19वीं सदी का सामाज सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी का सामाजिक सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी का सामाजिक सुधार आंदोलन

पिछली शताब्दी का सुधार आंदोलन केवल धर्म तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका धर्म से जयादा सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव पड़ा। भारतीय समाज में कई ऐसी मान्यताएँ एवं प्रथाएँ विद्यमान थीं जिनका आधार अंधविश्वास और अज्ञान था। इनमें से कई प्रथायें अति क्रूर एवं अमानवीय थीं। सती प्रथा, बाल विवाह, बाल हत्या और जातीय भेदभाव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। समाज में अशिक्षा और घोर अंधविश्वास था। सारा सामाजिक ढाँचा अन्याय और असमानता पर आधारित था। समाज भयंकर रूप से पिछड़ गया था। उसकी शक्ति क्षीण हो चुकी थी और वह दिशाहीन था। इन सबके ऊपर विदेशी शोषण अलग से जड़ जमाये जा रहा था।

कुछ भारतीयों ने स्थिति की गंभीरता को समझा और स्थिति से निबटने के लिए सुधारों का सहारा लिया। धार्मिक सुधारों की ही तरह सामाजिक सुधार भी बंगाल से ही शुरू हुए और इसका भी श्रेय राममोहन राय और ब्रह्म समाज को ही है। सामाजिक सुधार प्रायः धार्मिक सुधारों से जुड़े रहे। कारण यह था कि देश की अनेक सामाजिक कुरीतियों को धार्मिक सहमति प्राप्त थी। ऐसे सामाजिक दोषों को बिना धार्मिक सुधार के दूर नहीं किया जा सकता था।

सुधार का कार्यक्रम कुछ सिद्धान्तों के आधार पर प्रारंभ हुआ। देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में अधिकांश सुधारकों का सामान्यतः यह विचार था कि उस समय की समस्याओं का समाधार वेदकालीन जीवन को अपनाकर किया जा सकता है। इसका यह अर्थ था कि वेद के बाद के पिछले लगभग तीन हजार वर्षों से विकसित उन सभी विचारों, संस्थाओं तथा लोकाचारों को हिन्दू समाज से निकाल बाहर किया जाये क्योंकि तात्कालिक समस्याओं के मूल कारण वे ही थे। मगर इस सिद्धान्त के सामने कई कठिनायाँ मसलन वैदिक जीवन को स्वीकारने का अर्थ था पिछले तीन हजार वर्षों की सारी उपलब्धियों को नकार देना। यह आसान नहीं था। पुनः भावी समाज के लिए प्राचीन काल के किस भाग को आदर्श माना जाय- वैदिक समाज को, स्मृतिकालीन समाज को या पुराण के समय के समाज को। यह भी एक जटिल समस्या थी। अंततः वह भी महसूस किया गया कि समाज जैसे जीवित अवयव में ‘पुनर्जीवन’ का सवाल नहीं उठता, अतः उसकी उन्नति के लिए ‘सुधार ही एकमात्र विकल्प’ है। शीघ्र ही जब नव-हिन्दूवाद (New Hinduism) ने उग्र पुनरूत्थानवादी आंदोलन की शुरूआत की तो वैदिक जीवन की वापसी के सिद्धान्त में अंतर्निहित खतरे सामने आने लगे। आधुनिक ज्ञान और विवेक के आधार पर भी यह सिद्धान्त युक्तिसंगत नहीं लगता था। अतः सुधारों के संबंध में विचार में परिवर्तन आवश्यक हो गया। अब अतीत पर अनावाश्यक निर्भरता के बजाय मानव विवेक तर्क और समसामयिक उपयोगिता को ही सुधारों का आवश्यक आधार माना गया। इस प्रकार सैद्धान्तिक मतभेद जो भी रहा हो, अधिकांश सुधारकों ने इन्हीं तत्वों को आधार मानकर अपने सुधारों की शुरूआत की। एक बात पर सबने सहमति जाहिर की कि व्याप्त अंधविश्वास पर आधारित निरर्थक विचारों, संस्थाओं और प्रथाओं को यथाशीघ्र समाप्त किया जाये।

