लार्ड कार्नवालिस का प्रशासनिक सुधार

लार्ड कार्नवालिस का प्रशासनिक सुधार

भारत के इतिहास में लार्ड कार्नवालिस को अपने सुधारों के कारण विशेष स्थान प्राप्त है। उसने वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा प्रारम्भ किये गये अपूर्ण सुधारों को पूर्ण करने के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था के अन्य दोषों को भी दूर करने का प्रयास किया। अपने कार्यकाल में कार्नवालिस ने निम्न सुधार किये-

  1. लगान सम्बन्धी सुधार

लार्ड कार्नवासि का सबसे प्रमुख सुधार राजस्व प्रणाली का सुधार था। उसके इस सुधार के पूर्व सर्वाधिक बोली लगाने वाले को एक दो वर्ष के लिए भूमि दी जाती थी। परिणामस्वरूप एक ओर तो भूमि बंजर हो गई तथा दूसरी ओर व्यापार चौपट हो गया। जमींदार भी परेशान थे तथा जनता भूखी मरने लगी थी। लार्ड कार्नवालिस ने सन् 1780 में जमींदारों को 10 वर्ष के लिए भूमि दे दी। इस प्रकार की व्यवस्था से सरकार, जनता एवं जमींदारों अर्थात् सभी वर्गों को बड़ा लाभ हुआ।

  1. प्रशासनिक सुधार

  • सर्वप्रथम लार्ड कार्नवालिस ने अपेन व्यक्तिगत उदाहरण, ईमानदारी तथा आदर्श चरित्र दआवरा कम्पनी के कर्मचारियों में भी ईमानदारी की भावना जागृत की।
  • उसने कम्पनी को पक्षपात के कारण उत्पन्न होने वाले अनेक दोषों से बचाने का प्रयास किया।
  • उसने अनेक अनावश्यक पदों को भी समाप्त कर दिया। ये पद कंपनी के संचालकों अथवा नियंत्रण परिषद् के सदस्यों तथा उनके सम्बन्धियों को प्रसन्न करने के लिए बनाये गये थे।
  • उसने कम्पनी के संचालकों को कर्मचारियों के वेतनों में वृद्धि करने को बाध्य किया ताकि वे किसी प्रकार के लालच में न आवें।
  • निजी व्यापार तथा घूसखोरी को रोकने के लिए कठोर नियम बनाये गये तथा इन कार्यों को करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाता था।
  1. न्याय सम्बन्धी सुधार

  • दीवानी न्यायालयों का पुनर्गठन

    दीवानी के मुकदमों का निर्णय करने के लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक छोटे-बड़े न्यायालयों की स्थापना की गई। मुन्सिफ तथा रजिस्ट्रार न्यायालय सबसे छोटे थे। मुन्सिफ 50 रुपये तक के तथा रजिस्ट्रार 200 रुपये तक के मुकदमे सुनने के अधिकारी होते थे। इन न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध जिला न्यायालय में अपील की जा सकती थी। जिला न्यायालयों में एक अंग्रेज जज तथा कुछ भारतीय कर्मचारी होते थे। न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील प्रान्तीय न्यायालयों में होती थी। ये प्रान्तीय न्यायालय कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद तथा पटना में स्थित थे। प्रत्येक प्रान्तीय न्यायालय में तीन अंग्रेज जज तथा अनेक भारतीय कर्मचारी होते थे। ये प्रान्तीय न्यायालय, कलकत्ता स्थित सदर दीवानी न्यायालय जो कि गवर्नर जनरल तथा उसकी काउन्सिल के अधीन होती थी, के अधीन होते थे।

  • फौजदारी न्यायालयों का पुनर्गठन

    दीवानी न्यायालयों के समान ही फौजदारी के न्यायालयों का भी पुनर्गठन किया गया। सबसे छोटा न्यायालय दरोगा का होता था तथा ये छोटे-छोटे फौजदारी के मुकदमों का निर्णय करते थे। प्रायः भारतीय ही दरोगा होते थे। इनके निर्णयों के विरुद्ध अपील जिला जज अथवा सेशन जज की जिला न्यायालय में होती थी। इन जिला न्यायालयों के ऊपर कलकत्ता, मुर्शिदाबाद, पटना तथा ढाका में प्रान्तीय न्यायालय थे। इनके जज वही थे जो सिविल न्यायालय के थे। कभी-कभी इन न्यायालयों को अपने प्रान्तों का दौरा भी करना होता था, वे घूमकर जनता को न्याय प्रदान करते थे। इन प्रान्तीय न्यायालयों द्वारा दिये गये मृत्यु-दण्ड की अपील की स्वीकृति सदर निजामत से लेनी पड़ती थी। सदर निजामत अदालत गवर्नर जनरल तथा उसकी काउन्सिल के अधीन कार्य करती थी।

