भारत-जापान सम्बन्धों की प्रगति

भारत-जापान सम्बन्धों की प्रगति

(Progress of Indo-Japan Relations)

भारत-जापान सम्बन्ध 1952-80

ऊपर वर्णित तथ्यों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि भारत तथा जापान द्विपक्षीय सम्बन्ध स्थापित करने में असफल ही रहे। 1950 के दशक में ही उच्च स्तरीय सम्बन्ध कायम किये गये थे। भारत के नेता एशिया तथा विश्व में जापान द्वारा निभाई जा सकने वाली सम्भावित भूमिका से अनभिज्ञ नहीं थे। भारत तथा जापान के बीच सम्बन्धों की प्रक्रिया 1957 में महत्वपूर्ण ढंग से शुरू हुई।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पहले ऐसे एशियाई नेता थे, जिन्होंने जापान का दौरा किया। वास्तव में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों का एक-दूसरे के देश में आना-जाना 1957 से शुरू हुआ और यह वास्तव में एक ऐतिहासिक महत्व की बात थी। नेहरू ने एशिया के तीन मुख्य देशों जापान, चीन तथा भारत को सभी एशियाइयों के कल्याण के लिए मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का आह्वान दिया। प्रधानमंत्री तेनशीन ओकेकुरा ने भी ऐसे ही विचार प्रकट किये। 1958 में जापान भारत सहायता क्लब का सदस्य बना तथा धीरे-धीरे यह भारत को सहायता देने वाले दो बड़े देशों में से एक बन गया। नवम्बर-दिसम्बर, 1960 में जापान के वर्तमान सम्राट, तब के राजकुमार एकीहीतो तथा राजकुमारी मिचीको भारत आए तथा उन्होंने भारत अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र का नींव पत्थर रखा जो जापान के अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र की तरह का सांस्कृतिक तथा बौद्धिक केन्द्र बनाया गया। जापान द्वारा दी जाने वाली सरकारी सहायता भारत की विकास प्रक्रिया का एक बड़ा निवेश बन गई तथा इसके अन्तर्गत ऊर्जा से पर्यावरण तक के विभिन्न मानवीय आवश्यकताओं के क्षेत्र शामिल किये गये।

1952 1980 तक के काल में भारत तथा जापान के सम्बन्ध मधुर रहे परन्तु औद्योगिक, आर्थिक तथा व्यापारिक सहयोग का स्तर निम्न ही रहा। एक-दूसरे के लिए पर्याप्त सद्भावना रखने के बावजूद भारत तथा जापान इसे उच्च स्तरीय व्यापारिक तथा औद्योगिक ढांचे में ढाल नहीं सके। जापान अपना विकास करने तथा अमरीका, दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों तथा अन्य विकसित देशों के साथ उच्च स्तरीय व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने में ही संलग्न रहा। भारत भी पाकिस्तान तथा चीन के साथ सम्बन्धों की अपनी समस्याओं से घिरा रहा। भारत को कच्चे लोहे के अतिरिक्त और कुछ जापान को बेचना कटिन लगा तथा जापान को भारत में निवेश करना कठिन लगा क्योंकि भारत का औद्योगिक क्षेत्र में उन्नति का स्तर बड़ा निम्न था। 1962 में चीन के साथ युद्ध से, पाकिस्तान को लेकर भारत की तल्लीनता से, तथा 1967 के बाद तथा फिर 1975 से 80 तक भारत की राजनीतिक अस्थिरता से, भारत की कमजोरी प्रकट हुई थी। फिर 1971 में बंगलादेश के प्रश्न पर पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत की सफल भूमिका, 1970 के दशक की हरित क्रान्ति तथा 1974 में भारत द्वारा किये गये शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण के बाद ही जापान ने भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में देखना शुरूकर दिया।

1980 से 1992 तक के काल में भारत-जापान सम्बन्धों में शक्ति-संचार

1978 में दोनों ही देशों द्वारा पहले से ही विद्यमान विदेश सचिव स्तर के वार्षिक परामर्श को विदेश मंत्री स्तर के परामर्श तक बढ़ाने का निर्णय किया गया। इन संयुक्त परामर्श सम्मेलनों का उद्देश्य विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 22 अगस्त, 1978 को राज्यसभा में जापान तथा कोरिया से वापस आने के बाद पेश किए गये वक्तव्य में उचित ढंग से परिभाषित किया गया। उन्होंने कहा था, “इस यात्रा से भारत तथा जापान की इस सांझी मान्यता का पता चलता है कि एशिया में बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियाँ होने के कारण दोनों ही देश समस्त एशिया की शांति, आर्थिक विकास तथा उन्नति में गहरी रुचि रखते हैं। इन वार्षिक परामर्शों का मुख्य उद्देश्य जापान के साथ हमारे बहुमुखी सम्बन्धों में सुदृढ़ता व उन्हें परस्पर लाभ के आधार पर लाने का प्रयत्न करना है। यह स्पष्ट है कि समस्त एशिया के प्रसंग में भारत को पूर्वी एशिया के सभी राष्ट्रों के साथ गहरी आपसी समझ तथा मैत्री के लिए कार्य करने की आवश्यकता है। जापान भी इस क्षेत्र में व्याप्त तनाव को कम करना चाहता था तथा इस क्षेत्र के सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने में रुचि रखता है।

