आर्थिक विकास (Economic Development)

आर्थिक विकास

आर्थिक विकास

विकास शब्द के बहुत से समानार्थी शब्द हैं – वृद्धि, प्रगति, समृद्धि आदि। सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में इनमें कोई अन्तर नहीं है। वह उदारता से इन शब्दों को समानार्थी के रूप में ही प्रयुक्त करता है।

आर्थिक विकास की परिभाषा 

प्रो. यंगमन के विचारानुसार, “आर्थिक प्रगति से आशय किसी समाज से सम्बन्धित आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की शक्ति में वृद्धि करना है।”

प्रो. विलियम्सन के अनुसार, “आर्थिक विकास अथवा वृद्धि से उस प्रक्रिया का बोध होता है। जिसके द्वारा किसी देश अथवा प्रदेश के निवासी उपलब्ध साधनों का उपयोग प्रति व्यक्ति वस्तुओं के उत्पादन में, निरन्तर वृद्धि के लिए करते हैं।”

प्रो. डी. बाइट सिंह के अनुसार, “आर्थिक वृद्धि से अभिप्राय, एक देश: समाज में होने वाले उस परिवर्तन से लगाया जाता है जो अल्पविकसित स्तर से उच्च आर्थिक उपलब्धियों की ओर अग्रसर होता है। “

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि जहाँ मायर एवं बाल्डविन ने आर्थिक विकास में वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने की बात कही है कहीं विलियम्सन तथा लुईस द्वारा प्रति व्यक्ति उत्पादन अथवा आय में वृद्धि का समर्थन किया गया है। किन्डलबर्गर ने भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाते हुए कहा है, “आर्थिक वृद्धि, विकास की ऐसी प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप प्रति व्यक्ति आय तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।”

आर्थिक विकास एक सतत् प्रक्रिया है, जिसका अर्थ कुछ विशेष प्रकार की शक्तियों के कार्यशील रहने के रूप में लगाया जाता है। इन शक्तियों के एक अवधि तक निरन्तर कार्यशील रहने के कारण आर्थिक घटकों में सदैव परिवर्तन व बिवर्तन होते रहते हैं। यद्यपि इस प्रक्रिया के फलस्वरूप किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन तो होता है, किन्तु इस क्रिया का सामान्य परिणाम राष्ट्रीय आय में वृद्धि होना है।

उपर्युक्त तर्कों के आधार पर व्यावहारिक एवं उचित यह परिभाषा होगी – “आर्थिक विकास या वृद्धि एक ऐसी दीर्घकालीन प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्थागत एवं संरचनात्मक लाभकारी परिवर्तन होते हैं, जिससे व्यक्ति व समाज समृद्धिं या खुशहाली अर्थात् निम्न से उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त करता है।”

अतः निष्कर्ष यह हैं कि राष्ट्रीय आय में निरंतर वृद्धि एवं आय वितरण में सुधार के साथ-साथ देश में अन्य आवश्यक सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं संस्थागत परिवर्तन इस तरह से हों ताकि इन सब आर्थिक सामाजिक परिवर्तनों के प्रभाव से प्रतिव्यक्ति आय भी निरंतर बढ़ती रहे। व्यापारिक दृष्टि से यही आर्थिक विकास है।

आर्थिक विकास के मापदण्ड

आर्थिक विकास के मापदण्डों की विवेचना इस प्रकार है-

  1. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि –

    आर्थिक विकास का प्रमुख मापदण्ड राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने से आर्थिक विकास होता है। कुल राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर किसी भी राष्ट्र की जनता की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की शक्ति बढ़ जाती है। किन्तु जनसंख्या में होने वाली वृद्धि का प्रभाव देखने के लिए प्रति व्यक्ति आय इससे भी बेहतर उपाय है। प्रति व्यक्ति आय में होने वाली आर्थिक प्रगति की उचित माप है और जिस देश में या जिस समय में प्रति व्यक्ति आय जितनी अधिक है, उस देश का विकास उतना ही अधिक विकसित है। आय में होने वाली यह वृद्धि मौद्रिक इकाइयों में भी प्रकट की सकती है और वृद्धि की दर के रूप में भी। आर्थिक विकास की स्थिति की तुलना के लिए प्रथम पद्धति राष्ट्रीय आय में वृद्धि की गणना उपयोगी है। आर्थिक विकास की गति के अध्ययन के लिए दूसरी पद्धति प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की गणना उपयोगी है।

  2. पूँजी निर्माण की दर-

    आर्थिक विकास की गति की माप का सर्वश्रेष्ठ आधार पूँजी निर्माण की दर को माना जाता है। पूँजी निर्माण की दर के अंतर्गत हम उस अनुपात का अध्ययन करते हैं जिनमें कुल पूँजी में वृद्धि होती है। राष्ट्रीय आय में से हम कितना बचाकर और आय उत्पन्न करने में विनियोग कर सकते हैं। हमारी इस क्षमता पर विकास की संभावनाएं आधारित होती हैं। जो देश जितना ज्यादा विनियोग कर सकता है, वह उतना ही अधिक विकास कर सकता है। इस प्रकार पूँजी निर्माण ही वास्तव में आर्थिक विकास का पूँजीवादी मतलब है और प्रत्येक देश को आर्थिक विकास की प्रतियोगिता में पूँजी निर्माण पर ज्यादा जोर देना चाहिए। साधारणतः पूँजी निर्माण की प्रक्रिया और आर्थिक विकास की प्रक्रिया एक ही होती है और आर्थिक विकास प्रक्रिया में पूँजी निर्माण की प्रकिया मुख्य चालक का कार्य प्करती है। अविकसित एवं अल्पविकसित राष्ट्र में उपभोग की प्रवृत्ति बहुत अधिक होती है। परिणामतः विनियोग की प्रकृति के कमजोर होने के कारण पूँजी निर्माण बहुत कम हो पाता है। दूसरी ओर प्राथमिक व्यवसायों की प्रमुखता और शैक्षिक विकास के अभाव में रूढ़िगत अवरोधों के कारण भी पूँजी निर्माण नहीं हो पाता इसके विपरीत विकसित राष्ट्रों में पूँजी निर्माण की दर काफी अधिक होती है। क्योंकि एक तो उपभोग प्रवृत्ति कम होती है, दूसरी पूँजी निर्माण के अवसर सुलभ होते हैं।

