गुटनिरपेक्षता के मुख्य स्रोत

गुटनिरपेक्षता की अवधारणा, नकारात्मक तथा सकारात्मक तत्त्व

विदेश नीति के सिद्धान्त के रूप में गुटनिरपेक्षता की उत्पत्ति तथा विकास में कुछ तत्त्वों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। निश्चय ही शीत-युद्ध तथा संधियों के दूर रहने की नीति के रूप में गुटनिरपेक्षता को अपनाने के कई कारण थे, जिनसे इसका औचित्य सिद्ध होता था तथा इसके साथ-साथ स्वतन्त्र विदेश नीति का सिद्धान्त अपनाने के भी कुछ कारण थे। शीत युद्ध, सैनिक तथा राजनीतिक संधियां, द्विधुवीयता तथा दो गुटों के बीच शक्ति-राजनीतिक जिसमें प्रत्येक का नेतृत्व एक-एक उच्च शक्ति करती थी, के प्रादुर्भाव ने इन भयानक परिस्थितियों से दूर रहने की आवश्यकता को जन्म दिया। नए बने सम्प्रभु राज्य इन परिस्थितियों को व्यर्थ तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा नए राष्ट्रों की सुरक्षा के लिए घातक समझते थे। टी.एन. कौल के शब्दों में, “नेहरू यह विश्वास करते थे कि शांति सामान्यतः सारे विश्व की और विशेषतया नए बने राज्यों की आवश्यकता है। वे यह अनुभव करते थे कि यदि नए राज्य प्रतिद्वन्द्वी तथा परस्पर विरोधी सैन्य गुटों से दूर रहेंगे, तो शांति की सम्भावनाएं अधिक हो जायेंगी और अगर वे एक दूसरे गुट में ही पंक्तिबद्ध हो जायेंगे तो वे महाशक्तियों के हाथ का खिलौना बन जायेंगे तथा इससे तनाव तथा खतरा बढ़ेगा।” इसके अतिरिक्त राज्य को सुदृढ़ करने के काम पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता, पिछड़ेपन तथा निर्धनता से लड़ने की आवश्यकता तथा कार्य करने की स्वतन्त्रता को बनाये रखने का सिद्धान्त भी गुटनिरपेक्षता को अपनाने के लिए आधार बने। इस तरह दोनों नकारात्मक तथा सकारात्मक, बाह्य तथा आन्तरिक तत्त्वों ने गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त निर्माण तथा इसके अंगीकरण को प्रभावित किया । गुटनिरपेक्षता की अवधारणा के निर्माण तथा विकास में सहायक होने वाले निम्नलिखित नकारात्मक एवं सकारात्मक मुख्य तत्त्व रहे हैं :

A. नकारात्मक तत्त्व (Negative Elements)

  1. शीत युद्ध का विरोध

    दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही दोनों महाशक्तियों, अमरीका तथा (भू.पू.) सोवियत संघ के बीच युद्ध शुरू हो गया। युद्धकालीन सहयोग भूला दिया गया तथा सारे विश्व पर आधिपत्य जमाने के प्रयत्न किए जाने लगे। पहले वाले शक्तिशाली राज्यों की कमजोर शक्ति स्थिति के कारण जो शक्ति शून्य पैदा हो गया था, उसने अमरीका तथा सोवियत संघ को विश्व राजनीति में प्रधान स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रतिद्वन्द्वी बना दिया। दोनों निरन्तर एक दूसरे के आलोचक होते गये तथा प्रत्येक ने दूसरे को अलग-थलग करने की नीति अपना ली। दोनों शस्त्र-दौड़ में शामिल हो गए। अमरीका परमाणु-शस्त्रों पर अपना एकाधिकार बना कर अपनी श्रेष्ठ स्थिति पैदा करना चाहता था तथा इस स्थिति को दूसरे राष्ट्रों पर, विशेषतः नए उदय हो रहे सम्प्रभु राज्यों पर प्रभाव जमाने के लिए प्रयुक्त करना चाहता था। इसने सोवियत संघ की बढती शक्ति का विरोध करना तथा ललकारना शुरू कर दिया। अमरीका की इस तरह की चालों का सोवियत संघ ने प्रत्युत्तर दिया तथा वह भी अपनी शक्ति बढ़ाने वाली नीतियों को अपनाने तथा विश्व-राजनीति को प्रभावित करने लगा। वह साम्यवाद के प्रसार के लिए कठिन परिश्रम करने लगा तथा बहुत से पूर्वी यूरोप के राज्यों में साम्यवादी व्यवस्था स्थापित करने में सफल भी हो गया। 1949 में चीन के साम्यवादी राज्य बन कर उभरने में सोवियत संघ के साम्यवाद के प्रसार के प्रयत्नों को तथा अमरीका के पूंजीवाद को चुनौती देने तथा इसका विरोध करने वाली प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला और इसका परिणाम यह निकला कि सोवियत संघ तथा अमरीका के बीच शीत युद्ध छिड़ गया।

