भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण

भारत में राष्ट्रीयता के उदय के कारण

‘राष्ट्रवाद’ का तात्पर्य राष्ट्रीयता की भावना के उदय से है। जब किसी राज्य के व्यक्तियों में परस्पर समानहित, समान परिस्थितियों एवं समान उद्देश्य के कारण सहानुभूति एवं एकता का बंधन उत्पन्न होता है तो उसे राष्ट्रीयता की भावना कहते है। यही राष्ट्रीयता उप समुदाय में राजनीतिक एकता का निर्माण कर स्वतन्त्रता के लिए प्रेरित करती है। इसे राष्ट्रवाद कहते है। भारत में 19वीं शताब्दी के मध्य के वाद राष्ट्रवाद का उदय होने लगा जिसने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। भारत में राष्ट्रवाद के उदय के मुख्य कारण निम्न थे।

भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की परिस्थितियाँ एवं कारण

  1. राजनीतिक एकता की स्थापना

    सन् 1707 ई० के उपरान्त (प्रसिद्ध मुगल सम्राट औरंगजेब के शासन का अन्त) भारत की राजनीतिक एकता का लोप हो गया था और वह विभिन्न छोटे-छोटे स्वतन्त्रता राज्यों में विभाजित होना आरम्भ हुआ मराङ्गों ने समस्त भारत को अपने प्रभाव-क्षेत्र में लाने का घोर प्रयास किया, किन्तु अपनी नीति के ही कारण वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके और उनकी शक्ति का पतन पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई0) से आरम्भ होने लगा इसी बीच भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर अंग्रेजों की शक्ति का उदय हुआ। सन् 1757 ई० में क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजद्दौला को परास्त किया और इसी समय से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना आरम्भ हुई। शीघ्र ही साम्राज्यवादी भावनाओं से परिपूर्ण विभिन्न गवर्नर जनरलों ने जिनमें लार्ड वैलेजली, वारेन हेस्टिंग्ज तथा लार्ड डलहौजी का नाम विशेष महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय है, भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक अंग्रेजी पताका फहराई जिसके कारण भारत में राजनीतिक एकता उदय हुआ। इससे शोषित भारतीयों के हृदय में अंग्रेजी साम्राज्य का अन्त करने की भावना बलवती हुई। इस एकता को और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाने में पाश्चात्य शिक्षा, यातायात का विस्तार, साम्राज्ञीय दरबारों का आयोजन, संचार-साधनों के विकास ने बड़ा ही सराहनीय कार्य किया जिससे एकता की भावना दृढ़ होती चली। वास्तव में कम्पनी के शासन-काल में जिस नीति का अवलम्बन कम्पनी के शासकों ने किया उससे भारतवासियों में असन्तोष की लहर तीव्र गति से बढ़ने लगी और उनमें एकता की स्थापना होने लगी।

  2. धार्मिक कारण

    भारत में धर्म का अत्यधिक प्रभाव तथा महत्व है। यहाँ जनता में राष्ट्रीय जागृति उत्पन्न करने में 19वीं शताब्दी में हुए धार्मिक आन्दोलनों का बहुत बड़ा हाथ रहा है और उनके ही कारण सन् 1885 ई० में कांग्रेस की स्थापना सम्भव हुई, क्योंकि ये सुधार आन्दोलन मुख्यतः धार्मिक होने के साथ-साथ राष्ट्रीय भी थे। 19वीं शताब्दी के पूर्व देश में घटित घटनाओं के बीच किसी भी प्रकार का राजनीतिक राष्ट्रीय आन्दोलन सम्भव नहीं था। धार्मिक जागरण के द्वारा भारतीयों में आध्यत्मिक तथा सांस्कृतिक चेतना का उदय हुआ और उनके हृदय में यह भावना जागृत हुई कि वे अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति को आदर तथा श्रद्धा की दृष्टि से देखें और किसी भी दशा में अपने आपको विदेशियों से हीन न समझें। इस दिशा में आर्य समाज, राम कृष्ण मिशन ब्रम्ह समाज आदि ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  3. यूरोपियनों के कार्य-

    भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में यूरोपियन विद्वानों का कार्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इनमें मेक्समूलर, योनियर विलियम्स, राव सासून विशेष उल्लेखनीय है जिन्होंने यूरोप के सामने भारतीय साहित्य संस्कृति तथा सभ्यता के गौरव के महत्व को व्यक्त किया इनके द्वारा भारतीयों में आत्म-विश्वास उत्पन्न हुआ तथा उनको अपने प्राचीन वैभव तथा गौरव का ज्ञान हुआ। वे अपने को उनसे किसी भी बात में कम नहीं समझते थे। इसके हृदय में अपनी तत्कालीन दशा तथा स्थिति के प्रति असन्तोष की भावना उत्पन्न हुई और वे अपनी प्रगति करने की ओर ध्यानमग्न हुए ।

पाश्चात्य शिक्षा

पाश्चात्य विचारधारा एवं साहित्य ने भी भारतीयों में राष्ट्रीय भावना जागृत करने में बड़ा योग दिया, किन्तु पाश्चात्य शिक्षा के प्रचारकों का उद्देश्य वास्तव में इस भावना की भारत में विलीन करना था जैसा कि लार्ड मैकाले की मिनिटस से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि उनका पाश्चात्य शिक्षा एवं सभ्यता व संस्कृति का प्रचार करने का उद्देश्य यह था कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पूर्णरूप से लोप हो जाये और भारतवासी अपने अतीत की सभ्यता तथा संस्थाओं से उदासीन हो जाये कुछ सीमा तक अंग्रेज अपने मनोरथ में सफल हुए, क्योंकि कुछ शिक्षित भारतीय अपनी प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति से विमुख हो गये और उन्होंने अपने पाश्चात्य ढंग से रंगना आरम्भ किया। वास्तव में भारत में ऐसे व्यक्तियों के एक वर्ग की स्थापना होनी आरम्भ हो गयी जो रंग से भारतीय तो अवश्य थे, किन्तु रूचि, विचार, शब्द और बुद्धि से अंग्रेज थे। ऐसे वर्ग की स्थापना का विरोध धार्मिक आन्दोलनों द्वारा किया गया जिसने भारतीयों को अपने प्राचीन गौरव तथा वैभव की ओर आकर्षित किया।

साम्राज्यवादी नीति

साम्राज्यवादी नीति का पूर्ण तांडवनृत्य भारत में किया इसके अन्तर्गत सरकार द्वारा निम्न निन्दनीय कार्य किये गये जिन्होंने जनता में असन्तोष की भावना का उदय किया।

आर्थिक असन्तोष

मानव सब कुछ सहन कर सकता है, किन्तु आर्थिक कठिनाइयों तथा समस्याओं के कारण इतना असन्तुष्ट हो जाता है कि वह सब कुछ करने को तत्पर रहता है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना था। 19वों शताब्दी तक भारत के उद्योग-धन्धे पर्याप्त समृद्धिशाली थे, यद्यपि कम्पनी ने भारत पर अधिकार करने पर उनको (व्यापर, वाणिज्य, उद्योग-धन्धों) को किसी प्रकार का प्रोत्साहन प्रदान नहीं किया, वरन् इसके विपरीत उन्होंने उनको ठेस पहुँचाना आरम्भ किया। कम्पनी की आर्थिक नीति के कारण देश में असन्तोष की भावना तीव्र गति से प्रज्वलित होनी आरम्भ हुई। पहले भारत का बना हुआ कपड़ा आदि वस्तुयें विदेशी में बिकती थीं, किन्तु बाद में विदेशों का माल भारत में बहुत मात्रा में बिकने लगा। जिसके कारण निर्यात की अपेक्षा आयात अधिक होने लगा। कम्पनी की नीति द्वारा भारतीयों के सामने भुखमरी का तांडव नृत्य होना आरम्भ हो गया। भारत का समस्त धन विभिन्न उपायों तथा साधनों द्वारा इंगलैंण्ड को बड़ा आर्थिक लाभ हुआ। उद्योग-धन्धों के विनाश का स्पष्ट परिणाम यह हुआ कि उद्योग-धन्धों में कार्य करने वाले व्यक्तियों को कृषि की ओर आकर्षित होना पड़ा, जिससे भूमि पर बोझ बढ़ गया। सरकार ने कृषि को उन्नत तथा उसको प्रोत्साहन देने की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जिससे किसानों की दशा शोचनीय होनी आरम्भ हो गई। आये दिन के अकालों ने भारतीयों को दशा और भी अधिक दयनीय बना दिया। इसी समय अंग्रेजों ने स्वतन्त्र व्यापार की नीति अपनाई, जिससे भारत में आयात होने वाले सामान पर किसी प्रकार का आयात-कर नहीं लगता था। इसका परिणाम भारतीय उद्योग धन्धों के लिये और भी खराब सिद्ध हुआ, क्योंकि अब उनके द्वारा तैयार किया गया सामान विदेशी सामान की अपेक्षा अधिक मूल्य पर बिकने लगा। इसके अतिरिक्त उनका कच्चा माल भी मंहगे दामों पर बिकता था और अधिकांश कच्चा माल इंगलैंण्ड के लिये निर्यात कर दिया जाता था इसके कारण गिरते हुए भारतीय उद्योग-धन्धों को बड़ा गहरा आघात पहुँचा। किसानों तथा कारीगरों के सामने बेकारी की समस्या उत्पन्न हो गई।

