भारतीय विदेश नीति

भारत की विदेश नीति के मूलभूत कारक

भारत की विदेश नीति

किसी भी देश की वैदेशिक नीति का निर्धारण तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के सापेक्ष तथा राष्ट्रीय हितों के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। परंतु भारतीय विदेश नीति के निर्धारण में उक्त्त अवधारणात्मक पक्ष के साथ-साथ देश की प्राचीन परम्पराओं और स्वतंत्रता आंदोलन के उच्च आदर्शों को भी समाहित कया गया है। भारतीय चिंतन एवं दर्शन की उत्कृष्ट परम्पराओं जिसका स्वभाव सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व रहा है, के कारण भारतीय विदेश नीति में गुट निरपेक्षता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के तत्वों को सर्वोपरि महत्त्व प्रदान किया गया है। कई सदियों से भारत के वैदेशिक संबंध शांति तथा समता पर आधारित एवं सत्कार की भावना से ओत-प्रोत रहे हैं। इसको संयोग नहीं कहा जा सकता है कि पं० जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के वैदेशिक नीति की नींव अशोक और बुद्ध के शाश्वत सिद्धांतों एवं दर्शन पर रखी है। भारतीय विदेश नीति में उपनिवेशवाद, जातिवाद, फासीवाद आदि का विरोध सन्निहित है जिसे स्वतंत्रता संग्राम की अवधि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपने अनेक प्रस्तावों के माध्यम से स्पष्ट किया गया था। यहाँ मार्च, 1950 में पं० जवाहर लाल नेहरू के उस दिये गये बयान का उल्लेख करना अति आवश्यक है। पं० नेहरू के अनुसार, “हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हम विदेश नीति के क्षेत्र में सर्वथा नई शुरुआत करने जा रहे हैं। यह एक ऐसी नीति है जो महारे अतीत के इतिहास से और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित है। इसका विकास उन सिद्धांतों के अनुसार हुआ है जिसकी घोषणा हम अतीत में समय-समय परbकरते रहे हैं।” यहाँ पामर एवं पार्किस के शब्दों को उद्धृत करना गलत नही होगा कि भारतीय विदेश नीति की जड़ें विगत कई शताब्दियों में विकसित समस्याओं के मूल में छिपी है और इसमें चिंतन शैलियों, ब्रिटिश नीतियों के विरासत, स्वाधीनता आंदोलन तथा वैदेशिक मामलों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहुँच, गांधीवादी दर्शन के प्रभाव, अहिंसा तथा साध्य और साधनों के महत्व के गांधीवादी सिद्धांतों आदि का प्रभावशाली योगदान रहा है। अतः भारत की वैदेशिक नीति कोई आकस्मिक उपज नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक आधार है।

भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य

किसी भी देश की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों से ओत-प्रोत होता है। भारत की विदेश नीति भी इसका अपवाद नहीं है। किसी भी देश की विदेश नीति के कुछ ऐसे पक्ष होते हैं जिनके संदर्भ में आम सहमति होती है। ध्यातव्य है कि इन पक्षों का समावेश सभी देशों की विदेश नीति में होता है। जयंतनुजा वंद्योपाध्याय ने भारतीय विदेश नीति के तीन उद्देश्यों राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास तथा विश्व व्यवस्था का उल्लेख किया है। वंद्योपाध्याय के अतिरिक्त कुछ और लेखकों ने भी भारतीय विदेश नीति के उद्देश्यों में क्षेत्रीय अखण्डता एवं स्वतंत्र नीति, अंतर्राष्ट्रीय शांति का विकास एवं आर्थिक विकास, पराधीन राष्ट्रों की स्वतंत्रता एवं रंगभेद का विरोध तथा भारतीय मूल के लोगों के हितों की रक्षा करना आदि को सम्मिलित किया है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों के अतिरिक्त देश की ऐतिहासिक विरासत, स्वतंत्रता आंदोलन, व्यक्तियों एवं विचारधाराओं का प्रभाव, अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं की बाध्यताओं, विभिन्न घटनाक्रमों आदि के कारण राष्ट्र के मूल्यों को भू-समाहित करना पड़ता है। अतः भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को मुख्यरूप से दो भागों में बांटा जा सकता है-

