उग्रवाद के उदय के प्रमुख कारण

उग्रवादी के उदय के प्रमुख कारण

कांग्रेस के उदारवादी नेता देश की जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल रहे। उनको राजनीतिक भिक्षावृत्ति की प्रवृत्ति से युवा वर्ग पूर्णतया असन्तुष्ट रहा । उसको सन्तुष्ट करने के लिए उग्रवादी दल की स्थापना हुई । लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक तथा विपिन चन्द्र पाल ने इस दल का नेतृत्व किया ।

उग्रवाद के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

  • राजनीतिक कारण

    उग्रवाद के उदय में राजनीतिक कारणों ने विशेष योग दिया। सन् 1892 से 1914 ई0 तक इंग्लैण्ड की राजनीतिक तथा शासन पर अनुदार दल का शासन रहा, जिसकी नीति साम्राज्यवादी थी। लार्ड लैंसडाउन एक साम्राज्यवादी शासक था, जिसने भारतीयों की माँगों की सर्वथा उपेक्षा की ओर भारतीय जनता बड़ी असन्तुष्ट हुई और भारतीय नवयुवकों के हृदय में ब्रिटिश शासन के प्रति घृणा की भावना भर गई। उसके बाद लार्ड एल्गिन ने भारतीयों के प्रति बड़ी कठोर नीति अपनायी। इस नीति के भारतीय जनता के असन्तोष में भारी वृद्धि हुई। तिलक ने महाराष्ट्र में सरकार की नीति का प्रबल विरोध करने की तैयारियों करनी प्रारम्भ की। लेकिन लार्ड एल्गिन के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार ने देशभक्तों का बड़ी कठोरता के साथ दमन करना प्रारम्भ कर दिया। एल्गिन के बाद लार्ड कर्जन वायसराय बना। लार्ड कर्जन एक स्वेच्छाचारी, साम्राज्यवादी तथा प्रतिक्रियावादी शासक था । उसने भारत में ऐसी नीति अपनायी, जिसके कारण भारतीयों का असन्तोष अपनी सीमा पर पहुँच गया। लार्ड कर्जन की केन्द्रीयकरण की नीति ब्रिटिश शासन के लिये घातक सिद्ध हुई।

  1. लार्ड कर्जन की साम्राज्यवादी नीति का प्रथम आघात-स्थानीय संस्थाओं पर हुआ । लार्ड कर्जन भारतीयों को स्वशासन देने के पक्ष में नहीं था। सन् 1899 में उसने कलकत्ता कारपोरेशन के सदस्यों की संख्या 76 से घटाकर 50 कर दी । 25 सदस्य जो करदाताओं के प्रतिनिधि थे, हटा दिये गये और कारपोरेशन पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो गया । उसके इस कार्य से भारतीयों में बड़ा असन्तोष उत्पन्न हुआ। जनता इस अधिनियम को घोर विरोध किया और कारपोरेशन के 28 सदस्यों ने भी त्याग-पत्र दे दिया। लेकिन लार्ड कर्जन पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ।
  2. सन् 1904 में लार्ड कर्जन की सरकार ने भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम का उद्देश्य विश्वविद्यालयों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करना था। इस सम्बन्ध में ‘रोनाल्ड रो’ ने लिखा है कि-इस अधिनियम के द्वारा लार्ड कर्जन विश्वविद्यालय की सीनेट और शासन समिति का यूरोपीयकरण करना चाहता था और इनको वह सरकारी विश्वविद्यालय में परिणित करना चाहता था।
  3. लार्ड कर्जन ने सन् 1904 ई0 में ‘अधिकारी गुप्त अधिनियम’ पारित करवाया। इस अधिनियम के पारित होने पर भारतीय जनता में भारी उत्तेजना व्याप्त हुई।
  4. लार्ड कर्जन की विदेश नीति भी साम्राज्यवादी थी। उसने उद्देश्य की पूर्ति के लिये आवश्यकता पड़ने पर सैनिक कार्यवाही की, जिसमें उसने भारतीयों सेना और धन का प्रयोग किया। इस धन की पूर्ति के लिये उसने भारतीय जनता पर अनेक कर लगाये। उसकी सीमान्त नीति (अफगानिस्तान, तिब्बत तथा चीन) सम्बन्ध के कारण भारतीयों में गहरा असन्तोष व्याप्त हा गया।
  5. लार्ड कर्जन भारतीयों को बुद्धिहीन और चरित्रहीन समझता था और उसने घृणा करता था। उसका मत था कि -“ईश्वर ने एक ही जाति को शासन करने के लिये बनाया है और वह है अंग्रेज जाति। भारतीयों को शासनाधिकार प्रदान करना उस सर्वोच्च सत्ता ‘ईश्वर’ के नियम का तिरस्कार करना है।”
  6. लार्ड कर्जन ने भारतीयों को उच्च सरकारी पदों पर कभी नियुक्त नहीं किया। उसने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में हिन्दू और मुसलमानों के चरित्रवान बताया तथा भारतीयों को चरित्रहीन, मक्कार व असत्यवादी कहा । उसने यह कहकर कि ‘भारत राष्ट्र’ नाम की कोई चीज नहीं है, भारतीयों के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाई। समस्त भारत में स्थान-स्थान पर सभायें हुई और लार्ड कर्जन की नीति का प्रबल विरोध किया गया, किन्तु लार्ड कर्जन ने इसकी कोई चिन्ता न की और कांग्रेस के शीघ्र नष्ट होने की आशा को व्यक्त करके अपनी शत्रुता को प्रकट किया।
  7. लार्ड कर्जन का सबसे अधिक घृणास्पद और निन्दनीय कार्य बंगाल का विभाजन करना था। उसके इस कार्य ने भारतीय युवकों को विद्रोही बना दिया। बंगाल विभाजन ने भारतीय नवयुवकों में एक नयी जागृति और जीवन में साहस व उत्साह का संचार किया। सन् 1904 में लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की। इसके पूर्व बंगाल में असम, बिहार और उड़ीसा सम्मिलित थे, जिनकी कुल जनसंख्या 8 करोड़ के लगभग थी। यह एक विशाल प्रान्त था, जिसमें विभिन्न भाषा-भाषी रहते थे। लार्ड कर्जन ने इस प्रान्त का विभाजन भाषा के आधार पर नहीं किया था बल्कि उसका उद्देश्य बंगाल की राष्ट्रीयता के विकास को रोकना था। उसने अपने भाषणों से स्पष्ट कर दिया था कि इस विभाजन का उद्देश्य बंगाल में फूट डालना है । वह देश में साम्प्रदायिकता का प्रचार करना चाहता था । सम्पूर्ण बंगाल में लार्ड कर्जन के इस कार्य के विरूद्ध बंगाली नेताओं ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा विपिन चन्द्रपाल के नेतृत्व में उग्र प्रदर्शन किया। बंगाल के कुछ युवकों ने क्रान्तिकारी साधनों का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया।
  • विदेशों में घटित कुछ प्रभावकारी घटनायें-

