1980  से 1991 के मध्य भारत-चीन सम्बन्ध

1980-1991 के मध्य भारत-चीन सम्बन्ध

1980-91 के चरण में भारत-चीन सम्बन्ध

जनवरी 1980 में श्रीमती गाँधी तथा उनकी कांग्रेस पार्टी पुनः सत्तारूढ़ हुई। इस परिवर्तन से एक बार फिर भारत सोवियत विशेष सम्बन्धों के सम्भावित युग की वापसी हुई और चीन के साथ सम्बन्धों में चौकसी और नियन्त्रण की नीति पुनः वापस हुई। श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने बिना समय गंवाए चीन को भारत-चीन मित्रता तथा सहयोग के विकास तथा उसके साथ सम्बन्धों को सामान्य बनाने का आश्वासन दिया। 1979 से लेकर भारत तथा चीन अपने व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों को बनाए रखने तथा उनमें वृद्धि करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अभी तक दोनों देशों के राजनीतिक सम्बन्धों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, वियतनाम तथा कम्बोडिया के प्रति नीति-भेद होने के कारण तथा सीमा विवाद के बने रहने के कारण, परिवक्वता और सूझ-बूझ की कमी विद्यमान रही थी। दोनों देश आधिकारिक स्तर पर वार्ता करते रहे लेकिन समस्या को सुलझाना उनके लिये बड़ा कठिन बना रहा। 2 फरवरी, 1983 को भारत और चीन के मध्य आधिकारिक स्तर की तीसरे दौर की वार्ता बिना किसी सफलता के समाप्त हो गई। वार्ता का पहला दौर बीजिंग में दिसम्बर, 1981 में हुआ तथा दूसराbजुलाई 1982 को दिल्ली में तथा वार्ता का तीसरा दौर जनवरी 1983 में फिर बीजिंग में हुआ। इन वार्ताओं में दोनों पक्ष अपने मतभेदों को कम करने में सफल नहीं हुए। चीन और भारत के बीच मुख्य मतभेद सीमा विवाद को लेकर बना रहा।

चीन के साथ सम्बन्धों में गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए 3 फरवरी, 1983 के अंक में ट्रिब्यून के सम्पादक ने अपने सम्पादकीय में लिखा, “सामान्य पड़ोसी सम्बन्धों को बनाने के रास्ते में सबसे बड़ा कठिन कार्य है हिमालय के आधे भाग में 4200 कि०मी० लम्बी सीमा का सीमांकन। दिल्ली तथा बीजिंग दोनों ओर से हमें सांस्कृतिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा व्यापारिक सम्बन्धों के शीघ्र सुधारने के सुखद समाचार मिल रहे हैं। लेकिन सीमा-विवाद एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान आने वाले कई वर्षों में नजर नहीं आता।” सम्पादकीय में उस अन्तर की ओर भी संकेत किया जिस कारण कि चीन एकमुश्त सौदे के सिद्धान्त और भारत द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृत सिद्धांत, खण्ड से खण्ड स्तर के आधार पर समाधान की इच्छा रखता था। यदि एकमुश्त सौदे को मान लिया जाये तो भारत को अक्साई चिन के साथ 5000 वर्ग किलोमीटर का अपना क्षेत्र छोड़ना होगा और यदि भारत के सिद्धान्त को माना जाए तो चीन को 1959 से पहले ही सीमा पर लौट जाना होगा, कोई भी देश इस प्रकार के दूसरे के विचारों को मान्यता देने को तैयार नहीं था। अतः गतिरोध बना रहना स्वाभाविक था।

  1. 1985-89 के मध्य भारत-चीन सम्बन्ध

    प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी ने यह निर्णय लिया कि अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मित्रता एवं सहयोगात्मक सम्बन्धों को विकसित करने के लिए एक प्रमुख अभियान चलाना चाहिए। पड़ोसियों के प्रति भारत के प्रति परिवर्तित दृष्टिकोण का सुखद प्रभाव हुआ तथा अनेक पड़ोसियों के साथ भारत के सम्बन्धों में कुछ सुधार होता दिखाई दिया। प्रधानमन्त्री ने कहा कि, “कई देशों, विशेषतः हमारे पड़ोसियों के साथ सम्बन्धों में ताजी हवा का झोंका महसूस हुआ है तथापि दुर्भाग्य से चीन (1985-88) के साथ हमारे सम्बन्ध वैसे ही बने रहे- सीमा-विवाद को हल करने और सम्बन्धों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया बड़ी धीमी गति से ही चली। भारत के प्रधानमन्त्री ने कई बार भारत-चीन सम्बन्धों को सामान्य बनाने तथा सीमा विवाद को हल करने की इच्छा व्यक्त की परन्तु सफलता सीमित ही रही।