  • प्रमुख उद्देश्य (a) राष्ट्रीय सुरक्षा, (b) आर्थिक विकास, (c) विश्व व्यवस्था।
  • अन्य उद्देश्य (a) उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद एवं रंगभेद का विरोध ।

राष्ट्रीय सुरक्षा-

किसी भी देश का पहला कर्तव्य अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा एवं प्रभुसत्ता की रक्षा करना होता है। यही कारण है कि उपरोक्त तीन प्रमुख उद्देश्यों का तुलनात्मक विवरण करते हुए वंद्योपाध्याय का मानना है कि सुरक्षा राज्य के अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व की गारंटी देता है। राष्ट्रीय विकास उसकी महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है तथा एक सुव्यवस्थित विश्व-व्यवस्था इसके स्वतंत्र अस्तित्व एवं उन्मुक्त विकास के लिये आवश्यक है। भारत के संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा से आशय व्यापक संदर्भ में देश स्वतंत्रता, विकास, सैन्य गठबंधनों का विरोध, पड़ोसी राज्यों से मित्रतापूर्ण संबंध, साम्राज्यवादी एवं उपनिवेशवादी नीतियों का विरोध सम्मिलति है। इसके साथ-साथ भारत अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता का पक्षधर है। इसके अतिरिक्त भारत बाह्य हस्तक्षेप एवं शीत युद्ध का सशक्त विरोधी है।

आर्थिक विकास-

भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों का एक महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक विकास भी है। संदर्भ में सर्वप्रथम अपनी राष्ट्रीय क्षमता का विकास करना होगा जो मूलतः तीन तथ्यों-जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन एवं तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करती है। इसके बाद संवैधानिक व्यवस्था एवं आर्थिक विचारधारा के संदर्भ में राज्य की भूमिका तय करनी होगी। इन आंतरिक तत्वों के आधारों के क्रियान्वयन में बाह्य विश्व में आदान-प्रदान करना पड़ता है। जिनको विदेश नीति के माध्यम से ही संभव बनाया जा सकता है। इस संदर्भ में भारत को अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये प्रति व्यक्ति आय तथा सकल घरेलू उत्पादन को बढ़ाना होगा, जिससे रक्षा पर अधिक व्यय सुनिश्चित किया जा सकें, राजनय द्वारा युद्धों की पुनरावृत्ति को रोकना, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से युद्ध के विरुद्ध नियमों की व्यवस्था करना अति आवश्यक बन गया है। इसके साथ-साथ बाह्य राष्ट्रों से आर्थिक सहायता, पूंजी निवेश, व्यापार तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना अनिवार्य हो गया है।

विश्व व्यवस्था-

किसी भी देश को अपनी विदेश नीति का निर्वाह एवं अनुपालन एक अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में करना पड़ता है। विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु उसके अनुकूल विश्व व्यवस्था की रचना करना है। इन दोनों पक्षों का यह आशय है कि विभिन्न शब्दों के साथ – अंतःक्रिया भारतीय विदेश नीति का प्रमुख पक्ष है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत द्वारा शस्त्रीकरण का विरोध तथा निरस्त्रीकरण का समर्थन विश्व आणविक मुद्दों की विभीषिका के कारण होता है। शीत युद्ध तथा सैन्य गठबंधनों का भी विरोध तीसरे विश्व अर्थात् निर्गुट संगठन के देशों के हितों को ध्यान में रखकर होता है। इसी प्रकार परतंत्र राष्ट्रों की स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद तथा रंगभेद का विरोध शक्ति पर आधारित गुटों का विरोध, सं० रा० संघ को मजबूत करना तथा पूर्ण निरस्त्रीकरण भारतीय विदेश नीति के प्रमुख विषय रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विदेश नीति में परिवर्तन एक प्रमुख पक्ष होता है जो भारत के विदेशी नीति में भी दिखाई पड़ता है। वर्तमान में भारतीय विदेश नीति में परतंत्र देशों की परतंत्रता का स्थान आर्थिक विषयों ने लिया है। इसके अतिरिक्त विश्व में आतंकवाद का फैलाव भी भारतीय विदेश नीति में प्रमुख विषय बन चुका है। भारत पूरे विश्व से आतंकवाद का उन्मूलन चाहता है तथा सभी देशों से इसके लिये सक्रिय सहयोग की अपेक्षा करता है।