नारी मुक्ति

सुधारकों का ध्यान सबसे पहले स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर गया। स्त्रियों की दयनीय दशा का इतिहास लंबा था। सदियों के शोषण एवं अत्याचार के कारण वे इस दुर्दशा में पहुंची थी। इसके लिए कई तत्व जिम्मेदार थे। व्यक्तिगत कानून और धार्मिक प्रथाओं ने स्त्रियों को समाज में बहुत ही निम्न स्तर दे रखा था। निम्नवर्गीय औरतों से खराब हालत उच्चवर्गीय औरतों की थी। परंपरागत दृष्टि से औरतों की मां और पत्नी के रूप में प्रायः प्रशंसा की जाती थी, लेकिन व्यक्ति के रूप में समाज में उनका स्थान बहुत नीचे था। उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं थी, न उन्हें अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का अधिकार ही था। उदाहरण के लिए हिन्दुओं में औरत केवल एक बार विवाह कर सकती थी जब कि हिन्दू पुरुष को इच्छानुसार कितना ही बार विवाह करने की स्वतंत्रता थी। पुरुषों के लिए बहुविवाह की प्रथा मुसलमानों में भी मान्य थी। औरतों को पर्दे में रहना पड़ता था और लड़कियों की बहुत कम उम्र में किसी भी उम्र के लड़के के साथ शादी कर दी जाती थी। इससे विधवाओं की संख्या बढ़ती गई पर विधवाओं को पुनर्विवाह करने का अधिकार नहीं था। इतना ही नहीं, विधवाओं का अपने मृत पति की लाश के साथ ही जल जाना अच्छा माना जाता था। इसी ‘सती प्रथा’ के नाम से जाना जाता है।

आर्थिक दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की औरतों की बड़ी खराब स्थिति थी। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से वे पुरुषों पर निर्भर थीं। हिन्दू औरतों को पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार नहीं था, न ही विषम परिस्थिति में अनुपयोगी विवाह को समाप्त करने का अधिकार था। मुसलमान औरतों को पुरुष की तुलना में केवल आधी संपत्ति ग्रहण करने का अधिकार था। उन्हें सैद्धान्तिक रूप से तलाक का अधिकार तो था, पर इस मामले में उनका अधिकार पुरुषों के समान नहीं था। औरतों को लगभग किसी भी तरह की स्वतंत्रता नहीं थी। सामान्यतः उन्हें पढ़ने-लिखने भी नहीं दिया जाता था।

ऐसी स्थिति में मानवतावादी और समतावादी भावनाओं से प्रेरित होकर सुधारकों ने उनकी दशा सुधारने के लिए आंदोलन शुरू किया। आंदोलन के समर्थन में सुधारकों ने व्यक्तिवाद और समानता के सिद्धान्तों की दुहाई दी, कुछ ने यह तर्क दिया कि हिन्दू, इस्लाम और जोरोष्ट्रियनप किसी भी धर्म में स्त्रियों को नीचा स्थान देने की मान्यता नहीं थी। सच तो यह है कि इन धर्मों में औरतों का स्थान ऊंचा और सम्मानपूर्ण रहा था।

राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा पर पूरी ताकत से प्रहार किया। कंपनी की सरकार ने सहयोग किया और 1829 में कानून द्वारा विधवाओं को जीवित जलाना बंद कर दिया गया तथा न्यायालयों को ओदश दिया गया कि वे ऐसे मामलों में सदोष मानव हत्या के अनुसार मुकद्दमा चलाएँ ओर अपराधी को दंड दें। प्रारंभ में यह नियम केवल बंगाल के लिए था। 1830 में इसे बंबई तथा मद्रास में भी लागू कर दिया गया।

बालिका वध की क्रूर प्रथा बंगालियों और राजपूतों में प्रचलित थी। इस प्रथा के अनुसार आर्थिक भार मानकर या अन्य कारणों से बालिकाओं की बचपन में ही हत्या कर दी जाती थी। प्रबुद्ध भारतीयों और अंग्रेजों दोनों ही ने इस प्रथा की कटु आलोचना की। अंततः कानून बनाकर बालिका हत्या को साधारण हत्या के बराबर माना गया। भारतीय रियासतों के रेजिडेंटों को भी कहा गया कि वे रियासतों में इस कुप्रथा को बंद करने के प्रयत्न करें। इस प्रथा को रोकने के लिए 1870 में भी कुछ कानून बनाये गये।

