सामूहिक सुरक्षा (Collective Security)

सामूहिक सुरक्षा (Collective Security)

सामूहिक सुरक्षा (Collective Security)

सामूहिक सुरक्षा शान्तिपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को विकसित करने का एक प्रमुख साधन है। सामूहिक सुरक्षा ही राष्ट्र संघ (League of Nations) तथा संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) का मूलाधार है किन्तु इस शब्द का प्रयोग न तो राष्ट्र संघ और न ही संयुक्त राष्ट्रसंघ की संविदा में हुआ है। सुरक्षा की समस्या न केवल एक ही राष्ट्र की समस्या है बल्कि सभी राष्ट्र एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन बनाकर व एकजुट होकर सुरक्षा के प्रति उत्पत्र होने वाले खतरों का विरोध कर रहे हैं। ‘एक सभी के लिए और सभी एक के लिए’ की भावना ही सामूहिक सुरक्षा का मूलाधार है।

सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत आने वाले किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा को जब खतरा उत्पन्न होता है या इसकी सम्भावनायें होती हैं तो उक्त व्यवस्था के अन्तर्गत आने वाले राष्ट्र सामूहिक रूप से आक्रमणकारी राष्ट्र के विरुद्ध संगठित होकर सुरक्षा कार्य करते हैं। इस व्यवस्था का प्रमुख लक्ष्य युद्धप्रिय व साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध संयुक्त कार्य करने से सम्बन्धित है। इन्हीं कारणों से श्वार्ज़ेनबर्गर महोदय ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करने के संयुक्त तंत्र की संज्ञा दी है।

होगन महोदय ने सामूहिक सुरक्षा को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति बनाये रखने तथा उसे क्रियान्वित करने के लिए सामान्य सहयोग कार्य कहकर सम्बोधित किया। लेकिन युद्ध के विरुद्ध शान्ति की स्थापना उसी समय सम्भव है जब सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ व प्रभावी हो। अतः इस व्यवस्था को सुदृढ़ आधार उपलब्ध कराना सभी सदस्य देशों का लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए सभी सदस्य राष्ट्रों के मध्य विचारों में साम्य होना तथा इस व्यवस्था को क्रियात्मक रूप देना आवश्यक है, जिससे आक्रमणकर्ता का प्रतिरोध अपने-अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करते हुए सम्भव हो सके। इस संदर्भ में डॉ0 नायडू ने बताया है कि, “कोई भी सामूहिक सुरक्षा का संगठन अपने उद्देश्य को तभी प्राप्त कर सकता है जब प्रत्येक राज्य की विश्व समुदाय, शान्ति की अविभाज्यता, यथास्थिति तथा सामूहिक गारण्टियों में पूर्ण निष्ठा हो तथा वह शक्ति के प्रयोग को अनैतिक समझकर उसका विरोध करे।” और भी स्पष्ट किन्तु संक्षेप में सफल सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए, निम्नलिखित तत्व अपरिहार्य होते हैं-

  1. किसी एक राष्ट्र पर किया गया आक्रमण सभी राज्यों पर आक्रमण माना जायगा।
  2. किसी राष्ट्र की सुरक्षा-समस्या मात्र उसी तक सीमित न रहकर अन्तर्राष्ट्रीय समाज को चिन्ता का विषय है।
  3. किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होने पर अन्य देश सामूहिक रूप से आक्रमणग्रस्त राष्ट्र की सहायता करेंगे।
  4. आक्रमणकर्ता के अतिरिक्त अन्य सभी देशों के मध्य सहयोग स्थापित होना सामूहिक सुरक्षा का सार तत्व है।

