नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) का उत्तर-दक्षिण विवाद

नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) का उत्तर-दक्षिण विवाद

North-South controversy of NIEO

  1. दक्षिण का मत (The View of the South)-

    तृतीय विश्व समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की प्राप्ति को अत्यावश्यक मानते हैं। यह अनुभव किया जाता है कि विद्यमान अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में अपनी अर्थव्यवस्थाओं की गिरावट को रोकने के लिए केवल यही एक विकल्प है। वे विकसित राष्ट्रों द्वारा विकासशील राष्ट्रों के निरन्तर किए जाने वाले आर्थिक शोषण का विरोध करते हैं। उनका विचार है कि व्यापक अन्तःनिर्भरता के इस युग में, उनके साधनों, मण्डियों तथा अर्थ-व्यवस्थाओं का और अधिक शोषण तथा गिरावट उनके लिए हानिकारक, प्रति उत्पादक और यहां तक कि विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी विध्वंसक सिद्ध होगी। केवल नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) ही नव-उपनिवेशवाद के इस युग को समाप्त कर सकती है। केवल यही विद्यमान आर्थिक व्यवस्था में उत्पन्न हुई व्यवस्था को समाप्त कर सकती है। इसी तर्क के आधार पर तृतीय विश्व या दक्षिण नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था का पूर्ण समर्थन करता है, तथा इस बात की वकालत करता है कि विकसित राष्ट्र इस समस्या पर बातचीत करने के लिए आगे आएं आज समय की पुकार यह है कि तत्काल ही उत्तर-दक्षिण के बीच गम्भीरतापूर्वक बातचीत हो। यह तर्क दिया जाता है कि न तो संयुक्त राष्ट्र संघ तथा न ही विद्यमान अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं ही वर्तमान आर्थिक व्यवस्था की पुनः संरचना में कोई आर्थिक तथा लाभदायक भूमिका निभा सकती हैं क्योंकि इन पर विकसित देशों का आधिपत्य तथा नियन्त्रण है।

  2. उत्तर का मत (The View of the North)-

    दूसरी ओर, विकसित राष्ट्र अपनी वर्तमान सुदृढ़ तथा आधिपत्यपूर्ण आर्थिक स्थिति छोड़ना नहीं चाहते और न ही अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों में अपनी मुख्य भूमिका त्यागना चाहते हैं। वे यह मानते हैं कि नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था उनके उद्देश्यों तथा हितों के लिए हानिकारक होगी। विद्यमान अर्थव्यवस्था के द्वारा वे विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं तथा नीतियों पर नियन्त्रण रखे हुए हैं। वे संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी दूसरी अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं में भी अपनी सशक्त भूमिका को छोड़ना नहीं चाहते। वे इस बात की वकालत करते हैं कि वर्तमान आर्थिक संस्थाएं, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सभी तरह के कार्य करने में सक्षम हैं तथा इन्हें तृतीय विश्व के देशों की मांग के अनुसार संशोधित करके प्रयुक्त किया जा सकता है। इसलिए वे इस विषय पर उत्तर-दक्षिण वार्ता में भाग लेने के लिए न तो कोई रुचि रखते हैं तथा न ही इस समस्या को गम्भीरता से लेते हैं। वे तृतीय विश्व के राष्ट्रों पर अपना नव-उपनिवेशवाद नियन्त्रण बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए वे नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बनाने के पक्ष में नहीं है।

  3. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तथा उत्तर बनाम दक्षिण (NIEO and North Vs South)-

    एक ओर दोनों विकसित राष्ट्रों तथा दूसरी ओर तृतीय विश्व के राष्ट्रों के बीच दृष्टिकोणों में अन्तर के कारण नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विषय अब बहुत विवादास्पद विषय बन गया है। विकसित राष्ट्र इसकी स्थापना के पक्ष में नहीं हैं, परन्तु कम-विकसित राष्ट्र इसकी प्राप्ति के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं। कम-विकसित राष्ट्र विकासशील राष्ट्रों के इन प्रयत्नों की बहुत आलोचना करते हैं क्योंकि वे उनका अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में नियन्त्रण बनाए रखने के लिए वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।

  4. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था- दक्षिण के प्रयत्न (NIEO-The Attempts of the South)-

    उत्तर-दक्षिण वार्ता द्वारा नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की स्थापना के लिए विकसित राष्ट्रों की निरन्तर विरोधता के कारण, तृतीय विश्व के देशों ने विकासशील देशों के बीच दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा ‘विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग’ (RCD) की धारणा पर पहले से अधिक बल देने का निश्चय किया है। भारत और ब्राजील जैसे बहुत से काफी सीमा तक विकसित विकासशील राष्ट्रों ने अपनी आन्तरिक अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का निर्णय किया है। इसके लिए वे अपनी समस्याओं का घरेलू हल ढूंढेंगे। उन्होंने आत्म-निर्भरता के प्रयलों को तेज कर दिया है। यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग सर्वश्रेष्ठ विचारधारा लगती है। परन्तु अपनी निर्धनता, पिछड़ापन तथा आयात पर लगभग पूर्ण निर्भरता के कारण वे इस दृष्टिकोण को क्रियान्वित करने में असमर्थ हैं। निर्धनता तथा पिछड़ेपन से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने विकास के लिए सहायता बिना बंधनों के विदेशी सहायता, मुख्य साधनों का तथा तकनीकी ज्ञान की प्राप्ति की आवश्यकता है। इनकी पूर्ति केवल विकसित देश ही कर सकते हैं। इसलिए अन्तिम तथा प्रभावशाली उपाय केवल नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था ही है। दक्षिण-दक्षिण सहयोग तथा विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग (RCD) भी अधिक विकसित देशों में वास्तविक रूप से कम ही सफल होगी। उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर भारी प्रतिबन्ध तथा उनकी त्रुटियों उनके रास्ते में बड़ी-बड़ी रुकावटें हैं। विकसित राष्ट्रों के निरन्तर विरोध तथा उनकी संरक्षणात्मक नीतियों ने भी उनके विकास के रास्ते में रोड़े अटका दिये हैं। इस तरह नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) ही वर्तमान पक्षपातपूर्ण, भेदभाव पूर्व तथा अनुसूचित अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक विकल्प है किन्तु विकसित राष्ट्र इसे महत्व नहीं देते। वे आज भी ऐसा व्यवहार करते हैं जिनसे उनका स्वार्थ पूर्ण हो। विकासशील राष्ट्रों की ओर से पड़ने वाले दबाव को निष्क्रिय करने के लिए अपनी शक्ति, एकता तथा स्तर को सुदृढ़ करने के प्रयत्न, उत्तर-दक्षिण वार्ता अथवा नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) के संदर्भ में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) को निरुत्साहित करने वाला रवैया तथा विकासशील राष्ट्रों पर नव-उपनिवेशीय नियन्त्रण रखने वाली विद्यमान व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रयत्न जारी रखना- ये सभी नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) के प्रति उनके विरोध को प्रकट करते हैं। इससे यह पता चलता है कि नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) के विषय पर उत्तर-दक्षिण सम्बन्ध आने वाले समय में तनावपूर्ण, समस्यात्मक तथा खिंचावपूर्ण बने रहेंगे।

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