भारतीय सभ्यता की विदेशियों द्वारा प्रशंसा-

19वीं शताब्दी में कुछ प्रख्यात यूरोपीय विद्वानों ने भारतीयों सभ्यता और संस्कृति को जो अभी तक अज्ञानता के कारण बनी हुई थी उसे पुन: प्रकाश में लाने का प्रयत्न किया। मैक्समूलर महान् जर्मन विद्वान ने जर्मन भाषा में अनुवाद कर यह सिद्ध किया कि ये प्राचीनतम पुस्तकें ही नहीं, बल्कि आधुनिकतम दर्शन और साहित्य से कहीं अधिक सारगर्भित हैं। ये अतुलनीय है। इसी प्रकार मौनियर विलियम्स शैव्य, सैसून बुर्नफ इत्यादि विद्वानों ने संस्कृत का गहन अध्ययन किया और यह सिद्ध किया कि यह भाषा पूर्ण श्रेष्ठ एवं पाश्चात्य भाषाओं से अधिक समृद्ध है। पश्चिमी विद्वानों की इस प्रशंसा भरी खोज ने समस्त भारतीयों को रहने व पराधीनता से होने के लिए प्रोत्साहित किया।

  1. समाचारपत्र

    समाचार-पत्रों की स्वंत्रता के क्षेत्र में राजा राम मोहन राय का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने योग्य है। यह बात यहाँ याद रखने योग्य है कि पत्रकारिता का प्रारम्भ भारत में यूरोपियों के द्वारा ही किया गया था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने भारतीय भाषा के माध्यम से प्रचार करने के उद्देश्य से छापेखानों की स्थापना की थी। ये ही बाद में समाचार-पत्रों के महत्वपूर्ण उपागम बने। भारतीय भाषाओं में छपे समाचार-पत्रों में होती थी। उन्होंने अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीति की कड़ी आलोचना की। इसका फल यह हुआ कि 1879 में इस समाचार-पत्रों पर कड़ी पाबन्दी लगा दी गयी। भारतीय समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता को बिल्कुल नष्ट कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार की इस कार्यवाही से एक बड़ी तेज प्रतिक्रिया हुयी राष्ट्रवाद और तेजी से पनपने लगा।

जिन समाचार-पत्रों ने भारतीय राष्ट्रवाद को विकसित और प्रसारित करने में योगदान दिया है उनमें हिन्दू, पेट्रियट,हिन्दू सिरर, अमृत बाजार पत्रिका, केसर, नवशक्ति और संध्या मुख्य इन समाचार-पत्रों के साथ-साथ महान साहित्यकारों के लेखों ने नवीन जागृति को फैलाने में सहायता की है। इनमें बंकिम चन्द्र चटर्जी के ‘आनन्द मठ’ मैथिलीशरण गुप्त जी की ‘भारत भारती’ और तिलक के सीता रहस्य और केसरी में प्रकाशित लेखों को महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

