाद, में से किसी को भी पूर्ण मान्यता नहीं दे सकते। दोनों में से कोई भी दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के वास्तविक स्वरूप को समझने में पूरी तरह सहायक नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए औपचारिक, अपर्याप्त तथा अमूर्त मान कर इन्हें अस्वीकार करता है। वैज्ञानिकों के इस दोषारोपण की वैधता की ओर अधिक ध्यान न देकर बहुत से विचारक इन दोनों विचारधाराओं को सीमित रूप में मान्यता देते हैं।

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