समकालीन समय में भारत-अमरीकी सम्बन्धों की प्रकृति

भारत-अमरीकी सम्बन्धों की प्रकृति (समकालीन समय में)

1996-98 के दौरान भारत-अमरीकी सम्बन्धों में जो मधुरता तथा विकास उत्पन्न होने की प्रक्रिया उत्पन्न हुई उसे एक बड़ा धक्का उस समय लगा जब 11 तथा 13 मई, 1998 को भारत ने पाँच (3+2) परमाणु परीक्षण करने के बाद अपने को परमाणु शस्त्र धारक देश घोषित कर दिया तथा अमरीकी प्रशासन ने इसकी न केवल कड़ी आलोचना की अपितु इस के साथ ही भारत के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्धों को लगाने की घोषणा भी की। अमरीका तथा कुछ अन्य देशों ने मिल कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् से भारत की नई परमाणु नीति तथा शस्त्रों के विरुद्ध एक प्रस्ताव भी पारित करवाया तथा भारत को अपना परमाणु शस्त्र कार्यक्रम समाप्त कर CTBT पर एकदम हस्ताक्षर करने के लिए कहा। अमरीका ने यह माना कि भारतीय परमाणु परीक्षण पाकिस्तान को परमाणु परीक्षण करने के लिए प्रेरित करेंगे तथा दक्षिण एशिया में एक भयंकर और हानिकारक परमाणु दौड़ आरम्भ हो जाएगी। जब भारत के परमाणु परीक्षणों के 15 दिन बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण कर परमाणु शस्त्र प्राप्त करने की घोषणा की तो अमरीका का रुख और भी कड़ा हो गया तथा भारत-अमरीकी सम्बन्ध एक प्रकार से गतिहीन हो गये।

भारत ने अपनी नई परमाणु नीति के विरुद्ध अमरीकी प्रतिक्रिया को सहज रूप में लिया, अपने परमाणु-शस्त्र कार्यक्रम को जारी रखने का निर्णय लिया तथा CTBT पर हस्ताक्षर न करने की नीति अपनाई रखी। परमाणु अमरीका के साथ सम्बन्धों के महत्त्व तथा आवश्यकता को देखते हुए उससे उच्चस्तरीय वार्तालाप आरम्भ करने का निर्णय लिया। 12 जून, 1998 को श्री जसवंत सिंह (जो बाद में विदेश मन्त्री मन गये) तथा अमरीकी उप विदेश सचिव श्री स्ट्रोव टालवोट के मध्य उच्चस्तरीय वार्तालाप का पहला दौर हुआ। जून 1998 से जनवरी 1999 के मध्य सुरक्षा, परमाणु अप्रसार तथा निःशस्त्रीकरण के मुद्दों पर वार्तालाप के आठ दौर हुए।

दोनों देश परमाणु मुद्दे पर अपने मतभेदों को कुछ कम करने में सफल हुए। मार्च 1999 में अमरीकी कांग्रेस के एक मण्डल ने भारत का दौरा किया तथा भारत-अमरीकी सहयोग सम्भावनाओं पर भारतीय नेताओं के साथ बातचीत की। परन्तु अप्रैल 1999 में बी० जे० पी० नेतृत्व वाली साझी सरकार लोकसभा में विशवास मत प्राप्त न कर सकी तथा एक कार्यवाहक सरकार बन गई। इससे भारत-अमरीकी वार्तालाप में कुछ शिथिलता आ गई। लेकिन इस के बाद कुछ महीनों में अमरीका ने भारत के विरुद्ध उत्तर-पोखरां काल के आर्थिक प्रतिबन्धों को कुछ ढीला कर दिया।

मई-जून 1999 में भारत तथा पाकिस्तान के मध्य भड़के कारगिल युद्ध के समय अमरीका ने एक वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाया। इसने पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा के उल्लंघन से वापस हटने को कहा, दोनों देशों से नियंत्रण रेखा का सम्मान करने को कहा तथा दोनों देशों में वार्तालाप आरम्भ करने को कहा। इसने पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा के उल्लंघन करने वालों को वापस बुलाने के लिए कहा। भारत के सन्तुलित तथा संयम की प्रशंसा भी की। पाकिस्तान द्वारा कारगिल क्षेत्र से घुसपैठ समाप्त करवाने में अमरीका ने एक अच्छी भूमिका निभाई। इसने भारत-अमरीकी सम्बन्धों के वातावरण को और भी सकारात्मक तथा सुखद बना दिया।

