गुटनिरपेक्षता का आलोचनात्मक मूल्यांकन

गुटनिरपेक्षता का आलोचनात्मक मूल्यांकन

(Critical Evaluation of Non-alignment)

जब से गुटनिरपेक्षता की उत्पत्ति हुई है, तभी से इसकी कड़ी आलोचना हो रही है। आलोचक इसे आदर्शवाद पर आधारित नीति मानकर इसकी आलोचना करते हैं तथा विदेश नीति के सिद्धान्त के रूप में इसकी प्रचलन-योग्यता पर सन्देह करते हैं। बहुत से आलोचक तो इसे निष्क्रियता तथा अकर्मण्यता की नीति कहकर इसका खण्डन करते हैं तथा नए बने देशों पर यह आरोप लगाते हैं कि गुटनिरपेक्षता के नाम पर वे अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से दूर रहना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त जहां बहुत से पश्चिमी आलोचक अब भी अनैच्छिक तटस्थता की नीति कहकर इसका वर्णन करते हैं, वहाँ दूसरे आलोचक इसे दोहरी गुटबन्दी की नीति कहकर इसकी आलोचना करते रहे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में इस सिद्धान्त के परिकलन के लगभग पांच दशकों बाद भी आलोचक आज भी गुटनिरपेक्षता में दोष ढूंढते रहते हैं। वे भारत जैसे निर्गुट देशों की असफलताओं का उदाहरण देते हैं कि ऐसे राष्ट्र दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगपूर्ण सम्बन्ध कायम करने तथा अपने राष्ट्रीय हितों के कुछ उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हुए हैं तथा इसलिए वे गुटनिरपेक्षता को जारी रखने का विरोध करते हैं। बहुत से विचारक अब शीत-युद्ध की समाप्ति तथा साम्यवादी गुट के विघटन के बाद गुटनिरपेक्षता को एक नकारा तथा कमजोर नीति भी कहते हैं।

गुटनिरपेक्षता की आलोचना

(Criticism of Non-alignment)

आलोचक गुटनिरपेक्षता के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क देते हैं :

  1. गुटनिरपेक्षता एक अवास्तविक तथा आदर्शवादी नीति है

    गुटनिरपेक्षता के आलोचकों, विशेषतया पश्चिमी तथा अपरीकी आलोचकों ने गुटनिरपेक्षता को आदर्शात्मक तथा स्वप्रदर्शी सिद्धान्त माना है और इसका खंडन किया है क्योंकि इसे परिचालित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह मत दिया कि शीत युद्ध से दूर रहना तथा उच्च शक्तियों के बराबर की दूरी बनाये रखने की बात तो की जा सकती है और सैद्धान्तिक रूप में उचित भी हो सकती है परन्तु प्रभावशाली ढंग से व्यावहारिक नहीं हो सकती। आलोचक यह तर्क देते रहे हैं कि अनादिकाल से राजनीतिक गुटबन्दी अन्तर्राष्ट्रीय जीवन का सिद्धान्त रही है तथा यह युद्धोत्तर काल के बाद भी एक वैध सिद्धान्त है। कोई राष्ट्र, विशेषतया निर्धन और अविकसित राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों से पर्याप्त तथा वास्तविक सहायता लिए बिना विकास नहीं कर सकता और इसके लिए किसी एक देश अथवा गुट के साथ गुटबन्धी ही उचित नीति है। गुटनिरपेक्षता सभी के साथ मैत्री तथा शान्ति की नीति के रूप में सैद्धान्तिक रूप में तो अच्छी लगती है। परन्तु इसका वास्तविक परिचालन कठिन तथा हानिकारक है। गुटनिरपेक्षता के इर्द-गिर्द जो आदर्शवाद है, जैसा कि इसके उद्देश्यों में प्रतिपादित किया गया है, अर्थात् सभी के साथ समरूप मित्रता, इसे अवास्तविक तथा स्वप्नमयी नीति बनाती है। इस तरह गुटनिरपेक्षता एक आदर्शवादी सिद्धान्त है, जिसे सैद्धान्तिक रूप में तो माना जा सकता है परन्तु व्यावहारिक रूप से यह प्रभावशाली नहीं है।

