आर्थिक विकास के प्रतिष्ठित सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

आर्थिक विकास के प्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचनाएं

आर्थिक विकास के प्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचनाएं

सभी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री पूँजी संचय की प्रक्रिया के अन्त में स्थिर अवस्था को देखते हैं। उनके अनुसार जब लाभ एक बार घटना प्रारम्भ होता है तो यह क्रम लगातार चलता रहता जब तक कि अर्थव्यवस्था में लाभ शून्य नहीं हो जाते, जनसंख्या में वृद्धि रुक नहीं जाती, पूँजी संचय बन्द नहीं हो जाता और मजदूरी दर निर्वाह-स्तर पर पहुँच नहीं जाती। माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि तथा खाद्य पूर्ति के बीच एक निराले परस्पर सम्बन्ध की स्थापना की। उनके अनुसार यदि जनसंख्या की वृद्धि अनियंत्रित छोड़ दी जाये तो वह पूँजी की वृद्धि और परिणामस्वरूप निर्वाह के साधनों को पीछे छोड़ जायेगी। रिकार्डो तथा माल्थस दोनों यह मानते थे कि प्रतिफल के नियम के कार्यकरण के माध्यम से बढ़ती जनसंख्या तथा घटती पूँजी वृद्धि आर्थिक विकास में चरम बाधाएँ हैं। इससे ही अर्थव्यवस्था में स्थिर अवस्था आती है।

पूँजी-संचय आर्थिक विकास की कुंजी

सभी क्लासिकी अर्थशास्त्री पूँजी संचय को आर्थिक विकास की कुंजी मानते हैं। इसके लिये वे अधिक बचत करने पर जोर देते हैं। वे केवल पूँजीपति तथा भूमिपति को ही बचत करने के योग्य समझते हैं। श्रमिक वर्ग बचत करने में असमर्थ समझा जाता है क्योंकि उसे निर्वाह स्तर के बराबर ही मजदूरी मिलती है।

लाभ निवेश की प्रेरणा-

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार लाभ निवेश को प्रेरित करता है। लाभ जितने अधिक होंगे पूँजी संचय तथा निवेश उतना ही होगा।

लाभ घटने की प्रवृत्ति-

लाभ लगातार बढ़ते नहीं रहते बल्कि पूँजीपतियों में जब अधिक पूँजी संचय के लिये प्रतियोगिता बढ़ती है तो लाभ घटने प्रारम्भ हो जाते हैं। स्मिथ के अनुसार इसका कारण पूँजीपतियों में प्रतियोगिता से मजदूरी का बढ़ना है जबकि रिकार्डो के अनुसार अनाज की कीमत बढ़ने से जब मजदूरी तथा लगान बढ़ते हैं तो लाभों में कमी आती है।

स्थिर अवस्था-

सभी क्लासिकी अर्थशास्त्री पूँजी-संचय की प्रक्रिया के अन्त में स्थिर अवस्था को देखते हैं। उनके अनुसार जब लाभ एक बार घटना प्रारम्भ करते हैं तो यह क्रम लगातार चलता रहता है जब तक कि अर्थव्यवस्था में लाभ शून्य नहीं हो जाते, जनसंख्या में वृद्धि रुक नहीं जाती, पूँजी संचय बन्द नहीं हो जाता और मजदूरी दर निर्वाह-स्तर पर पहुँच नहीं जाती। माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि तथा खाद्य पूर्ति के बीच एक निराले परस्पर सम्बन्ध की स्थापना की है। उनके अनुसार यदि जनसंख्या की वृद्धि अनियंत्रित छोड़ दी जाये तो वह पूँजी की वृद्धि और परिणामस्वरूप निर्वाह के साधनों को पीछे छोड़ जायेगी। रिकार्डो तथा माल्थस दोनों यह मानते थे कि घटते प्रतिफल के नियम के कार्यकरण के माध्यम से बढ़ती जनसंख्या तथा घटती पूँजी वृद्वि आर्थिक विकास में चरम बाधाएँ हैं। इनसे ही अर्थव्यवस्था में स्थिर अवस्था आती है। यही विचार जे.एस. मिल का था जो यह बताता है कि कृषि में तकनीकी सुधारों के अभाव में तथा पूँजी संचय की दर से जनसंख्या की वृद्धि दर अधिक होने पर लाभ की दर कम होनी शुरू हो जाती है तथा अर्थव्यवस्था अन्त में स्थिर अवस्था में पहुँच जाती है। परन्तु वे स्थिर अवस्था का स्वागत करते हैं क्योंकि इससे आय वितरण में सुधार होता है और श्रमिकों को अधिक मजदूरी प्राप्त होती है। परन्तु ऐसा कार्यकारी जनसंख्या की संख्या में वृद्धि को नियंत्रित करके ही सम्भव है।

