1980 के दशक में भारत-चीन के संबंध

1980 के दशक में भारत तथा चीन के संबंध

परस्पर अविश्वास, डर तथा शत्रुता के युग में रहने के पश्चात् अथवा वैर-विरोध तथा तनाव के वातावरण में जहाँ तर्क की अपेक्षा भावनाओं का बोलबाला था, भारत तथा चीन दोनों ने आठवें दशक में आपसी सम्बन्धों में आए इस गतिरोध को दूर करने की आवश्यकता महसूस की। एशिया में परिवर्तित स्थिति नए अन्तर्राष्ट्रीय दृश्यपटल के आविर्भाव, 1971 ई० में भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय के परिणामस्वरूप दक्षिण एशिया में भारत का एक मुख्य शक्ति के रूप में उभरना, तृतीय विश्व के देशों में महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में बढ़ती हुई भारतीय भूमिका, तृतीय विश्व के देशों के साथ सम्बन्धों के सुधारने की आवश्यकता का चीन द्वारा एहसास तथा इन सब से भी बढ़कर दोनों देशों के परस्पर सम्बन्धों में आए गतिरोध को समाप्त करने की भावना, इन सब ने मिलकर भारत-चीन सम्बन्धों को सुधारने की प्रक्रिया आरम्भ करने की अपार भूमिका तैयार कर दी।

1962 ई० के पश्चात् भारत अपनी शक्ति को बढ़ाने की कोशिश में लग गया था। 1965 ई० में पाकिस्तान के युद्ध के साथ भारत ने अपनी शक्ति का परिचय दिया था। 1971 ई० के में पाकिस्तान पर भारत की विजय ने दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती हुई शक्ति का प्रदर्शन किया। दोनों महाशक्तियों के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने तथा सन्1972 में शिमला समझौते के द्वारा पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने के प्रयास ने विदेशी सम्बन्धों के सफलतापूर्ण संचालन की भारतीय योग्यता को सिद्ध कर दिया। तृतीय विश्व में एक महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू की तथा इस समय गुटनिरपेक्ष आन्दोलन से भी भारत की छवि अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उभरी। इसीलिए चीन को भारत के साथ सम्बन्धों को सम्बन्धों को सामान्य बनाने की आवश्यकता स्वीकार करनी पड़ी। सन् 1971 में भारत-सोवियत सन्धि पर हस्ताक्षर होने के पश्चात् बढ़ती हुई भारत-सोवियत मित्रता ने चीन को यह सोचने पर बाधित कर दिया कि उसके भारत के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध ही भारत-सोवियत मित्रता का आधार हैं। बढ़ती हुई सोवियत शक्ति का डर तथा सोवियत-चीन सम्बन्धों की बढ़ती हुई दरार ने चीन को भारत के साथ सम्बन्धों को सुधारने की आवश्यकता के प्रति सचेत किया। इन सभी कारणों ने चीन तथा भारत को अपने सम्बन्धों का पुनरावलोकन करने को प्रेरित किया। इस प्रकार 1970 के दशक का प्रारम्भ भारत-चीनी सम्बन्धों में सुखद परिवर्तन लेकर आया। माओ-त्से-तुंग तथा चाऊ-इन-लाइ की मृत्यु के पश्चात् आठवें दशक के मध्य में चीन में नए नेतृत्व के आने से उसकी विदेश नीति कुछ उदारवादी बनी। इससे भी भारत तथा चीन के सम्बन्धों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को शक्ति मिली। वैसे आज तक सम्बन्धों में पूर्ण समान्यीकरण तथा वास्तविक तनाव से मुक्ति की प्रगति काफी कम ही रही है। लेकिन ऐसा क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व हमें भारत-चीनी सम्बन्धों के 1971 से सामान्यीकरण की प्रक्रिया के इतिहास का विश्लेषण करना होगा।