नए राज्य शीत युद्ध से बचना चाहते थे क्योंकि इसे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा के लिए बहुत भयानक समझा जाता था। वे यह मानते थे कि शीत युद्ध से एक नया युद्ध छिड़ सकता था तथा इसमें शामिल होने पर उनकी कार्य करने की स्वतन्त्रता सीमित हो जाएगी अथवा स्पष्ट रूप से समाप्त ही हो जाएगी।

  1. सैनिक गठबन्धनों का विरोध

    शीत युद्ध के युग 1945-90 में दोनों महाशक्तियों ने अपनी-अपनी शक्ति स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए कड़ा परिश्रम किया। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने समर्थकों या गुट या अनुयायियों के साथ राजनीतिक तथा सैनिक संधियां करना शुरू कर दिया। NATO, SEATO, ANZUS आदि संधियों द्वारा अमरीका अपने मित्रों तथा समर्थकों को अमरीकी गुट में शामिल करने में सफल हो गया। सोवियत संघ ने अमरीका की इस कार्यवाही के प्रत्युत्तर में साम्यवादी देशों के साथ, जो उसके प्रति वफादार थे तथा इसके समर्थक थे, वार्सा समझौता (Warsaw Pact) कर लिया। संधियों तथा प्रति-संधियों की इस व्यवस्था ने तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर दी, जिससे एक संधि एक सदस्य दूसरी संधि के सदस्यों के दुश्मन माने जाने लगे। शीत-युद्ध के उपकरण के रूप में इन संधियों ने परस्पर भय तथा राष्ट्रों में क्रोध और अविश्वास पैदा कर दिया। इससे वातावरण तनावग्रस्त हो गया। भारत जैसे नए देश बहुत चिंतित हो गए क्योंकि वे इन संधियों को बड़ा भयानक उपकरण समझते थे। इसलिए वे इन संधियों से दूर रहना चाहते थे। इन संधियों को गुटनिरपेक्ष राज्यों ने अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा तथा राज्यों की स्वतन्त्रता के लिए भय मानकर इनका विरोध किया। संधियों की स्थापना शीत-युद्ध के युग की महत्वपूर्ण विशेषता थी परन्तु गुटनिरपेक्ष राष्ट्र यह अनुभव करते थे कि संधियों विश्व शान्ति के लिए तथा इन संधियों के सदस्यों की प्रतिरक्षा के लिए हानिकारक थीं। इसलिए सबसे श्रेष्ठ ढंग यही था कि इन संधियों से दूर रहा जाये। इसके अतिरिक्त किसी भी एक संधि में शामिल होने का अर्थ था दूसरी विरोधी संधि के सदस्यों के साथ दुश्मनी मोल लेना। यही बहुत से राष्ट्र नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने इनसे तथा महाशक्तियों की शक्ति राजनीति से दूर रहने का निर्णय किया। इस पहलू ने और शीत-युद्ध के विरोध ने गुटनिरपेक्षता की उत्पत्ति के लिए सुदृढ़ आधार प्रस्तुत किया।

