विकसित तथा कम-विकसित देशों के बीच सम्बन्धों का स्वरूप तथा समस्या

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अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उत्तर-दक्षिण विभाजन के स्वरूप का आलोचनात्मक परीक्षण

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उत्तर-दक्षिण विभाजन का स्वरूप  

आर्थिक सम्बन्धों का महत्व तथा उसके साथ-साथ धनी तथा निर्धन देशों के बीच दिन-प्रतिदिन बढ़ रही आर्थिक सम्बन्धों की विभिन्न समस्याओं के साथ निरन्तर बढ़ रही सार्वभौमिक आर्थिक आत्मनिर्भरता समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का बहुत अधिक महत्वपूर्ण पहलू है। सारांश यह है कि सार्वभौमिक अन्तःनिर्भरता के इस युग में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के उन आयामों का वर्णन धनी तथा निर्धन देशों के बीच सम्बन्धों एवं विकसित (उत्तर) तथा कम-विकसित (दक्षिण) देशों के बीच सम्बन्धों के रूप में किया जा सकता है। आज यह समस्या वर्तमान समय की टेढ़ी समस्या है। वुल्फ तथा कोलोम्बिस के शब्दों में, “उन्नीसवीं शताब्दी की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के साथ तुलना करने पर हम देख सकते हैं कि नए तथा महत्वपूर्ण आयामों का विकास हो गया है- उदाहरणस्वरूप सार्वभौम आर्थिक अन्तः निर्भरता दूसरे विश्वयुद्ध के समय से ही यातायात तथा संचार के साधनों में नाटकीय ढंग से विकास के कारण राष्ट्रों के बीच व्यापारिक तथा वित्तीय सम्पर्को को उनकी सामाजिक व्यवस्था को ध्यान में रखे बिना प्रोत्साहन मिला है। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप राष्ट्रों के बीच विरोधों तथा सहयोग दोनों के अवसरों को प्रोत्साहन मिला है तथा अन्तर्राष्ट्रीय दृश्यपटल पर शक्तिशाली तथा आर्थिक दृष्टिकोण से उन राज्यों को प्रवेश मिला जो पहले इसके भागीदार नहीं थे।”

निश्चय ही, विकसित तथा कम-विकसित राष्ट्रों के बीच सम्बन्धों का मामला और जैसा कि प्रायः कहा जाता है उत्तर-दक्षिण सम्बन्ध, उन महत्वशाली दो विषयों में से एक है जो समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को प्रभावित कर रहे हैं- दोनों में से एक है नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की समस्या तथा दूसरा विषय है निःशस्त्रीकरण की समस्या। समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को अच्छी प्रकार समझने के लिए इस विषय का पूर्ण ज्ञान बहुत आवश्यक है। इसके लिए हमें दो शब्दों के अर्थ को स्पष्टतया समझना होगा अर्थात् विकसित देश-उत्तर अर्थात् विकसित विश्व तथा कम-विकसित देश-दक्षिण, अर्थात् तीसरा विश्व ।

(A) विकसित देश-उत्तर

(Developed Countries-The North)