भारत परमाणु शक्तियों के प्रसार एवं पक्षपात पूर्ण परमाणु संधियों के कारण एक न्यायोचित व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि के लिये भी संघर्ष करता रहा है।

भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत

भारत द्वारा अपनी विदेशी नीति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये कुछ सिद्धांत निर्धारित किया गया है। ध्यातव्य है कि ये सिद्धांत न केवल विदेश नीति के तर्कसंगत विश्लेषण में सहायक होते हैं बल्कि निरंतरता को बनाये रखते हैं। यद्यपि विश्व शांति, गुटनिरपेक्षता एवं निरस्त्रीकरण का समर्थन, साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध, अफ्रो-एशियाई एकता का आह्वान तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों में आस्था भारत की वैदेशिक नीति की नींव के पत्थर है। जिस समय भारत को स्वतंत्रता प्राप्ति हुई उस समय पूरा विश्व द्वितीय महायुद्ध के ध्वंस का बोझ वहन कर रहा था। जवाहर लाल नेहरू इस तथ्य को अच्छी तरह समझते थे कि यदि एशिया और अफ्रीका के गुलाम देशों को आजाद होने का अवसर नहीं सुलभ होता है तो अफ्रो-एशिया एकता को एक नयी दिशा नहीं दी जा सकती है। यह तभी संभव है जब विश्व शांति को अक्षुण्ण बनाये रखा जाये। पं० नेहरू का यह भी कहना था कि विश्व शांति के कायम न रहने पर विकासशील एवं नवोदित राष्ट्रों के लिये राष्ट्र निर्माण के निमित्त संसाधनों की उपलब्धता सुलभ एवं सरल नहीं हो सकेंगी। क्योंकि युद्ध का दबाव अन्य सभी सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं को पीछे की ओर धकेल देता है। यह स्थिति मनुष्य के पाशविक पक्ष को उभारता है और अधिनायकवाद की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। भारत की स्वतंत्रता को सार्थक बनाने तथा विकास का गति को तीव्र करने के लिये भी विश्व शांति अनिवार्य है। यही कारण है कि पं० नेहरू ने भारतीय विदेश नीति में विश्व शांति के तत्व को प्राथमिकता प्रदान की है।

भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों के प्रतिपादन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनायी गयी नीतियों एवं आदर्शों तथा अनुभवों को विशेष स्थान दिया गया है। इसके अतिरिक्त भारतीय नीति-निर्माताओं के दृष्टिकोण ने भी इसके सिद्धांतों के प्रतिपादन में प्रमुख भूमिका निभायी है। पं० नेहरू ने भारत के संदर्भ में 1950 में कहा था कि भारत विभिन्न विरोधी विचारधाराओं वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में एकल विश्व का पक्षधर है। भारत विश्व संघर्षों, घृणाओं एवं आंतरिक द्वन्द के बावजूद अंततः निश्चित रूप से घनिष्ठ सहयोग एवं विश्व राष्ट्रकुल की ओर अग्रसर होगा। भारत एक ऐसे विश्व की स्थापना के लिये कार्य करेगा जिसमें स्वतंत्र लोगों के बीच स्वतंत्र सहयोग होगा तथा की वर्ग या समूह एक दूसरे का शोषण नहीं कर सकेगा। भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों की विवेचना निम्नलिखित दो शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है-

