सार्क (SAARC)- दक्षिण एशियाई देशों के संगठन

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सार्क (SAARC) (दक्षिण एशियाई देशों के संगठन) कार्य एवं भूमिका

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क)-(SAARC)

(The South Asian Association for Regional Co-operation SAARC)

‘सार्क’ (दक्षेस) का पूरा नाम है ‘साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन’ अर्थात् ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ’। 7 व 8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में दक्षिण के 7 देशों के राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन हुआ तथा ‘सार्क’ की स्थापना हुई। ये देश हैं—भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव। यह दक्षिण एशिया के सात पड़ोसी देशों की विश्व राजनीति में क्षेत्रीय सहयोग की पहली शुरुआत है। ‘सार्क’ की स्थापना के अवसर पर दक्षिण एशिया के इन नेताओं ने जो भाषण दिए, उनमें आपसी सहयोग बढ़ाने और तनाव समाप्त करने पर जोर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि इस नये संगठन के जन्म से इन सात देशों के बीच सद्भावना, भाई-चारा और सहयोग का नया युग शुरू होगा। उन्होंने ‘क्षेत्रीय सहयोग संघ’ के जन्म को ‘युगान्तरकारी घटना’, ‘नये युग का शुभारम्भ’ तथा ‘सामूहिक सूझबूझ और राजनीतिक इच्छा शक्ति की अभिव्यक्ति’ बताया।

दक्षिण एशियाई संघ के सदस्य देशों में लगभग 125 करोड़ लोग रहते हैं। इस दृष्टि से यह विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला संघ है। यद्यपि यह क्षेत्र प्राकृतिक साधनों, जनशक्ति तथा प्रतिभा से भरपूर है तथापि इन देशों की जनसंख्या गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण की समस्या से पीड़ित है। इस क्षेत्र में जनसंख्या के सकल राष्ट्रीय उत्पाद इस क्षेत्र का भाग केवल 2 प्रतिशत और निर्यात में 0.6 प्रतिशत है। भारत को छोड़कर इस क्षेत्र के अन्य देशों को खाद्यान्न का आयात करना पड़ता है।

मालदीव को छोड़कर संघ के शेष सदस्य (भारत, बांगलादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और श्रीलंका) भारतीय उपमहाद्वीप के हिस्से हैं। ये सभी देश इतिहास, भूगोल, धर्म और संस्कृति के जरिए एक-दूसरे से जुड़े हैं। विभाजन के पहले भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश एक ही प्रशासन और अर्थव्यवस्था के अभिन्न अंग थे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद ये देश एक-दूसरे से दूर हो गये।

‘सार्क’ का विकास धीरे-धीरे हुआ है। दक्षिण एशियाई देशों का क्षेत्रीय संगठन बनाने का विचार बंगलादेश के पूर्व राष्ट्रपति जिया उर रहमान ने दिया था। उन्होंने 1977 से 1980) के बीच भारत, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की यात्रा की थी। उसके बाद ही उन्होंने एक दस्तावेज तैयार करवाया जिसमें नवम्बर 1980 में आपसी सहयोग के लिए दस मुद्दे तय किये गये। बाद में इसमें पर्यटन और संयुक्त उद्योग को निकाल दिया गया। इन्हीं में से चयनित मुद्दे आज भी ‘सार्क’ देशों के बीच सहयोग का आधार है।

‘सार्क’ के विदेश सचिवों की अप्रैल 1981 में बंगलादेश के दस्तावेज पर विचार करने के लिए एक बैठक हुई थी। विदेश मंत्रियों की पहली बैठक नयी दिल्ली में सन् 1983 में हुई थी। इसी बैठक में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग की पहली औपचारिक घोषणा हुई। विदेश मंत्रियों की बैठक जुलाई, 1984 में मालदीव में और 1985 में भूटान में हुई। उसके बाद ही दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना हुई और इसका संवैधानिक स्वरूप निश्चित किया गया।

सहयोग क्षेत्रों का निर्धारण

सार्क का मूल आधार क्षेत्रीय सहयोग पर बल देना है। अगस्त 1983 में ऐसे नौ क्षेत्र रेखांकित किये गये थे–कृषि, स्वास्थ्य सेवाएं, मौसम विज्ञान, डाक-तार सेवाएं, ग्रामीण विकास, विज्ञान तथा तकनीकी, दूरसंचार तथा यातायात, खेलकूद तथा सांस्कृतिक सहयोग। वर्ष बाद ढाका में इस सूची में कुछ और विषय जोड़ दिये गये आतंकवाद की समस्या, मादक-द्रव्यों की तस्करी तथा क्षेत्रीय विकास में महिलाओं की भूमिका।