विकसित देशों से हमारा अभिप्राय उन सभी राज्यों से है “जिनकी अर्थव्यवस्थाएं विकसित हैं, जिनमें उच्च स्तरीय उद्योगीकरण, विकसित तकनीकी विकास तथा उच्च सकल राष्ट्रीय उत्पादन (G.N.P.) तथा कुल राष्ट्रीय उत्पाद प्रति व्यक्ति (G.N.P. per-capital level) अधिक है।” इन देशों में प्रति व्यक्ति के हिसाब से सड़कों तथा संचार के विस्तार का स्तर ऊंचा है। विद्युत तथा मशीनों के कलपुर्जी तथा उपकरणों का उत्पादन अधिक है, व्यवस्था उन्नतिशील शहरों में संकेन्द्रित है तथा अधिक पूंजी वाले गहन उत्पादन केन्द्र हैं, तथा जहां सामान्य रूप से लोगों का जीवन-स्तर उच्च है। अमरीका, कनेडा, जापान, यूरोप के देश विकसित विश्व के क्षेत्र में आते हैं। चूंकि, विश्व के प्रायः सभी विकसित देश उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित हैं इसलिए ‘उत्तर’ शब्द का प्रयोग सामूहिक रूप से इन्हीं के लिए किया जाता है। ये सभी देश मिलकर दो विकसित विश्वों का निर्माण करते हैं- (i) पहला विकसित विश्व : उन देशों का है जिनका आर्थिक ढांचा स्पर्द्धाशील है। ये देश हैं-अमरीका, ब्रिटेन, कैनेडा, जापान, पश्चिमी यूरोपीय देश; तथा (ii) दूसरा विकसित विश्व : उन विकसित देशों का है जिनका आर्थिक ढांचा पहले संकेन्द्रित था परन्तु अब विकेन्द्रित तथा खुला आर्थिक ढांचा बन रहा है। अब दूसरा विकसित देश भी लोकतंत्रीय, उदारवादी तथा सीमित बाजार अर्थव्यवस्था अपना रहा है। अब दूसरा विकसित देश भी लोकतंत्रीय, उदारवादी तथा सीमित बाजार अर्थव्यवस्था अपना रहा है। यह प्रथम विकसित विश्व के अधिक पास आ गया है। यह प्रथम विश्व से तो कम विकसित है परन्तु तीसरे विश्व से अधिक विकसित है।

इस प्रकार विकसित राष्ट्रों में उच्च-स्तरीय उद्योगीकरण, तकनीकी रूप से विकसित स्तर, अतिरिक्त आय, सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.N.P.) का उच्च स्तर तथा प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.N.P. Per Capita) अधिक होता है। ये देश जो आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक रूप से स्थिर तथा विकसित व्यवस्था वाले होते हैं। इन्हें हम आम भाषा में उत्तर (The North) अथवा दो विकसित विश्व या विकसित विश्व के नाम से पुकारते हैं। 27.1% जनसंख्या वाले ये विकसित देश विश्व-उत्पादन तथा आय के 77.7% भाग पर अपना नियन्त्रण रखते हैं।

(B) कम विकसित/विकासशील देश-दक्षिण

(Under-developed/Developing Countries-The South)

‘पिछड़े हुए देश’, ‘कम-विकसित देश’ तथा ‘विकासशील देश’ आदि शब्दों का प्रयोग प्रायः उन निर्धन तथा कम-विकसित देशों की आर्थिक स्थिति को प्रकट करने के लिए पर्यायवाची के रूप में किया जाता है जो सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। प्रारम्भ में आर्थिक तथा सामाजिक विकास के निम्न स्तर के कारण उनके लिए ‘पिछड़े हुए देश’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। तथापि पांचवें दशक के अन्त तक पिछड़े हुए (Backward) देश के स्थान पर ‘कम-विकसित’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया गया। हाल ही के समय में विद्वान् लोग विश्व के तकनीकी तथा औद्योगिक रूप में कम-विकसित देशों के सम्बन्ध में, “विकासशील (Developing) या निम्न विकसित देश (Lowly Developed Countries-LDCs) शब्द का प्रयोग करना अधिक श्रेयस्कर समझते हैं।” स्पराऊट तथा स्पराऊट (Sprout and Sprout) के शब्दों में, “एक कम-विकसित देश वह होता है जिसमें अधिकतर काम मानवीय या पशुओं की शारीरिक शक्ति के प्रयोग से होता है तथा जिसमें अधिकतर लोग निर्धन होते हैं।” इसका आगे वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि, “यह परिभाषा उचित होगी, यदि हम समझें के निर्धनता वस्तुओं के उत्पादन के तथा सेवा-कार्य के प्राचीन और घिसे-पिटे साधनों के कारण नहीं होता बल्कि प्राकृतिक साधनों की कमी के कारण भी हो सकती है।’ विकसित देशों की यह परिभाषा इतनी साधारण है कि यह कम-विकसित देशों के स्वरूप का वर्णन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। विकसित देशों का वर्णन करने के लिए जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया जाता था।