स्त्रियों की स्थिति सुधारने की दिशा में बाल विवाह का निषेध और विधवा विवाह की अनुमति के प्रश्न पर भी आंदोलन शुरू किया गया। इस दिशा में कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के आचार्य ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का कार्य सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है। उन्होंने प्रमाण प्रस्तुत किया कि वेद विधवा विवाह की अनुमति देता है। विधवा विवाह के समर्थन में उन्होंने लगभग एक सहस्त्र हस्ताक्षरों से अनुमोदित एक प्रार्थना-पत्र भारत सरकार को भेजा। अंततः 1856 के ‘हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ (Hindu Widow Remarriage Act) द्वारा विधवा विवाह को वैध मान लिया गया और ऐसे विवाह से उत्पन्न हुए बच्चे वैध घोषित किये गये।

बंबई में प्रोफेसर डी0 के0 कर्वे और मद्रास में वीरेशलिंगम पण्डल ने इस दिशा में विशेष प्रयत्न किया। प्रोफेसर कर्वे ने विधुर होने पर 1893 में स्वयं एक ब्राह्मण विधवा से विवाह किया। वे विधवा पुनर्विवाह संघ के सचिव थे। 1899 में उन्होंने पूना में एक विधवा आश्रम स्थापित किया, जिसमें विधवाओं को जीविकोपार्जन का साधन प्रदान किया जाता था। 1906 में उन्होंने बंबई में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की।

सुधारकों ने बाल विवाह का विरोध किया। इसके फलस्वरूप 1872 में एक कानून ‘नेटिव मैरिज ऐक्ट’ (Native Marriage Act) पास किया गया, जिसमें 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं का विवाह वर्जित कर दिया गया तथा बहुविवाह को भी गैर-कानूनी घोषित किया गया। लेकिन यह कानून बहुत प्रभावशाली नहीं हो सका। अंत में एक पारसी सुधारक वी० एम० मालाबारी के प्रयत्नों के फलस्वरूप 1891 में ‘सम्मति आयु अधिनियम’ (Age of Consent Act) पास हुआ जिसमें 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर रोक लगा दी गयी।

1931 में बड़ौदा की सरकार ने दी ‘इन्फेन्ट मैरिज प्रिवेन्शन ऐक्ट’ (बाल विवाह निवारण अधिनियम) पास कर बाल-विवाह का निषेध किया। भारत सरकार ने बाल विवाह के विरूद्ध सबसे महत्वपूर्ण कदम 1930 में उठाया। उस वर्ष हरविलास शारदा के प्रयत्नों से बाल विवाह निरोधक कानून पास हुआ, जिसे ‘शारदा ऐक्ट’ के नाम से जाना जाता है। इसने 18 वर्ष से कम उम्र के लड़के और 14 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह अवैध घोषित कर दिया। ऐक्ट के विरूद्ध काम करने वालों के लिए सजा भी थी। लेकिन सरकार की उदासीनता और भारतीयों की रूढ़िवादिता के चलते यह कानून बहुत सार्थक नहीं हो पाया।

उन्नीसवीं श्ताब्दी में एक गलत धारणा प्रचलित थी कि हिन्दू शास्त्रों में स्त्री शिक्षा की अनुमति नहीं है। लेकिन जैसे ही सांस्कृतिक जागरण शुरू हुआ, सुधारकों ने इस भ्रांति का जोरदार खंडन किया।

स्त्रियों में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रायः सभी तात्कालिक सुधार आंदोलनों ने प्रयत्न किया। लेकिन यह काम इनसे पहले ईसाइयों ने प्रारंभ किया था। उनका उद्देश्य चाहे जो भी रहा हो, वे (ईसाई धर्म प्रचारक) पहले लोग थे जिन्होंने 1819 में कलकत्ता में कलकत्ता तरूण स्त्री सभा (Calcutta Female Juvenile Society) की स्थापना की थी। आगे चलकर शिक्षा परिषद के अध्यक्ष जे0 ई0 डी0 बेटन ने 1849 में एक बालिका विद्यालय स्थापित किया।