वास्तव में, 1980 के दशक में ही भारत-जापान सम्बन्धों में वास्तविक तथा बड़े विकास की आवश्यकता को पहचाना गया।

  1. भारत-जापान व्यापार सम्बन्ध-

    1980 के दशक में भारत तथा जापान के व्यापार में काफी बढ़ोत्तरी हुई तथापि सन्तुलन जापान के पक्ष में ही रहा। भारत के विदेश व्यापार में जापान का भाग 10 से 12 प्रतिशत रहा जबकि जापान के विदेश व्यापार में भारत का भाग एक प्रतिशत से भी कम रहा। यह बड़े अफसोस की बात थी। दूसरे विश्व युद्ध से पहले जापान के विदेश व्यापार में भारत का भाग लगभग 12 प्रतिशत था। उत्तर-युद्ध काल में अवनति हुई तथा यह घटकर एक प्रतिशत से भी कम हो गया। 1980 के दशक में भारत मुख्यतया आयातक ही रहा। भारत जापान से जो वस्तुएं आयात करता रहा था, उनमें हल्की औद्योगिक वस्तुएं, भारी तथा रासायनिक औद्योगिक उत्पाद, धातु की वस्तुएँ तथा मशीनरी शामिल थीं। भारत का जापान को निर्यात सीमित ही रहा क्योंकि इसके उत्पादों का स्तर घटिया था तथा यह जापान के बाजारों के रणकौशल की बराबरी करने में भी सक्षम नहीं था। जापान भारत को एक ऐसा बाजार मानता रहा, जहाँ से यह कच्चा माल ले सकता तथा तैयार माल बेच सकता था।

1987 से 92 तक के व्यापार आंकड़ों से जापान के साथ भारत के व्यापार में आयात-निर्यात के बीच का अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है।

  1. यात्राओं का आदान-प्रदान-

    1980 के दशक के मध्य में ही भारत ने जापान के साथ अपने औद्योगिक, व्यापारिक तथा व्यावसायिक सम्बन्ध बढ़ाने के दृढ़ प्रयत्न किये। श्री राजीव गांधी के शासन में जापानियों को इस दिशा में प्रभावित करने के दृढ़ प्रयत्न किये गये। 1984 में जापान के प्रधानमंत्री नाकासोने भारत के मेहमान बने। इस यात्रा से विभिन्न परिप्रेक्ष्यों तथा ऐतिहासिक तथा भौगोलिक बाध्यताओं के सम्बन्ध में आपसी समझ-बूझ को बढ़ाने में सहायता मिली। इसके बाद 1985 में भारत के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने जापान का दौरा किया। उनकी यात्रा तथा जापान में भारत उत्सव से भारत-जापान सम्बन्धों को बढ़ाने में अच्छा योगदान दिया। उस अवसर पर श्री राजीव गांधी ने करोड़ों डालरों का व्यापार करने वाली निगमों के अध्यक्षों, बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं को सम्बोधित किया तथा उन्होंने भारत में वैसी स्थितिययाँ पैदा करने की पेशकश की जो वे भारत में निवेश के लिए चाहते थे। इसके साथ-साथ उन्होंने लाइसैंसों आदि की प्रक्रिया में एक खिड़की संचालन’ सुविधा प्रदान करने का वादा किया। इससे जापानी काफी प्रभावित हुए तथा उनमें से कई अपने-अपने प्रस्ताव लेकर आगे आए। परन्तु जैसे कि एस० विश्वान ने लिखा, “उनके विश्वास दिलाने के बावजूद यह देखकर बहुत निराश हुए कि उन्हें कोई भी ऐसी ‘एक खिड़की’ वाली सुविधा नहीं मिली तथा यह देखकर वे और भी निराश हुए कि अफसरशाही की देरी तथा परेशानी पहले जितनी ही दुर्भेद्य तथा बोझिल थी।” फिर नवम्बर, 1989 के आम चुनावों के बाद भारत में जो राजनीतिक अस्थिरता आई, उसने भी जापानियों को भारतीय बाजार से दूर रहने के लिए प्रभावित किया। जनवरी, 1990 में जापानी संसद् डाइट के स्पीकर, जो भारत-जापान एसोसिएशन के प्रधान भी थे, सर्वेक्षण मिशन को लेकर भारत आए लेकिन इस यात्रा के भी कोई ठोस परिणाम नहीं निकले।

जून, 1991 से नई कांग्रेस सरकार द्वारा आरम्भ की गई आर्थिक उदारता ने एक बार फिर जापान के व्यापार को भारत की ओर आकर्षित किया। जनवरी, 1992 में भारत की नीतियों का परीक्षण करने के लिए जापान से एक व्यापारिक मंडल भारत आया। इसने कुल 24 शर्ते रखीं जिनको पूरा करने पर ही जापानी व्यापारी भारत में निवेश के लिए प्रोत्साहित हो सकते थे। ये शर्ते अभी पूरी की जानी हैं।