  2. गुटनिरपेक्षता मित्रविहीनता का कारण बनती है

    आलोचक यह मानते हैं कि विदेशी सम्बन्धों में गुटनिरपेक्षता के कारण वफादार तथा सच्चे मित्र कम मिल पाते हैं। वे भारत का उदाहरण देते हैं। अमरीका की विदेश नीति को शीत-युद्ध तथा संधियों की नीति मानकर भारत द्वारा की गई कड़ी आलोचना के कारण तथा कोरिया तथा वियतनाम समस्या में इसके निर्णयों के कारण इसे अमरीका की वास्तविक तथा शक्तिशाली मित्रता प्राप्त नहीं हो सकी। इसी तरह भारत का साम्यवाद के प्रति भय तथा इस द्वारा भूतपूर्व सोवियत संघ की कुछ नीतियों की आलोचना से सोवियत संघ के साथ ही गहरी मित्रता के रास्ते में रुकावटें खड़ी हो गई थीं। इसलिए आलोचकों ने यह माना कि अपनी गुटनिरपेक्षता के कारण भारत दोनों उच्च शक्तियों की मित्रता प्राप्त करने में असफल रहा। 1962 में चीन के आक्रमण के समय यह असफलता बड़ी उत्तेजनापूर्ण थी। इस संकटकालीन परिस्थिति में भारत सोवियत संघ से ऐच्छिक समर्थन हासिल नहीं कर सका। यहां तक कि अमरीका तथा ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मैक-मिलन (Mc-Millan) के व्यक्तिगत विचारों के कारण अधिक थी तथा भारत के साथ अमरीका तथा ब्रिटेन की मित्रता के कारण कम थी। यहां तक बंगलादेश के संकट के समय भी भारत को (भूतपूर्व) सोवियत संघ के साथ मित्रता की संधि करनी पड़ी ताकि वह अपनी नीतियों के लिए विश्वस्त तथा निश्चित समर्थन प्राप्त कर सके। अफगानिस्तान संकट तथा कम्बोडिया संकट के दौरान भी भारत के मित्रों की कमी दृष्टिगत हुई। इसलिए आलोचक गुटनिरपेक्षता के स्थान पर गुटबन्धी के पक्ष में मत देते हैं। उनका विचार रहा है कि “कुछ राष्ट्रों के साथ वास्तविक, गहरी तथा विश्वसनीय मित्रता का होना सभी के साथ सामान्य तथा औपचारिक मित्रता तथा किसी के साथ वास्तविक मित्रता न होने से अच्छा है।”

  3. गुटनिरपेक्षता, अकर्मण्यता, तुष्टिकरण और दुर्बलता का सिद्धान्त है-

    गुटनिरपेक्षता के आलोचक इसे शीत युद्ध में तटस्थता के नाम पर निस्सहायता तथा अकर्मण्यता का सिद्धान्त मानकर इसकी आलोचना करते हैं। गुटनिरपेक्षता के कारण नए राज्य दृढ़ नीति अपनाने से बचते फिरते हैं। वे मध्यवर्गी निर्णय लेकर साफ बच निकलते हैं। “इसी कारण भारत जैसे देश अफगानिस्तान संकट में कोई ठोस कदम उठाने से बचते रहें।” दूसरे शब्दों में, आलोचकों का विचार है कि गुटनिरपेक्षता अकर्मण्यता तथा निष्क्रियता का सिद्धान्त है।

  4. गुटनिरपेक्षता वास्तव में दोहरी गुटबन्दी है-

    गुटनिरपेक्षता के बहुत से आलोचक गुटनिरपेक्ष की नीति को दोहरी गुटबन्दी की नीति कहकर इसकी आलोचना करते हैं। वे यहां तक कह देते हैं कि इसके द्वारा नए राष्ट्र पश्चिमी तथा साम्यवादी देशों से सहायता लेने के लिए दोहरे मापदण्ड अपनाने के प्रयत्न करते रहे हैं। भारत का उदाहरण देते हुए वे लिखते हैं कि भारत, विशेषतया 1971 के बाद से सोवियत संघ के प्रति एक विशेष प्रकार के झुकाव को प्रकट कर रहा था और इसके साथ ही यह अमरीकी सहायता प्राप्त करने का भी प्रयत्न कर रहा था। वे तो यहां तक कहते हैं कि इस नीति में राजनीतिक नैतिकता की कमी है तथा यह कि “तटस्थता का दृष्टिकोण किसी राजनीतिक नैतिकता पर आधारित नहीं है परन्तु व्यक्तिगत शिकायतों तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर आधारित है।”

