संसदीय प्रश्न

संसदीय प्रश्न

संसदीय प्रश्न

(Parliamentary Questions)

संसद द्वारा लोक उद्योगों पर नियन्त्रण के समस्त माध्यमों में सर्वाधिक प्रचलित तथा प्रायः संसद सदस्यों द्वारा सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला माध्यम संसदीय प्रश्न है। संसदीय कार्यवाही संचालन के नियम 32 के अन्तर्गत संसदीय कार्यवाही संचालन के प्रावधानानुसार जब तक अध्यक्ष कोई अन्य आदेश न दे दे, प्रत्येक बैठक का प्रथम घण्टा संसद सदस्यों को अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने हेतु उपलब्ध रहता है। लोक उद्योगों पर संसदीय प्रश्नों से सम्बन्धित कार्यवाही का विस्तृत विवेचन निम्न प्रकार है-

  1. प्रश्नों का उद्देश्य (Objectives of Questions)-

    संसद सदस्यों को लोक उद्योगों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने का तात्कालिक तथा सुगम साधन संसदीय प्रश्न है। प्रजातंत्रीय शासन व्यवस्था में लोक उद्योगों पर प्रश्न पूछकर संसद सदस्य निम्न उद्देश्यों का निर्वाह करते

  • लोक उद्योग अपने कार्यकलापों से सम्बन्धित सूचनाओं का प्रकाशन वार्षिक प्रतिवेदन (Annual Reports) तथा अन्य प्रलेखों में करते हैं। लेकिन कुछ सूचनाओं का प्रकाशन इस माध्यम से नहीं होता जिनके सम्बन्ध में संसद सदस्य सम्बन्धित मन्त्री से प्रश्न पूछकर अवगत होते हैं।
  • उचित विधि से पूछे गये प्रश्न प्रतिष्ठान कर्मचारियों तथा प्रबन्धकों के मनोबल पर अपेक्षित प्रभाव डालते हैं।
  • लोक उद्योगों से सम्बन्धित मंत्री के कुछ अनौपचारिक हस्तक्षेप तथा औपचारिक सम्बन्ध होते हैं। इनमें सम्बन्धित मंत्री का उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से प्रगट नहीं होता है। इस अस्पष्टता की आड़ में वह कुछ अनचाहे मगर व्यर्थ कार्य कर सकता है। प्रश्नों द्वारा संसद सदस्य मंत्री को उसकी सीमा में बाँधे रहते हैं।
  • संसदीय प्रश्न अवसर का एक ऐसा संक्षिप्त कथन है जिसके माध्यम से संसद सदस्य सरकार को उन सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों की रूपरेखा बताते हैं। जिसके क्रियान्वयन में संसद अभिरुचि रखती है।
  1. प्रश्नों का प्रकार (Types of Questions)-

    इस माध्यम तथा अवधि में संसद सदस्यों द्वारा पूछे जाने वाले समस्त प्रश्नों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • तारांकित प्रश्न (Starred Questions)-

    इन प्रश्नों का उत्तर सम्बन्धित मन्त्री द्वारा मौखिक रूप में दिया जाता है। कोई भी सदस्य एक दिन में तीन से अधिक तारांकित प्रश्न नहीं पूछ सकता है।

  • अतारांकित प्रश्न (Unstarred Questions)-

    इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर मंत्री लिखित रूप में देता है। प्रश्न का उत्तर देने हेतु सम्बन्धित मंत्री को प्रश्न से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने हेतु पर्याप्त समय देना पड़ता है। अतः इन प्रश्नों का उत्तर सम्बन्धित सदस्य को दस दिन पश्चात् प्राप्त होता है।

  • अल्प सूचना वाले प्रश्न (Short Notice Questions)-

    लोक महच (Public Interest) के ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर अल्प समय की सूचना में दिये जाने हों।

  • पूरक प्रश्न (Supplementary Questions)-

    अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त करके कोई भी सदस्य अपने किसी प्रश्न के उत्तर के स्पष्टीकरण के उद्देश्य से पूरक प्रश्न पूछ सकता है।

  1. स्वीकार्य प्रश्न (Allowable Questions)-

    सामान्यतः संसद सदस्यों से लोक उद्योगों की नीति सम्बन्धित अधिनियम अथवा जनहित से सम्बन्ध रखने वाले प्रश्नों को पूछने की अपेक्षा की जाती है। अध्यक्ष द्वारा निम्न प्रश्नों के पूछने की स्वीकृति प्रदान की जाती है-