25 जुलाई, 1999 को विदेश मन्त्री जसवंत सिंह तथा अमरीकी विदेश सचिव मैडम अल्ब्राईट के मध्य सिंगापुर में एक बैठक हुई तथा इसने दोनों देशों के सम्बन्धों में गुणात्मक परिवर्तन किया। दोनों देशों ने एक दूसरे विचारों को अधिक अच्छी प्रकार से समझा। CTBT पर मतभेद के बावजूद अमरीका ने कश्मीर मुद्दे पर एक अच्छी सोच को प्रकट किया। यह बैठक उद्देश्यपूर्ण, मित्रतापूर्ण तथा उत्पादक रही।

जुलाई-अगस्त 1999 में भारत-अमरीकी सम्बन्धों के वातावरण में और सुधार हुआ। भारत ने कारगिल युद्ध के मुद्दे पर अमरीकी नीति की प्रशंसा की क्योंकि इसमें पाकिस्तान को कारगिल घुसपैठ समाप्त करने के लिये कहा गया था। अमरीकी कांग्रेस में पेश भारत विरोधी दो संशोधनों गुडलिंग संशोधन तथा बर्टन संशोधन के रदद किये जाने को भी भारतीय सरकार ने सराहा तथा इसे शुभ संकेत माना। ऐसा स्पष्ट दिखाई दिया कि चिर-परिचित भारत विरोधी अमरीकी रवैया अब परिवर्तित हो रहा था तथा अमरीका भारत को अब महत्त्व दे रहा था।सितम्बर 1999 में अफगानिस्तान संकट पर भारत-अमरीका वार्तालाप हुआ तथा दोनों देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के उभर रहे संकट पर चिंता व्यक्त की तथा इस के विरुद्ध सहयोगी प्रयासों की आवश्यकता को स्वीकार किया।

भारत में 13वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् 13 अक्तूबर, 1999 को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन की सरकार का गठन हुआ। यह भारत में लोकतन्त्र की सफलता का एक बड़ा प्रतीक माना गया तथा अमरीका ने इस पर प्रसन्नता व्यक्त की। इसके एक दिन पहले पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सरकार का गला दबाकर सैनिक शासन की स्थापना हुई थी जिसकी अमरीका ने तीखी आलोचना की। अमरीका ने भारत में लोकतन्त्र की सफल प्रक्रिया, बढ़ती आर्थिक प्रगति तथा तकनीकी विकास विशेषकर सूचना तकनीक विकास को देखते हुए भारत के साथ सम्बन्धों को अधिक महत्त्व देने की नीति अपनाई। दिसम्बर 1999 में जब भारतीय वायु सेना का एक हवाई जहाज IC-814 को इस्लामिक आतंकवादियों ने अगवा कर कन्धार (अफगानिस्तान) में उतार लिया तो अमरीका ने इसकी कड़े शब्दों में निन्दा की तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की समाप्ति के पक्ष में कार्य करने की नीति को दोहराया। भारत तथा अमरीका ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की समाप्ति के लिए सहयोग करने का निर्णय किया तथा इससे भी दोनों देशों के सम्बन्ध दृढ़ हुए।

भारत तथा अमरीका के सम्बन्धों के वातावरण में जो सकारात्मक परिवर्तन जून 1998 से दिसम्बर 1999 के दौरान आये, उसके आधार पर अमरीकी राष्ट्रपति ने 21वीं शताब्दी के तीसरे महीने में ही भारत की यात्रा करने का निर्णय किया। इस यात्रा ने निश्चय ही भारत-अमरीकी सम्बन्धों को एक उत्तम, आवश्यक तथा अत्यन्त सहयोगी स्वरूप देने का कार्य किया और नई शताब्दी में भारत-अमरीकी सम्बन्ध तेजी से विकसित होने लगे।

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अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा तथा भारत-अमरीकी सम्बन्ध (मार्च 2000)

