शैक्षिक निर्देशन

ैक्षिक निर्देशन 

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ

छात्रों के स्वाभाविक और समुचित विकास हेतु शिक्षा का विशेष महत्व है, परन्तु शिक्षा के द्वारा वांछित विकास की दिशा में अग्रसरण केवल तभी संभव है जब प्रत्येक बालक को अपनी वैयक्तिक विभिन्नताओं के अनुरूप विकास का अवसर प्राप्त हो। साथ ही विकास की प्रक्रिया, सतत् रूप से संचालित होती रहे, इसके लिए विभिन्न प्रकार की शैक्षिक समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है। निर्देशन का यही कार्य है। शिक्षा के सहभागी अंश के रूप में विद्यार्थी के समक्ष उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान हेतु उसे सक्षम बनाने तथा उसकी रूचि स्तर योग्यता आदि के अनुरूप शिक्षण-अधिगम की परिस्थितियों का चयन करने में निर्देशन सहायक है। शिक्षा की समस्त प्रक्रिया में अभिगम ही वह आधार होता है जिसकी दिशा में समस्त प्रयास किए जाते है तथा जिसके द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि किए गए प्रयास किस सीमा तक सफल रहे हैं। अधिगम के वर्गीकृत उद्देश्यों के आधार पर, अधिगम से सम्बन्धित यह जानकारी प्राप्त की जाती है यही कारण है कि अधिगम से सम्बन्धित समस्याओं को शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत यथेष्ट महत्व प्रदान किया जाता है।

परिभाषा (Definition)

बेबर के अनुसार- “शिक्षा निर्देशन चेतना अनुभूति प्रयत्न है, जिसके द्वारा व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता प्रदान की जाती है, कोई भी चीज जो शिक्षण या सीखने के साथ की जाती है, शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत आती है।”

जौन्स के अनुसार- ‘शिक्षा निर्देश वह व्यक्तिगत सहायता है जो छात्रों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय तथा पाठ्यतिरिक्त क्रियाओं का चयन कर सकें तथा उनमें समायोजित कर सकें।’

होपिकन्स ने भी, अधिगम की परिस्थितियों को सफल बनाने हेतु निर्देशन को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार-सैद्धान्तिक रूप से, निर्देशन प्रभावशाली सीखने का एक अंग है, अतः सीखने की परिस्थितियों के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रबन्धन में निर्देशन करना चाहिए।

आर्थर ई० ट्रेक्सलर के अनुसार- “निर्देशन प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की योग्यताएँ रूचियाँ और व्यक्ति सम्बन्धी गुणों को समझने, उनका सम्भावित विकास करने, उनको जीवन के उद्देश्यों से सम्बन्धित करने तथा अन्त में प्रजातान्त्रिक सामाजिक व्यवस्था के योग्य नागरिक की भाँति पूर्ण तथा परिपक्क स्वः निर्देशन की स्थिति तक पहुंचाने के योग्य बनाता है। अतः निर्देशन, विद्यालय के प्रत्येक अंग यथा पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, निरीक्षण, अनुशासन उपस्थिति की समस्याएँ, पाठ्यक्रम के अतिरिक्त क्रियाएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रम, गृह तथा समाज के सम्बन्धों से सम्बन्धित है।”

स्ट्रंग के अनुसार- “छात्रों की योग्यताओं एवं रूचियों का ज्ञान, शैक्षिक अवसरों के विस्तृत क्षेत्र का ज्ञान, कार्यक्रम के चयन व उसके लिए परामर्श आदि पर प्रकाश डालते हैं।”

जी० ई० मायर्स के अनुसार- “शैक्षिक निर्देशन एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक ओर व्यक्ति तथा उसके विशिष्ट गुण तथा दूसरी ओर अवसरों के विभिन्न समूह व माँगों के मध्य व्यक्ति के विकास या शिक्षा के लिए अनुकूल परिस्थित तैयार किया जाता है।”

शिक्षा निर्देशन को एक विधि के रूप में स्वीकार करते हुए हैमरिन तथा इरिक्सन ने शैक्षिक निर्देशन को परिभाषित करते हुए लिखा है-

“निर्देशन व्यक्तिगत छात्रों की योग्यताओं, रूचियों, पृष्ठभूमि तथा आवश्यकताओं का पता लगाने की विधि प्रदान करता है।”

शैक्षिक निर्देशन की विशेषताएँ (Characteristics of Educational Guidance)

शैक्षिक निर्देशन की इन परिभाषाओं में विशेषताओं, कार्यों एवं उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है। शिक्षा निर्देशन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है-