वस्तुतः, सामूहिक सुरक्षा शान्ति के अभिगम के रूप में काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस व्यवस्था के माध्यम से युद्धों को रोका जा सकता है। लेकिन सामूहिक सुरक्षा तभी सफलतापूर्वक अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकती है जबकि इसके सदस्य राष्ट्र शान्ति को खतरा उत्पन्न करने वाले राष्ट्र विशेष से आवश्यकता पड़ने पर युद्ध हेतु भी अपने को सशक्त व तैयार रखें, क्योंकि शान्ति स्थापित करने में शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है।

सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का विकास

सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा का विकास 17वीं शताब्दी में सम्पत्र ओस्नावक सन्धि से प्रारम्भ हुआ माना जाता है, जिसके अनुच्छेद 17 में कहा गया था कि, “संविदा करने वाले सभी और प्रत्येक पक्ष को इस शान्ति सन्धि के प्रत्येक और सब रूपों की प्रतिरक्षा और अस्तित्व रक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया जायेगा, चाहे इसके विरोध में खड़ा होने वाला कोई क्यों न हो। तत्पश्चात् विलियम पेन द्वारा यूरोप में शान्ति व्यवस्था कायम रखने की योजनायें प्रस्तुत करने के पश्चात् 1805 में विलियम पिट ने यूरोपीय शक्तियों का व्यापक शान्ति भंग करने के किसी भी प्रयत्न का सामूहिक रूप से विरोध करने का विचार प्रतिपादित किया किन्तु वास्तविक अर्थों में सामूहिक सुरक्षा का विचार बीसवीं शताब्दी में उस समय आरम्भ हुआ जब सन् 1902 में रूजवेल्ट ने सभी सभ्य व व्यवस्था प्रिय राष्ट्रों से संसार की समुचित देखभाल करने व शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने का आह्वान किया। इतना ही नहीं, प्रथम महायुद्ध के दौरान रूजवेल्ट ने सामूहिक रूप से आक्रमण रोकने की विचारधारा के प्रतिपादन का हर सम्भव प्रयत्न करके सामूहिक सुरक्षा सिद्धान्त की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

इसके पश्चात् एक डच विद्वान सी0 वैन वोलनहोवन ने भी एक अन्तर्राष्ट्रीय रोक व्यवस्था की स्थापना पर विशेष बल दिया जिसे अमेरिकी कांग्रेस द्वारा अनुमोदित भी कर दिया गया। यद्यपि अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था द्वारा शान्ति स्थापित करने की अवधारणा के प्रबल पक्षधर थे किन्तु उनके द्वारा इसे समर्थन देकर प्रचारित करने से पूर्व ही सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा न केवल अन्तर्राष्ट्रीय महत्व प्राप्त कर ठोस विचार के रूप में प्रतिस्थापित होचुकी थी अपितु राष्ट्र संघ के गठन में इसे मूलाधार के रूप में स्वीकार कर लिया गया था। राष्ट्र संघ के असफल रहने के पश्चात् सन् 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना भी सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त के आधार पर ही हुई है।

वस्तुतः, सामूहिक सुरक्षा का सिद्धान्त, जिसके जन्म का श्रेय राष्ट्र संघ को है, संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्माण से और भी सुदृढ़ हुआ है क्योंकि राष्ट्रसंघ की तुलना में यह एक विकसित व शक्तिशाली अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। डॉ0 महेन्द्र कुमार के शब्दों में “राष्ट्रसंघ के अन्तर्गत तो सामूहिक सुरक्षा एक नये विचार की स्वीकृति की सूचक थी परन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत सामूहिक सुरक्षा राष्ट्रसंघ द्वारा पहले ही स्वीकृत विचार के अधिक कारगर तरीके से कार्य करने की लगन की द्योतक है। इस प्रकार राष्ट्र संघ के अन्तर्गत सामूहिक सुरक्षा अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक क्रान्ति की सूचक और संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत वह उस क्रान्ति के फलों को मजबूत बनाने के प्रयत्नों की सूचक है।’