  1. कमविकसित तथा विकसित देशों के बीच गहरा अन्तर

    विकसित देशों के लोगों तथा कम-विकसित तथा विकासशील देशों के लोगों के बीच एक चौड़ी खाई है। विकसित देश, जिनकी जनसंख्या 30% से कुछ कम ही है, समस्त विश्व की सम्पत्ति तथा आय के 70% से भी अधिक पर नियन्त्रण रखते हैं जबकि कम-विकसित देशों के पास, जिनकी जनसंख्या 70% है, केवल 30% साधन तथा आय है। दो दर्जन औद्योगिक देशों में प्रति व्यक्ति आय 3000 से 6000 पौंड तक है जबकि 100 से भी अधिक विकासशील देशों की प्रति-व्यक्ति आय 100 पौंड वार्षिक है। जान टिनबर्जर (Jan Tinberger) के शब्दों में, “आज करीब दो-तिहाई मानवता 30 सैंटों से भी कम की आय में अपना जीवन निर्वाह कर रही है। आज सारे विश्व में केवल एक करोड़ जनता ही शिक्षित है चाहे शिक्षा के प्रसार के लिए विश्व के पास सभी साधन तथा तकनीके हैं। तृतीय विश्व के लगभग 70% बच्चे अंसतुलित भोजन के शिकार हैं चाहे विश्व के पास उनका पोषण करने के पर्याप्त साधन हैं। विश्व के साधनों का विभाजन भी असंतुलित है। यही कारण है कि औद्योगिक देश निर्धन राष्ट्रों द्वारा प्रयुक्त किए गए साधनों का विभाजन भी असंतुलित है। यही कारण है कि औद्योगिक देश निर्धन राष्ट्रों द्वारा प्रयुक्त किए गए साधनों से बीस गुना अधिक साधनों का प्रयोग कर रहे हैं। आज स्थिति यह है कि तृतीय विश्व के लाखों लोग कड़ी धूप में प्रातः से लेकर सायं तक थोड़े से पैसों के लिए अपना पसीना बहाते हैं तथा समय से पूर्व ही मर जाते हैं। क्यों मरते हैं? वे नहीं जानते। विकसित तथा कम-विकसित राष्ट्रों के बीच की इसी चौड़ी खाई के कारण उनके बीच सम्बन्ध सीमित हो जाते हैं। कम विकसित देशों की निर्धनता तथा वस्तुओं की कमी की तुलना में विकसित राष्ट्रों के धन तथा वस्तुओं के बाहुल्य ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को असंतुलित कर दिया है।” इथोपिया तथा दूसरे अफ्रीकी राष्ट्र में समय-समय पर पड़ने वाली अकाल अविकसित देशों की दुःख दीनता को प्रकट करते हैं और अमरीका का ‘सितारा युद्ध’ (Star War) कार्यक्रम विकसित देशों के बाहुल्य पर प्रकाश डालता है।

  2. विकसित तथा कमविकसित देशों के बीच निरन्तर बढ़ रहा अन्तर

    विकसित तथा कम-विकसित देशों के बीच जो अन्तर है वह निरन्तर भयाक दर से बढ़ रहा है। विकसित तथा कम-विकसित देशों के बीच जो अन्तर है वह निरन्तर भयानक दर से बढ़ रहा है। विकसित तथा धनी राष्ट्र और धनी हो रहे हैं तथा कम-विकसित तथा निर्धन राष्ट्र, विशेषरूप से1970 के ऊर्जा संकट के बाद, अधिक निर्धन हो रहे हैं। तकनीकी रूप से विकसित तथा औद्योगिक रूप से विकसित होने के कारण धनी राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर अपना नियन्त्रण बढ़ा रहे हैं। UNCTAD तथा GATT भी धनी तथा निर्धन देशों के बीच निरन्तर बढ़ते हुए अन्तर को रोकने में सफल नहीं हो सके। UNCTAD की रिपोर्टों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि विकासशील राष्ट्रों के आत्म-निर्भर बनने के प्रयत्नों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विधि आज भी विकसित देशों के पक्ष में है। द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय वित्तीय सहायता कार्यक्रम के बावजूद विकसित तथा विकासशील राष्ट्रों के बीच अन्तर बढ़ रहा है। शक्ति संकट, गिरता हुआ निर्यात, विश्व बाजार में कड़ी प्रतियोगिता, बहुराष्ट्रीय निगमों का एकाधिकारिक नियन्त्रण, पुराने बँटनवुड व्यवस्था की अपर्याप्तता, विकासशील राष्ट्रों को अपर्याप्त आर्थिक तथा तकनीकी सहायता, नये गैट की सीमाओं आदि सभी समस्याओं ने निर्धन राष्ट्रों को निर्धनता में रहने के लिए बाध्य कर दिया है। मुद्रा स्फीति की प्रवृत्तियों तथा अवशेष भुगतान के बढ़े हुए लगातार आर्थिक संकटों के साथ-साथ व्यापार तथा वित्तीय सहायता में निरन्तर ह्रास, समय-समय पर पड़ने वाले सूखे तथा इन सब के अतिरिक्त समय-समय पर हो रहे ऊर्जा-संकटों ने तीसरे विश्व के सामने गम्भीर सामाजिक तथा आर्थिक संकट पैदा हुए हैं।