  2. साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध

    यूरोपीय साम्राज्य के पंजे में बहुत अधिक देर तक कष्ट भोगने के बाद नए राज्यों ने साम्राज्यवाद की प्रक्रिया का कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया था। ऐसे प्रत्येक राष्ट्र ने अपनी स्वतन्त्रता को बनाए रखने का दृढ़ संकल्प किया हुआ था। इसलिए नए बने राज्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी नीतियों तथा निर्णयों पर बाहरी नियन्त्रण सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि किसी भी संधि में उनके शामिल होने से वे न केवल शीत-युद्ध में घसीट लिए जायेंगे। अपितु इससे उनकी नीतियों पर महाशक्तियों के नियन्त्रण की सम्भावनाएं भी बढ़ जायेंगी। इससे एक नए प्रकार का साम्राज्यवाद पैदा हो जायेगा। इसे सैनिक संधियां करने की पुरानी प्रक्रिया को दोहराना ही समझा गया। यह अनुभव किया गया कि इन संधियों द्वारा महाशक्तिशाली तथा विकसित राष्ट्र नये बने देशों की स्वतन्त्रता को खतरे में डाल देंगे। इसलिए उन्होंने साम्यवादी तथा गैर-साम्यवादी दोनों गुटों की संधियों का विरोध करने का निर्णय किया। इस तरह साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के विरोध में गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्त को अंगीकार करने का समर्थन किया।

  3. युद्ध का भय

    नए राज्य शान्ति चाहते थे। वे इसे अधिक से अधिक ही चाहते थे क्योंकि उन्हें सदियों के कष्टों के बाद अपने आपको विकसित तथा कल्याणकारी राज्य बनाने का अवसर मिला था। उनके नेता यह विश्वास करते थे कि शीत-युद्ध तथा किसी एक महाशक्ति की राजनीतिक में लिप्तता से युद्ध का खतरा अर्थात् दूसरी तरफ से आक्रमण का भय बन जायेगा। इसलिए शान्ति के लिए यह आवश्यक था कि वे गुटनिरपेक्ष रहें तथा शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा दूसरे देशों के साथ मित्रता करने के लिए कार्य करें।

B. सकारात्मक तत्त्व (Positive Elements)

  1. स्वतन्त्र विदेशी नीति की इच्छा

    अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त करने के पश्चात् प्रत्येक नया राज्य अपने राष्ट्रीय हितों को प्राप्त करने के लिए वचनबद्ध था जिसमें विदेशी सम्बन्धों में महाशक्तियों के हस्तक्षेप से स्वतन्त्रता की इच्छा भी शामिल थी। किसी भी गुट के साथ गुटबन्दी से विदेश नीति का निर्णय करने तथा उसके अनुसरण में उसकी स्वतन्त्रता सीमित हो जायेगी। इसीलिए एक राज्य में गुटनिरपेक्षता की नीति को अपना लिया, क्योंकि इसका अर्थ है नीति-निर्माण कार्य की स्वतन्त्रता। इसका अर्थ है कि किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय समस्या पर उस मामले के गुणों तथा स्थिति के स्वतन्त्र अवलोकन के आधार पर निर्णय लेना। गुटनिरपेक्षता को इसलिए अपनाया गया था क्योंकि इससे नए राष्ट्र अपने व्यक्तिगत अस्तित्व बनाए रख सकते थे। गुटनिरपेक्षता की नीति को उचित ठहराते हुए नेहरू ने फिर कहा था, ‘नीति अपने आप में केवल हमारी श्रेष्ठ मूल्यांकन के अनुसार कार्य करने की नीति हो सकती है।” तथा ”हमें मामलों के गुणों के आधार पर मूल्यांकन करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए।” गुटबन्दी का केवल एक अर्थ है- स्वतन्त्र मूल्यांकन तथा कार्य की स्वतन्त्रता का त्याग । नए राज्य ऐसी स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए उन्होंने गुटनिरपेक्षता को अपनाया।