    इसी समय विदेशों में कुछ ऐसी घटनायें घटित हुई जिन्होंने भारतीयों को बहुत प्रेरणा प्रदन की । प्रमुख प्रभावकारी घटनाओं का विवरण इस प्राप्त हुई-

  1. इसी समय मित्र, फारस तथा टर्की में स्वतन्त्रता का युद्ध हुआ और इन सभी ने अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त हुई ।
  2. सन् 1893 में एबीसीनिया की जनता ने इटली को पराजित कर दिया। गैरेट के मतानुसार-इटली की पराजय ने सन् 1897 ई० में तिलक के आन्दोलन को विशेष बल प्रदान किया। इस घटना से महाराष्ट्र में एक नवीन चेतना तथा उत्तेजना का प्रादुर्भाव हुआ ।
  3. सन् 1905 में जापान जैसे छोटे से देश ने रूस जैसे विशाल देश को पराजित करके विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। भारतीय युवकों ने जापान की विजय को जानने के लिए उसके इतिहास का अध्ययन करना प्रारम्भ कर दिया। अन्त में वे इस निष्कर्ष पर पहुँच कि अगाध देशभक्ति, बलिदान तथा राष्ट्रीयता की भावना जापान की विजय के प्रमुख कारण थे। भारतीयों ने भी जापान के समान देशहित के लिये अपना सब कुछ बलिदान कर देने का निश्चय कर लिया।
  4. इसी समय मैजनी, गैरीबाल्डी तथा काबूर ने अपने-अपने अथक प्रयत्नों से इटली का एकीकरण किया । इस घटना में भारत के देश-भक्तों को स्वतन्त्रता के लिये बलिदान करने की बड़ी प्रेरणा दी।
  • अकाल और महामारी-

    उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम 45 वर्षों में दो बार भीषण अकाल पड़ा । पहला अकाल 1896-97 में बम्बई में पड़ा । इस अकाल में भारतीयों को अपार कष्ट उङ्गाना पड़ा और लगभग दो करोड़ व्यक्ति काल के ग्रास बने। ब्रिटिश सरकार ने यद्यपि अकाल से रक्षा हेतु कुछ प्रयत्न अवश्य किया किन्तु उसकी नीति उपेक्षापूर्ण ही रही । दूसरा अकाल सन् 1899-1900 में पड़ा जिसमें एक लाख 73 हजार व्यक्ति भूख से तड़प-तड़प कर मर गये । इस समय भी सरकार की नीति उपेक्षापूर्ण ही रही, जिससे क्षुब्ध होकर नवयुवक बहुत क्रान्तिकारी हो गये । महाराष्ट्र के एक क्रान्तिकारी नवयुवक दामोदर ने कमिश्नर रैड तथा उसके लेफ्टीनेन्ट को गोली से उड़ा दिया। इस पर सरकार ने कठोर दमन नीति अपनाई ।