  1. गुट निरपेक्षता
  2. पंचशील
  3. यथार्थवाद
  4. गत्यात्मकता
  5. शांतिपूर्ण एवं सहअस्तित्व

(i) गुटनिरपेक्षता

भारतीय विदेश नीति का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा विलक्षण पक्ष गुट निरपरेक्षता है। गुट निरपेक्षता की अवधारणा शांति की पहल के लिये आवश्यक है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युद्ध विराम तो गया परंतु अपेक्षित शांति नहीं स्थापित हो सकी। मित्र राष्ट्रों में फूट पड़ गयी तथा शीत युद्ध का आविर्भाव हुआ। इसी समय अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक नयी अवधारणा “गुट निरपेक्षता” का जन्म हुआ।

वस्तुतः गुट निरपेक्षता अथवा गुट निरपेक्ष आंदोलन शीत युद्ध एवं द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था के विरुद्ध नव-स्वतंत्र राष्ट्रों का ऐसा अभियान था जिसमें विश्व शांति, सद्भावना एवं आर्थिक विकास के साथ-साथ उनके राष्ट्रीय हितों एवं महत्वकाक्षाओं का अद्भुत सामंजस्य निहित था।

प्रायः गुट निरपेक्षता से आशय निष्क्रिय उदासीनता या तटस्थता से लगाया जाता है परन्तु सकारात्मक अर्थ में गुट निरपेक्षता से आशय निष्क्रिय तटस्थता, उदासीनता या अवसरवादिता से नहीं होता है बल्कि स्वविवेक के अनुसार अपने राष्ट्र हित के अनुकूल विकल्पों का चयन ही वास्तविक गुट निरपेक्षता थी। उस समय नेहरू जी ने विश्व की दो प्रमुख महाशक्तियों यथा सोवियत संघ तथा सं० रा० अमेरिका, में से किसी के भी पक्ष में न जाकर इस आंदोलन के माध्यम से मित्र, युगोस्लाविया, इंडोनेशिया और कम्बोडिया जैसे देशों से घनिष्ठ संबंध स्थापित करके अफ्रों-एशियाई भाई चारे और विश्व बंधुत्व की भावना को प्रबलता प्रदान की। शुरू में सोवियत संघ के राष्ट्रपति स्टालिन ने गुट निरपेक्षता की खिल्ली उड़ाई परंतु शनै-शनैः गुट निरपेक्ष आंदोलन का काफिला बढ़ता ही गया और यह सं० रा० संघ के बाद विश्व का दूसरा बड़ा संगठन बन गया। यही कारण है कि कई समीक्षकों ने गुट निरपेक्षता को भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत की संज्ञा देने की बजाय उसे विदेश नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये अपनायी गयी राजनीति की संज्ञा देना उपयुक्त समझा। पंचशील को गुट निरपेक्षता की सैद्धांतिक व्याख्या माना गया, जिसमें गुटों से अपने को अलग करते हुए विश्व शांति के लिये सक्रिय कार्य करना में किया गया। 28 जून, 1954 को चीन के प्रधानमंत्री चाऊ० एन० लाई को भारत यात्रा के समय जारी संयुक्त घोषणापत्र में उक्त प्रस्ताव को दोहराया गया। यह प्रस्ताव ही आगे चलकर पंचशील के नाम से विख्यात हुआ। पंचशील के सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

  • एक दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता एवं सर्वोच्च सत्ता के लिये परस्पर सम्मान की भावना।
  • पारस्परिक अनाक्रमण का आश्वासन
  • एक दूसरे के आंतरिक मामलों के प्रति तटस्थता
  • समानता एवं पारस्परिक सहयोग
  • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व