स्त्री शिक्षा के प्रसार में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की देन महान थी। वे बंगाल के कम-से-कम 35 बालिका विद्यालयों से संबंधित थे। बंबई के एलफिंस्टन इन्स्टीट्यूट (Elphinston Institute) के विद्यार्थियों का भी स्त्री शिक्षा के प्रसार में योगदान था। 1854 में चार्ल्स वुड के पत्र में भी स्त्री शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।

जब बीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीय आंदोलन ने जोर पकड़ा तो इससे नारी मुक्ति आंदोलन को काफी बल मिला। स्वतंत्रता संग्राम में औरतों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। यहाँ तक कि वे क्रांतिकारी आतंकवादी आंदोलनों में भी सरीक हुई। 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में उन्होंने किसान आंदोलन और ट्रेड यूनियन आंदोलनों में भी भाग लिया। उन्होंने विधायक के चुनाव में मत दिया औ खुद उम्मीदवार के रूप में भी खड़ी हुई। प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा बनीं। 1937 के लोकप्रिय मंत्रिमंडलों में कई महिलाएं मंत्री या संसदीय सचिव थीं। उन लोगों के स्थानीय प्रशासन में भी प्रतिनिधित्व के पद सँभाले।

नारी उद्धार के लिए मुख्य रूप से पुरूषों ने प्रयत्न शुरू किया। 1920 के बाद खुद स्त्रियों ने भी अपने उद्धार की जिम्मेवारी सँभाली। उन्होंने कई संगठनों एवं संस्थाओं की शुरूआत की जिनमें 1927 में ‘अखिल भारतीय महिला सभा’ (All India Women’s Conference) की स्थापना एक महत्वपूर्ण घटना थी। देश में नारी आंदोलन के उद्भव और विकास में नारी मुक्ति-आंदोलन की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई।

जब देश को आजादी मिली तो इसका नारी की आजादी और उद्धार पर भी महत्वपूर्ण असर पड़ा। औरतों की समानता के लिए संघर्ष का ठोस परिणाम नए भारतीय संविधान (1950) में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ। नए संविधान ने महिलाओं और पुरूषों को बराबरी की गारंटी दी। 1956 के ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम’ (Hindu Succession Act, 1956) ने लड़की को पिता की संपत्ति का उसके पुत्र के साथ बराबरी हकदार करार किया। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम ने विशेष परिस्थितियों में विवाह समाप्त करने की अनुमति दी। संविधान द्वारा पुरूष और स्त्री दोनों के लिए बहुविवाह निषिद्ध कर दिया गया। दहेज प्रथा को भी समाप्त करने का प्रयत्न किया गया है, हालांकि इस दिशा में अब तक बहुत सफलता नहीं मिली है। संविधान ने औरतों को सरकारी नौकरी करने और पुरूषों के बराबर तनख्वाह पाने का समान अधिकार दिया है। फिर भी नर-नारी समानता के सिद्धांत को सही रूप में लागू करने की दिशा में अब तक पूरी सफलता नहीं मिल पाई है।