खाड़ी युद्ध (जनवरी-फरवरी 1991) के बाद स्थिति और भी खराब हो गई। तीसरे विश्व में आर्थिक स्थितियां इतनी भयंकर हैं कि इनकी अब उपेक्षा नहीं की जा सकती। धनी राष्ट्रों में प्रति व्यक्ति आय तथा निर्धन राष्ट्रों के प्रति व्यक्ति आय में अन्तर निरन्तर बढ़ रहा है। विश्व व्यापार में विकासशील देशों का भाग 1960 में 21.8% से 1970 में)7.6% तक कम हो गया। चाहे कई एक रिपोर्ट उत्साहजनक हैं फिर भी विश्व व्यापार में विकासशाली देशों के भाग के निरन्तर कम होने का क्रम लगातार बना हुआ है। यह प्रवृत्ति अभी भी विद्यमान है। विकासशील देशों में साधनों का स्थानान्तरण निरन्तर घट रहा है, जबकि उनका बाहरी ऋण छ: गुणा बढ़ गया है और बढ़ रहा है। विकासशील देशों के तेल-आयात के बिल ने उनकी आर्थिक परिस्थितियों को और भी सीमित कर दिया है। इस तरह विकसित देशों तथा अल्पविकसित देशों (LDC’s) में लगातार बढ़ता अन्तर समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की एक कर वास्तविकता है। विश्व के सम्बन्ध में प्रकाशित सभी आंकड़े और रिपोर्ट यह दिखलाती हैं कि गरीब और अमीर देशों में खाई बढ़ रही है।

  1. सार्वभौमिक अन्तर्निभरता में वृद्धि

    विकसित तथा कम विकसित राष्ट्रों की अर्थ-व्यवस्थाओं में बड़े अन्तर के बावजूद सार्वभौमिक अन्तर्निर्भरता में काफी वृद्धि हो गई है। विकसित तथा कम-विकसित दोनों प्रकार के देश आज अपने आप को और भी अधिक एक दूसरे पर निर्भर मानते हैं। एडवर्ड एल, मोरस (Edward L. Morse) के शब्दों में, “अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के कुछ भागों में उच्चस्तरीय आत्मनिर्भरता की अधिकता है। शक्ति साधनों में हाल ही की विश्वपरकीय समस्याएं 1967 के बाद लगातार पैदा होने वाले मुद्रा-संकट तथा युद्ध में काम आने वाले शस्त्रों को सीमित करने के लिए वार्ता” इस बात की सच्चाई का प्रमाण है कि अन्तर्राष्ट्रीय या बहुत महत्वपूर्ण घरेलू घटनाएं, सारे विश्व में राजनीतिक व्यवस्थाओं की बढ़ती संख्या पर अपना गहरा प्रभाव रखती हैं।” विकसित देश अपनी वस्तुओं को बेचने तथा कच्चे माल खरीदने के लिए कम-विकसित राष्ट्रों पर निर्भर करते हैं। कम-विकसित राष्ट्र आज भी विकसित राष्ट्रों पर मुख्यतः (i) आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्राप्त करने के लिए; (ii) अपनी वस्तुएं बेचने के लिए; तथा(iii) विकसित तकनीक प्राप्त करने के लिए निर्भर करते हैं।