  2. राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रीय हित

    स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् ही भारत जैसे नए राज्यों ने अपनी विदेश नीतियों को राष्ट्रीय हितों पर आधारित करने का अवसर प्राप्त किया। स्वतन्त्रता से पहले की नीतियां हमेशा ही साम्राज्यवादी शक्तियों के साम्राज्यवादी हितों पर आधारित होती थीं। स्वतन्त्रता के बाद प्रत्येक नया राज्य अपनी अर्थव्यवस्था तथा समाज को अपने-अपने दृष्टिकोण तथा जीवन ढंग के अनुसार आकार देने के लिए वचनबद्ध था। उनके नेता आर्थिक विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहते थे और इसके लिए बड़े पैमाने पर साधनों की आवश्यकता थी। यह अनुभव किया गया कि शीत युद्ध तथा सन्धियों में शामिल होने से नये राज्य रास्ता भटक जायेंगे। इससे सुरक्षा की समस्या पैदा होगी क्योंकि किसी भी एक गुट में शामिल होने से दूसरे पर दूसरी प्रतिक्रिया होगी, तथा सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी। इसलिए भारत जैसे राष्ट्रों ने अपनी सुरक्षा तथा आन्तरिक पुनर्निर्माण की समस्या के कारण गुटनिरपेक्षता को अपनाने का निर्णय लिया। नेहरू ने गुटनिरपेक्षता को अपनाना इसलिए उचित ठहराया, क्योंकि शीत युद्ध के इस युग में भारत के राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति का यही सबसे अच्छा साधन माना गया। तथापि यह स्पष्ट कर देना होगा कि राष्ट्रीय हितों की व्याख्या हमेशा व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा एवं विकास के उद्देश्यों को सामने रखकर ही की जाती है। गुटनिरपेक्ष अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा तथा नए राज्यों के राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति दोनों के लिए बनाई गई है।

  3. आर्थिक विकास की आवश्यकता

    स्वतन्त्रता के बाद राज्यों के सामने जो मूलभूत समस्याएं थीं, वे आन्तरिक थीं न कि बाह्य । वे निर्धन थे, आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे तथा निर्भर थे। चाहे उनके पास पर्याप्त प्राकृतिक साधन तथा मानव-शक्ति थी परन्तु इन साधनों का प्रयोग करना इतना आसान काम नहीं था। इसके लिए न केवल साधनों को गतिशीलता, देशी तकनीक तथा देश में तकनीकी विकास तथा तकनीकी ज्ञान के आयात की आवश्यकता थी अपितु सभी विकसित देशों से आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्राप्त करने की भी आवश्यकता थी, ताकि देश में आर्थिक विकास के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अनुकूल विश्वजन्य वातावरण भी मिल सके। किसी एक गुट या शक्ति के साथ गुटबन्दी से सहायता तथा आर्थिक सहायता का क्षेत्र सीमित हो जाता । गुटनिरपेक्षता के कारण दूसरी ओर साम्यवादी तथा गैर-साम्यवादी, पूर्व तथा पश्चिम दोनों प्रकार के राष्ट्रों से आर्थिक सहायता मिल सकती थी। सभी विकसित देशों में सहायता पाने की भावना ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए सुदृढ़ आधार प्रस्तुत किया।

इसके अतिरिक्त यह भी अनुभव किया गया कि गुटबन्धी से शीत युद्ध तथा उस समय की दोनों महाशक्तियों के बीच चल रही शक्ति-राजनीति में अभिवृद्धि होगी। इससे तनाव तथा अस्थिरता बढ़ेगी। राज्य आर्थिक विकास के लिए न केवल देश के अन्तर शांतिपूर्ण परिस्थितियां तथा सुरक्षा चाहते थे बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तथा विश्व के दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसा ही चाहते थे। इन दोनों बातों ने भी उन्हें महाशक्तियों तथा शीत युद्ध से दूर रहने के लिए प्रेरित किया तथा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया।