  1. भारतीय समाचारपत्रों तथा देशी साहित्य का विकास

    भारतीय समाचार-पत्रों और देशी साहित्य के विकास के कारण भी राष्ट्रीय भावना का उदय हुआ और उन्होंने इस भावना का पोषण किया (अ) भारतीय समाचार पत्र-भारतीय समाचार-पत्र अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते थे। भारत में कुछ आंग्ल भारतीय समाचार-पत्र भी थे जो सदा राष्ट्रीय-विरोधी नीति का पालन करते थे और सदा सरकार का पक्ष लेते थे। उनके द्वारा शासक तथा शासित जातियों में समानता की नीति का विरोध किया जाता था। भारतीय समाचार-पत्रों द्वारा राष्ट्रीय भावना को प्रोत्साहन दिया जाता था। वे सरकारी नीति के आलोचक थे। शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ इन पत्रों का प्रकाशन तथा संचालन तीव्रगति से बढ़ता चला गया। इस प्रकार इस समय भारतीय समाचार-पत्र अपने पाठकों के हृदय में विदेशी सरकार के प्रति असन्तोष तथा राष्ट्रीय भावना जागृत करने के कार्य किया।

  2. सरकारी नौकरियों के सम्बन्ध में अन्यायपूर्ण नीति

    प्रारम्भ से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उच्च तथा महत्वपूर्ण-पदो पर अंग्रेजों को नियुक्त किया और भारतीयों को उन पदों से वंचित किया भारतीयों को केवन निम्न और साधारण पदों पर नियुक्त किया जाता था। प्रारम्भ में भारतीयों को यह विभेद अधिक नहीं खला, क्योंकि अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बहुत कम भारतीयों को प्राप्त था, किन्तु जब इनकी संख्या में वृद्धि होने लगी और उनका असन्तोष मात्र जागृत होने लगी। शिक्षित वर्ग में बेकारी उत्पन्न हुई जिसने असन्तोष की ओर भी तीव्र कर दिया। सन्

1833 ई० में ब्रिटिश संसद में एक अधिनियम पारित हुआ जिसमें यह घोषणा की गयी कि सरकारी नौकरियों के प्रवेश में योग्यता पर ही बल दिया जायेगा। किसी भी भारतवासियों को उसके धर्म, जन्म, स्थान, वंश, और रंग के कारण कंपनी के अधीन किसी स्थान को प्राप्त करने में बाधा उपस्थित नहीं की जायेगी। इस घोषणा ने भारतीयों के हृदय में आशा का संचार किया, किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि उसकी आशा पूर्ण नहीं हुई। कोई भी भारतीय उत्तरदायी स्थानों पर नियुक्त नहीं किया गया। सरकार की इस अन्यापूर्ण नीति ने इन योग्य व्यक्तियों के हृदय में बड़ा असन्तोष उत्पन्न किया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने तो सरकारी नीति का खुले आम विरोध करना आरम्भ कर दिया और बाद में उन्होनें बंगाल में इण्डियन ऐसोसियेशन की स्थापना की। अरविन्द घोष क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित हुए और उन्होनें अंग्रेजी शासन का अन्त करने का प्रयास किया।

  1. लार्ड लिटन की अन्यायपूर्ण नीति

    सन् 1876 ई० में लार्ड लिटन भारत का वायसराय बनकर भारत आया। यह साम्राज्यवाद का एक विशाल तथा दृढ़ स्तम्भ था। उसकी अन्यायपूर्ण तथा साम्राज्यवादी नीति के कारण देश में असन्तोष की लहर फैल गयी। जिसके कारण भारतीयों के हृदय में एक व्यापी संस्था की स्थापना का विचार हुआ है और जिससे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा स्थापित इण्डियन ऐसोसिएशन को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन करने का अवसर प्रदान किया।

  • इण्डियन सिविल सर्विस की आयु 21से 19 करना

    सन् 1876 ई० में भारत मन्त्री की एक घोषणा के अनुसार इण्डियन सिविल सर्विस में सम्मिलित होने की आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई जिससे भारतीयों का इस परीक्षा में सम्मिलित होना लगभग असम्भव हो गया। इसके द्वारा सुरेन्द्र नाथ बनर्जी को सरकार की नीति की आलोचना तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। 25 मार्च, 1877 ई० में कलकत्ते के टाउनहाल में एक विराट सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। एसोसियेशन की ओर से भारत के प्रमुख नगरों में जिनमें लाहौर, अमृतसर, मेरठ, दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, अलीगढ़, बनारस, बम्बई, सूरत, अहमदाबाद, पूना, और मद्रास में विशाल सार्वजनिक सभायें की गयीं। उन्होंने विभिन्न नगरों में राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की जो एसोसियेशन के साथ राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग देंगी। इस प्रकार उनके प्रयत्नों द्वारा भारत के प्रमुख नगरों में राष्टीय जागृति का उदय होना आरम्भ हो गया और समस्त भारत में इन संस्थाओं का जाल बिछ गया।