तथापि विकसित तथा विकासशील राष्ट्रों के बीच विद्यमान बढ़ते हुए अन्तर के कारण विश्वपरकीय अन्तर्निर्भरता का विकसित राष्ट्र अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं। यह आशा कि विकसित राष्ट्र, जो विकासशील राष्ट्रों के बाजारों पर निर्भर करते हैं, विशेषतया क्रिया तथा व्यापार की उदारता के लिए आगे आएंगे, झूठी सिद्ध हुई है। बड़ी संख्या में अन्तर्राष्ट्रीय नीति-निर्माताओं का दृढ़ विश्वास है कि अन्तःनिर्भरता के प्रसार से विकसित बाजार अर्थ-व्यवस्थाएं विकासशील राष्ट्रों को अधिक छूट देंगी, फिर झूठा सिद्ध हुआ है। वास्तविक प्रक्रिया में विकसित राष्ट्र अन्तःनिर्भरता की अच्छी तरह समझ नहीं सके हैं, इसलिए वे विकासशील राष्ट्रों की आवश्यकताओं तथा परिकल्पनाओं को उचित ध्यान दिए बिना अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा अर्थ-व्यवस्था में अपने इच्छित उद्देश्य को प्राप्त करने में निरन्तर लगे हुए हैं। प्रौद्योगिक, राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति, इन तीनों शक्तिशाली शस्त्रों के कारण, विकसित देश इस विश्वपरीय अन्तःनिर्भरता के युग में भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अपना नियन्त्रण तथा श्रेष्ठ भूमिका बनाए रखने में पूर्णतया सफल रहे हैं। यह विकासशील राष्ट्रों के लिए बहुत हानिकारक है। अन्तःनिर्भरता की अवधारणा ने अन्तर्राष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में विकासशील राष्ट्रों के पहले से अधिक तथा सक्रिय भागीदारी के अवसरों को उत्तेजित किया है, तथापि उन्हें इस बात से बड़ी निराशा हुई कि नव-उपनिवेशवाद के इस युग में वे आज गौण भूमिका निभा रहे हैं।

  1. विकासशील राष्ट्रों पर विकसित राष्ट्रों का नवउपनिवेशीय नियन्त्रण

    व्यापक अन्तःनिर्भरता तथा अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्यों का समान सम्प्रभु स्तर होने पर भी विकासशील राज्य अभी तक नव-उपनिवेशवादी नियन्त्रण के अधीन रहे हैं। स्वतन्त्रता के उदय तथा परिणामस्वरूप सम्प्रभु स्तर की प्राप्ति ने उन्हें राजनीतिक रूप से तथा सैद्धान्तिक रूप से ही स्वतन्त्र किया है। आर्थिक रूप से तथा वास्तविक व्यवहार में, वे विकसित राष्ट्रों पर आज भी निर्भर हैं। घोर निर्धनता के कारण तथा आवश्यक वस्तुओं की कमी के कारण वे विदेशी सहायता के लिए विकसित राष्ट्रों पर निर्भर रहते हैं। उनकी वर्तमान स्थिति, सदियों से पश्चिमी साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के पंजों में भोगे गए शोषण का परिणाम है। आज के विकसित राज्य केवल तभी विकसित हो सके जब भूतकाल में उन्होंने अपने उपनिवेशों, जो अब सम्प्रभु विकासशील राष्ट्र बन गये हैं, के साधनों तथा धन का शोषण किया। अपने साम्राज्यों की समाप्ति के बाद भी विकसित राष्ट्र विकासशील राष्ट्रों की अर्थ-व्यवस्थाओं तथा नीतियों पर अपना पूर्ण नव-उपनिवेशीय आर्थिक तथा राजनीतिक नियन्त्रण बनाये हुए हैं। “नव-उपनिवेशवाद का सार है’ जैसे एन. नक्रमा (Nkrumah) ने कहा है, “जो राज्य इसके अधीन हैं, वे केवल सिद्धान्त में स्वतन्त्र हैं तथा अन्तरराष्ट्रीय प्रभुता के सारे बंधन उन पर लागू होते हैं। वास्तव में, इनकी आर्थिक व्यवस्था तथा इस तरह उनकी आन्तरिक नीति बाहर से ही निर्देशित होती है।”