  • कलक्टर न्याय सम्बन्धी अधिकारों से वंचित

    सन् 1793 तक कार्नवालिस वारेन हेस्टिंग्ज की नीति का ही अनुसरण करता रहा तथा कलक्टर एवं जिला जज का कार्य एक ही व्यक्ति करता रहा परन्तु सन् 1793 के उपरान्त उसमें परिवर्तन करके दोनों पदों को दो विभिन्न व्यक्तियों को दे दिया गया अब कलक्टर का कार्य केवल लगान इकट्ठा करना रह गया तथा जिले के सिविल न्यायालयों के जिले डिस्ट्रिक्ट जजों की नियुक्ति की गई।

  • कार्नवालिस कोड

    न्याय व्यवस्था में सुधार लाने के विचार से कार्नवालिस ने विभिन्न नियमों को संकलित करके एक न्याय विधान का निर्माण किया। वह न्याय विधान “कार्नवालिस कोड” के नाम से विख्यात है। इस कोड में अन्य बातों के अतिरिक्त हाथ-पाँव काटने आदि के अमानुषिक दण्ड समाप्त कर दिये गये।

  1. पुलिस सुधार

  • एक नये पुलिस विभाग की स्थापना की गई।
  • जमींदारों को उनके पुलिस अधिकारों से वंचित कर दिया गया तथा उन्हें अपने सभी सैनिक हटा देने के लिए बाध्य किया गया।
  • प्रत्येक जिले को अनेक थानों में बाँटा गया और प्रत्येक थाने को एक दरोगा के अधीन रखा गया। दरोगा की सहायता के लिए अनेक सिपाही भी होते थे।
  • जिले के सभी दरोगा जिला मजिस्ट्रेट के अधीन होते थे।
  • पुलिस प्रबन्ध को प्रोत्साहित करने तथा सुचारु बनाने के विचार से जिला मजिस्ट्रेट को चोरी का माल पकड़ने पर 10% कमीशन दिया जाता था, इसी प्रकार प्रत्येक डाकू को पकड़ने पर भी उसे एक संचित राशि मिलती थी।
  • पुलिस की इस व्यवस्था पर होने वाले व्यय की पूर्ति के लिए बड़े-बड़े नगरों की दुकानों पर थोड़ा-सा कर लगा दिया गया।
  1. व्यापारिक सुधार

सन् 1774 ई० में कम्पनी के लिए माल खरीदने के लिए एक व्यापारिक बोर्ड का गठन किया गया था। सन् 1778 ई0 में उस बोर्ड ने स्वयं माल न खरीद कर भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहने वाले अंग्रेज रेजीडेण्टों को ठेका देना आरम्भ कर दिया। परन्तु यह व्यवस्था अत्यन्त दोषपूर्ण थी। ये रेजीडेण्ट भारतीय व्यापारियों तथा जमींदारों पर दबाव डाल कर सस्ते मूल्य पर माल खरीदते थे तथा साथ ही वे अच्छा माल तो स्वयं रख लेते थे तथा खराब माल कम्पनी को दे देते थे। इस प्रथा को समाप्त कर सीधे ही सौदागरों तथा जमींदारों से माल खरीदने का ठेका कर लिया। इस प्रकार कम्पनी को अच्छा माल मिलने लगा तथा भारतीय व्यापारियों को भी अपने माल का पूरा मूल्य मिलने लगा।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि कार्नवालिस ने अल्पकाल में ही अनेक महत्वपूर्ण सुधार किये। उसने वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा प्रारम्भ किये गये सुधारों के कार्यक्रम को पूरा किया तथा कम्पनी के शासन को सुदृढ़ किया।

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