  1. सामान्यीकरण के संकेत-

    भारत के प्रति चीन के इस परिवर्तित व्यवहार के पहले संकेत 1969 ई० में तब मिले जब चीनियों ने भारतीय कूटनितिक मिशनों द्वारा आयोजित समारोहों में भाग लेना शुरू किया और अपने समारोहों में भारतीय कूटनीतिज्ञों को आमंत्रित करना शुरू किया। परिवर्तन का एक ‘बड़ा संकेत’ तब मिला जब 1970 में बीजिंग में मई दिवस स्वागत समारोह (May Day Reception) के अवसर पर अध्यक्ष माओ-त्से-तुंग ने भारतीय प्रभारी राजदूत (Charged’ affairs) का स्वागत करते हुए कहा था कि “भारत एक महाने देश है तथा भारत और चीन बहुत पहले अच्छे मित्र थे, उन्हें फिर मित्र बनना चाहिए।” इस घटना को ‘माओ मुस्कराहट’ के नाम से जाना जाने लगा तथा भारतीय चीनी कूटनीतिज्ञ दूसरे देशों की राजधानियों में अपनी गतिविधियों के दौरान सम्पर्क बढ़ाने लगे। 1971 ई० में चीन के राजदूत ने भारतीय राजदूत श्री डी० पी० धर से मास्को में तीन मुलाकातें कीं। इसी प्रकार काहिरा, पैरिस, वार्सा तथा बोन में चीन तथा भारत के राजदूतों में सम्पर्क बने। इस बढ़ते हुए सम्पर्कों के परिणामस्वरूप भारत तथा चीन के बीच एक अच्छी शुरुआत होने की सम्भावना बनने लगी। अक्तूबर 1971 में भारतीय विदेश सचिव के नेतृत्व में अफसरों के एक दल ने नई दिल्ली में चीन के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भाग लिया। दिसम्बर 1971 में भारत सरकार ने चीनी दूतावास के बाहर बनी पुलिस चौकी को हटाने का आदेश दिया। इस चौकी को 1957 ई० में बनाया गया था। भारतीय एवं चीनी कूटनीतिज्ञों के बीच मुस्कराहटों का आदान-प्रदान तथा हाथ मिलाने का क्रम नियमित बन गया। नवम्बर 1971 में चीन ने अफ्रीकी-एशियाई मैत्री टेबल टेनिस प्रतियोगिता (Afro-Asian Friendship Table Tennis Championship) में भारत की टीम को भी आमन्त्रित किया। भारत ने इस निमन्त्रण को स्वीकार किया और इस प्रकार दोनों देशों के मध्य पिंगपांग कूटनीति ने जन्म लिया।

  2. भारत-चीन सम्बन्धों में पाकिस्तानी तत्त्व-

    दिसम्बर1971 के भारत-पाक युद्ध में चीन ने भारत की भूमिका का विरोध किया किन्तु यह विरोध इतना शत्रुतापूर्ण नहीं था जितना 1965 ई० में था। वैसे कुछ प्रकार की सकारात्मक घटनाओं के साथ-साथ चीनियों द्वारा भारतीय क्षेत्रों का अतिक्रमण और भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पहले की तरह सीमा घटनाएँ होती रहीं। चीनी प्रेस भारत के प्रति उतनी ही शत्रुतापूर्ण बनी रही और चीन पाकिस्तान को भारत के विरोध में समर्थन देता रहा। जनवरी 1972 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री श्री भुट्टो की चीन यात्रा की पूर्व सन्ध्या पर ‘पीकिंग डेली’ ने अपने सम्पादकीय में भारत और सोवियत संघ की बंगला देश के युद्ध में निभाई गई भूमिका के लिए आलोचना की और चेतावनी दी कि ‘भारत’ इस उपमहाद्वीप में और अधिक समस्याओं की अपेक्षा कर सकता था। 1972 ई० के पहले महीनों में चीन के अनेक नेताओं ने भारत के विरुद्ध अनेक बयान दिए।

लेकिन इन्हीं दिनों चीन ने भारत के साथ सम्बन्धों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को बनाए जाने की इच्छा भी प्रकट की। एक ओर चीन ने पाकिस्तान को कश्मीर समस्या पर पूर्ण समर्थन दिया और दूसरी ओर भारत तथा पाकिस्तान के बीच समस्याओं के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए वार्तालाप का भी स्वागत किया। जब श्रीमती इन्दिरा गाँधी चैकोस्लोवाकिया तथा हंगरी की यात्रा पर गईं तो चीनी कूटनीतिज्ञ सभी समारोहों में उपस्थित रहे और भारतीय संवाददाताओं को दोनों देशों के सम्बन्धों के सुधारने की आवश्यकता व्यक्त करते रहे।