  5. गुटनिरपेक्षता अब संगत सिद्धान्त नहीं लगता

    गुटनिरपेक्षता के विरुद्ध एक अन्य तर्क यह है कि चाहे नये राज्यों द्वारा दोनों महाशक्तियों के बीच शीत-युद्ध तथा शक्ति-आधारित राजनीति के युग में इस सिद्धान्त को अपनाना उचित था, परन्तु अब परिवर्तित अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में गुटनिरपेक्षता की नीति को बनाए रखना उनके लिए उपयुक्त नहीं है। शीत-युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत संघ के विघटन तथा साम्यवादी गुट के अन्त के कारण जिन परिस्थितियों ने गुटनिरपेक्षता को जन्म दिया था, वे अब समाप्त हो गई हैं। इस तरह गुटनिरपेक्षता के बने रहने की अब कोई उपर्युक्तता नहीं है क्योंकि यह अब लाभदायक तथा संगत सिद्धान्त नहीं रहा है। आज की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में अब गुटनिरपेक्षता की मांग नहीं है।

इन सब आधारों पर आलोचक गुटनिरपेक्षता का खंडन करते हैं। उनके अनुसार इस नीति ने गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को नगण्य लाभ पहुँचाए हैं।

गुटनिरपेक्षता की उपयुक्तता

(Justification of Non-alignment)

गुटनिरपेक्षता के विरुद्ध उपरिलिखित सभी तर्क अवास्तविक लगते हैं तथा आलोचकों ने ये व्यक्तिगत पक्षपाद से प्रभावित होकर दिए हैं।

  1. गुटनिरपेक्षता वास्तविक तथा व्यावहारिक धारणा है

    यह निश्चय ही मूलतः गलत है कि गुटनिरपेक्षता अवास्तविक तथा आदर्शवादी सिद्धांत है। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विभिन्न देशों समाजवादी तथा गैर-समाजवादी देशों तथा वैसे ही तीसरे विश्व के देशों के साथ सम्बन्धों की दिशा में जिस सफलता से गुटनिरपेक्षता की नीति का प्रयोग किया है। वह इसके वास्तविक तथा व्यावहारिक स्वरूप का पर्याप्त उदाहरण है। आज विश्व के सभी शक्तिशाली देश उनके साथ सम्बन्धों के महत्व का अनुभव करते हैं तथा गुटनिरपेक्षता के महत्व को समझते हैं।

  2. गुटनिरपेक्षता में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में पूर्ण कर्मण्यता तथा भागीदारी होती है

    गुटनिरपेक्षता का सही अनुमान तथा मूल्यांकन तभी हो सकता है, जब हम अपने आप को पूर्वाग्रहों से मुक्त कर लें। इस नीति को तटस्थता, निष्क्रियता तथा अकर्मण्यता की नीति कहना गलत है। इस तरह के विचार का अर्थ है गुटनिरपेक्षता के वास्तविक स्वरूप की उपेक्षा करना। यह सर्वविदित है कि भारत जैसे देश ने शक्ति गुटों से दूर रहते हुये भी सभी अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचार स्वतन्त्रतापूर्वक निष्पक्षता से तथा दिलेरी से अभिव्यक्त किये हैं। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में सदस्यों के बीच मित्रता तथा सहयोग का विकास तथा विश्व शांति की स्थापना में सक्रिय भूमिका अदा की है। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई है। वे संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में सक्रियता से भाग लेते रहे हैं। वे गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के विकास तथा तीसरे विश्व की एकता में सहायता देने के लिये उपकरण बने हैं। नेहरू के शब्दों में ‘गुटनिरपेक्षता सुरक्षित बच निकलने की नीति नहीं है तथा न ही मध्यमार्गीय नीति है। यह एक सकारात्मक तथा रचनात्मक नीति है जो कुछ उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये बनाई जाती है।” यह अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से पूर्ण तथा सक्रिय भागीदारी के द्वारा आपसी समझ के पुल बनाने की नीति है। गुटनिरपेक्षता नीति सदा विश्व शांति तथा सुरक्षा के लिये लड़ी है, तथा कभी भी यह विचारों की स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष अभिव्यक्ति में हिचकिचाई नहीं है। तटस्थतावाद तथा अकर्मण्यता के दोष का खण्डन करते हुए नेहरू ने तटस्थता तथा गुटनिरपेक्षता के बीच स्पष्ट तथा सही अन्तर बनाया। उन्होंने लिखा, गुटनिरपेक्षता एक मूलभूत नीति है परन्तु विशेष परिस्थितियों या प्रस्तावों में इसको लागू करना निर्णय का मामला है। गुटनिरपेक्षता एक ऐसी पृष्ठभूमि है, जो हमारे विचारों को निर्देशित करती है। ऐसा इसलिए होता है कि हम गुटबन्दी में शामिल नहीं हैं कि हमें किसी चीज के लिये अवश्य सहमत होना है या नहीं होना है। इसके लिये स्वतन्त्र निर्णय की आवश्यकता है जिससे उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके। यह साधारण सी बात है कि हम केवल निन्दा से डरते हैं जिसके कारण विभिन्न समूहों का मिलना कठिन हो जाता है। परन्तु किसी विशेष चीज के सम्बन्ध में हमें हमेशा अपने विचारों की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से परिणाम प्राप्त करने के लिये करनी चाहिये। इस तरह के विवरण के प्रकाश में हम अफगानिस्तान में सोवियत संघ की उपस्थिति को स्पष्ट रूप से निन्दा करने से भारत के इन्कार का वर्णन कर सकते हैं। यह गुटनिरपेक्षता का प्रौढ़ पहलू था जिससे हम निन्दा से भी बचे तथा इसके साथ-साथ अफगानिस्तान से सोवियत सेनाएं हटाने के लिये कार्य करते रहे। इस प्रकार गुटनिरपेक्षता निष्क्रिय नहीं है, यह सकारात्मक रूप से सक्रिय नीति है।