  2. विकसित देशों द्वारा विश्व की आय तथा साधनों का अत्यधिक शोषण

    विकसित तथा कम विकसित देशों के बीच के सम्बन्धों की एक विशेषता यह है कि विकसित राष्ट्र विश्व के साधनों तथा आय का आनुपातिक अधिक शोषण तथा उपभोग कर रहे हैं। धनी तथा दृढ़ राष्ट्र विभिन्न प्रकार से लुके छिपे साधनों द्वारा निर्धन तथा कमजोर राष्ट्रों को हानि पहुंचा कर भी अपने काम में लगे हुए हैं। तकनीकी तथा औद्योगिक रूप से विकसित होने तथा आर्थिक रूप से समृद्ध होने के कारण विकसित देश कच्चे माल की मंडियों पर अपना नियन्त्रण आज भी बनाए हुए हैं जिसका अभिप्राय यह है कि निर्मित माल तथा पूंजी उपकरणों पर उनका लगभग एकाधिकार है। यही कारण है कि वे जो माल विकासशील देशों से खरीदते हैं उनका मूल्य भी वे अपनी इच्छानुसार ही नियत करते हैं। परिणामस्वरूप वे अपने लाभों वाले विभिन्न साधनों में तीसरे विश्व के सारे साधनों को पूरी तरह समाप्त कर देने की स्थिति में हो जाते हैं। 8 मई, 1970 को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक बैठक में अमरीका तथा प्रायोजित एक प्रस्ताव रखा गया जिसके द्वारा अपने छोटे साधनों में 50% वृद्धि को किसी सदस्य द्वारा अपने ऋण की शेष राशि की अदायगी में असफल हो जाने की स्थिति में निलम्बन की धारा के साथ जोड़ा गया। इसका उद्देश्य मुख्यतया विकासशील राष्ट्रों पर अतिरिक्त दबाव डालना था। तत्कालीन भारतीय वित्तमंत्री श्री मधु दण्डवते ने इसे अनुचित कहा था। विकसित देश सदैव ही विकासशील देशों पर दबाव डालने के लिए इस प्रकार की चालें चलते रहते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक तथा अन्य विश्व आर्थिक संस्थाओं की आड़ में विकसित देश, विशेषकर संयुक्त राज्य अमरीका, विकासशील देशों की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने के प्रयत्न करते रहते हैं। अपनी आर्थिक समस्याओं पर नियन्त्रण पाने के लिए सभी विकसित राज्य विकासशील राज्यों की आर्थिक प्रणालियों पर इच्छानुसार नियन्त्रण करने का प्रयास कर रहे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं तथा विश्व-अर्थव्यवस्था पर विकसित देशों के नियंत्रण के कारण विकासशील राष्ट्रों पर उनका नियन्त्रण और भी सुदृढ़ हो जाता है। अपनी दृढ़ स्थिति के कारण विकसित अल्पसंख्यक अपने इच्छित उद्देश्य के अनुसार ही विश्व के साधनों का अपनी इच्छा अनुसार बड़ी आसानी से तथा शीघ्रता से बंटवारा कर लेते हैं। रॉबिन जैकिन्स के विचार में, विश्व के साधनों पर अपनी प्रमुख स्थिति बनाना तथा उससे चिपके रहने की उनकी इच्छा, विश्व के विकसित राज्यों के व्यवहार का निर्देशक सिद्धान्त रहा है।