सार्क का चार्टर एवं ढाका घोषणा

सार्क के चार्टर में 10 धाराएं हैं। इनमें सार्क के उद्देश्यों, सिद्धान्तों, संस्थाओं तथा वित्तीय व्यवस्थाओं को परिभाषित किया गया है, जो इस प्रकार हैं :

उद्देश्य

अनुच्छेद 1 के अनुसार सार्क के मुख्य उद्देश्य हैं—

  1. दक्षिण एशिया क्षेत्र की जनता के कल्याण एवं उनके जीवन-स्तर में सुधार करना;
  2. दक्षिण एशिया के देशों की सामूहिक आत्म-निर्भरता में वृद्धि करना;
  3. क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास में तेजी लाना;
  4. आपसी विश्वास, सूझ-बूझ तथा एक-दूसरे की समस्याओं का मूल्यांकन करना;
  5. आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में सक्रिय सहयोग एवं पारस्परिक सहायता में वृद्धि करना;
  6. अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग में वृद्धि करना; तथा
  7. सामान्य हित के मामलों पर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर आपसी सहयोग मजबूत करना।

सिद्धान्त-

अनुच्छेद 2 के अनुसार सार्क के मुख्य सिद्धान्त निम्न हैं :

  1. संगठन के ढांचे के अन्तर्गत सहयोग, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता, दूसरे देशों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना तथा आपसी लाभ के सिद्धान्तों का सम्मान करना;
  2. इस प्रकार का सहयोग द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग का स्थान नहीं लेगा बल्कि उनका पूरक होगा;
  3. इस प्रकार का सहयोग द्विपक्षीय और बहुपक्षीय उत्तरदायित्वों का विरोधी नहीं होगा।

संस्थाएँ–

चार्टर के अन्तर्गत ‘सार्क’ की निम्न संस्थाओं का उल्लेख किया गया है ।

  1. शिखर सम्मेलन

    अनुच्छेद 3 के अनुसार प्रति वर्ष एक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के शासनाध्यक्ष भाग लेते हैं। पहला शिखर सम्मेलन बांगलादेश की राजधानी ढाका में (7-8 दिसम्बर, 1985), दूसरा सम्मेलन भारत के बंगलौर नगर में (16-17 नवम्बर, 1986), तीसरा शिखर सम्मेलन नेपाल (1987) में, चौथा शिखर सम्मेलन (1988) पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में, पांचवां शिखर सम्मेलन (1990) मालदीव की राजधानी माले में, छठा शिखर सम्मेलन 1991 में श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में, सातवां शिखर सम्मेलन (अप्रैल 1993), बंगलादेश की राजधानी ढाका में, आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली (3-4 मई, 1995) में, नौवां शिखर सम्मेलन मालदीव की राजधानी माले (12-14 मई, 1997) में, दसवां शिखर सम्मेलन जुलाई 1998 में कोलम्बो में, 11वां शिखर सम्मेलन जनवरी 2002 में काठमांडू में तथा 12वां शिखर सम्मेलन जनवरी 2004 में इस्लामाबाद में आयोजित किया गया।

  2. मंत्रिपरिषद्

    अनुच्छेद 4 के अनुसार यह सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की परिषद् है। इसकी विशेष बैठक आवश्यकतानुसार कभी भी हो सकती है परन्तु छह माह में एक बैठक होना आवश्यक है। इसके कार्य हैं—संघ की नीति निर्धारित करना, सामान्य हित के मुद्दों के बारे में निर्णय करना, सहयोग के नये क्षेत्र खोजना, आदि।

  3. स्थायी समिति-

    अनुच्छेद 5 के अनुसार यह सदस्य देशों के सचिवों की समिति है। इसकी बैठकें आवश्यकतानुसार कभी हो सकती है परन्तु वर्ष में एक बैठक का होना अनिवार्य है। इसके प्रमुख कार्य हैं—सहयोग के कार्यक्रमों को मॉनिटर करना, अन्तर-क्षेत्रीय प्राथमिकताएं निर्धारित करना, अध्ययन के आधार पर सहयोग के नये क्षेत्रों की पहचान करना।