  • सरकार की जाति-भेद की नीति-

    अंग्रेजी में जाति भेद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। वे भारतीयों को काले आदमी कहकर उनसे घृणा करते थे । सरकार गोरे अपराधियों को क्षमा कर देती थी, जो काले (भारतीय) आदमियों पर अत्याचार करते थे । इतना ही नहीं यदि कोई अंग्रेज किसी भारतीय की हत्या भी कर देता था तो सरकार उसे केवल नाममाद्द का दण्ड देती थी ऐंग्लो-भारतीय समाचार-पत्र अंग्रेजों का पक्ष लेते थे और उन्हें अभद्र व्यवहार करने के लिये प्रोत्साहित करते थे। लार्ड कर्जन भारतीयों को असभ्य तथा अयोग्य कहता था । अतः इस जातीय अपमान ने भारतीयों की ब्रिटिश शासन का उग्र विरोधी बना दिया।

  • ब्रिटिश सरकार की आर्थिक शोषण की नीति-

    ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीति बड़ी दोषपूर्ण थी । उसने अपने देश के उद्योगपतियों तथा व्यापारियों के हित के लिये भारतीय जनता के हितों का बलिदान कर दिया। लार्ड बेकन का मत है कि, ‘आर्थिक दरिद्रता और अंसतोष क्रांति को जन्म देते है’ कुछ विद्वानों ने अपने लेखों के माध्यम से यह प्रचार किया कि भारत की निर्धनता का मुख्य कारण रकार की आर्थिक नीति है । प्रारम्भ में कपास का आयात कर 5 प्रतिशत था, जिसे घटाकर सरकार ने 37 प्रातिशत कर दिया। इस कर में कमी करने का उद्देश्य केवल भारतीय उद्योग-धन्धों को नष्ट करना था। विदेशी वस्तुयें सस्ते मूल्यों में मिलने के कारण देशी वस्तुओं की बिक्री बन्द हो गई। इसके साथ ही साथ ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मिलों पर भी 3% प्रतिशत कर लगाया। इससे इन मिलों में तैयार होने वाली वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो गयी। सरकार की इस नीति के कारण ही देश में स्वदेशी आन्दोलन का प्रादुर्भाव हुआ और जनता विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने लगी।

  • धार्मिक पुनर्जागरण-

    ब्रिटिश सरकार की नीति के कारण जब भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति घृणा, द्वेष तथा असन्तोष की भावना तीव्र रूप धारण कर रही थी तो कुछ महान भारतीय धार्मिक प्रचारकों (दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द तथा श्रीमती एनी बेसेण्ट) ने भारतीयों में धार्मिक भावना का संचार किया और उनका ध्यान भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अतीत गौरव की ओर आकर्षित किया। स्वामी विवेकानन्द तथा स्वामी रामतीर्थ ने विदेशों में जाकर भारतीय संस्कृति का प्रचार किया, जिससे भारतीयों में एक नये उत्साह का संचार हुआ। कुछ प्रमुख नेताओं ने हिन्दू धर्म की वकालत कर भारतीयों में उग्र राष्ट्रवाद का व्यापक प्रचार किया । श्री बकिंमचन्द्र चटर्जी ने इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया । उनका ‘वन्दे मातरम्’ गीत भारतीय क्रांतिकारियों का प्रिय गीत बन गया । इस गीत को गाते हुए अनेक भारतीयों ने अपने देश के हितार्थ अपने प्राणों की आहुति दे दी।

  • प्रवासी भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार-

    ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीयों के प्रति अंग्रेजों का व्यवहार बड़ा अन्यापूर्ण तथा अभद्रतापूर्ण था जिसके कारण अंग्रेजों के प्रति विरोधी भावनाओं को बड़ा प्रोत्साहन मिला । प्रारम्भ में अंग्रेज भारतीय मजदूरों को अपने उपनिवेश में ले गये परन्तु उन्हें राजनीतिक व सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा। बाद में कुछ व्यापारी भी इन उपनिवेश में जाकर बस गये । उनके साथ भी अंग्रेजों ने वही अभद्र व्यवहार करना प्रारम्भ कर दिया । इस अभद्र व्यवहार की सूचना जब देश के लोगों को मिली तो उनमें भी अंग्रेजों के प्रति घृणा और अपने देशवासियों के प्रति प्रेम व सहनुभूति की भावना जाग्रत | महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में जाकर अंग्रेजों के विरूद्ध अंहिसात्मक आन्दोलन चलाया, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने उनके साथ भी बड़ा अभद्र व्यवहार किया। इससे भारतीयों में घोर असन्तोष व्याप्त हो गया और उन्होंने उपनिवेशों की जनता की आर्थिक सहायता करनी प्रारम्भ कर दी । इस प्रकार भारत में उग्रवाद का उदय हुआ।

इस प्रकार उग्रवादियों ने उदारवादी नेताओं की राजनीतिक भिक्षावृत्ति का बहिष्कार कर दिया और उन्होंने अपने कार्यक्रम निश्चित किये, जिसमें विदेशी संस्थाओं और वस्तुओं का विरोध करना तथा स्वदेशी वस्तुओं और संस्थाओं में आस्था रखना था।

सन् 1905 के कांग्रेस के अधिवेशन के लोकमान्य तिलक, विपिनचन्द्र तथा लाला लाजपत राय ने उदारवादियों की नीति का चोर विरोध किया । सन् 1906 में उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग का आंदोलन चलाया । इस प्रकार देश में उग्रवादी राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ।

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