  3. गुटनिरपेक्षता ने नए राज्यों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में मनचाही भूमिका निभाने में सहायता की है

    गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त ने नए राज्यों की युद्धोत्तर काल की विश्व राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने में सहायता की है। गरीबी, आर्थिक तथा औद्योगिक पिछड़ापन तथा बहुत सी सीमित सैन्य शक्ति में क्षीण स्थिति होने के बावजूद वे अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने तथा शीत युद्ध के इस युग में सक्रिय भूमिका निभाने की स्थिति में हैं। जैसा कि के.एम. पनिकर लिखते हैं, “अपने आप को शीत युद्ध के झगड़ों से दूर रखकर भारत अपनी स्वतन्त्र स्थिति बना चुका है जिसके द्वारा वह दूसरे राज्यों के सहयोग से अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए कार्य करने के योग्य है।” अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए बहुत से विद्वानों द्वारा यह उचित ही कहा गया है कि अपनी कमजोरी के बावजूद, उन्होंने विश्व राजनीति ये यथायोग्य भूमिका निभाई है।

  4. गुटनिरपेक्षता संयुक्त राज्य अमरीका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ दोनों की नीतियों पर प्रभाव डालने का स्त्रोत बनी

    नए बने गुटनिरपेक्ष राज्यों को अपनी स्वतन्त्र विदेशी नीति का अनुकरण करने तथा व्यक्तिगत मूल्यांकन कर आधारित निर्णय लेने की वचनबद्धता उनकी शक्ति सुदृढ़ता का स्त्रोत है। दोनों, अमरीका तथा सोवियत संघ उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करते रहे तथा उनका समर्थन प्राप्त करने में गहरी दिलचस्पी लेते रहे। गुटनिरपेक्ष राष्ट्र बहुत-सी अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं तथा मामलों पर दोनों देशों की नीतियों को प्रभावित करने में सफल रहे।

  5. गुटनिरपेक्षता दोहरी गुटबन्दी नहीं है

    इसके अतिरिक्त गुटनिरपेक्षता दोहरी गुटबन्दी नहीं है। इसका अर्थ दोनों गुटों के साथ सैन्य या राजनीतिक गुटबन्दी नहीं है। इसका गुटबन्दी में कोई विश्वास नहीं, फिर भी इसका अर्थ है सभी के साथ मित्रता और समानता तथा परस्पर सम्मान पर आधारित सहयोग है। निश्चत ही निष्पक्ष मूल्यांकन के कमी के कारण कुछ लोग इसे दोहरी गुटबन्दी मानते हैं। किसी एक महाशक्ति के साथ मित्रता, दूसरी महाशक्ति के सम्बन्धों में मूल्य पर या विरुद्ध नहीं है। उदाहरण के लिए भारत ने कभी भी अमरीका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ के साथ अपने सम्बन्धों का गलत फायदा उठाने की कोशिश नहीं की थी। इसके विपरीत भारत ने दोनों को निकट लाने का प्रयत्न किया तथा दोनों के बीच दीतां प्रक्रिया में सहायता की थी। गुटनिरपेक्ष देशों ने साम्यवादी तथा गैर-साम्प्रदायी देशों के निकट लाने का सदैव प्रयत्न किया तथा इसमें सफल भी हुए।