इन्हीं विचारधाराओं को आधार मानते हुए ब्रेजनेव ने सन् 1969 में एशियाई सामूहिक सुरक्षा सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसके अन्तर्गत राष्ट्रों के मध्य बल प्रयोग का त्याग, दूसरे राष्ट्र की राजसत्ता और उसकी प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान, दूसरे राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में अहस्तक्षेप तथा एशियाई देशों के मध्य पूर्ण समानता के आधार पर आर्थिक व तकनीकी सहयोग जैसे तथ्यों पर विशेष बल दिया गया था। किन्तु ब्रेजनेव सिद्धान्त के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि यह मात्र एक क्षेत्रीय अथवा महाद्वीपीय स्तर की सामूहिक मोर्चेबन्दी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है क्योंकि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था एक विश्वव्यापी अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के अन्तर्गत ही सम्भव है न कि किसी क्षेत्र विशेष अथवा महाद्वीप के अन्तर्गत। वास्तविकता तो यह है कि ब्रेजनेव का एशियाई सामूहिक सुरक्षा का प्रस्ताव सामूहिक मोर्चेबन्दी के अन्तर्गत भी नहीं आता क्योंकि यह मोर्चेबन्दी किस देश के विरुद्ध है, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख इसमें नहीं है।

सामूहिक सुरक्षा के सैद्धान्तिक आधार

सामूहिक सुरक्षा का प्रमुख उद्देश्य युद्ध को रोकने के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा स्थापित करना होता है। मार्गेन्थो के अनुसार एक सफल सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था अग्र तथ्यों पर आधारित होती है-

  1. सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था सदैव इतनी सशक्त व सक्षम होनी चाहिए कि आक्रामक प्रवृत्ति वाले राष्ट्र आक्रमण का जोखिम न उठा सकें।
  2. सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के सदस्य राष्ट्रों की नीतियों, धारणाओं व मान्यताओं में समानता होनी चाहिए।
  3. सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की सफलता हेतु प्रत्येक राष्ट्र को अपने राजनीतिक हितों के बलिदान हेतु तत्पर रहना चाहिए।

जबकि प्रसिद्ध राजनीतिक विद्वान के0 एम0 बी0 नायडू ने सफल सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था हेतु निम्नलिखित पूर्व शर्तों का उल्लेख किया है

  1. सभी सदस्यों की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के सिद्धान्त में अटूट आस्था।
  2. परस्पर भाई-चारे की भावना में विश्वास।
  3. विश्व के किसी भाग अथवा राज्य में संघर्ष अथवा युद्ध को अन्तर्राष्ट्रीय शांति के लिए अशुभ व विनाशकारी मानना।
  4. सदस्यों द्वारा सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता में विश्वास।
  5. सामूहिक सुरक्षा के सभी प्रयत्नों का सदस्यों द्वारा स्पष्ट समर्थन।
  6. सभी देशों द्वारा एक-दूसरे की राजनीतिक सम्प्रभुता और प्रादेशिक अखण्डता की सुरक्षा हेतु वचनबद्धता।
  7. शस्त्र नियंत्रण व निशस्त्रीकरण का समर्थन।
  8. सभी या कम से कम अधिकांश देशों द्वारा सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की सदस्यता ग्रहण करना।
  9. सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की वैधानिकता व निष्पक्षता।
  10. विश्व सरकार की स्थापना हेतु तत्परता।

वास्तव में, य दि सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था निष्पक्ष एवं सशक्त होने के अतिरिक्त अधिकांश देश इसके सदस्य हो जायें तो यह विश्व शान्ति की स्थापना में महत्वपूर्ण अभिकरण सिद्ध हो सकती है क्योंकि आक्रामक राष्ट्र इस शक्ति से भयभीत होकर या तो आक्रमण का विचार ही त्याग देंगे अन्यथा उन्हें युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ेगा। यही कारण है कि आइनिस क्लाड ने सामूहिक सुरक्षा को शक्ति के व्यवस्थापन की एक युक्ति कहकर सम्बोधित किया है।

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