  4. तकनीकी समितियाँ-

    इनकी व्यवस्था अनुच्छेद 6 में की गयी है। इनमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि होते हैं। ये अपने-अपने क्षेत्र में कार्यक्रम को लागू करने, उनमें समन्वय पैदा करने और उन्हें मॉनिटर करने के लिए उत्तरदायी हैं। ये स्वीकृत क्षेत्रों में क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्र और सम्भावनाओं का पता लगाती हैं।

  5. कार्यकारी समिति

    अनुच्छेद 7 में कार्यकारी समिति की व्यवस्था की गयी है। इसकी स्थापना स्थायी समिति द्वारा की जा सकती है।

  6. सचिवालय-

    अनुच्छेद 8 में सचिवालय का प्रावधान है। इसकी स्थापना दूसरे सार्क सम्मेलन (बंगलौर) के बाद 16 जनवरी, 1987 को की गयी। 17 जनवरी, 1987 से काठमांडू सचिवालय ने कार्य करना शुरू कर दिया है। महासचिव का कार्यकाल 2 वर्ष रखा गया है तथा महासचिव का पद सदस्यों में बारी-बारी से घूमता रहता है। प्रत्येक सदस्य अपनी बारी आने पर किसी व्यक्ति को नामजद करता है जिसे सार्क मंत्रिपरिषद् नियुक्त कर देती है। सार्क सचिवालय को सात भागों में विभक्त किया गया है और प्रत्येक भाग के अध्यक्ष को निदेशक कहते हैं।

    • काठमाण्डू स्थित सार्क सचिवालय ने पिछले वर्ष (2003) श्रीलंका में एक सांस्कृतिक केन्द्र और मालदीव में तटीय प्रबन्धन केन्द्र की स्थापना की। दक्षिण एशिया के देशों के बीच विकास एवं सहयोग गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अब तक सार्क के पांच केन्द्र खोले जा चुके हैं। ढाका में कृषि व मौसम विज्ञान पर शोध के लिए दो अलग-अलग केन्द्रों की स्थापना की गई है जबकि दिल्ली में सार्क का एक शोध केन्द्र स्थापित है।
  7. वित्तीय प्रावधान

    सार्क के कार्यों के लिए प्रत्येक सदस्य के अंशदान को ऐच्छिक रखा गया है। कार्यक्रमों के व्यय को सदस्य देशों में बाँटने के लिए तकनीकी समिति की सिफारिशों का सहारा लिया जाता है।

सचिवालय के व्यय को पूरा करने के लिए सदस्य देशों के अंशदान को निम्न प्रकार निर्धारित किया गया है-भारत 32%, पाकिस्तान 25%, नेपाल, बंगलादेश एवं श्रीलंका प्रत्येक का 11% और भूटान एवं मालदीव प्रत्येक का 5%

सार्क शिखर सम्मेलन

ढाका शिखर सम्मेलन-

सार्क का पहला शिखर सम्मेलन बंगलादेश की राजधानी ढाका में 7-8 दिसम्बर, 1985 में हुआ जिसमें दक्षिण एशिया के 7 देशों ने विभित्र समस्याओं और भाई-चारे तथा सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श एवं विश्लेषण किया।

बंगलौर शिखर सम्मेलन-

सार्क का द्वितीय शिखर सम्मेलन बंगलौर में 16-17 नवम्बर, 1986 को सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में निश्चित किया गया कि सार्क का सचिवालय काठमाण्डू में स्थापित होगा जिसके प्रथम महासचिव श्री अब्दुल हसन नियुक्त किये गये। सहयोग के क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने, पर्यटन के विकास, रेडियो-दूरदर्शन प्रसारण कार्यक्रम, विपदा प्रबन्ध पर अध्ययन सम्मिलित किये गये और क्रियान्वयन हेतु एक समयबद्ध कार्यक्रम की घोषणा की गयी।

काठमाण्डू शिखर सम्मेलन—

सार्क का तीन दिवसीय तृतीय शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में 4 नवम्बर, 1987 को समाप्त हुआ। आतंकवाद की समस्या पर सभी राष्ट्रों ने खुलकर विचार किया। आतंकवाद निरोधक समझौता उस सम्मेलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। खाद्य सुरक्षा भण्डार की स्थापना एवं पर्यावरण की समस्या पर भी विचार-विमर्श हुआ।

