आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक

आर्थिक विकास के निर्धारक तत्व

आर्थिक विकास के निर्धारक तत्व

(Determinants of Economic Development)

प्रो. मायर एवं बाल्डविन के अनुसार-

  • आधारभूत संसाधनों की उपलब्धता में परिवर्तन,
  • उत्पादित माल की माँग संरचना में परिवर्तन।

प्रो. हैरोड एवं डोमर के अनुसार –

  • पूँजी-उत्पादन अनुपात,
  • बचत तथा आय का अनुपात,
  • औद्योगिक विकास की दर,
  • आबादी के बढ़ने की दर ।

प्रो. रिचार्ड टी. गिल के अनुसार –

  • प्रौद्योगिकी विकास व पूँजी संचय,
  • आबादी,
  • साधनों में लोच,
  • प्राकृतिक संसाधन

प्रो. रोस्टोव के अनुसार –

  • वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग,
  • नव-प्रवर्तनों का प्रयोग,
  • भौतिक प्रगति की प्रवृत्ति,
  • सन्तानोत्पत्ति की प्रवृत्ति आदि ।

आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले तत्व प्राथमिक तथा पूरक हो सकते हैं।

श्रीमती जॉन रोबिन्सन के अनुसार,आर्थिक विकास एक स्वतः आरम्भ होने वाली प्रक्रिया है। इसलिए प्राथमिक तत्वों के विपरीत अनुपूरक तत्वों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि आर्थिक विकास को अन्तिम रूप देने का उत्तरदायित्व इन्हीं तत्वों पर होता है।”

आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले आर्थिक कारक

(Economic Factors Determining Economic Development)

ये अग्रवत वर्णित किये जा सकते हैं –

  1. प्राकृतिक साधनों की उपलब्धता- 

    रिचार्ड टी. गिल के अनुसार, “जनसंख्या एवं श्रम की आपूर्ति की भाँति प्राकृतिक साधन भी एक देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उपजाऊ भूमि और जल की कमी में कृषि का विधिवत् विकास नहीं हो पाता। लोहा, कोयला व अन्य खनिज सम्पदा न होने पर तीव्र औद्योगीकरण का स्वन अधूरा ही बना रहता है। जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में प्रतिकूलता के कारण आर्थिक क्रियाओं के विस्तार से अवरोध उत्पन्न होते हैं। वास्तव में, प्राकृतिक साधनों का किसी देश के आर्थिक विकास को सीमित करने अथवा प्रोत्साहित करने में एक निर्णायक स्थान होता है।’

प्रो. लेविस के अनुसार, “प्राकृतिक साधन देश के विकास की दिशा निर्धारित करते हैं। उनकी चुनौती को स्वीकार करना न करना मानव मस्तिष्क के ऊपर है।’

प्रो. गिल के शब्दों में, “जनसंख्या बढ़ सकती है, उपकरणों, मशीनों तथा फैक्ट्रियों का निर्माण किया जा सकता है, किन्तु हमें प्रकृति द्वारा दिये गये प्राकृतिक उपहार (साधन) सदैव के लिए सीमित व निश्चित होते हैं।’

  1. मानवीय संसाधन-

    रिचार्ड टी. गिल के अनुसार, “आर्थिक विकास का यान्त्रिक प्रक्रिया मात्र ही नहीं, वरन् अन्तिम रूप से यह मानवीय उपक्रम है। अन्य मानवीय उपक्रमों की भाँति इसका फल सही अर्थों में इसको संचालित करने वाले जन-समुदायों की कुशलता, गुणों व प्रकृतियों पर निर्भर करता है।”

ह्निपिल (Whipple) के शब्दों में, “किसी देश की वास्तविक सम्पत्ति उस देश की भूमि या पानी में नहीं, वनों या खानों में नहीं, पक्षियों या पशुओं के झुण्डों में नहीं और न ही डालरों के ढेर में आँकी जाती है बल्कि उस देश के स्वस्थ सम्पन्न व सुखी पुरुषों, स्त्रियों व बच्चों में निहित है।’

  1. पूँजी निर्माण या पूँजी संचय –

    प्रो. रेगनर नर्कसे के अनुसार, “पूँजी निर्माण का अर्थ यह है कि समाज़ अपनी वर्तमान उत्पादन क्रिया को उपभोग की तत्कालिक आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति हेतु उपयोग नहीं करता, वरन् इसके एक भाग को पूँजीगत वस्तुओं जैसे यंत्र एवं उपकरण, मशीनों एवं यातायात सुविधाओं, लाण्ट व सामान आदि – वास्तविक पूँजी के समस्त रूप, जो उत्पादक प्रयत्नों की कुशलता को बड़ी मात्रा में बढ़ा सकते हैं, के निर्माण में लगाता है।’

प्रो. रेगनर नर्कसे आगे कहते हैं कि “पूँजी निर्माण आर्थिक विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता है।’

  1. उद्यमिता

    पाले ब्राजन के अनुसार, “न तो आविष्कारक की योग्यता और न केवल आविष्कार ही आर्थिक विकास को सम्भव बनाते हैं, अपितु यह तो उन्हें कार्यरूप में परिणित करने की प्रबल इच्छा व जोखिम उठाने की क्षमता पर निर्भर है।”