  2. छठे दौर की भारत-चीन वार्ता

    अक्तूबर 1985 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी और चीन के प्रधानमन्त्री जोआ जियांग (Zhoa Ziang) के बीच न्यूयार्क में बातचीत हुई। इसने भारत-चीन के छठे दौर की वार्ता के लिए अच्छी पृष्ठभूमि तैयार कर दी (नई देहली नवम्बर 11, 1985) लेकिन यह वार्ता बहुत थोड़ी आगे बढ़ पाई। दोनों पक्षों ने सीमा समस्या पर विचार विमर्श किया और पूर्वी क्षेत्र की समीक्षा की। पश्चिमी क्षेत्र की समीक्षा अगली वार्ता में करने का निश्चय किया गया। दोनों देशों के द्विपक्षीय सम्बन्धों के विकास पर काफी स्पष्ट वार्तालाप हुआ। कृषि, शिक्षा, कम्प्यूटर उद्योग, प्लाजमा भौतिकी तथा बायो तकनीकी क्षेत्रों में शिष्टमण्डलों के आदान-प्रदान का भी समझौता हुआ। इस बात का भी निर्णय किया गया कि चीन में सामाजिक-आर्थिक योजना पर एक संयुक्त सेमिनार आयोजित किया जाए। परन्तु सीमा विवाद के हल में असफल होने के कारण वार्ता सीमित ही रही।

  3. जून 1986 में चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ और जुलाई 1986 में सातवें दौर की भारत-चीन सीमा वार्ता

    जून 1986 में चीन ने भारतीय क्षेत्र में 6-7 किलोमीटर तक घुसपैठ कर ली। यह क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश में कमांग मण्डल के चियांग ड्ररेग क्षेत्र की चरागाह का है जो मैकमोहन रेखा के दक्षिण में है। भारत ने चीन की इस घुसपैठ के प्रति कड़ा विरोध किया और जुलाई 21-22 को बीजिंग में हुई सातवें दौर की वार्ता में इस समस्या को उठाया। चीन ने कहा कि यह क्षेत्र वास्तविक नियन्त्रण रेखा के उत्तर में है और यह उसकी सीमा है और साथ ही इस बात पर जोर दिया कि पूरा अरुणाचल प्रदेश (पहले नेफा) उसका है। भारत ने सोचा कि यह चीन का पूर्वी सीमा विवाद को पुनः जागृत करने का एक प्रयास था। यह सीमा-वार्ता चीन की इस घुसपैठ की प्रतिछाया में हुई इसलिए इसमें कोई सफलता नहीं मिली।

भारत-चीनी सम्बन्धों तथा सीमा वार्ताओं में आए गतिरोध को दूर करने के लिए भारत ने अधिकारी स्तर की वार्ता को राजनीतिक वार्ता में परिवर्तित करने का निर्णय लिया। इसीलिए तत्कालीन भारतीय विदेश मन्त्री एन० डी० तिवारी के नाम (NAM) कान्फ्रैंस से आते हुए बीजिंग रुकने तथा चीनी विदेश मन्त्री से बातचीत करने का निश्चय किया। मि० तिवारी ने कहा कि उसकी यात्रा का उद्देश्य है-”हम चाहते हैं चीन के साथ मित्रतापूर्ण तथा सामान्यीकरण के आश्वासनों की समीक्षा की जाये, हम अपने सभी मतभेदों को, सीमा-विवाद को शामिल करके, बातचीत द्वारा हल करना चाहते हैं। इसलिए किसी प्रकार के झगड़े की आवश्यकता नहीं है और न ही ऐसी किसी प्रकार की बात की। सभी मामलों का समाधान बातचीत के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है भले ही इसमें समय अधिक लगे।” मि० एन० डी० तिवारी कुछ सीमा तक चीनियों को यह समझाने में सफल रहे कि दोनों देशों के पूर्ण सामान्य सम्बन्ध तथा मित्रता सहयोग को बढ़ाने के लिए निश्चयपूर्वक यल करने चाहिए।