  1. शान्ति तथा शान्तिपूर्ण साधनों के प्रति प्यार

    गुटनिरपेक्षता को स्वीकार करने में एक अन्य सकारात्मक कारण, शांति तथा शान्तिपूर्ण साधनों के मूलभूत मूल्यों के रूप में स्वीकार करना है। बहुत से राज्यों में जो स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष हुए उनके पीछे शान्ति तथा समृद्धि के मूल्य थे। स्वतन्त्र होने के बाद वे प्राकृतिक रूप से ही शांति के लिए वचनबद्ध थे। राज्य के अन्दर शांति अभिन्न रूप से बाहर की शांति से जुड़ी हुई होती है। शीत-युद्ध तथा सैनिक सन्धियां शांति का प्रतिवाद थीं। इन्हें विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा भय समझा जाता था। दोनों महाशक्तियों के बीच परमाणु शस्त्रों सहित शस्त्र-दौड़ होने की स्थिति और भी अधिक बिगड़ गई थी तथा इसे तीसरी तथा सबसे बड़ी भयानक परिस्थिति समझा जाता है। उनके बीच शीत-युद्ध की विद्यमानता से विध्वंसकारी युद्ध की सम्भावनाएं बढ़ गई। नए स्वतन्त्र हुए देश इससे बहुत आशंकित हुए तथा उन्होंने विश्व-शान्ति को बनाए रखने के लिए सहायता करनी चाही, जिसके साथ उनकी अपनी शान्ति तथा विकास की सम्भावनाएं जुड़ी हुई थीं। गुटनिरपेक्षता शीत-युद्ध तथा सन्धियों को तथा इसके साथ-साथ इन दोनों द्वारा पैदा किए गए तनावों को फैलने से रोकने वाला सबसे अच्छा सिद्धान्त माना गया । इसे उन्होंने इसलिए अपनाया ताकि युद्ध की अपेक्षा शान्ति की सम्भावनाएं अधिक सुदृढ़ हो सकें।

  2. विश्वराजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा

    गुटनिरपेक्षता अपनाने का अन्य महत्वपूर्ण कारण यह था कि नए राज्य अपने आपको शीत-युद्ध में लिप्त हुए बिना तथा अपने राष्ट्रीय हितों को कठिनाई में डाले बिना विश्व राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद उन्हें अपने अन्तर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का, विशेषतया विश्व शान्ति तथा सुरक्षा के प्रति, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद तथा जातिवाद की समाप्ति के प्रति, राष्ट्रीय उदारवादी आन्दोलन के प्रति, संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति अपने अन्तर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का पता चला। वे राष्ट्रों के शिष्टाचार में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे तथा वे अपने इस उत्तरदायित्वों का पता चला। वे राष्ट्रों के शिष्टाचार में सक्रिया भूमिका निभाना चाहते थे तथा वे अपने इस उत्तरदायित्व के मुँह नहीं मोड़ना चाहते थे और न ही अलगाववाद को अपनाना चाहते थे। इसके लिए निश्चय ही कार्य करने की स्वतन्त्रता तथा सन्धियों और शक्ति-गुटों से बाहर रहने की आवश्यकता थी। वे कैम्प-अनुयायी नहीं बनना चाहते थे। इसलिए उन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाना श्रेयस्कर समझा। इस तरह के बहुत से नए राज्यों के द्वारा अलग-अलग कारणों के कारण गुटनिरपेक्षता को अपनी विदेश नीति के मूलभूत सिद्धान्त के रूप में स्वीकारा गया। इसकी अवधारणा तथा निर्माण में बहुत से तत्त्वों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे विभिन्न समस्याओं तथा विकल्पों के विस्तृत परीक्षण के बाद अपनाया गया। इसे अचानक ही नहीं प्रकट कर लिया गया था। युद्धोत्तर काल में शीत-युद्ध तथा इसके द्वारा पैदा किये तनावों ने बहुत से राष्ट्रों के इस निश्चय को और भी दृढ़ कर दिया कि वे गुटनिरपेक्षता को अपनाएंगे तथा दोनों महाशक्तियों की सैनिक सन्धियों का विरोध करेंगे। अपने सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए, अपनी स्वतन्त्रता को बनाए रखने तथा प्रयोग की इच्छा ने इस तरह के प्रस्ताव को और भी सुदृढ़ कर दिया। इस सब के परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्षता की उत्पत्ति तथा विकास हुआ।

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