मार्च 2000 में भारत-अमरीकी सम्बन्धों में एक बड़ी प्रगति तब हुई जब अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाँच दिन की भारत यात्रा की तथा भारतीय नेताओं से उच्चस्तरीय वार्तालाप किया। इस अवसर पर दोनों देशों ने अपने सम्बन्धों के भविष्य के प्रति एक साझी सोच बनाई तथा 21 शताब्दी में भारत-अमरीका सहयोग को व्यापक रूप से तथा तेज गति से विकसित करने का निर्णय किया। दोनों देशों ने NPT, CTBT तथा भारतीय परमाणु शस्त्र नीति के प्रति विद्यमान मतभेदों को अपने सम्बन्धों पर हावी न होने देने का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया। दोनों देशों के नेताओं प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने एक दृष्टि वक्तव्य पर हस्ताक्षर किये। दोनों देशों में विज्ञान तथा तकनॉलोजी क्षेत्र में सहयोग के सम्बन्ध में एक समझौता हुआ एवं व्यापार तथा निवेश पर S1.4 विलियन के समझौते, जो भारतीय तथा अमरीकी कम्पनियों ने सूचना तकनीक, पर्यटन, ऊर्जा तथा वातावरण रक्षण के सम्बन्ध में किये गये, इन सब ने यह स्पष्ट दिखलाया कि दोनों देशों ने नई शताब्दी में अपने सम्बन्धों को विकसित करने के लिये एक वास्तविक पहल की तथा द्विपक्षीय सम्बन्धों के विकास को एक नई सशक्त आधारशिला दी थी।

विचार/दृष्टि 2000 तथा संयुक्त वक्तव्य

(Vision 2000 and Joint Statement)

21 मार्च, 2000 को भारत तथा अमरीका ने द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने की ओर एक स्वागत भरा पग उठाया जब यह प्रण लिया गया कि विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों में दीर्घकाल तक चलने वाले, राजनीतिक तौर पर रचनात्मक तथा आर्थिक तौर से उत्पादक भागीदारी स्थापित की जायेगी। ऐसा प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा अमरीकी राष्ट्रपति क्लिंटन द्वारा हस्ताक्षर बद्ध की गई विचार/दृष्टि वक्तव्य में लिखा गया। इस वक्तव्य में कई एक उन क्षेत्रों का वर्णन किया गया जिनके सम्बन्ध में भारत-अमरीकी रिश्तों का विकास किया जाना था। आपसी मतभेदों में वार्तालाप तथा मेल-जोल बनाने के लिये एक सशक्त प्रयास किया गया।

भूतकाल में समय-समय पर हुई सम्बन्धों की रुकावटों को देखते हुए यह कहा गया कि अब दोनों के नये सम्बन्ध विश्वीकरण के सिद्धान्त पर आधारित थे जो आज सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रों, लोगों, अर्थव्यवस्थाओं तथा सभ्यताओं को जोड़ रहा था। नयी शताब्दी में दोनों देशों ने साझे हितों तथा क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राप्ति के लिये एक समान उत्तरदायित्व सहित शांति के भागीदार बनाना था। “हम नियमित परामर्श करेंगे तथा एशिया और इसके पार सामरिक स्थायित्व के इकट्ठे कार्य करेंगे। हम आतंकवाद तथा क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियों के विरुद्ध बड़े प्रयास करेंगे। हम संयुक्त राष्ट्र सहित अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को शक्तिशाली बनाएंगे तथा शांति सुरक्षा प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र का समर्थन करेंगे। हम स्वीकार करते हैं कि दक्षिण एशिया में विद्यमान तनाव दक्षिण एशिया के राष्ट्रों द्वारा ही हल किये जा सकते हैं। भारत इस क्षेत्र में सहयोग, शांति तथा स्थायित्व में वृद्धि के प्रति वचनबद्ध है।”