  1. नवम्बर 1987 में आठवें दौर की भारत-चीन वार्ता-

    सर्वोच्च राजनीतिक स्तर पर बने सम्पर्कों के कारण यह वार्ता आशा तथा सद्भावना के वातावरण में हुई। चीनियों ने द्विपक्षीय सम्बन्धों में आए तनाव और डर को दूर करने का यत्न किया। दोनों पक्ष औपचारिक रूप में इस बात के लिए सहमत हो गए कि सम्बन्धों के सकारात्मक पक्षों पर सीमा-विवाद की छाया न पड़ने दी जाए। भारत ने भी चीन के साथ अपना सहयोग का वातावरण बनाने की इच्छा प्रकट की। दोनों इस बात पर सहमत हुए कि सीमा विवाद के समाधान के लिए शान्तिपूर्ण तथा विवेकपूर्ण यत्न जारी रखे जाएं।

सीमाओं के साथ-साथ शांति तथा प्रशांति बनाए रखने का भी दोनों ने प्रस्ताव रखा। इस स्तर पर एक-दूसरे के देश में वाणिज्य दूतावास पुनः खोलने का विषय भी इस वार्ता के अन्तर्गत आया।

आठवें दौर की वार्ता में एशिया के दो महान् देशों भारत-चीन सम्बन्धों में गुणनात्मक-सुधारात्मक वातावरण बनाने का नवीन यत्न किया। पहली बार सीमा विवाद पर पर्याप्त मात्रा में विचार-विमर्श हुआ।

  1. भारत-चीन सम्बन्धों में एक नया उपक्रम : प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की चीन यात्रा दिसम्बर 1988-

    भारत-चीन के सम्बन्धों को भारी सकारात्मक प्रोत्साहन उस समय प्राप्त हुआ जब एक साहसिक तथा सुखद प्रयत्न भारत द्वारा किया गया। दिसम्बर 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री राजीव गाँधी ने चीन की यात्रा की तथा चीनी नेताओं के साथ लाभदायक बातचीत की। यह उच्चस्तरीय चीन की यात्रा 34 वर्ष के अन्तराल के पश्चात हुई। 1954 ई० में श्री नेहरू ने चीन की यात्रा की थी। भारत-चीन सम्बन्धों में इस यात्रा से एक नवीन आरम्भ का प्रादुर्भाव हुआ तथा इन दोनों भीमकाय देशों में इस यात्रा के दौरान जिन दिशा-निर्देशों को तैयार किया, उनके आधार पर सम्बन्धों का विकास शुरू हुआ। इसके दौरान चीनी नेता डेंग जियोपिंग ने घोषणा की, “हमारे सम्बन्धों के सुधार को इस यात्रा से ‘वास्तविक आरम्भ मिला है तथा यह यात्रा हमारे सम्बन्धों के विकास को और अधिक प्रोत्साहन देगी।”

श्री राजीव गाँधी का स्वागत करते समय श्री डेंग जीयोपिंग ने कहा, “मेरे युवा मित्र तुम्हारा अत्यधिक स्वागत है। आप की यात्रा से आरम्भ कर हम अपने सम्बन्ध पुनः मैत्रीपूर्ण बना लेंगे तथा दोनों देशों के नेताओं के मध्य हम मित्र होंगे। दोनों देशों के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण हो जाएंगे। इसलिए यही हमारी मुख्य इच्छा है। इस काल के मध्य चिरकाल तक दोनों के मध्य कटुता के सम्बन्ध थे। आओ हम इसे भूल जाएं। हमें भविष्य की ओर आशा से देखना चाहिए। हमारे सम्बन्धों में वास्तविक सुधार का प्रारम्भ आपकी यात्रा है।” इसी प्रकार एक प्रीतिभोज में अपने भाषण में प्रधानमन्त्री ली-पेंग (Li-Peng) ने कहा, ”हमारा यह सदा से ही विश्वास तथा सद्आशा है कि मैत्रीपूर्ण विचार विनिमय, जोकि पारस्परिक निकटता तथा पारस्परिक समायोजन की भावना में होगा, उसके द्वारा हमारे दोनों देशों में चिरकाल से चले आ रहे सीमा विवाद का समाधान न्याय-पूर्ण तथा तर्कसंगत रूप में हो जायेगा।