  1. शिक्षा निर्देशन विवेकपूर्ण प्रयास है जिससे छात्रों के मानसिक एवं बौद्धिक विकास में सहायता की जाती है।
  2. वह सभी अनुदेशन, शिक्षण तथा अधिगम की क्रियायें जो छात्र के विकास में सहायक होती है शिक्षा निर्देशन का अंग होती है।
  3. शिक्षा निर्देशन का सम्बन्ध छात्रों के विद्यालय समयोजन, अध्ययन विषयों के चयन करने तथा विद्यालय जीवन के कार्यक्रमों में सहायक होता है।
  4. शिक्षा निर्देशन के अन्तर्गत छात्रों की योग्यताओं एवं शक्तियों के अनुरूप अधिगम परिस्थितियों की व्यवस्था की जाती है।
  5. शिक्षा निर्देशन का सम्बन्ध विद्यालय की समस्त क्रियाओं पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों, अनुदेशन सामग्री, परीक्षा प्रणाली, विद्यालय का वातावरण आदि सभी, कार्यक्रमों की समस्याओं से होता है।
  6. शिक्षा निर्देशन में छात्रों की योग्यताओं, क्षमताओं तथा रूचियों के अनुरूप शिक्षण अधिगम परिस्थितियों की व्यवस्था करना तथा सम्बन्धित समस्याओं का समाधान देना है।
  7. शिक्षा निर्देशन में छात्रों को उनकी योग्यताओं की जानकारी दी जाती है। उनकी कठिनाइयों तथा समस्याओं का निदान करके उनके अनुरूप सुधारात्मक अनुदेशन की व्यवस्था की जाती है।
  8. शिक्षा निर्देशन का उद्देश्य छात्र को शैक्षिक कार्यक्रम के चयन में सहायता प्रदान करना जिससे छात्र भावी जीवन में विकास कर सके।

इन परिभाषाओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि शिक्षा निर्देशन भी छात्र के विकास में सहायक होती है तथा शिक्षा प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। शिक्षा सम्बन्धी सभी प्रकार की समस्याओं के समाधान में सहायक होती है।

बूअर के अनुसार- शिक्षा निर्देशन का क्षेत्र तथा क्रियाएँ इस प्रकार है-

  1. अध्ययन किस प्रकार किया जाए ?
  2. अधिगम सम्बन्धी सामान्य उपकरणों का प्रयोग कैसे करें ?
  3. विद्यालय में नियमित रूप से उपस्थित रहना।
  4. दिए गए गृह कार्यों तथा अन्य कार्यों को पूरा करना।
  5. परीक्षा में सम्मिलित होना।
  6. पुस्तकालय, वाचनालय, प्रयोगशाला का समुचित उपयोग करना।
  7. साक्षात्कार, बोलना, वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना।
  8. छात्रों की कठिनाइयों का निदान करके, सुधारात्मक शिक्षण तथा अनुदेशन की व्यवस्था करना।
  9. छात्रों को विषयों के चयन में सहायता प्रदान करना।

शिक्षा के निर्देशन के सिद्धान्त (Principles of Educational Guidance)

शिक्षा निर्देशन के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है :-

  1. निर्देशन समस्त छात्रों को उपलब्ध होना-निर्देशन सेवाएँ केवल चयनित विद्यार्थियों को ही प्रदान नहीं करनी चाहिए, वरन् ये सेवाएँ समस्त छात्रों को उपलब्ध होनी चाहिए, तभी निर्देशन प्रदाता अपने उद्देश्यों में सफल हो सकता है। जिस भी विद्यालय में निर्देशन कार्य चल रहा हो, उस विद्यालयों में, निर्देशन सेवाओं को इस प्रकार संगठित किया जाना चाहिए, जिसमें कोई भी छात्र वंचित न रह जाए।
  2. समस्या का समाधान, प्रारम्भ में ही होना-यदि किसी विद्यार्थी की, निर्देशन से सम्बद्ध कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो उसकी समस्या का समाधान तत्काल ही कर देना चाहिए, जिससे समस्या का रूप गम्भीर न हो सके।
  3. प्रमापीकृत परीक्षाओं को प्रयुक्त किया जाए-विद्यार्थियों द्वारा, विद्यालय में प्रवेश लेने पर, उन पर प्रमापीकृत परीक्षाओं का प्रशासन किया जाए। इन प्रमापीकृत परीक्षाओं से प्राप्त परिणामों के आधार पर, विद्यार्थी की किस पाठ्यक्रम में सफलता के बारे में भविष्यवाणी की जा सकेगी। इसके अतिरिक्त आने वाले समयों पर भी यदि इन परीक्षाओं का प्रयोग किया जाए तो उत्तम होगा।
  4. समुचित एवं सम्बन्धित सूचनाओं का संकलन किया जाए-पर्याप्त मात्रा में समुचित एवं सम्बन्धित सूचनाओं के संकलन के अभाव में, शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करना असंभव है। सफल निर्देशन प्रदान करने के लिए पर्याप्त सूचनाओं को संकलित करना आवश्यक है।
  5. छात्र का निरन्तर अध्ययन किया जाए-निर्देशन कहाँ तक सफल हुआ है ? यह ज्ञात करने के लिए, विद्यार्थी का व्यवसाय में लग जाने के उपरान्त भी उसका सतत् अध्ययन करना अधिक आवश्यक हैं अपने व्यवसाय में विद्यार्थी ने सफलता प्राप्त की है अथवा नहीं? इन्हीं बातों से निर्देशन की सफलता अथवा असफलता का ज्ञान हो जाता है। अतः व्यवसाय में लगे छात्रों की सफलता तथा असफलता का अध्ययन करना भी अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हैं अनुगामी सेवाओं का उपयोग होता है।
  6. विद्यालय एवं अभिभावकों के मध्य गहन सम्बन्ध स्थापित करना- शैक्षिक निर्देशन का एक अन्य महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि विद्यार्थी के विद्यालय एवं अभिभावकों के मध्यम गहन सम्बन्ध स्थापित किया जाए।

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