सार्क (दक्षेस ) का चतुर्थ शिखर सम्मेलन (दिसम्बर, 1988)-

इस्लामाबाद घोषणा-पत्र—सार्क (दक्षेस) का चतुर्थ शिखर सम्मेलन (29-31 दिसम्बर, 1988) क्षेत्रीय सहयोग के नूतन दिशा-संकेत इंगित करता है। ‘इस्लामाबाद घोषणा-पत्र’ में दक्षेस 2000 एकीकृत योजना पर विशेष जोर दिया गया। इस योजना के अन्तर्गत शताब्दी के अन्त तक क्षेत्र की एक अरब से अधिक आबादी को आवास व शिक्षा देने का प्रावधान है। इसमें मादक-द्रव्यों के खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया गया। घोषणा-पत्र में परमाणु निरस्त्रीकरण पर बल देते हुए सकारात्मक अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का नया माहौल बनाने का स्वागत भी किया गया।

घोषणा-पत्र में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था कायम करने की दिशा में फिर से बातचीत शुरू करने का आह्वान किया गया। विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने पर आह्वान करते हुए घोषणा-पत्र में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ के सदस्य देशों में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।

सार्क (दक्षेस) का पाँचवाँ शिखर सम्मेलन (नवम्बर, 1990)-

23 नवम्बर, 1990 को मालदीव की राजधानी माले में 5वां दक्षेस शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ व नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टराई शामिल हुए। मालदीव के राष्ट्रपति गयूम को दक्षेस का नया अध्यक्ष बनाया गया।

शिखर सम्मेलन की समाप्ति पर सदस्य देशों के शासनाध्यक्षों ने माले घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए। इन दक्षिण एशियाई देशों ने आर्थिक क्षेत्र में आपसी सहयोग मजबूत करने के लिए संयुक्त उद्योग स्थापित करने तथा क्षेत्रीय परियोजनाओं हेतु सामूहिक कोष गठित करने का निर्णय किया। सम्मेलन के नेताओं ने विकासशील देशों के लिए अधिक दिनों तक खाद्य जुटाने के सम्बन्ध में जैव-प्रौद्योगिकी के महत्व तथा चिकित्सा सम्बन्धी आवश्यकताओं पर बल दिया और इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया। घोषणा-पत्र में आत्म-निर्भरता की आवश्यकता पर बल दिया गया।

पार्क (दक्षेस) का छठा शिखर सम्मेलन (दिसम्बर 1991)-

21 दिसम्बर, 1991 को कोलम्बो में छठा सार्क शिखर सम्मेलन सम्पन हुआ। श्रीलंका के राष्ट्रपति सार्क के नये अध्यक्ष बनाये गये। सम्मेलन में निम्नांकित बातों पर सहमति व्यक्त की गई :

  1. क्षेत्र में आतंकवाद को रोकने के लिए व्यापक सहयोग और सदस्य देशों में सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाए।
  2. निरस्त्रीकरण की सामान्य प्रवृत्ति का स्वागत इस आशा से किया गया कि उससे सैन्य शक्तियों को विश्व के अन्य भागों में संयम बरतने के लिए प्रेरणा मिलेगी।
  3. मानव अधिकारों के प्रश्न को केवल संकीर्ण और विशुद्ध राजनीतिक दृष्टि से न देखकर आर्थिक और सामाजिक पहलू के साथ सम्बद्ध करके देखा जाये।
  4. सार्क के सदस्य देशों के बीच व्यापार के उदारीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसके संस्थागत ढांचे के बारे में समझौता किया जाए।
  5. गरीबी उन्मूलन के लिए यहसार्क समिति की स्थापना की जाए।
  6. 2000 ई0 तक क्षेत्र के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा की सुविधा प्रदान करायी जाए।

सार्क (दक्षेस ) का सातवां शिखर सम्मेलन (अप्रैल 1993)-

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का दो-दिवसीय शिखर सम्मेलन 10 अप्रैल, 1993 को बंगलादेश (ढाका) में प्रारम्भ हुआ। बंगलादेश की प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया ने श्रीलंका के राष्ट्रपति प्रेमदासा से संगठन की अध्यक्षता का कार्यभार लिया। सम्मेलन में सार्क के सातों सदस्य देशों के शासनाध्यक्षों ने भाग लिया।

आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त अभियान के आह्वान, आपसी आर्थिक सहयोग का घोषणा पत्र स्वीकार करने और दक्षिण एशिया वरीयता व्यापार समझौते की मंजूरी के साथ सार्क सम्मेलन सम्पन्न हुआ। भारत के प्रधानमंत्री पी0 वी0 नरसिंहराव तथा भारत के दक्षिण एशियाई पड़ोसियों ने अन्तर-क्षेत्रीय व्यापार को धीरे-धीरे उदार बनाने सम्बन्धी ढाका घोषणा-पत्र को स्वीकार किया और कहा कि दक्षेस देशों के बीच रियायती व्यापार के विनिमय के लिए पहले दौर की वार्ता आरम्भ करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए।

दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार समझौता (साप्टा) को मंजूरी दिये जाने से दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग के एक नये युग का सूत्रपात हुआ। साप्टा का उद्देश्य दक्षिण एशिया में व्यापार सम्बन्धी बाधाओं को दूर करना है। साप्टा समझौते के तहत सार्क देशों के बीच अधिक उदार व्यापार व्यवस्था कायम किये जाने का प्रावधान है।

सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन (मई 1995)-

3-4 मई, 1995 को सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। आतंकवाद एवं गरीबी के खिलाफ युद्ध की घोषणा दिल्ली घोषणा पत्र का मुख्य स्वर है। इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि सात देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने दक्षिण एशिया अधिमान्य व्यापार समझौता (SAPTA) लागू करना स्वीकार कर लिया। घोषणा पत्र में वर्ष 1995 को ‘दक्षेस गरीबी उन्मूलन वर्ष’ तथा वर्ष 1996 को ‘दक्षेस साक्षरता वर्ष’ भी घोषित किया गया है।

सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन (मई 1997)–

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का नौवां शिखर सम्मेलन 12-14 मई, 1997 को मालदीव की राजधानी माले में संपन्न हुआ। शिखर सम्मेलन का उद्घाटन मालदीव के राष्ट्रपति मैमून अब्दुल गयूम ने किया।

सम्मेलन की समाप्ति के अवसर पर सर्वसम्मति से जारी संयुक्त घोषणा पत्र में यह स्वीकार किया गया कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता का माहौल बनाये रखने तथा इस क्षेत्र के त्वरित सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अच्छे पड़ोसी सम्बन्धों का होना आवश्यक है। इसके लिए राजनीतिक स्तर पर अनौपचारिक वार्ताओं के महत्व को घोषणा पत्र में स्वीकार किया गया है।

नवी घोषणा पत्र में एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि संगठन के तीन या अधिक सदस्य देशों के हित की विशिष्ट परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने की बात इसमें स्वीकार की गई है।

दक्षिण एशिया क्षेत्र को एक स्वतन्त्र व्यापार क्षेत्र (SAFTA) के रूप में विकसित करने के सन् 2005 तक के पूर्ण निर्धारित लक्ष्य को अब सन् 2001 तक ही प्राप्त करने की बात माले घोषणा पत्र में कही गई है। आतंकवाद से निपटने के मामले पर घोषणा पत्र में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में आतंकवादी, गतिविधियां संचालित करने वाले गुटों के विदेशों में धन एकत्रित करने पर तुरन्त रोक लगाई जाए। इस सन्दर्भ में अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर 1996 में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र को स्वीकार किये जाने की मांग घोषणा पत्र में की गई है।

भारत के प्रधानमंत्री श्री इन्द्र कुमार गुजराल ने दक्षिण एशियाई देशों के इस संगठन को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने व सदस्य देशों के बीच आर्थिक सम्पर्क घनिष्ठ करने के लिए ‘दक्षिण एशियाई स्वतन्त्र व्यापार’ (SAFTA) की परिणति दक्षिण एशियाई आर्थिक समुदाय (SAEC) में करने का आह्वान किया।

सार्क का दसवां शिखर सम्मेलन (जुलाई 1998)-

29-31 जुलाई, 1998 को कोलम्बो में दस वें सार्क शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ। शिखर सम्मेलन ने व्यापार और निवेश के प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए। दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार से सम्बन्धित करार अथवा सन्धि पर बातचीत आरम्भ करने के लिए सार्क के सभी सात देशों के विशेषज्ञों का एक समूह गठित किया जाएगा। इस करार में व्यापार मुक्त करने के लिए बाध्य अनुसूचियों का उल्लेख होगा और इसे 2001 तक अन्तिम रूप दे दिये जाने और सही स्थिति में ले आने की सम्भावना है।