नारी उद्धार के प्रयत्न में यथोचित सफलता न मिल पाने के कई कारण हैं। महिलाओं की दशा न सुधरने देने में धार्मिक मान्यताओं का सबसे बड़ा हाथ रहा है। प्रायः सभी धर्मों, विशेषकर हिंदू और इस्लाम में, महिलाओं का स्तर सामान्यतः नीचा ही माना गया है। उन्हें उपने व्यक्तित्व को स्वतंत्र रूप से विकसित करने की अनुमति नहीं है। मूल हिंदू धर्म में ऐसी स्थिति नहीं थी, मगर बाद की–उत्तरवैदिक और मध्यकालीन-धार्मिक मान्यताओं में महिलाओं को अति निम्न स्थान दिया गया है। भारतीय जनमानस में इस तथ्य के व्यापक प्रभाव के दो परिणाम हुए। पहला यह कि नारी उद्धार से संबंधित अधिकांश प्रयत्न सीमित रहे और धर्म तथा समाज के भय से सुधार आंदोलन के सभी सुधारक स्त्रियों की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार मौलिक प्रश्नों से कतराते रहे। उदाहरण के लिए, सती प्रथा के खिलाफ तो आवाज उठाई गई, परंतु महिलाओं को आर्थिक समानता दिलाने या उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कोई ठोस प्रयत्न नहीं हुआ। दूसरे, उनकी दशा सुधारने के लिए जो प्रयास हुए भी उनको रूढ़िवादी समाज ने काफी विरोध किया। अंग्रेजी सरकार ने इस दिशा में ज्यादा हस्तक्षेप इसलिए नहीं किया कि 1857 के विश्वेह के बाद वह न तो भारतीयों की सामाजिक या सांस्कृतिक उन्नति के पक्ष में थी, न ही सामाजिक मुद्दों पर हस्तक्षेप कर भारतीयों को नाराज करना चाहती थी। वस्तुतः अंग्रेजी साम्राज्यवादी शोषण को भारत में कायम रखने के लिए भारतीयों के पिछड़ेपन को बरकरार रखना जरूरी था। इसके अतिरिक्त, नारी-मुक्ति आंदोलन की अधिकांश अवधि (कम-से-कम वर्तमान शताब्दी के तीसरे दशक तक) में खुद महिलाओं का नेतृत्व सर्वथा अनुपलब्ध रहा। परिणामतः, नारी दुर्दशा के वास्तविक स्वरूप और उसकी सीमा का कभी भी यथोचित अंदाज नहीं लगाया जा सका। जिन थोड़े से पुरूष सुधारकों ने नारी उद्धार की बात की, उनका दृष्टिकोण भी संकुचित रहा। उन्होंने महिलाओं को एक सीमित दायरे में रखकर तथा एक खास सीमा तक ही उनकी स्थिति में सुधार लाने की बात की। दूसरे, चूंकि बहुसंख्यक सुधारक ऊंची जातियों के थे, अतः सुधार हेतु उन्होंने जिन मुद्दों पर पहल की उनमें से अधिकतर का संबंध ऊंची जाति की महिलाओं से ही था। उदाहरणार्थ, सती या विधवा प्रथा समस्याएँ तो थीं, परंतु इनसे प्रभावित होने वाली महिलाएँ केवल उच्च वर्ग की थीं जिनकी संख्या बहुत कम थी। बहुसंख्यक निम्न वर्ग की महिलाओं को इन प्रथाओं के समाप्त होने से कोई फायदा नहीं था।

जातिप्रथा का विरोध और अछूतोद्धार आंदोलन

जाति प्रथा भारतीय समाज का दूसरा बड़ा रोग था जिसके विरूद्ध सुधारकों ने संघर्ष छेड़ा। जाति प्रथा ने समाज में कई दोषों को जन्म दिया था। इसकी वजह से सारा समाज अनेक इकाइयों में विभक्त हो गया था। विभिन्न जातियों, विशेषकर ऊँची और नीची, जातियों में काफी भेदभाव और वैमनस्य था और सामाजिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी। आर्थिक एवं सामाजिक विकास के प्रायः सभी साधन और सुअवसर ऊँची जातियों के हाथ में थे, अतः कालांतर में नीची जातियों का बहुतसंख्यक भाग दरिद्र, अशिक्षित और हर दृष्टि से पिछड़ा रहा गया। इसका अर्थ था पूरे राष्ट्र का पिछड़ापन और संपूर्ण राष्ट्र की कमजोरी।

जाति प्रथा और छुआछूत की नींव प्राचीन काल में पड़ चुकी थी और तभी से इन्हें दूर काने के असफल प्रयत्न भी होते रहे थे। जाति प्रथा और अस्पृश्यता को दूर करने की दिशा में प्राचीन काल में महात्मा बुद्ध और महावीर, तदुपरांत स्वामी रामानंद, कबीर, नानक, तुकाराम, एकनाथ और नामदेव आदि ने प्रयास किया था पर उन्हें यथोचित सफलता नहीं मिली।