गिल के अनुसार, “तकनीकी ज्ञान आर्थिक दृष्टि से तभी उपयोगी हो सकता है, जबकि उसे नव-प्रवर्तन के रूप में प्रयोग किया जाए और जिसकी पहल समाज के उद्यमी वर्ग द्वारा की जाय।”

  1. प्रौद्योगिकी-

    प्रो. रिआचर्ड टी. गिल के शब्दों में, “आर्थिक विकास अपने लिए महत्वपूर्ण पौष्टिकता, वस्तुतः नये विचारों, तकनीकों, आविष्कारों व उत्पादन विधियों के स्रोतों से प्राप्त करता है, जिसके अभाव में अन्य साधन कितने भी विकसित क्यों न हों, आर्थिक विकास को प्राप्त करना असम्भव ही बना रहता है।’

डब्ल्यू. ए. एल्टिस के विचारानुसार, “तकनीकी ज्ञान की प्राप्ति की प्रगति को एक ऐसे नये ज्ञान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके कारण या तो वर्तमान वस्तुएँ कम लागत पर उत्पन्न की जा सकें अथवा जिसके फलस्वरूप नई वस्तुओं का उत्पादन सम्भव हो सके।”

  1. विदेशी पूँजी –

    विदेशी पूँजी का आयात करके अल्पविकसित राष्ट्र पूँजी की कमी को दूर कर सकते हैं।

  2. स्थाई शासन या सरकार-

    प्रो. डब्ल्यू. आर्थर लुईस के अनुसार, “कोई भी देश राजकीय सहयोग व उसका सक्रिय प्रोत्साहन पायें बिना, आज तक आर्थिक विकास नहीं कर सका है। यह कथन आज भी अपने में सत्य है और भविष्य में भी सत्य रहना और अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह तो विशेष रूप से कटु सत्य माना जायेगा।”

आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले अनार्थिक तत्व

(Non-economic Factor Affecting Economic Development)

प्रो. केयर्नक्रास के अनुसार, “विकास न तो मुद्रा का बाहुल्य होने की बात है और न ही पूर्णतया आर्थिक घटना है। इसके अन्तर्गत सामाजिक व्यवहार के सभी पक्ष, विधि तथा व्यवस्था की स्थापना, व्यापार सम्बन्धी लेन-देन, राजस्व अधिकारियों के लेन-देन सहित, परिवार के सम्बन्ध, साक्षरता, यान्त्रिक युक्तियों से परिचय आदि आते हैं।’

आर. नर्क्स के अनुसार, “आर्थिक विकास एक जटिल प्रक्रिया है और उस पर केवल आर्थिक घटकों का ही नहीं बल्कि अनार्थिक घटकों (राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आदि) का भी प्रभाव पड़ता है।’

गुर्नार मिर्डल के अनुसार, “वास्तविक समस्यायें कभी भी केवल आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व राजनैतिक नहीं होती। अविकसित एवं विकसित सिद्धान्त, जोकि आर्थिक घटकों पर निर्भर हों उचित कारणों से अवास्तविक माने जाते हैं। अतः वे प्रमुख नहीं होते।’

लुईस के अनुसार, “सरकार का व्यवहार आर्थिक क्रियाओं को प्रोत्साहित अथवा हतोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।’

आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले अनार्थिक तत्व अग्रवत वर्णित हैं

  1. सामाजिक कारक –

    प्रो. आर. नर्से के शब्दों में, “आर्थिक विकास का मानवीय मूल्यों, सामाजिक प्रवृत्तियों, राजनीतिक दशाओं तथा ऐतिहासिक घटनाओं से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।

मायर एवं बाल्डविन के अनुसार, “आर्थिक विकास के लिए मनोवैज्ञानिक व सामाजिक आवश्यकताओं का होना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार आर्थिक आवश्यकताओं का।”

संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों के अनुसार, “आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि लोगों में प्रगति की प्रबल अच्छा हो, वे उसके लिए हर सम्भव त्याग करने को तत्पर हों, वे अपने आपको नये विचारों के अनुकूल ढालने के लिए जागरूक हों और उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व वैधानिक संस्थायें इन इच्छाओं को कार्यरूप में परिणित करने में सहायक हों।

  1. धार्मिक कारक –

    धार्मिक तत्व भी आर्थिक विकास पर प्रभाव डालते हैं।

  2. राजनीतिक व प्रशासनिक कारक

    प्रो. लेविस के अनुसार, “सरकार का व्यवहार आर्थिक क्रियाओं के प्रोत्साहन व हतोत्साहिन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

जैकब वाइनर के अनुसार, “यह अर्थशास्त्री का दायित्व है कि वह यह अनुभव एवं घोषित कर कि केवल अधिक पूँजी, या जमीन में अधिक कोयला से आर्थिक विकास नहीं हो सकता बल्कि अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, अच्छी प्रेरणा और राजनीतिक एवं सामाजिक संगठन से प्रबन्ध में प्रभावशीलता एवं मानसिक प्रयासों द्वारा भी प्रयास करना होगा।’

ए. के. केयर्नक्रास के शब्दों में, “किसी देश में विकास केवल आर्थिक शक्तियों पर ही निर्भर नहीं करता और कोई देश जितना विकसित होगा, यह बात ‘तनी ही सत्य होंगी। मनुष्यों की मनः स्थितियाँ, सामाजिक संस्थायें, विचारों की अभिव्यक्ति तथा विकास के अवसरों की उपलब्धि भी आर्थिक विकास की कुन्जी है । “

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