राष्ट्रपति क्लिंटन ने प्रधानमन्त्री वाजपेयी को अमरीका आने का निमंत्रण दिया जिसे श्री वाजपेयी ने स्वीकार कर लिया। यह भी निर्णय लिया गया कि भविष्य में अमरीकी राष्ट्रपति या भारतीय प्रधानमन्त्री को नियमित रूप से मिलता चाहिए ताकि द्विपक्षीय वार्तालाप को संस्थागत किया जा सके। वक्तव्य में कहा गया कि दोनों देश इस विषय में सहमत हैं तथा इसके अतिरिक्त भी उच्चस्तरीय परामर्श तथा सांझे कार्य समूह में वार्तालाप होंगे तथा यह उन सभी मुद्दों और विषयों के सम्बन्ध में होंगे जिनके सम्बन्ध में हमने सहयोग बढ़ाने तथा संस्थागत करने का निश्चय किया है। दोनों देश लोगों के साथ रिश्तों को उत्साहित तथा आगे से और भी दृढ़ करेंगे।

इस वक्तव्य में यह रिकार्ड किया गया कि भारत तथा अमरीका में इस प्रति पर मतभेद है कि परमाणु शस्त्रों की समाप्ति के सांझे उद्देश्य को किस ढंग से प्राप्त किया जाये, परन्तु दोनों इन उद्देश्य के सम्बन्ध में कार्य करने के लिये दृढ़-संकल्प लिये हुए हैं। अमरीका का यह विश्वास था कि भारत को परमाणु शस्त्र नहीं बनाने चाहिए, जबकि भारत का विश्वास था कि अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के हित में उसे एक न्यूनतम विश्वसनीय परमाणु निवारक बल प्राप्त करने की आवश्यकता थी। परन्तु दोनों देश परमाणु शस्त्रों के प्रसार तथा उनको छोड़ने के साधनों के विकास को रोकने के लिये सांझे प्रयास करने के लिये तैयार थे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये दोनों देश लगातार प्रयास जारी रखेंगे तथा चल रहे लाभकारी वार्तालाप को आधार बना कर चलते रहेंगे। दोनों देशों ने और परमाणु परीक्षण न करने के लिये निर्णय के प्रति वचनबद्धता को दोहराया तथा यह स्वीकार किया कि वह परमाणु शस्त्रों के लिये आवश्यक सामग्री के उत्पाद को रोकने की सन्धि के लिए जल्दी बातचीत की प्रक्रिया को आरम्भ करने के सांझे प्रयास करेंगे।

भारत तथा अमरीका ने यह स्वीकार किया कि दोनों देश विश्व में लोकतन्त्रीय संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने के लिये अपने अनुभव अन्य देशों से साझे करेंगे तथा आतंकवादी शक्तियों द्वारा लोकतंत्रीय व्यवस्था के लिये पैदा की जाने वाली चुनौती का सामना करेंगे।

इस विचार/दृष्टि वक्तव्य में स्पष्ट रूप से कहा गया कि भारत तथा अमरीका भविष्य की ओर देखेंगे तथा भूतकाल को भूतकाल ही रखेंगे तथा आने वाले वर्षों में भारत-अमरीका सम्बन्धों के निर्माण के लिये नई और स्वस्थ आधार शिलाएँ रखेंगे। इस नीति पत्र ने यह स्पष्ट दिखलाया कि अब अमरीका भारत को एक स्वतन्त्र तथा सक्रिय महत्त्वपूर्णकर्ता के रूप में देख रहा था तथा भारत और पाकिस्तान को एक धरातल पर रखने की नीति छोड़ रहा था।