(ii) पंचशील-

पंचशील की अवधारणा वस्तुतः महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्यों के लिये बनायी गयी आचार संहिता इसे उद्धृत है। भारत द्वारा प्रतिपादित पंचशील के सिद्धांतों पर इण्डोनेशिया द्वारा 1945 में अपनी विदेश नीति के संदर्भ में बनाये गये 5 आधारभूत सिद्धांतों-(a) अपने लोगों में विश्वास एवं राष्ट्रवाद, (b) मानवता में विश्वास, (c) स्वतंत्रता में विश्वास, (d) सामाजिक न्याय में विश्वास तथा (e) ईश्वर में विश्वास की अमिट छाप पड़ी है। पंचशील का पहला सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक देश को स्वतंत्र रूप से व्यवहार करने तथा अपना अखण्ड देश बनाने का अधिकार है। प्रत्येक देश द्वारा एक दूसरे देश की प्रभुसत्ता का सम्मान किया जायेगा तथा उसके ऊपर कोई निर्णय जबरदस्ती नहीं थोपा जायेगा। पंचशील का दूसरा सिद्धांत शांति का पोषक है। इसकी मान्यता यह है कि कोई भी राष्ट्र अपने निर्णयों तथा हितों को दूसरों से पालन करवाने के लिए शांतिपूर्ण साधनों का ही प्रयोग करेंगे। किसी भी देश द्वारा किसी अन्य देश के ऊपर आक्रमण नहीं किया जाना चाहिए। पंचशील का तीसरा सिद्धांत यह अपेक्षा करता है कि प्रत्येक देश द्वारा अपने आंतरिक मामलों का प्रबंध तथा संचालन स्वतंत्र रूप में किया जायेगा तथा कोई भी देश किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। पंचशील का चौथा सिद्धांत सभी राष्ट्रों के मध्य समानता तथा पारस्परिक लाभ की भावान के आधार पर कार्य करने को प्रोत्साहित करता है। कोई भी राज्य चाहे वह छोटा या बड़ा है, उसे दूसरे राज्यों के समान समानता तथा पारस्परिक हित के आधार पर दूसरे देशों के साथ संबंधों की स्थापना करने का पूर्ण अधिकार होगा। पंचशील का पांचवा सिद्धांत विश्व में शांति को बढ़ावा देने के प्रति समर्पित है। इस सिद्धांत की यह मान्यता है कि विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक व्यवस्थाओं के मध्य सामाजिक-आथिक मतभेदों के बावजूद भी राज्य शांतिपूर्ण तरीके से रह सकता है तथा मित्रता एवं सहयोग विकसित कर सकता है। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का यह सिद्धांत ही शांति तथा विकास ला सकता है। शीत युद्ध की राजनीति के विपरीत शांतिपूर्ण सह अस्तित्व विश्व की उन्नति तथा समृद्धि, शांति तथा सुरक्षा के प्रति उचित, प्राकृतिक, स्वस्थ तथा कुशलतापूर्ण दृष्टिकोण है।

उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि पंचशील का सिद्धांत शांतिपूर्ण सह अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप द्वारा शांति का सिद्धांत है। यह राष्ट्रों के मध्य अच्छे, मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक संबंधों के लिये पथ प्रदर्शक है।