कोलम्बो में सार्क नेता जनसंख्या की बढ़ोत्तरी को रोकने, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, बाल कल्याण और महिलाओं के विकास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रीय लक्ष्य निर्धारित करते हुए सार्क के लिए सामाजिक चार्टर तैयार करने पर सहमत हुए। क्षेत्र में गरीबी की समस्या पर विशेष ध्यान दिया गया और सार्क नेताओं ने एक-दूसरे को अधिकतम वर्ष 2002 तक दक्षिण एशिया में गरीबी के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की।

सार्क का 11वां शिखर सम्मेलन (जनवरी 2002)-

सार्क का बहुप्रतीक्षित 11वां शिखर सम्मेलन 5-6 जनवरी, 2002 को काठमांडू में सम्पन्न हुआ। यह सम्मेलन मूलतः नवम्बर 1999 में प्रस्तावित था, किन्तु पाकिस्तान में नवाज शरीफ की निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट जाने से वहाँ सैन्य सरकार होने के कारण उस समय नहीं हो सका। इस सम्मेलन का आयोजन अन्ततः ऐसे समय में हुआ जब भारत एवं पाकिस्तान के पारस्परिक सम्बन्धों में गम्भीर तनाव की स्थिति चरम अवस्था में थी।सम्मेलन की समाप्ति पर जारी 11 पृष्ठों के 56 सूत्रीय ‘काठमांडू घोषणा पत्र में आतंकवाद के खात्मे के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी। ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (SAFTA) का मसौदा 2002 के अन्त तक तैयार करने की मंशा भी व्यक्त की गयी।

सार्क का 12वां शिखर सम्मेलन (जनवरी 2004)-

12वां सार्क शिखर सम्मेलन 4 से 6 जनवरी, 2004 तक इस्लामाबाद में आयोजित किया गया। यह सम्मेलन आशा से अधिक सफल रहा। इसमें द्विपक्षीय मुद्दे, मसलन कश्मीर विवाद, आदि तो नहीं उठे, लेकिन आपसी व्यापार की बातें अवश्य की गईं। सारी बातचीत क्षेत्र में शान्ति, स्थायित्व, विकास और समृद्धि के केन्द्र में रखकर की गई। साफ्टा पर सहमति बनी और सार्क सामाजिक चार्टर को स्वीकृति प्रदान की गई।

घोषणा-पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि हर तरह के आतंकवाद को समाप्त करने की जरूरत है और इसके लिए सभी सदस्य देश सार्क चार्टर एवं अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों के प्रति वचनबद्ध हैं। काफी समय तक अधर में लटके रहे साफ्टा के प्रस्ताव पर रजामंदी सार्क की एक दूसरी प्रमुख उपलब्धि है। इस समझौते के तहत सार्क देश जनवरी 2006 से मुक्त व्यापार के क्षेत्र में कदम रखेंगे। घोषणा-पत्र में सार्क सोशल चार्टर पर हस्ताक्षर किये जाने का स्वागत किया गया तथा इसे ऐसी ऐतिहासिक घटना बताया गया जिसके दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। चार्टर में गरीबी उन्मूलन, जनसंख्या, नियंत्रण, महिलाओं का सशक्तिकरण, युवाओं की शक्ति को पहचानना, मानव संसाधन विकास, स्वास्थ्य, पोषाहार सुविधाओं का विस्तार करना, बच्चों की सुरक्षा और सभी दक्षिण एशियाई लोगों की भलाई के लिए विषय शामिल हैं।

सार्क (SAARC) की भूमिका का मूल्यांकन

(Assessment of the Role of SAARC)

सात देशों का क्षेत्रीय संगठन में आबद्ध होना जहाँ एक अच्छी बात है वहीं यह कहना एक तथ्य है कि ऐतिहासिक व भौगोलिक दृष्टि से बर्मा (म्यांमार) और अफगानिस्तान भी इस क्षेत्र के अविभाज्य अंग हैं। इनको समाहित किए बिना, यह क्षेत्रीय एकात्मकता अधूरी ही है। यह आश्चर्य का ही विषय है इन दोनों देशों को इस क्षेत्रीय सहयोग में सहभागी होने के लिए आमंत्रित क्यों नहीं किया गया?