  • दरबार समारोह

    उनके शासन काल में एक दूसरा कार्य दरबार समारोह हुआ जिससे राष्टीय भावना तथा जातीय कटुता को बड़ा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ इंग्लैंड की महारानी भारत की साम्राज्ञी की उपाधि से सुशोभित की गया। इस अवसर पर लार्ड लिटन ने दिल्ली में एक भव्य दरबार की व्यवस्था सन् 1877 ई० में की जिसमें बहुत अधिक धन व्यय किया गया। इसी समय भारत के कुछ भागों में भीषण अकाल पड़ रहा था जिसके ग्रास बहुत से भारतीय हो रहे थे। लार्ड लिटन ने अकाल से जनता की रक्षा करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। भारतीय समाचार-पत्रो ने इसके विरूद्ध आवाज उठायी। एक समाचार-पत्र में यहाँ तक लिख दिया कि, जब रोम जल रहा था तो नीरों बाँसुरी बजा रहा था। इस दरबार में नाथ बनर्जी

एक पत्र-प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुये वहीं उनके मस्तिष्क में यह भावना जागृत हुई कि यदि एक स्वेच्छाचारी वाइसराय की प्रशंसा के लिये देश के राजा तथा अमीर-उमरा को एकत्रित होने के लिये बाध्य किया जा सकता है तो देशवासियों को न्यायसंगत ढंग से स्वेच्छाचारी को रोकने के लिये क्यों नहीं संगठित किया जा सकता इस प्रकार दरबार समारोह ने अप्रत्यक्ष रूप से एक नवीन भावना भारतीयों के हृदय में जागृति की।

  • प्रेस की स्वतंत्रता का अपहरण

    लाई लिटन भारतीय प्रेस की शक्ति से घबरा गया और उसने उस पर प्रतिबन्ध लगाने का निश्चय किया। उसने 12 मार्च 1877 को भारत-सचिव के पास तार भेजकर प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाने की अनुमति मांगी। दूसरे ही दिन तार द्वारा भारत-मन्त्री ने अपनी अनुमति प्रदान कर दी। अनुमति प्राप्त होने के दो घन्टे के अन्दर वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित कर दिया गया और शीघ्र ही वह समस्त देश पर लागू हुआ। समस्त देश में और विशेषतः बंगाल में इसका विरोध किया गया। इसके विरोध में कलकत्ते में एक विराट सभा का आयोजन हुआ। दिन-प्रतिदिन यह आन्दोलन तीव्रतर होता चला गया और अंत में बाध्य होकर लार्ड लिटन के उत्तराधिकारी उदार लार्ड रिपन को यह एक्ट रद्द करना पड़ा। इस आन्दोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि उचित राष्ट्रीय मॉग के सामने विशाल तथा शक्तिशाली सरकार को अवश्य झुकना पड़ेगा। इससे राष्ट्रीय जागृत को बड़ा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

  • आर्स एक्ट का पारित होना

    लार्ड लिटन के समय में एक दूसरा अधिनियम आर्स एक्ट पारित किया गया। इस एक्ट के अनुसार बिना लाइसेन्स के हथियारों का रखना लेकर चलना या उनका व्यापार करना अपराध था। इस एक्ट का प्रभाव भारतीयों पर पड़ा और ऑग्ल-भारतीय अंग्रेज तथा कुछ सरकारी पदाधिकरी इस अधिनियम से मुक्त रहे।

  • जातिविभेद नीति

    1857 की क्रान्ति के पूर्व अंग्रेजों ने जाति-विभेद की नीति को तीव्र नहीं अपनाया था। उस समय उच्च-कुलीन भारतीयों और अंग्रेजों के पारस्परिक सम्बन्ध अच्छे थे, किन्तु इस क्रान्ति के उपरान्त जो नीति शासक वर्ग ने अपनाई उससे जाति-विभेद तीव्र होना आरम्भ हो गया। अंग्रेजों ने भारतीयों का दमन करने में जिस कठोर तथा घृणास्पद नीति का पालन किया उसने भारतीयों के हृदय में उनके प्रति घृणा तथा असन्तोष के भाव जागृत कर दिये जिससे राष्ट्रीय भावना को बड़ा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