  1. भारतीय प्रधानमंत्री की जून, 1992 में जापान यात्रा–

    1992 के 12 महीनों में भारत ने जापानी व्यापारियों तथा उद्योगपतियों के साथ उच्च स्तरीय सम्पर्क बनाये रखे। भारत के वित्त मंत्री तथा वित्त सचिव ने जापानी निवेश, उद्योग तथा व्यापार को भारत की ओर आकृष्ट करने के लिए जापान का दौरा किया। जून, 1992 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पांच दिवसीय यात्रा पर जापान गये ताकि विशाल आर्थिक व्यवस्था वाले इस देश के साथ भारत के हितों के सम्बन्ध में भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके तथा इसके साथ-साथ जापानी व्यापारियों को यह विश्वास दिलाया जा सके कि भारत में आर्थिक उदारता के जो सुधार लागू किये जा रहे हैं, वे चिरस्थायी हैं तथा यहाँ राजनीतिक स्थिरता भी बनी रहेगी। ऐस करना आवश्यक था क्योंकि भारत में दीर्घकालीन निवेश के लिए राजनीतिक स्थायित्व एक महत्वपूर्ण तत्व था। जनवरी, 1992 में रोकुर इशीकावा, जो जापानी चैम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष हैं, ने भारत यात्रा की ताकि वह भारत में आर्थिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों का अनुमान लगा सकें। उनकी रिपोर्ट में यह कहा गया कि भारत में आर्थिक परिवर्तनों की जो प्रक्रिया शुरू हुई है, वह अपरिवर्तनीय है परन्तु इसकी गति राजनीतिक स्थिरता के स्तर पर निर्भर करेगी। इसका अर्थ यह था कि जापानी उस समय की राजनीतिक स्थिरता को नहीं मानते थे क्योंकि भारत में अल्पसंख्यक सरकार सत्ता में थी।

प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव ने इस बात पर बल दिया कि भारत जैसे बहुलवादी समाज में सम्पूर्ण एकरूपता नहीं हो सकती। 23 जून, 1992 को मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को सम्बोधित करते हुए श्री नरसिम्हा राव ने कहा, “भारत के साथ जापानियों की अन्तःक्रिया, चाहे वह व्यापार के माध्यम से हो या निवेश के, अत्यधिक प्रेरक राजनीतिक वातावरण में ही होगी।’ इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में जापानी संस्थान  में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “यह सत्य है कि शीत युद्ध की कठोरताओं तथा रूढ़िबद्धताओं ने हमारे सम्बन्धों को प्रभावित किया है, कोई भी इस बात से इन्कार नहीं कर सकता कि 1960 तथा 1970 के दशकों में हम बहुत अधिक प्राप्तियाँ कर सकते थे। यह भी सम्भव है कि जापानियों को, जो अपने आप को हमारी तुलना में अधिक समरूपी मानते हैं।

जापान में अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव ने जापान को निमंत्रण दिया कि वह भारत में विशेषतया भारतीय अर्थव्यवस्था तथा बाजार की उदारता से पैदा हुए नये आर्थिक परिवेश में सीधा निवेश बढ़ाए। ODA सहायता तथा ऋणों के रूप में जापान की सहायता की पूर्णतया प्रशंसा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था, “जबकि जापान के विदेशी निवेश ने एशियाई NIES तथा ASEAN के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, हमारे क्षेत्र में जापानी निवेश बहुत थोड़ा है। पहले इतने थोड़े निवेश का कारण कोई भी हो, हमारे आर्थिक सुधारों से पैदा हुए नये वातावरण ने स्थिति में नाटकीय परिवर्तन कर दिया है तथा जापानी निवेश के लिए नये अवसर पैदा कर दिए हैं। भारत में जापान द्वारा पहले किया गया निवेश सफल रहा है। उनमें से हैं : मारुति उद्योग लिमिटेड, जो सुजुकी मोटर्स के साथ एक साझा उपक्रम है। विदेशों में कार्य कर रही 2300 जापानी फर्मों की कुल बिक्री के हिसाब से मारुति उद्योग का 1988 में सातवां स्थान था।”

भारत ने न केवल जापान द्वारा यहाँ प्रत्यक्ष निवेश के लिए ही प्रयत्न किया बल्कि भारतीय निर्यात के स्वरूप को अर्थात् प्रारम्भिक उत्पादों जैसे कच्चा लोहा, समुद्री उत्पादों तथा हीरों के निर्यातों, जो कुल निर्यात का 65% है, से वस्त्रों, हल्की इंजीनियरिंग की वस्तुएं, चमड़े का सामान, कम्प्यूटर साफ्टवेयर तथा गलीचों जैसी मूल्यवान वस्तुओं में बदलने के भी प्रयत्न आरम्भ कर दिये।

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