मनु : महान् स्मृतिकार

मनु

मनु : महान् स्मृतिकार

(Manu: The Great Legislator)

परम्परागत भारतीय मान्यताओं के अनुसार मनु प्रथम समाज व्यवस्थापक तथा आदि पुरुष हैं। मनु द्वारा प्रतिपादित नियमों का अभिलेख ‘मनुस्मृति’ में सुरक्षित है। प्रायः सभी प्राचीन ग्रन्थों में मनु का नाम वर्णित है। ऋग्वेद में मनु का नाम विशेष रूप से उल्लिखित है और वहाँ वे पिता के रूप में स्वीकार किये गये हैं। काणे के अनुसार वैटिक संस्कृत साहित्य में मनु का वर्णन कई रूपों में किया गया है। सर्वप्रथम वे मानव जाति के पिता तथा आदि पुरुष के रूप में स्वीकार किये गये हैं। मनु की सन्तान ही मनुष्य अथवा मानव के नाम से जानी जाती है। कुछ अन्य वैदिक ऋचाओं में वे एक अत्यन्त प्राचीन ऋषि के रूप में भी उल्लिखित हैं। ऐसा भी वर्णन है कि मनु ही सर्वप्रथम अग्नि को पृथ्वी पर लाये। मनु वैदिक साहित्य में अर्द्ध-दैवी सत्ता के रूप में भी मान्य हैं जिन्होंने ईश्वर से नियमों उपनियमों को प्राप्त किया। कहीं-कहीं पर उनका उल्लेख कृतयुग के राजा के रूप में भी हुआ है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार मनु स्वयं भुवः है। अत्यन्त प्राचीन काल में ही मनु द्वारा प्रतिपादित विचारधारा एवं मान्यताएँ कितनी प्रतिष्ठित हो चुकी थीं, इसका आभास, ‘तैत्तिरीय संहिता’ के कथन से होता है ‘यदकिञ्च मनुरवदयत् भेषजम् । अर्थात् मनु ने जो कहा है वह औषधि के समान है।

हिन्दुओं का कानूनी साहित्य तीन वर्गों में विभाजित है- धर्मसूत्र (Aphorisms of Law), धर्मशास्त्र (Codes of Law) और टीकाएँ (Commentaries and Digests)। इन तीनों वर्गों में धर्मशास्त्रों का महत्व अत्यधिक और धर्मशास्त्रों में सर्वप्रमुख स्थान मनुस्मृति का है। इसे हिन्दू कानून की आधारशिला माना जाता है। मनुस्मृति केवल धर्मशास्त्र ही नहीं वरन् एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें मनुष्य के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन की व्यवस्था दी गयी है। मूलतः इसमें मनुष्य के सामाजिक जीवन के उन सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है जिन्हें सभी कालों और देशों में लागू किया जा सकता है।

मनुस्मृति : रचनाकाल / मनुस्मृति की रचना कब हुई ?

(MANUSMRITI : THE AGE OF CREATION)

मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में बहुत अधिक मतभेद है। इसमें ऐसे श्लोक और विचार हैं जो अति प्राचीन प्रतीत होते हैं और महाभारत में भी कई स्थानों पर मनु का सन्दर्भ आता है। प्राचीन हिन्दू परम्परा के अनुसार मनु मनुष्यों का प्रथम राजा था। यद्यपि मनु के वचन या श्लोक अति प्राचीन थे, परन्तु समय बीतने पर उनमें वृद्धि होती रही और अन्त में वे वर्तमान ‘मनुस्मृति’ या मानव धर्मशास्त्र’ के रूप में संग्रहित कर लिये गये जो बहुत बाद की रचना है।

डॉ० वी० सी० सरकार मनुस्मृति को ईसा से लगभग 150 वर्ष पूर्व की रचना मानते हैं। मैक्समूलर का मत है कि मनुस्मृति चौथी शताब्दी के बाद लिखी गयी, परन्तु जॉर्ज वुलर के अनुसार इस ग्रन्थ का अस्तित्व ईसा की दूसरी शताब्दी में भी था, कुछ भारतीय और पाश्चात्य विद्वान् जिनमें डॉ० हण्टर सबसे प्रमुख हैं मनुस्मृति को ईसा से 600 वर्ष पूर्व से अधिक प्राचीन ग्रन्थ नहीं मानते। अन्य पाश्चात्य विद्वान् जैसे काल्डवेल एवं एलफिन्सटन इसे ईसा से 900 वर्ष पूर्व की रचना मानते हैं। कुछ लोग इसे रामायण और महाभारत काल की रचना मानते हैं। मजूमदार एवं पुसालकर मनुस्मृति का रचनाकाल ईसा पूर्व 3,110 वर्ष मानते हैं।