आधुनिक काल में अंग्रेजी शासन के दौरान कुछ ऐसी शक्तियाँ उत्पन्न हुईं जिन्होंने जातीय एवं अन्य सामाजिक भेद-भाव की भावना पर सशक्त प्रहार किया। ये शक्तियाँ बाह्य एवं आंतरिक दोनों थीं। अंग्रेज के भारत में आगमन के साथ-साथ आधुनिक उद्योग, शहरीकरण और परिवहन के नए साधनों ने जाति प्रथा और अन्य सामाजिक भेदभावों पर घातक प्रहार किया। इन तत्वों ने सामूहिक एवं व्यक्तिगत संपर्क को अवश्यंभावी कर दिया। विभिन्न उद्योगों में आर्थिक लाभ के सुअवसर ने विशेषकर ऊंची जातियों को किसी भी उद्योग (जहाँ मुनाफा हो) को शुरू करने के लिए बाध्य किया। अब वाणिज्य और व्यापार वैश्यों का ही धंधा नहीं रह गया था। पैसे के लिए अब ब्राह्मण भी चमड़े या जूते का व्यापार कर सकता था।

अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ भारत में कानून का शासन और कानून के सम्मुख समानता के सिद्धांत का प्रवेश हुआ। इससे सामाजिक समानता को बल मिला, जातिवाद और असमानता की भावना को धक्का लगा। नए न्यायालयों की स्थापना ने जातीय पंचायतों के कार्य को खत्म कुछ दिया। दूसरी ओर अंग्रेजी सरकार की नीति से सरकारी नौकरियों और सेना के द्वार सभी जातियों के लिए खुल गए।

आधुनिक लोकतांत्रिक विचार, बुद्धिवाद तथा मानवतावाद से प्रभावित भारतीयों ने धार्मिक अंधविश्वास के साथ ही सामाजिक असमानता, जातिप्रथा और छुआछूत के विरूद्ध आवाज उठाई।

यही वजह है कि जब राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हुआ तो स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जातीय भेदभाव की समाप्ति और व्यापक सामाजिक समता अनिवार्य शर्त बन गएं। इस प्रकार शुरू से ही राष्ट्रीय आंदोलन और उसके अभिन्न अंग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सभी जातिगत विशेषाधिकारों और छुआछूत का विरोध किया तथा सभी भारतीयों के लिए समान नागरिक अधिकार, जाति-धर्म-लिंग के भेदभाव के बिना सभी को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए समान अधिकार एवं स्वतंत्रता की मांग की।

इस दिशा में विशेषकर छुआछूत समाप्त करने और दलित एवं अछूत वर्ग के उद्धार के लिए गाँधी ने भी भरसक प्रयत्न किया। उन्होंने अछूतों (शूद्र आदि) को ‘हरिजन’ अर्थात भगवान का आदमी कहा। उन्होंने उनकी भलाई के लिए हरिजन नामक एक साप्ताहिक पत्र निकाला और ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की। गाँधी दलितों एवं अछूतों के उद्धार के कार्य में आजीवन लगे रहे। यहाँ इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है कि अपनी सारी नेकनीयती के बावजूद गाँधी की सामाजिक सुधार से संबंधित नीति की कुछ मौलिक कमजोरियाँ थीं। मसलन, गाँधी सामाजिक भेदभाव, छुआछूत आदि के विरूद्ध तो थे, पर वे वर्णव्यवस्था के समर्थक थे। यह एक बड़ा अंतर्विरोध था। 20वीं शताब्दी में वर्ण का अर्थ जाति से भिन्न नहीं हो सकता था। जाति प्रथा के प्रश्न पर उनके विचार अस्पष्ट और अनुदार थे। इसी प्रकार गाँधी सामाजिक एकता के पक्ष में तो थे, मगर संपत्ति के समान वितरण के पक्ष में नहीं थे। वे ‘ट्रस्टीशिप’ (न्यासिता) के पक्षधर थे। गांधी के सामाजिक चिंतन में ऐसे कितने ही मौलिक अंतर्विरोध थे और उसमें व्यावहारिकता का अभाव था। इसके मुख्य कारण थेः उनके सामाजिक चिंतन पर धर्म का अतिशय प्रभाव उसमें प्रगतिशीलता का अभाव और सामाजिक प्रश्नों के प्रति भावनाप्रधान आदर्शवादी दृष्टिकोण।