आर्थिक विकास के प्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचना –

आर्थिक विकास का सरल तथा सामान्य क्लासिकी सिद्धान्त आलोचना से मुक्त नहीं है –

  1. मध्यम वर्ग की उपेक्षा

    समस्त क्लासिकी विश्लेषण ब्रिटेन तथा यूरोप के अन्य भागों में प्रवर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर आधारित था। इसने पूँजीपतियों तथा भूमिपतियों और श्रमिकों के बीच समाज के एक कठोर विभाजन का अस्तित्व मान लिया था। इसने मध्यम वर्ग के कृत्य की उपेक्षा की जो आर्थिक वृद्धि के लिये आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करता है। वे यह नहीं समझ पाये कि उन्नत समाज में सम्पत्ति-स्वामी नहीं बल्कि आय प्राप्तकर्ता बचत के प्रमुख साधन होते हैं।

  2. सार्वजनिक क्षेत्र की अवहेलना

    प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के लिये पूर्ण प्रतियोगिता तथा निजी सम्पत्ति की संस्था आर्थिक विकास के लिये अनिवार्य मान्यताएँ हैं। परन्तु वे उस महत्वपूर्ण कृत्य को अनुभव करने में असमर्थ रहे, जो आधुनिक कार्यों में सार्वजनिक क्षेत्र ने पूँजी संचय का त्वरण करने में धारण किया है।

  3. प्रौद्योगिकी को कम महत्व

    विकास में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का कार्य क्लासिकी सिद्धान्त की एक महत्वपूर्ण कमी है। अतिरिक्त पूँजी तथा बड़े हुए श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप उत्पादकता बढ़ी। औद्योगिक क्रान्ति के महान आविष्कार असामान्य समझे गये। विकसित राष्ट्रों के तीव्र आर्थिक विकास पर विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का जो महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, उसे समझने में प्रतिष्ठित सिद्धान्त असमर्थ रहा।

  4. अवास्तविक नियम

    रिकार्डो तथा माल्थस जैसे क्लासिकी अर्थशास्त्रियों का मत है कि “पूँजीवाद विकास का अन्तिम परिणाम स्थिर अवस्था है।” दो मान्यताओं पर आधारित है : घटते प्रतिफलों का भूमि पर लागू होना तथा माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त। उन्नत राष्ट्रों में कृषि उत्पादन की तीव्र वृद्धि ने सिद्ध कर दिया है कि क्लासिकी अर्थशास्त्रियों ने भूमि के सम्बन्ध में घटते प्रतिफलों के निवारण में प्रौद्योगिकीय प्रगति की क्षमताओं का कम मूल्यांकन किया है। इसी प्रकार पश्चिमी दुनिया में प्रवर्तमान जनसंख्या प्रवृत्तियों ने माल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त को गलत सिद्ध कर दिया है।

  5. मजदूरी तथा लाभ की गलत धारणाएँ

    मजदूरी निर्वाह-स्तर पर ही नहीं रही है। मुद्रा-मजदूरी में निरन्तर वृद्धि होती रही है जबकि लाभ की दरों में तदनुरूप कमी नहीं आयी और परिपक्व अर्थव्यवस्थाएँ स्थिर आर्थिक अवस्था को नहीं पहुँची हैं।

  6. अवास्तविक विकास प्रक्रिया

    प्रतिष्ठित सिद्धान्त ने ऐसी स्थैतिक अवस्था का रूप धारण कर लिया जिसमें परिवर्तन तो था परन्तु एक सन्तुलन बिन्दु के गिर्द, जिसमें प्रगति वृक्ष की तरह नियमित, एकरूप एवं निरन्तर थी पर आर्थिक विकास की प्रक्रिया की यह व्याख्या सन्तोषजनक नहीं है क्योंकि जैसाकि आजकल समझा जाता है, आर्थिक वृद्धि एकरूप तथा निरन्तर नहीं बल्कि रुक-रुक कर होती है।

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