  • जबकि प्रश्न का (अ) जनहित से सम्बन्ध हो (चाहे वह दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से सम्बन्धित क्यों न हो) तथा (ब) प्रश्न का उत्तर नीति सम्बन्धी हो, तथा
  • अतारांकित प्रश्नों की श्रेणी के ऐसे प्रश्न भी लिखित उत्तर देने हेतु स्वीकार होते हैं जिनकी प्रकृति सांख्यिकीय (Statistical) तथा विवरणात्मक (Descriptive) होती है।
  1. वर्जित प्रश्न (Restricted Questions)-

    संसदीय कार्य नीति के अनुसार लोक उद्योगों पर नियन्त्रण के इस माध्यम को अनायास राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के दृष्टिकोण से कुछ विशेष प्रकृति के प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था है। इस श्रेणी में निम्न प्रश्नों को सम्मिलित किया जाता है-

  • ऐसे प्रश्न जिनका दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से सीधा सम्बन्ध हो तथा जिनका उद्देश्य सम्बन्धित मंत्रालय को नीचा दिखाने का हो, तथा
  • प्रकाशित प्रलेखों में प्रस्तुत सूचनाओं के सम्बन्ध में सांख्यिकीय सूचनाएँ (Statistical Information) पूछना।

संसदीय प्रश्नों से फलदायक परिणाम तब ही प्राप्त किये जा सकते हैं जब दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से सम्बन्धित प्रश्नों को त्याग करके ऐसे प्रश्न पूछे जायें जो विधान सम्बन्धित अथवा सम्बन्धित मंत्री द्वारा सौंपे गये उत्तरदायित्वों के सम्बन्ध में गलती को उजागर करें। लेकिन व्यवहार में इस बात की पूर्ण अवहेलना करके संचालन सम्बन्धी तुच्छ प्रश्न पूछे जाते हैं जो प्रबन्धकों का मनोबल गिराने तथा उन्हें शुद्ध रूप से सरकार पर निर्भर रहने हेतु आग में घी का काम करते हैं। इंगलैण्ड में दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से सम्बन्धित प्रश्नों के पूछे जाने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाता है। इस सम्बन्ध में लॉड मोरीसन (Lord Morrison) का सुझव है कि यदि संसद प्रत्येक प्रश्न को पूछने की स्वतन्त्रता चाहती है तो राष्ट्रीयकृत उद्योगों को सरकारी विभाग में परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए लेकिन यदि सरकार ऐसे सार्वजनिक निगमों की स्थापना का निर्णय लेती है जिनमें सार्वजनिक हित समाविष्ट हो, लेकिन साथ ही स्वतन्त्र प्रकृति के उच्च व्यावसायिक प्रबन्ध की अपेक्षा हो, तो सांसद को किसी भी मूल्य पर दिन प्रतिदिन के मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के प्रबन्ध में लोच तथा स्वच्छन्दता आवश्यक है। इस तथ्य को सिद्धान्ततः स्वीकार करके संसद को सार्वजनिक प्रतिष्ठानों से सम्पूर्ण जवाबदेयता (Accountability) की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए।

  1. अध्यक्ष के अधिकार (Rights of Chairman)-

    यद्यपि नीति सम्बन्धी प्रश्नों तथा दिन-प्रतिदिन के संचालन से सम्बन्धित प्रश्नों के मध्य किसी स्पष्ट अंतर की रेखा का खींचना कठिन है, तब भी सम्बन्धित मंत्री तथा संसद सदस्यों के मध्य अनायास टकराव उत्पन्न न होने देने के दृष्टिकोण से अध्यक्ष को सामान्यतः यह अधिकार प्राप्त होता है कि वह जनहित से सम्बन्धित अथवा किसी सैद्धान्तिक प्रश्न को स्वीकार कर ले, चाहे उसका सम्बन्ध दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से ही क्यों न हो। भारत के सम्बन्ध में यह प्रचलित है कि जिन प्रश्नों का उत्तर मंत्री देना नहीं चाहता उन्हें दिन-प्रतिदिन के प्रशासन से सम्बन्धित प्रश्न कहकर टाल देता है।