इलबर्ट बिल विवाद

सन् 1883 ई0 में लार्ड रिपन को काउन्सिल के कानूनी सदस्य इलबर्ट ने एक विधेयक प्रस्तुत किया जिसमें भारतीय मजिस्ट्रेटों को अंग्रेजों के मुकदमें सुनने और उन्हें दण्डित करने के अधिकर का वर्णन था। इससे पूर्व भारतीय मजिस्ट्रेटों को इस प्रकार का कोई अधिकार नहीं था समस्त अंगेजों ने इस विधेयक का घोर विरोध किया। परिणाम स्वरूप इसे वापिस लेना पड़ा इससे भारतीयों को एक बार पुनः अनुभव हुआ कि अंग्रेज भारतीयों के साथ रंग-भेद की नीति बरतते हैं। राष्टीयता की आग को और अधिक प्रज्जवलित करने में इस बिल को एक चिनगारी माना जा सकता है। उपर्युक्त कारणों ने इस प्रकार, राष्ट्रीय भावना को विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा एक पृष्ठभूमि तैयार की जिससे राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म-

सबसे महत्वपूर्ण तत्व नव भारत में एक राष्ट्रीय चेतना का विकास था जिसका परिणाम अन्तत: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे संगठन के निर्माण में हुआ। इस महान् संगठन का निर्माण मुख्य रूप से दो कारणों से हुआ था। इनमें प्रथम सम्पूर्ण भारत की एकता तथा दूसरा यह विचार था कि भारतीयों को स्वयं के ऊपर शासन करने का अधिकार होना चाहिये।

बहुत से अंग्रेजों का भी यह विश्वास था कि भारतीयों का कोई ऐसा संगठन होना चाहिये जो भारतीयों की समस्याओं को अंग्रेजी सरकार के समक्ष पेश कर सके। वाइसराय लार्ड डफरिन के अनुसार, मुझे भारतीयों की वास्तविक इच्छा का निश्चय करने में बड़ी कठिनाई होती है और यह जनता के हित में होगा अगर ऐसा कोई उत्तरदायी संगठन हो जिसके माध्यम से भारतीयों की इच्छाओं से सरकार को अवगत बनाया जा सका।

लाला लाजपत अनुसार भी ए0ओ0 ह्यूम का उद्देश्य कांग्रेस की स्थापना से ब्रिटिश साम्राज्य को विघटित होने से बचाना था। इस प्रकार इसमें कोई सन्देह नही कि कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य असंतोष का पता लगा कर ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध उत्पन्न होने वाले खतरे को मिटाना था। लेकिन यह भी सत्य है कि भारत की निर्धनता, दुःख और दर्द से कई अंग्रेजों को अत्यधिक सहानुभूति थी और वे इसे दूर करने के लिए भारतवासियों को संगठित करना चाहते थे।

ए0ओ0 ह्यूम का उद्देश्य भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने एवं इसे समृद्ध बनाने में शासक वर्ग को सहयोग देना था। उनका विचार था कि भारत के गणमान्य व्यक्ति एक जगह पर बैठकर सामाजिक मामलों पर विचार करें और मित्र वनें। वह नहीं चाहते थे कि लोग राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करें । ह्यूम की कर्तव्य- निष्ठा एवं वायसराय लार्ड डफरिन के सहयोग से 28 दिसम्बर, 1885 ई0 को व्योमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई मे इण्डियन नेशनल कांग्रेस की पहली बैठक हुई।

कांग्रेस के इतिहास को चार भागों में बाँटा जा सकता है-

  1. 1885 से 1905 तक,
  2. 1905 से 1919 तक
  3. 1919 से 1929 तक,
  4. 1929 से 1947 तक