  3. आय का वितरण-

    यदि वितरण सभी वर्गों में न हो सके आर्थिक आय से राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो, किन्तु उसका न्यायोचित उस स्थिति को वास्तव में विकास की स्थिति नहीं कहा जा सकता। अतः आर्थिक विकास के लिए यह भी आवश्यक है कि आय के वितरण के प्रश्न को भी ध्यान में रखा जाय। किंडलबर्गर ने अपनी पुस्तक आर्थिक विकास के सन्दर्भ में कुवैत का उदाहरण देकर इस बात को सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया है कि कुवैत को हम प्रतिव्यक्ति आय के आधार पर पूर्णतः विकसित राष्ट्र नहीं मान सकते, क्योंकि वहाँ के जनसमूह अत्यन्त दरिद्रता का जीवन बिता रहे हैं।

अन्त में मायर एवं बाल्डविन के शब्दों में कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास की व्याख्या वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि तथा सम्पूर्ण वृद्धि से संबंधित सभी परिवर्तनों पर केन्द्रित है। यद्यपि प्रतिव्यक्ति उत्पादन में वृद्धि होना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण सफलता है तथापि बिना अन्य बातों पर विचार किये हुए हम इसकी समानता आर्थिक लाभ में होने वाली वृद्धि से नहीं कर सकते। सामाजिक कल्याण की बात ही जाने दीजिये। विकास की आदर्शतम दर का ठीक-ठीक अनुमान लगाने के लिए हमें आय का वितरण, उत्पत्ति का स्वरूप लोगों की रुचियों, वास्तविक लागतों के संबंध में मान्यताएं करनी पड़ेगी।

अल्पविकसित देशों की विशेषतायें

अल्पविकसित देशों की विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

  1. कृषि की प्रधानता –

    अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से प्राथमिक वस्तु उत्पादक होता हैं। इन देशों में अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं कृषि से सम्बद्ध क्रियाओं में लगी रहती है। अल्पविकसित देशों में राष्ट्रीय आय में योगदान, कृषि क्षेत्र का अधिक होता है अतः कृषि तथा प्राथमिक उत्पादन की प्रधानता अल्पविकसित देशों का एक लक्षण है।

  2. पूँजी का अभाव व पूँजी निर्माण की धीमी दर-

    पूँजी की कमी अल्पविकास युक्त देशों में उत्पादकता होने का कारण और परिणाम दोनों है। इन देशों में पूँजी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता विकास प्राप्त देशों की तुलना में बहुत कम है। इसीलिए इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अनिवार्य रूप से उत्पादकता के निम्न स्तर पर काम करना पड़ता है। जनसंख्या अधिक होने के कारण इन देशों में निम्न आय स्तर होता है, जो भावी विकास के लिए वांछित विनियोग दर से पूरी नहीं कर पाते जिससे पूँजी निर्माण व आर्थिक विकास का काम रुक जाता है।

  3. आय का असामान्य वितरण –

    अल्पविकसित देशों में आय का जनसंख्या के बीच वितरण असामान्य ढंग से होता है। राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग अल्पसंख्यक अमीरों को और जनसंख्या के एक बड़े भाग जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, को कुल राष्ट्रीय आय का थोड़ा ही भाग मिल पाता है। प्रो0 महोलनोबीस के अनुसार, भारत में देश की 5 प्रतिशत जनसंख्या को राष्ट्रीय आय का 3 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है। 1 प्रतिशत जनसंख्या को 11 प्रतिशत तथा 5 प्रतिशत निर्धन जनसंख्या को राष्ट्रीय आय का मात्र 10 प्रतिशत भाग ही मिल पाता है। धीरे-धीरे ये असमानताएं और बढ़ती जा रही हैं। जब तक आय व धन की असमानताएं बनी रहेंगी तब तक विश्व की विकसित, अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएं एक धरातल पर नहीं ला जा सकती है।

  4. तकनीकी का अल्पविकास –

    प्रो० कुटनेटस के मतानुसार इन देशों में तकनीकी विकास के चार महत्त्वपूर्ण चरणों, वैज्ञानिक खोज, आविष्कार, नव प्रवर्तन तथा सुधार का प्रायः अभाव होता है। तकनीकी पिछड़ेपन के सम्भवतः तीन कारण दृष्टिगत होते हैं- (i) नीची मजदूरी के बावजूद उत्पादन लागत ऊँची होना, (ii) उत्पादन का निम्न स्तर, (iii) उत्पादन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता जो कि उनके पास नहीं होती।

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