सातों देशों के बीच यद्यपि राजनीतिक एवं सुरक्षा के विवादास्पद नये-पुराने उलझाव हैं पर आर्थिक विकास एवं सहयोग की अमिट सम्भावनाएं हैं। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय संगठन की स्थापना ऐसे समय में हुई है, जबकि इसके कुछ सदस्य देशों के आपसी सम्बन्ध सामान्य नहीं है। मसलन, पड़ोसी देशों के साथ भारत के सम्बन्ध उतार-चढ़ाव के हैं। लेकिन राजनीतिक विग्रह के बावजूद आर्थिक, व्यापारिक, सामाजिक व सांस्कृतिक सहयोग से आगे बढ़ा जा सकता है।

आलोचकों के अनुसार सार्क के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ और बाधाएं उत्पन्न होंगी जो इस क्षोत्र के राष्ट्रों की एकजुटता के प्रयत्नों को किसी भी समय ध्वस्त कर सकती हैं। आलोचक कहते हैं कि

  1. दक्षिण एशिया की कोई पृथक् पहचान (identity) ही नहीं है। अतः क्षेत्रीय सहयोग का यह प्रयत्न मृत शिशु की भांति है। पाकिस्तान अपने आपको इस्लामिक मध्य-पूर्व का अंग समझता है, दक्षिण एशिया का नहीं। नेपाल कभी चीन की ओर देखता है और कभी भारत की ओर, श्रीलंका हाल तक आसियान की सदस्यता का इच्छुक था।
  2. सार्क के सदस्य राष्ट्रों में अत्यधिक विविधता है। नेपाल और भूटान राजतंत्र हैं; पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही है; भारत, श्रीलंका व मालदीव में लोकतंत्र हैं; बंगलादेश जनतन्त्र की ओर उन्मुख हो रहा है। सार्क में 3 इस्लामिक देश हैं, 2 बौद्ध हैं, एक हिन्दू और एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं। इन देशों की नीतियां और दृष्टिकोण भी एक-दूसरे के विरोधी हैं, यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में भी ये देश एक-दूसरे के विरुद्ध मतदान करते हैं।
  3. सार्क के सदस्य देशों में भारत आकार, आबादी और शक्ति की दृष्टि से ‘बिग ब्रदर’ की स्थिति रखता है जिससे छोटे देशों में शंका और अविश्वास पैदा हो सकता है।
  4. सार्क के सदस्य देशों में आपसी विवाद और संघर्ष के अनेक मुद्दे विद्यमान हैं। भारत पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराता है, हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के करगिल क्षेत्र में घुसपैठिए भेजकर नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया जिससे दोनों देशों में युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। श्रीलंका तमिल उग्रवादियों की गतिविधियों में भारत का हाथ देखता है। भारत और पाकिस्तान में कश्मीर विवाद, भारत और बंगलादेश में गंगा के पानी के बंटवारे का मुद्दा, भारत और श्रीलंका में तमिल प्रवासियों का मुद्दा क्षेत्रीय सहयोग के मार्ग में रुकावट डाल रहे हैं। पाकिस्तान और बंगलादेश के मध्य सम्पदा के बंटवारे पर और पाकिस्तानी बिहारियों के बंगलादेश में शरणार्थी शिविरों में रहने पर मतभेद है। भूटानी शरणार्थियों के नेपाल में रहने पर इन दोनों में मतभेद है।
  5. दक्षिण एशिया के राष्ट्र आज भी एक-दूसरे से कटे हुए हैं। बंगलादेश आस्ट्रेलिया से लौह अयस्क मँगाता है जबकि झारखण्ड और उड़ीसा से उसे यह सस्ती दरों पर मिल सकता है। नेपाल की शंका ने काठमाण्डू को चीन के निकट और भारत-पाक संघर्ष ने इस्लामाबाद को वाशिंगटन के निकट और दिल्ली को मास्को के निकट ला दिया है।

‘सार्क’ देश यदि आपसी हितों के आधार पर अपने अनुभवों व तकनीक का आदान-प्रदान कर सकें और सदस्य देशों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए साज-सामान व सेवा का लेन-देन होता रहे तो सामूहिक निर्भरता प्राप्त कर सकेंगे और महाशक्तियों के चंगुल से बच सकेंगे। काठमाण्डू में सार्क के स्थायी सचिवालय की स्थापना से लगता है कि सातों देश आपसी सहयोग से आर्थिक समृद्धि में योगदान करने को कृतसंकल्प हैं।

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