  1. विकासशील राष्ट्रों पर विकसित राष्ट्रों के नियन्त्रण

    उपकरण के रूप में बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका- विकसित राष्ट्र बहुत से बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) द्वारा विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं तथा इस तरह उनकी नीतियों पर अपना पूर्ण नियन्त्रण रख रहे हैं। बहुराष्ट्रीय निगम विकसित राष्ट्रों के होते हैं तथा ये विकासशील राष्ट्रों के बाजारों की अर्थव्यवस्थाओं तथा नीतियों पर उनका नियन्त्रण बनाये रखने के लिए अपने देशों की सरकार के अतिरिक्त बाजू बनकर काम करते हैं। विकासशील देशों में बड़ी संख्या में उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में इन्ही निगमों के अधीन होते हैं या इनके द्वारा नियन्त्रित होते हैं। अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, कनेडा इन सातों राष्ट्रों में लगभग 900 बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय निगम हैं जो सारे विश्व के 50% से अधिक उत्पादन पर नियन्त्रण रखते हैं। ये निगम वास्तव में कम-विकसित राष्ट्रों में प्रचुर मात्रा में पाये जाने वाले प्राकृतिक साधनों या कच्चे माल पर अपना नियन्त्रण रखते हैं। तकनीकी ज्ञान तथा अन्तर्राष्ट्रीय पेटैन्टों पर अपना एकाधिकार होने के कारण इन देशों में औद्योगिक केन्द्रों द्वारा ये बहुराष्ट्रीय निगम बड़ा लाभ कमाते हैं। भारत जैसे देश का भी, जो निश्चय ही दूसरे विकासशील देशों से अधिक विकसित है, आज भी बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा आर्थिक शोषण हो रहा है।

  2. विकासशील देशों की नीतियों पर विकसित देशों का नियन्त्रण

    अपनी श्रेष्ठ आर्थिक, राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति के कारण विकसित देश, विकासशाली देशों की नीतियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियन्त्रण बनाए रखने की स्थिति में हैं। विकसित राष्ट्र नए राज्यों की नीतियों तथा व्यवहार को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। विकसित देशों नए राज्यों में शस्त्र दौड़ शुरू कर सकते हैं तथा इस तरह उनकी अर्थव्यवस्थाओं को विकासशील अर्थव्यवस्था से प्रतिरक्षा अभिमुखी कार्यक्रमों में बदल देते हैं। वे अपनी इच्छानुसार विनिमय दर निश्चित करके, व्यापार में संरक्षणवाद अपनाकर तथा अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं तथा बहुराष्ट्रीय निगमों पर अपना अधिकार जता कर, विकासशील राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं की स्थिरता को हानि पहुँचा सकते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में अपनी इच्छा अनुकूल विशिष्ट स्थिति पैदा करने के लिए तथा इसे बनाए रखने के लिए वे विकासशील राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में प्रायः हस्तक्षेप कर सकते हैं तथा ऐसा करते भी हैं। अपनी श्रेष्ठ संचार तकनीक तथा दूसरे राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक युद्धकला साधनों के प्रयोग द्वारा विकसित राष्ट्र विकासशील राष्ट्रों की नीतियों तथा जनमत को नियन्त्रित करने तथा उन पर इच्छित प्रभाव डालने की स्थिति में होते हैं।

  3. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की समस्या

    तृतीय विश्व के देश नीओ(NIEO) को समकालीन समय की अनिवार्य आवश्यकता मानते हैं क्योंकि केवल यही उनकी तेजी से गिरती अर्थव्यवस्थाओं को सम्भाल सकती है। व्यापक अन्तःनिर्भरता के इस युग में कम-विकसित देशों के साधनों तथा मण्डियों का और अधिक शोषण तथा हास बहुत अधिक हानिकारक होगा तथा विकसित राष्ट्रों की अर्थ-व्यवस्था के लिए भी विध्वंसक सिद्ध होगा। इसलिए नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था विकसित तथा कम-विकसित राष्ट्रों के लिए बहुत अधिक सहायक तथा उपयोगी सिद्ध हो सकती है। कम-विकसित देश इस बात की वकालत करते हैं कि नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करने के लिए, विकसित राष्ट्र इस विषय पर बातचीत करने के लिए आगे आएं। वे इस उद्देश्य के लिए उत्तर-दक्षिण में अविलम्ब गम्भीर वार्ता की वकालत करते हैं। वे यह विश्वास करते हैं कि न तो संयुक्त राष्ट्र और न ही दूसरी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं वास्तविक रूप में नीओ (NIEO) के निर्माण में सहायक हो सकती हैं क्योंकि इनमें विकसित राष्ट्रों का प्राधान्य है।