विचार/दृष्टि 2000 को भारत तथा अमरीका ने एक अच्छा आरम्भ देने का प्रयास भी किया तथा फलस्वरूप राष्ट्रपति क्लिंटन की यात्रा के दौरान विज्ञान तथा तकनॉलोजी क्षेत्र में सहयोग पर एक समझौता हुआ तथा यात्रा पर आये सरकारी मण्डलों तथा भारतीय राजकीय एजेंसियों के द्वारा 15 समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। दोनों देशों ने विज्ञान तथा तकनॉलोजी पर भारत-अमरीका फोरम की स्थापना का समझौता किया ताकि सरकार शिक्षक तथा उद्योग की अन्तक्रियाओं को विज्ञान, तकनॉलोजी तथा अन्य सम्बन्धित क्षेत्रों में विकसित किया जा सके और इन्हें सरल बनाया जा सके। भारतीय वाणिज्य तथा उद्योग मन्त्री श्री मुरासोली मारन तथा अमरीकी वाणिज्य सचिव विलियन डेले ने वाणिज्य वार्तालाप के सन्दर्भ में उभरी बातों पर हस्ताक्षर किये। इसका उद्देश्य दोनों देशों में व्यापार तथा निवेश रिश्तों को दृढ़ करना था। यह भी स्वीकार किया गया कि इस सहमति के 90 दिनों के अन्दर दोनों देशों के वाणिज्य विभाग आपसी विचार-विमर्श से इनको लागू करने की योजना बना लेंगे।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण समझौता भारत के IDBI तथा अमरीकी एक्सिम बैंक के मध्य हस्ताक्षर बद्ध हुआ जिसके अन्तर्गत एक 500 मिलियन डालर का कर्ज खाता खोला जाना था जिसने भारत में निर्यात को तेल देने का कार्य करना था। इसी तरह ऊर्जा, बिजली तथा वातावरण क्षेत्रों के सम्बन्ध में भी समझौते किये गये। इनके द्वारा दोनों देशों ने वित्तीय, वाणिज्य, व्यापार तथा सेवा क्षेत्रों में आपसी सम्बन्धों के विस्तार के लिये शक्तिशाली प्रयास किये। यह आशा की गई कि भारत-अमरीकी व्यापार-अगले पाँच वर्षों में 25 बिलियन डालर तक जा पहुंचेगा।

WTO के साथ सम्बन्धित मुद्दों तथा आपसी सम्बन्धों में साझे कार्य समूहों को संस्थागत बनाने के सम्बन्ध में सहयोग पूर्ण नीतियाँ बनाने और अपनाने के लिये सक्रियता से कार्य किए जाने का निर्णय भी लिया गया।

अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान ही भारतीय तथा अमरीकी निजी कम्पनियों ने 1.4 बिलियन डालर मूल्य के व्यापारिक समझौते किये। इन का सम्बन्ध सूचना तकनॉलोजी, ऊर्जा, पर्यटन वातावरण, साझे उद्यमों तथा निवेश समझौतों से था।

प्रधानमंत्री वाजपेयी की अमरीका यात्रा तथा भारत-अमरीकी सम्बन्ध, सितम्बर 2000

भारत-अमरीकी सम्बन्धों में उत्पन्न हुई सकारात्मक सहयोग की प्रक्रिया को और दृढ़ता प्रदान करने के लिये तथा जैसा कि दृष्टि-2000 में अंकित किया गया था, भारतीय प्रधानमन्त्री तथा अमरीकी राष्ट्रपति ने सितम्बर 2000 में दोनों देशों के सम्बन्धों को अधिक विकसित करने का निश्चय दोहराया। ऐसा प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी की अमरीका यात्रा (सितम्बर 2000) के दौरान किया गया। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के निमन्त्रण पर प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ने उच्च-स्तरीय भारतीय मण्डल के साथ अमरीका की यात्रा की तथा दोनों देशों के सम्बन्धों को अधिक सहयोगी तथा उच्चस्तरीय बनाने का प्रयास किया। पाँच दिवसीय यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री ने अमरीकी कांग्रेस को भी सम्बोधित किया तथा राष्ट्रपति बिल क्लिंटन तथा अन्य अमरीकी अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श भी किया।

भारत तथा अमरीका ने आतंकवाद तथा नशीले पदार्थों की तस्करी (जिनका सीधा सम्बन्ध अफगानिस्तान में विद्यमान तालिबान शासन से था) का सामना करने के लिये सांझे प्रयास करने का निर्णय लिया तथा इस सम्बन्ध में सभी स्तरों पर सहयोग बढ़ाने का निश्चय किया गया।

NPT, CTBT तथा पाकिस्तान के साथ वार्तालाप के मुद्दों पर मतभेद होते हुए भी, दोनों देशों ने आपसी सम्बन्धों विशेषकर आर्थिक सम्बन्धों के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने का उपक्रम किया। भारत ने 6 बिलियन डालर के वाणिज्यिक समझौते किये जिनका सम्बन्ध ऊर्जा, इ-कार्मस तथा बैंकिंग क्षेत्रों से था। अमरीकी वस्तुओं और सेवाएँ खरीदने के लिये अमरीकी एक्सिम बैंक (U.S. Exim Bank) के साथ 900 मिलियन डालर ऋण लेने का समझौता भी हुआ। भारत में 3 ऊर्जा केन्द्र स्थापित किये जाने के भी तीन समझौते किये गये।