(iii) यथार्थवाद-

भारतीय विदेश नीति में सदैव यथार्थवाद का घुट रहा है। भारत द्वारा अपनी विदेश नीति के माध्यम से सदैव राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने का प्रयास किया गया । यद्यपि कुछ विशेषज्ञों द्वारा पं० नेहरू द्वारा सृजित भारतीय विदेश नीति को एक कोरी कल्पना बताया है जो आदर्शवाद से ओत-प्रोत है। परंतु यह सत्य नहीं है। पं० नेहरू ने भारतीय विदेश नीति को दीर्घकालीन और तत्कालीन हितों को ध्यान में रखकर प्रतिपादित किया है। पं० नेहरू की सोच आदर्शवादी अवश्य थी। यही कारण है कि भारतीय विदेश नीति में आदर्शवाद की प्रधानता है। पंरतु यह भी ध्यान रखना होगा कि आज का आदर्शवाद कल का यथार्थवाद होता है। पं० नेहरू का कहना था कि व्यावहारिक व्यक्ति या यथार्थवादी केवल वर्तमान के बारे में ही सोचता रहता है और भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोचता है। यही कारण है कि व्यवहारवादी व्यक्ति स्वयं लड़खड़ाता रहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर भारतीय विदेश नीति में आदर्शवाद और यथार्थवाद के मिश्रण को स्थान दिया है। शुरू के दिनों में पं० नेहरू ने केवल आदर्शवादी नीतियों को अपनाना शुरू किया था परंतु बाद में उनको वास्तविक जीवन के कटु अनुभव के दर्शन हुए और यथार्थवाद को भी महत्व देना शुरू किया। इसके बाद विशेष कर श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारतीय विदेश नीति में यथार्थवाद का अधिक प्रभाव रहा है। परंतु इसका आशय यह नहीं रहा कि भारतीय विदेश नीति में आदर्श को कोई स्थान नहीं दिया गया। श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल में तथा उसके बाद के वर्षों में भी आदर्शवाद के साथ-साथ देश के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति हेतु यथार्थवादी दृष्टिकोण भी अपनाया गया।

(iv) गत्यात्मकता-

भारतीय विदेश नीति में गत्यात्मकता का भी स्पष्ट दर्शन होता है। यही नहीं भारतीय विदेश नीति गत्यात्मक होने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालने की क्षमता रखती है। भारत द्वारा समय-समय पर आवश्यकतानुसार विभिन्न देशों से सैन्य सहायता प्राप्त करना उसकी गतिशील विदेश नीति का परिचायक है। 1962 में चीन युद्ध के समय सं० रा० अमेरिका से तथा इसके बाद पाकिस्तान के साथ हुई युद्धों में सोवियत संघ से सैन्य मदद प्राप्त की गई। सोवियत संघ के विघटन तथा 1991 में शीत युद्ध के अंत के बाद भारत द्वारा एशिया प्रशांत क्षेत्र में सैन्य संबंध स्थापित करना भारतीय विदेश नीति की गतिशीलता और समय के अनुसार उसे की क्षमता को प्रदर्शित करता है। भारत द्वारा सी०टी०बी०टी० पर हस्ताक्षर न करना तथा प्रभावशाली तरीके से अपना पक्ष विश्व के देशों के सम्मुख रखना उसकी राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की क्षमता स्पष्ट करता है।

(v) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व-

शांतिपूर्ण सह-अस्त्वित्व का सिद्धांत भी भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों में अहम स्थान रखता है। भारत की विदेश नीति में “जीओ और जीने दो” की परम्परा को आगे बढ़ाने की बात को सिद्धांतिक रूप में स्वीकार किया गया है। यद्यपि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को पंचशील के सिद्धांत में स्थान दिया गया है, परंतु व्यापक में इसे स्वीकार कर लिया गया। बाद में इसमें कुछ नये सिद्धांत भी सम्मिलित कर लिये गये और आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, पोलैंड इसे स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार कालांतर में पंचशील के सिद्धांत को व्यापक दर्शन प्राप्त हो गया।

परंतु चीन द्वारा भारत पर 1962 में आक्रमण किये जाने के बाद पंचशील के सिद्धांत को आधात पहुँचा। इससे भारत को सदमा तो अवश्य लगा परंतु भारत आज भी पंचशील के सिद्धांत में पूर्ण विश्वास रखता है। भारत आज भी इसकी महत्ता को स्वीकार करता है तथा विभिन्न देशों के मध्य संबंधों को अच्छे, मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक बनाने के लिये पंचशील के सिद्धांतों को अपनाये जाने की वकालत करता है।

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