फ्रांसीसी विचारक रेनेगिनो मनु शब्द को ऐतिहासिकता के साथ जोड़ने का पक्षधर नहीं है। उसके अनुसार ‘मनु’ शब्द की उत्पत्ति मूल धातु ‘मन’ से हुई है जिसका अर्थ है मनन, चिन्तन अथवा सार्वभौम बुद्धि अथवा विचार। मन धातु से ही ‘मनु’ तथा ‘मानव’ दोनों की उत्पत्ति हुई है। उसके अनुसार मनु द्वारा प्रतिपादित नियम सिद्धान्ततः एक सार्वभौम इच्छा के रूप में स्वीकार किये जा सकते हैं। यह सार्वभौम इच्छा सृष्टि की विभिन्न अवस्थाओं में प्रजापति नाम से और सम्पूर्ण मन्वन्तर के अनुसार मनु नाम से व्यक्त होती है। रेनेगिनो इस बात पर भी बल देता है कि जिस प्रकार वेदों की उत्पत्ति के विषय में कोई निश्चित तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती है और सिद्धान्ततः तिथि निर्धारण के प्रयल निष्फल सिद्ध होंगे, वैसे ही स्मृतियों की रचना के विषय में तिथि निर्धारण का प्रयल निरर्थक है। वेद का दूसरा नाम श्रुति और धर्मशास्त्रों का नाम स्मृति है। श्रुतियों का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रेरणा का फल है। प्रक्ष्यक्ष प्रेरणा से उद्भूत होने के कारण श्रुतियाँ आधारभूत हैं। स्मृतियाँ चेतना के प्रतिबिम्ब के समान हैं। इस तरह से चिन्तन, मनन एवं सामाजिक नियमन की परम्परा का नाम मनु है। ‘वायु पुराण’ भी मनु की उत्पत्ति मनन से ही मानता है।

भारतीय परम्परा के अनुसार विद्वान् पुरुष अपने आपको ग्रन्थों का रचयिता न कहकर केवल ज्ञान का सन्देशवाहक मानते थे। अत: हम कह सकते हैं कि मनुस्मृति में प्रतिपादित नियम किसी एक दिन की उत्पत्ति नहीं है। वे एक लम्बे ऐतिहासिक काल तथा परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके वास्तविक रचयिता वर्तमान सृष्टि के प्रारम्भिक महापुरुष ही रहे होंगे। सम्भवतः मनुस्मृति का यह ज्ञान मनु से नारद, नारद से मारकण्डेय, मारकण्डेय से सुमति भार्गव और सुमति भार्गव से भृगु ऋषि को प्राप्त हुआ होगा। सम्भवतः वर्तमान मनुस्मृति विद्वान् भृगु के द्वारा संकलित की गयी है। परन्तु इस बारे में यह तथ्य ज्ञात नहीं है कि भृगु ने यह संकलन कार्य कब किया ? मनुस्मृति के अन्तर्गत प्रारम्भ में एक लाख श्लोक थे, जो कम होते होते 12 हजार रह गये और वर्तमान संस्करणों में तो 2,694 श्लोक ही प्राप्त होते हैं।

मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में भले ही मतभेद हो, एक विधि ग्रन्थ के रूप में इसकी श्रेष्ठता को सभी पक्ष.निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं। गौतम के अनुसार मनु के अतिरिक्त और कोई स्मृतिकार नहीं है। वृहस्पति का कथन है कि मनुस्मृति में प्रतिपादित नियम वेदानुकूल हैं। अतः इससे भिन्न स्मृतियाँ मान्य नहीं है। पाश्चात्य विद्वान् कीथ के अनुसार, “इसकी तुलना सरलता से ल्यूक्रेटियस के महाकाव्य से की जा सकती है साथ ही साथ इसमें जीवन दर्शन का अभूतपूर्व वर्णन है ।” जर्मन विद्वान् नीत्शे के शब्दों में “मनुस्मृति बाईबिल की अपेक्षा कहीं अधिक अनुपम, उत्कृष्ट और बौद्धिक ग्रन्थ है ।” मैकेन्जी ब्राउन के अनुसार, “यह हिन्दू कानून पर सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है।”

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