  6. शीत युद्ध को कमजोर करने में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की सक्रिय भूमिका

    गुटनिरपेक्षता ने निश्चय ही शीत युद्ध को कम करने में भूमिका निभाई। भारत जैसे कुछ देशों द्वारा गुटनिरपेक्षता अपनाने का निर्णय, शीत-युद्ध में कमी लाने का साधन बना। 1950 के दशक में यदि भारत किसी एक गुट में शामिल हो गया होता तो शीत युद्ध और भी भड़क सकता था। किसी भी गुट में शामिल होने की समस्या पर टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा था, “अगर सारा विश्व इन दोनों बड़े शक्ति-गुटों के बीच बंट जाये तो परिणाम क्या होगा? इसका अनिवार्य परिणाम युद्ध होगा। इससे शत्रुता बढ़ेगी तथा तनावों में वृद्धि होगी।” इसलिए भारत ने शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति को अपनाने का निश्चय किया तथा किसी भी शक्ति-आधारित राजनीति में शामिल होने से इन्कार कर दिया। खुश्चेव के अधीन सोवियत संघ की विदेशी नीति में शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व को स्वीकार किया गया। इसी तरह अमरीका ने भी धीरे-धीरे गुटनिरपेक्षता तथा शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के मूल्य को स्वीकार कर लिया। भारत के विरुद्ध चीन के आक्रमण के बाद अमरीका ने भी यह मान लिया कि भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता जारी रखना स्वाभाविक रूप से लाभदायक नीति था। गुटनिरपेक्षता ने 1971-80 तथा 1985-91 के बीच दीतां के प्रादुर्भाव में सक्रिय भूमिका निभाई।

  7. गुटनिरपेक्षता गुटबन्दी से अच्छी है

    गुटनिरपेक्षता की सफलता का वर्णन, गुटबन्दी की नीतियों की कार्य-कुशलता तथा गुटनिरपेक्षता की नीतियों की कार्यकुशलता के बीच तुलना करके किया जा सकता है। आजकल गुटनिरपेक्षता अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन बन गया है। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है तथा इस समय राज्यों का बहुत बड़ा समूह (114 राज्यों का समूह) इस नीति पर चल रहा है। इसके विपरीत महाशक्तियों की गुटबन्दी या शक्ति संधियां कमजोर हो गई हैं। वार्सा समझौता समाप्त हो चुका है तथा नाटो कुछ कमजोर पड़ चुका है और कुछ बदल चुका है। गुटबन्दी की नीति वास्तविक तथा सक्रिय होने में असफलत ही रही है। अमरीका की सन्धि व्यवस्था में दरारें पैदा हो गई हैं। फ्रांस लगभग इससे बाहर है तथा वह गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के आने वाले सम्मेलन में एक प्रेक्षक स्तर पाने का इच्छुक है और चीन ऐसा स्तर प्राप्त कर चुका है। बहुत से पूर्वी यूरोपीय तथा नये स्वतन्त्र हुए भूतपूर्व सोवियत संघ के राज्य अब गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का भाग बनना चाहते हैं। इसी प्रकार रूस के गुट में दरारें पैदा हो गई थीं। चीन तथा पोलैंड के उदाहरण दिये जा सकते हैं। बहुत से राष्ट्र, जैसे पाकिस्तान, अब गुटबन्दी के स्थान पर गुटनिरपेक्षता को श्रेष्ठ समझते हैं। इस तुलना से पता चलता है कि गुटनिरपेक्षता की नीति का सिद्धान्त गुटबन्दी से अधिक गतिशील सिद्धान्त है। तीसरे विश्व के नेता गुटनिरपेक्षता के मूल्य तथा लाभ पहले से देख पाने की दूरदृष्टि रखते थे।

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