सामाजिक जागृति और शिक्षा के प्रसार से नीची जातियों में भी जागृति आई। उन्हें मौलिक मानव अधिकारों का ज्ञान हुआ और वे स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने लगे। इस प्रकार उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों के सदियों से चले आ रहे शोषण के विरुद्ध एक शक्तिशाली आंदोलन जोर पकड़ने लगा। ऐसे आंदोलन के नेताओं में डॉ0 बी0 आर0 अम्बेडकर का नाम उल्लेखनीय है। उनका जन्म एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ था और उन्होंने जाति प्रथा के दोषों को ठीक से समझा था। अतः वे आजीवन जाति प्रथा के खिलाफ, विशेषकर ऊंची जातियों की नीची जातियों पर मनमानी के विरूद्ध लड़ते रहे। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास फैडरेशन’ (अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ) की स्थापना की। दलितों एवं अछूतों के उद्धार के लिए इन जातियों के अन्य नेताओं ने भी ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन’ की स्थापना की। दक्षिण भारत में जातीय कट्टरता और छुआछूत अपनी चरम सीमा पर था। 1920 के बाद वहाँ गैर-ब्राह्मण जातियों ने एक ‘सेल्फ-रेसपेक्ट मूवमेंट’ (आत्मसम्मान आंदोलन) चलाया और अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश की मंदिर में प्रवेश और ऐसे ही अन्य निषेधों के खिलाफ उन्होंने अनेक सत्याग्रह किए।

इन सबके बावजूद जातीय कट्टरता एवं अस्पृश्यता का अंत आसान नहीं था। जब तक देश में विदेशी साम्राज्यवादी शासन था तब तक इसका अंत हो भी नहीं सकता था। इस समस्या को खत्म करने के लिए विदेशी सरकार ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी, जिससे समाज का रूढ़िवादी वर्ग, जो संपन्न और अंग्रेजों का समर्थक था, नाराज हो जाए। दूसरे, सामाजिक उत्थान का संबंध राजनीतिक और आर्थिक उत्थान से अविच्छिन्न रूप में जुड़ हुआ था। लेकिन भारतीयों का आर्थिक और राजनीतिक उत्थान अंग्रेजी शासन के स्वामित्व के लिए खतरनाक था। अतः इन सभी मुद्दों पर अंग्रेज बड़े सतर्क और लगभग चुप थे।

1947 में भारत विदेशी शासन से मुक्त हो गया। समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों ने भारतीय मुक्ति-संग्राम को प्रेरणा दी थी। अतः स्वतंत्रता मिलने पर भारत सरकार का पहला काम था इन आदर्शों को जीवन के हर क्षेत्र में अभिव्यक्ति प्रदान करना। इसलिए नए संविधान के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को एक-दूसरे के साथ समानता का अधिकार दिया गया और छुआछूत, तथा जाति प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया। इतना ही नहीं, अछूतों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों की भलाई के लिए विशेष व्यवस्था की गई। उन्हें नौकरियों में उच्च पद दिए गए और केंद्र तथा राज्यों की सरकारों में उनके लिए प्रतिनिधित्व सुरक्षित किया गया। भविष्य में भी इनकी भलाई हो, इसके लिए गणतंत्र के राष्ट्रपति को विशेष अधिकार दिए गए।

फिर भी जाति प्रथा अभी भी पूर्णरूप से समाप्त नहीं हो पाई है। आज भी वह देश के सामने एक बड़ी समस्या है। आरक्षण-संबंधी विवाद के कारण जातीय भेद-भाव हाल के वर्षों में और भी संकीर्ण और कठोर होता जा रहा है।

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