1885 से 1905 तक कांग्रेस का संचालन देश के व्योमेश चनद्र बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दादा भाई नौरोजी, सर फिरोज शाह मेहता, रानाडे, गोखले, रास बिहारी बोस, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, ए0ओ0 ह्यूम तथा वेडन वन जैसे महान् नेताओं के हाथ में था। ये सभी नेता किसी न किसी रूप में यह स्वीकार करते थे कि भारत में ब्रिटिश शासन एक वरदान के रूप में है। उन्हें अंग्रेजों की ईमानदारी, न्यायप्रियता तथा सहिष्णुता पर पूर्ण विश्वास था। उनका विचार था कि अंग्रेजों के द्वारा भारत के सम्बन्ध में जो गलत नीतियाँ अपनाई जाती हैं उसका कारण कोई षड्यन्त्र न होकर अंग्रेजों की भारतीय समाज से अनभिज्ञता है। इसलिए उनका (कांग्रेस ) उद्देश्य होना चाहिए कि वे सरकार को उचित क्या है बतायें। दादा भाई नौरोजी का कहना था, अंग्रेज थोड़ी देर मे समझता है। एक विचार उसके दिमाग में आसानी से नहीं घुसता लेकिन घुस जाने के बाद वह स्थायी रहता है।

इस युग में कांग्रेस का उद्देश्य किसी भी रूप में सरकार को नाराज करना नहीं था। कांग्रेस के जितने भी अधिवेशन हुए उन सब में ब्रिटिश राज्य के प्रति स्वामिभक्ति प्रकट की । प्रारम्भ में अंग्रेजों ने इसलिए इस संस्था को काफी प्रोत्साहित किया । प्रायः वरिष्ठ पदाधिकारी इस संस्था की कार्यवाहियों में सक्रिय भाग लेते थे । 1886 में गर्वनर जनरल डफरिन ने कांग्रेस सदस्यों को कलकत्ता में गार्डन पार्टी पर बुलाया था। लेकिन शीघ्र ही सरकारी दृष्टिकोण में परिवर्तन आना प्रारम्भ हो गया । लार्ड डफरिन ने अपने रिटायारमेंट के समय राष्ट्रीय कांग्रेस को गतिविधियों पर असन्तोष व्यक्त किया तथा इसके सदस्यो को भारत का अत्यधिक अल्पमत बतलाया। सरकारी पदाधिकारियों ने वायसराय के संकेत को 35 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म एवं विकास समझा और धीरे-धीरे ये कांग्रेस के प्रति उदासीन हो गये । सर रमेश चन्द्र मित्रा ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि भारत का यह प्रबुद्ध वर्ग भारतीय जनता का मस्तिष्क क्या होगा कि एक विदेशी शासक जनता की इच्छाओं को जनता के शिक्षित वर्ग की अपेक्षा अधिक समझता है । कांग्रेस के द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली माँगों को सरकार के द्वारा कम माना जाने लगा। ए0ओ0 ह्यूम के शब्दों, राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार को समझाना चाहा था कि लेकिन सरकार ने समझना अस्वीकार कर दिया। सरकार की इस उपेक्षा से हताश होकर कांग्रेस ने एक संवैधानिक आन्दोलन चलाया। इसमें इसके जनमत को भारतीय समस्यायें बतलाना सम्मिलित था । इंगलैण्ड में चलाये जाने वाले आन्दोलन सफल रहे । चार्ल्स एम0पी0 1889 को बम्बई कांग्रेस में सम्मिलित हुए। अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के इन प्रयासों से ही 1892 ई० की इण्डियन कौसिल्स ऐक्ट पारित हुआ।

जहाँ तक कांग्रेस के अन्य प्रस्तावों का सम्बन्ध है, सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया । हर वर्ग कांग्रेस ने उन्हीं प्रस्तावों को बार- बार पारित किया जिन्हें सरकार ने उपेक्षा से अस्वीकार कर दिया । कांग्रेस क्षेत्र में निराशा बढ़ने लगी और धीरे-धीरे कांग्रेस में सरकार विरोधी भावनायें संचरित होने लगी । एक ऐसा वर्ग स्वाभाविक रूप से पैदा हो गया है जिसे कांग्रेस की हाथ जोड़ नीति पर विश्वास नहीं रहा उनका विश्वास था कि हाथ जोड़कर कोई सुधार नहीं होगा बल्कि इसके लिए कार्य करना आवश्यक है । इस वर्ग के प्रधान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे।

इस प्रकार कांग्रेस एक सूचक व सलाक देने वाली संस्था से राष्ट्रीय आन्दोलन को संस्था के रूप में परिणित होने लगी ।

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