  4. पूर्वी यूरोप तथा भू.पू. सोवियत गणराज्यों में हुए नए परिवर्तनों ने विकासशील देशों की आर्थिक समस्याओं को बढ़ा दिया है

    अब पश्चिम के विकसित देश तथा अमरीका पूर्वी यूरोप के देशों को आर्थिक सहायता देकर इन का विकास करने की ओर अधिक ध्यान दे रहे हैं, वे यह समझते हैं कि इनमें साम्यवाद की पुनस्र्थापना को रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। विदेशी सहायता का इन देशों की ओर झुक जाना विकासशील देशों के लिए चिन्ता का विषय बना हुआ है।

  5. नया गैट विश्व व्यापार संगठन की अपूर्णता

    विश्व अर्थव्यवस्था में जो नया गैट समझौता हुआ है तथा जिस विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना हुई है, उसने विकसित और विकासशील देशों की समस्याओं को हल करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया है। इसके विपरीत सामाजिक धारा (Social clause), श्रम कानूनों में सम्भावित परिवर्तनों तथा एकस्व अधिकारों (Patents) और प्रतिलिप्यधिकार (Copy Right) के विषयों ने विकसित तथा विकासशील देशों के सम्बन्धों को और भी उलझा दिया है। 1999 केWTO के सिएटल सम्मेलन में विकसित तथा विकासशील देशों के मध्य WTO के अधीन मुद्दों के सम्बंध में मतभेद स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आये।

निष्कर्ष

विकसित तथा कम-विकसित राष्ट्रों के बीच सम्बन्ध आज भी तनावपूर्ण हैं तथा बिल्कुल ही संतोषपूर्ण नहीं हैं। विकसित राष्ट्र, विशेषरूप से आर्थिक तथा व्यापारिक सम्बन्धों में, विकासशील देशों पर कठोर तथा शोषणात्मक नियन्त्रण रखे हुए हैं। भयानक अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक स्थिति, ऊर्जा संकट, निरन्तर बनी रहने वाली अनुत्पादक तथा हानिकारक शस्त्र दौड़ GATT तथा UNCATD की असफलता, उत्तर-दक्षिण की नीओ (NEO) के विषय पर एकमत की कमी, अपना उत्तरदायित्व निभा सकने में संयुक्त राष्ट्र संघ की असफलता आदि, सभी ने मिलकर एक भयानक परिस्थिति पैदा कर दी है जिसमें विकासशील राष्ट्र, विकसित राष्ट्रों पर निर्भरता तथा निर्धनता के कारण अपने आप को हानि की स्थिति में पाते हैं। सात अत्यन्त विकसित राष्ट्रों ने कम विकसित राष्ट्रों के मुकाबले में अपने आप को एक G-7 गुट में संगठित कर लिया है। पश्चिमी यूरोप के विकसित देश भी यूरोपीय संघ के रूप में दृढ़ तथा सकारात्मक रूप में संगठित हो चुके हैं। 15 प्रमुख विकासशील देशों ने भी G-15 नाम का एक गुट बना लिया परन्तु उनकी निर्धनता इसकी कार्यक्षमता में बड़ी रूकावट है। 1990 का दशक विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर (1) ऋण जाल, (2) पश्चिमी यूरोप द्वारा अपनी सहायता पूर्वी यूरोपीय देशों को देना, (3) मुद्रा स्फीति दबाव, तथा (4) NIEO जैसे मुद्दे पर असफलता के कारण, और अधिक भार तथा तनाव का स्रोत रहा। नए राज्यों की विकास सम्बन्धी तथा आर्थिक आवश्यकताओं को अनुभव करने में विकसित राष्ट्रों की असफलता ने विकासशील राज्यों को बहुत अधिक कष्ट पहुँचाया, और परेशान किया है। ये देश आज की विद्यमान नव-उपनिवेशीय लक्षणों बाली व्यवस्था से निकलने का तथा न्याय और समानता पर आधारित नई व्यवस्था की स्थापना का दृढ़ निश्चय किए हुए हैं। डॉ. डी.एन, महरिश ने अपने लेख ‘भारत तथा नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था” में ठीक ही लिखा।

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