श्री राजीव गाँधी ने चीनी नेताओं पर भारत-चीन मित्रता तथा सहयोग को नवीन सकारात्मक स्वास्थ्य प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया जो कि पारस्परिक द्वि-पक्षीय सम्बन्धों में शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्तों के प्रयोग द्वारा सीमा विवाद का मैत्रीपूर्ण समाधान करने के लिए किया जा सकता है। अपने प्रीति भोजन भाषण के प्रत्युत्तर में श्री राजीव गाँधी ने कहा, “विश्व को इन शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्तों के विषय में बतलाते हुए, हम अपनी पारस्परिक समस्याओं का समाधान इन सिद्धान्तों के अनुसार करेंगे। सीमा विवाद का प्रश्न एक प्रमुख समस्या बनी हुई है यदि हम इसका समाधान एक दूसरे के दृष्टिकोण के आधार पर करेंगे तो यह हमारे पारस्परिक लाभ में होगा तथा हमारे दोनों देशों के लोगों के हित में होगा। इस काल के दौरान हमारी सीमाओं पर शान्ति तथा प्रशान्ति की आवश्यकता है। हमें पूर्ण विश्वास है कि सीमा का प्रश्न सद्भावनापूर्ण सुलझाया जा सकता है। इसे एक यथार्थ समय अवधि में सुलझाया जाना चाहिए। भारत इसके अनुसार कार्यक्रम निश्चित करने के लिए तैयार है।”

भारत तथा चीन दोनों देश इस बात पर सहमत हो गए कि वे मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्धों के विकास को बनाए रखें तथा साथ ही साथ सीमा विवाद के प्रश्न का ही हल खोजते रहें। सीमा विवाद को हल करने के लिए भारत तथा चीन ने यह निर्णय लिया कि एक संयुक्त कार्य-प्रचालन समूह का निर्माण किया जाए जिसका भारत की ओर से सभापतित्व विदेश सचिव द्वारा किया जाएगा तथा चीन की ओर से विदेश मामलों के उप-मन्त्री द्वारा । इसे ये कार्य भार सौंपे जाने थे-

  1. सीमा विवाद एक निश्चित कालावधि में सम्पूर्ण समाधान के लिये ठोस सिफारिशें करना।
  2. इस बात को सुनिश्चित बनाना कि सीमा-क्षेत्र में शान्ति तथा प्रशान्ति को बनाए रखा जाए।

दोनों देशों के नेताओं ने तथा उनके शिष्य मण्डलों ने पारस्परिक हित के मामलों में बड़ा गहरा विचार-विमर्श किया। इसमें सीमा विवाद का प्रश्न तथा भारत-चीन आर्थिक, सांस्कृतिक तथा प्रौद्योगिक सहयोग में वृद्धि का मामला भी था। सीमा-विवाद प्रश्न पर संयुक्त कार्य प्रचालन समूह के निर्माण के अतिरिक्त आर्थिक सम्बन्धों, व्यापार, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पर भी संयुक्त कार्य प्रचालन समूह की नियुक्ति का निश्चय किया गया।

तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए-

  1. असैनिक वायु परिवहन से सम्बन्धित समझौता,
  2. विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता, तथा
  3. द्विपक्षीय सांस्कृतिक सहयोग के समझौते के अन्तर्गत 1988, 1989, 1990 के वर्षों के लिए कार्यकारी प्रोग्राम।

श्री राजीव गाँधी की चीन की यात्रा के अन्त में जारी की गई विज्ञप्ति में यह अभिलेख दिया गया कि प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी ने चीन के सभी शीर्ष नेताओं से बातचीत की तथा पारस्परिक हित के मामलों पर स्वतन्त्र तथा स्पष्ट विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

दोनों पक्षों ने व्यापार, संस्कृति, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, शहरी हवाबाजी तथा अन्य क्षेत्रों में हाल ही के वर्षों में हुए सहयोग तथा आदान-प्रदान का सकारात्मक मूल्यांकन किया तथा दोनों पक्षों में इस सम्बन्ध में हुए समझौतों पर सन्तोष व्यक्त किया। दोनों पक्षों ने पंचशील के सिद्धान्तों में पूर्ण विश्वास व्यक्त किया तथा इस बात को स्वीकार किया कि ये सिद्धान्त नवीन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था तथा नवीन अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु आधारभूत दिशा निर्देशों का कार्य करेंगे।

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