  1. चीनी अवबोधन में परिवर्तन-

    पहले तीन वर्षों (1973 से 1975) तक लुका-छिपी का खेल ऐसा चलता रहा। भारत तथा चीन दोनों के अधिकारी अपनी सम्पर्क बनाने तथा उन्हें बढ़ाने में लगे रहे और भारत-चीनी मित्रता तथा सहयोग को बनाने की इच्छा व्यक्त करते रहे लेकिन इस दिशा इससे अधिक कुछ नही किया गया और न ही कुछ प्राप्त हुआ। इस पूरे काल में चीन यह प्रभाव देता रहा कि भारत के साथ सम्बन्धों को सुधारने में बड़ा आतुर है। चीन के इस प्रभाव को फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक आन्द्रे मालरॉक्स (Andre Malraux) तथा अमरीका के भूतपूर्व राजदूत और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गालब्रेथ (Mr. Galbraith) ने अपनी अप्रैल 1973 में चीन यात्रा के समय भी अनुभव किया। गालब्रैथ ने अपने इस प्रभाव से नई दिल्ली को अवगत करवाया और उसे बताया कि भारत-चीन मतभेदों के होते हुए भी चीन भारतीय प्रधानमन्त्री का आदर तथा सत्कार करता था और चीन वास्तव में भारत के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारना चाहता था। यह उसकी सामान्य इच्छा थी कि पारस्परिक लाभ पर आधारित उपमहाद्वीप के दोनों देशों में सम्बन्ध कायम हों। परन्तु भारत सरकार ने इसे महत्त्वहीन सामान्योक्ति के रूप में लिया क्योंकि चीन सरकार की ओर से सम्बन्धों को सामान्य बनाने के लिए कोई भी सकारात्मक एवं स्पष्ट उपक्रम नहीं किया गया था। परिणामस्वरूप चीन ने जब भारत-चीन सीमा पर लाउडस्पीकर प्रचार युद्ध को बन्द किया, जिसे उसने 1963 ई० से शुरू किया था तब भारत ने चीन सम्बन्धों में सकारात्मक परिवर्तन को स्वीकार किया। भारत के विदेश राज्यमंत्री श्री सुरेन्द्रपाल सिंह ने इस प्रकार का मत अगस्त 1973 में राज्यसभा में दिया। अगस्त 1973 के बाद भारत के सरकारी समारोहों में चीन की उपस्थिति बढ़ गई एवं गैर-सरकारी और निजी यात्राओं के आदान-प्रदान का सिलसिला भी काफी बढ़ गया। दोनों देशों के नेताओं ने अपने राष्ट्रीय दिवसों के उपलक्ष्य में बधाई संदेशों का आदान-प्रदान फिर शुरू कर दिया।

  2. सम्बन्धों में गतिरोध-

    स० स्वर्ण सिंह ने काहिरा के एक समाचार पत्र में भेंटवार्ता में बतलाया, “हमारे सम्बन्ध चीन के साथ सुसुप्ति की अवस्था में हैं। पिछले वर्षों के मुकाबले में न बुरे हुए और न अच्छे ही हुए।” लेकिन उन्होंने इस बात की आशा व्यक्त की कि सम्बन्ध अगले वर्ष शायद सुधर जाए।1974 ई० में भारत ने शान्तिपूर्ण अणु परीक्षण किया और 1975 ई० में सिक्किम को भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाया। ये दोनों बातें ही चीनी आलोचना के लक्ष्य रहे और भारत-चीनी सम्बन्ध केवल सम्पर्कों तक ही सीमित रहे। सिक्किम के भारत में मिलने के विरुद्ध कड़ी चीनी प्रतिक्रिया, चीन का भारत विरोधी लगातार प्रचार, बीजिंग-पिण्डी की बढ़ती हुई शक्ति तथा भारतीय सीमा पर चीनियों द्वारा उत्पन्न कठिनाइयाँ, इन सब से भारत-चीन सम्बन्ध बड़े शिथिल रहे। पिछले वर्षों की तरह इस काल में भी मित्रता एवं सहयोग के विकास की इच्छा में विश्वास तो प्रगट किया गया लेकिन इस भावना को यथार्थ रूप देने के लिए कोई ठोस कार्य नहीं हुआ।

  3. सामान्यीकरण प्रक्रिया का आरम्भ-

    15 अप्रैल, 1976 को भारत सरकार ने चीन के साथ दुबारा उच्चस्तरीय पूर्ण कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने का निर्णय लिया। श्री के० आर० नारायणन को पीकिंग में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया जो एक बहुत बड़ा अच्छा परिवर्तन था। भारत-चीन सम्बन्धों को सामान्य बनाने की दिशा में भारत का एक सुदृढ़ प्रयास था। भारत के इस प्रयास की चीन द्वारा सराहना की गई और चीन की सरकार ने घोषणा की, “चीन भी भारत के साथ राजदूतीय स्तर के सम्बन्धों को पुनः स्थापित करेगा।’ वैसे चेन चाओ यवान (Chen Chao Yuan) को भारत में चीनी राजदूत नियुक्त करने में पाँच महीने लग गए। 1976 ई० में पूर्ण कूटनीतिक सम्बन्धों की पुनः स्थापना से भारत-चीन सम्बन्धों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया को शक्ति मिली।

1976 ई० के उत्तर काल में व्यापार में वृद्धि तथा सांस्कृतिक सहयोग के द्वारा भारत-चीन-सम्बन्धों में सुधार होना शुरू हुआ। धीरे-धीरे भारत-चीन व्यापार में वृद्धि और सद्भावना मिशनों का पारस्परिक आदान प्रदान शुरू हुआ परन्तु सम्बन्धों के सामान्यीकरण में सीमा विवाद मुख्यरूप में गतिरोध और मुख्य उत्तेजक बना रहा।

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