प्रधानमन्त्री वाजपेयी की अमरीकी यात्रा के द्वारा भारत-अमरीकी सम्बन्धों को एक अधिक दृढ़ और व्यापक आधार देने का प्रयत्न किया गया । वार्तालाप के स्तर से ऊपर निकल कर दोनों देशों विभिन्न मुद्दों पर एक जैसी सोच तथा दृष्टिकोण अपनाने की ओर अग्रसर हो गये। दोनों देशों के सम्बन्धों के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमुख विषयों पर सहमति बनी-

  1. आतंकवाद का मुकाबला करने तथा इसे समाप्त करने के लिये द्विपक्षीय सहयोग को और दृढ़ किया जायेगा।
  2. सुरक्षा तथा अप्रसार के मुद्दों पर विद्यमान मतभेदों को सीमित करने के लिये आगे से अधिक वार्तालाप किये जायेंगे।
  3. भारत परमाणु परीक्षणों पर लगाई गई स्वेच्छक रोक को तब तक जारी रखेगा जब तक CTBT प्रभावी नहीं हो जाती। परन्तु भारत ऐसा अपने सर्वोच्च राष्ट्रीय हितों की आवश्यकता अनुरूप ही करेगा।
  4. एशिया सुरक्षा वार्तालाप को जारी रखा जायेगा ताकि आपसी समझ को शक्तिशाली बनाया जा सके।
  1. दोनों देश यह स्वीकार करते हैं कि दक्षिण एशिया की समस्याएँ (भारत-पाक समस्याएँ) दक्षिण एशिया के देशों द्वारा शांतिपूर्ण साधनों से ही हल की जा सकती है।
  2. अमरीका कश्मीर समस्या में मध्यस्था नहीं करेगा।
  3. पूँजी निवेश को उत्साहित करने तथा विश्व तथा व्यापार व्यवस्थाओं को दृढ़ता प्रदान करने के लिये द्विपक्षीय व्यापार वातावरण में सुधार किया जायेगा।
  4. दोनों देशों ने स्वच्छ ऊर्जा वातावरण तथा वैज्ञानिक और तकनॉलोजी संगठनों पर सांझे परामर्श समूह की कार्यवाही पर संतोष प्रकट किया।
  5. डिजिटल विभाजन के अन्तर को कम किया जायेगा ताकि सूचना तकनॉलोजी का लाभ गरीब तथा अमीर दोनों प्रकार के देशों के प्राप्त हो सके।
  6. दोनों देशों में आपसी समझ को बढ़ाने के क्षेत्र में अमरीका में बसे भारतीयों के योगदान को स्वीकार कर इसकी प्रशंसा की गई।

श्री वाजपेयी ने कामना की कि आने वाले तीन वर्षों में 15 बिलियन डालर का अमरीकी निवेश भारतीय बाजारों में हो सकेगा। यात्रा के अन्त में जारी किये गये संयुक्त वक्तव्य में यह कहा गया कि इस यात्रा ने दोनों देशों के सम्बन्धों में एक गुणात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया है तथा सम्बन्धों के राजनीति, आर्थिक, वाणिज्यिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, सामाजिक तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्रों में आपसी समझ तथा सहयोग बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंत में यह स्पष्ट तथा दृढ़ रूप से कहा जा सकता है कि इस नई शताब्दी में भारत तथा अमरीका अपने सम्बन्धों के विकास के लिये तथा इन्हें अच्छी सकारात्मक स्वस्थता तथा गति प्रदान करने के लिये सभी आवश्यक पगों को उठाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। आशा है आने वाले समय में भारत-अमेरिकी संबंधों में आपसी विश्वास, सहयोग, मित्रता तथा सम्बन्धों के सभी क्षेत्रों में अच्छी भागीदारी बढ़ेगी। दोनों देशों के सम्बन्धों का भविष्य आज उज्ज्वल दिखाई देता है।

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