भारतीय शासन अधिनियम, 1919 के पारित होने के कारण

भारत शासन अधिनियम, 1919 के पारित होने के कारण

कोई भी अधिनियम पारित होता है तो उसके पीछे कई कारण होते है, कई घटनाएँ होती है। 1919 के अधिनियम के पारित होने के भी कई कारण थे। इससे पहले जो मार्ले मिंटो सुधार हुए वे त्रुटिपूर्ण, अपर्याप्त तथा भारतीयों की समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ थे। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार ने सुधारों द्वारा उदारवादियों को खुश करने तथा उग्रवादियों को कुचलने की जो नीति अपनाई थी उसकी प्रतिक्रिया भारत में हुई। सामान्यता सरकार का ध्यान भारतीयों को संतुष्ट करने की ओर गया। तीसरे, लार्ड क्रो की नीति ने भारतीयों के मन में घोर निराशा पैदा की जिससे भारतीयों ने स्पष्ट शब्दों में स्वशासन की माँग शुरू की। अतः सुधारों की आवश्यकता पड़ी चौथे, सरकार के प्रति मुसलमानों के रूख में परिवर्तन आया। पृथक् निर्वाचन की मान्यता ने अंग्रेजों और मुसलमानों की मित्रता को काफी गाढ़ा बना दिया। परन्तु मार्ले मिन्टों सुधारों के बाद कुछ ऐसी घटनाएं हुई, जिससे मुसलमानों में भी राष्ट्रीय जागरण हुआ तथा वे अंग्रेज विरोधी हो गए। पाँचवें, प्रथम महायुद्ध के समय अंग्रेजों ने भारतीय सहयोग प्राप्त करने के लिए अनेक घोषणाएं की। परन्तु युद्ध के बाद उक्त भारतीयों को जब अपनी आशाएँ पूरी होती दिखाई न दी तो उनमें असंतोष बढ़ा। छठे, स्वशासन आंदोलन को जो श्रीमती एनी बेसेंट के नेतृत्व में शुरू किया गया था, कुचलने के लिए सरकार ने कड़ा कदम उठाया, जिससे देश में राष्ट्रीय एकता अपने चरम सीमा तक पहुँच गई। अतः सुधारों की आवश्यकता पड़ी। सातवें 1909 ई. के सुधार अधिनियम द्वारा भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता का बीजारोपण किया गया था। इसके पश्चात् उसके केवल मुसलमानों तक ही सीमित नहीं रख गया, अपितु इसे अन्य सम्प्रदायों में भी बढ़ा दिया गया। मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों तथा आंग्ल भारतीयों को विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। अतः सुधारों की आवश्यकता पड़ी। आठवें, जब बंबई में लीग का अधिवेशन हुआ तब कांग्रेस के नेताओं ने भी भाग लिया। कांग्रेस-लीग समझौता जो लखनऊ पैक्ट के नाम से मशहूर है, भारत के राष्ट्रीय इतिहास की एक महान घटना थी। इस समझौते के ज़रिए कांग्रेस ने सोचा कि मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन और पूर्णतया सहयोगी बना पाएगें। लेकिन सांप्रदायिक चुनावों पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाने में उन्होंने अनजाने में अंग्रेज सरकार को इस शरारत भरी चाल के बाकी संप्रदायों पर लागू करने का अवसर दे दिया।

1919 के ऐक्ट के अंतर्गत मुसलमान उच्च वर्ग को लखनऊ समझौते में मिली माँगों से कहीं अधिक रियायतें मिली जिनके कारण मुस्लिम लीग ने स्वतंत्रता-संघर्ष में सहयोग देने का वायदा किया था। पूरा न हो सका और हिंदू मुसलमान एकता, जिनकी ओर लखनऊ समझौता एक अहम क़दम माना जाता है, एक स्वप्रशासन ही रह गई। इसके अतिरिक्त केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों द्वारा ज्ञापन प्रस्तुत किया जाना; मेसोपोटामिया की घटना तथा ड्यूक द्वारा घातक पत्र प्रस्तुत करना कुछ ऐसी घटनाएँ थी, जिनके कारण देश में सुधार अधिनियम बनाना आवश्यक हो गया था। अतः 1919 के अधिनियम के पारित होने में इस सब कारणों ने सहयोग दिया।

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