  2. सदस्यों के अधिकार (Rights of Members)-

    संसद सदस्यों को संसद में सम्बन्धित मंत्री से प्रश्न पूछने के अधिकार के अतिरिक्त वैधानिक निगमों (Statutory Corporations) तथा सीमित कम्पनियों (Limited Companies) के कार्यकलापों के सम्बन्ध में भी प्रत्यक्ष (Direct) प्रश्न पूछने का अधिकार है। इसके लिए सम्बन्धित निगम अथवा कम्पनी में सरकार का वित्तीय (Financial)अथवा नियंत्रक (Controlling) हित होना आवश्यक है। इस प्रकार पूछे जाने वाले प्रश्नों की व्यवस्था के अन्तर्गत सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे ही प्रश्न पूछे जिनकी लोकसभा में पूछे जाने की अनुमति हो। यदि प्रतिष्ठान किसी विषय पर सदस्यों को सूचनायें प्रदान नहीं करता तो सदस्यों को नियमों के अंतर्गत संसद में प्रश्न पूछने का अवसर प्राप्त होता है। इस सम्बन्ध में श्री खेरा का विचार है कि लोक उद्योगों को इस प्रकार के आदेश दिये गये हैं कि वे संसद द्वारा पूछी जाने वाली सूचनाओं का उत्तर अवश्य दें लेकिन इस सम्बन्ध में इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि इन सूचनाओं का प्रबन्धकों के दायित्वों से टकराव न हो तथा न ही उनकी प्रकृति गोपनीय हो। किसी संदेह की स्थिति में लोक उद्योग को सम्बन्धित मंत्री से सलाह ले लेनी चाहिए। संसद सदस्यों को भेजी जाने वाली सूचनाओं की एक प्रति सम्बन्धित मन्त्री को भी दे देनी चाहिए।

  3. प्रश्नों की प्रविधि (Techniques of Questions)-

    लोक उद्योगों पर संसदीय नियन्त्रण के अंतर्गत संसद सदस्यों द्वारा सम्बन्धित मंत्री से प्रश्न पूछने का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस माध्यम से एक तरफ जहाँ सदस्यों को लोक उद्योगों के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं वहीं दूसरी तरफ सरकार को भी महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी नीति की व्याख्या करने का अवसर प्राप्त होता है। इस सम्बन्ध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि प्रश्नों का पूछा जाना तब ही फलदायक होगा, जबकि सदस्यों द्वारा सम्बन्धित उद्योग के वार्षिक प्रतिवेदन (Annual Report) का पूर्णतः अध्ययन करके विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ली गयी हो। पिछला अनुभव स्पष्ट करता है कि लोक उद्योगों से सम्बन्धित संसद में पूछे प्रविधि को अपनाये जाने की आवश्यकता है।

इस शीर्षक के अंतर्गत किये गये उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रश्नोत्तर की वर्तमान व्यवस्था स्वायत्तशासी (Autonomous) संगठनों के गठन को प्रोत्साहन देने के मार्ग में सबसे प्रमुख बाधा है। इस प्रकार की व्याख्या दोषों से परिपूर्ण है। इस सम्बन्ध में प्रो० रॉब्सन का विचार है कि एक बार यदि राष्ट्रीयकृत उद्योग पर संसद में प्रश्न पूछने की व्यवस्था को स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो सार्वजनिक निगमों को प्राप्त अधिकारों एवं स्वतंत्रता का अंत हो जायेगा। लोक उद्योगों को संसद में प्रश्नों की अनचाही बौछार से बचने हेतु अपने वार्षिक प्रतिवेदन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए कि यह प्रतिवेदन स्वयं ही संसद सदस्यों के प्रश्नों का उत्तर प्रस्तुत कर सकने में सक्षम हो। इन प्रतिवेदनों में सूचनाओं का विस्तृत विवरणात्मक विवेचन होना चाहिए। इस सम्बन्ध में प्रशासनिक सुधार आयोग का भी विचार है कि लोक उद्योगों द्वारा अपने वार्षिक प्रतिवेदन में अपूर्ण सूचनाओं के प्रस्तुतीकरण के कारण ही संसद में अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। यदि वार्षिक प्रतिवेदन को सजगता से तैयार किया जाय तो सदस्यों को अपने बहुत से प्रश्नों का उत्तर प्रतिवेदन में ही प्राप्त हो जायेगा।

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