भारत में औद्योगिक विकास

भारत में औद्योगिक विकास

प्रारम्भिक समय से ही भारत एक कृषि-प्रधान देश रहा है, इसलिये यहाँ कृषि से सम्बन्धित विविध प्रकार के उद्योग धन्धे अच्छी प्रकार विकसित थे। भारत का आर्थिक जीवन व्यवस्थित तथा सुसंगठित था। भारत धन-धान्य से परिपूर्ण समृद्ध देश था, यहाँ का नागरिक सुखी तथा समृद्ध से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा था। अंग्रेजों द्वारा हमारे देश पर दृढ़तापूर्वक राज्य स्थापित कर लेने के पश्चात् हमारे देश की व्यापारिक तथा आर्थिक नीति पूर्णतया बदल गयी। अंग्रजों ने अपने लाभ को दृष्टि में रखते हुए एक विशेष प्रकार की आर्थिक नीति का अनुकरण किया उस काल में अर्थात् 18वीं शताब्दी के अनितम वर्षों एवं 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इंग्लैण्ड में एक महान औद्योगिक क्रान्ति घटित हुई, जिसके कारण वहाँ अनेक प्रकार के उद्योग-धन्धे स्थापित हुये परिणामतः इंग्लैण्ड में औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। इंग्लैण्ड के बड़े-बड़े आधुनिक कल-कारखानों में बड़ी-बड़ी मशीन दिन-रात औद्योगिक माल का उत्पाद करने लगीं। इन कारखानों को चालू रखने के लिए इंग्लैण्ड को अब कच्चे माल की भी भारी मात्रा में आवश्यकता पड़ने लगी थी। इसलिये वह अपने तैयार माल को खपाने हेतु नये बाजार की भी तलाश में था। तब तक भारत पूर्ण रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का ही अंग बन चुका था। भारत ही एक मात्र ऐसा देश था जहाँ ब्रिटिश कल-कारखानों में तैयार माल की खपत भी हो सकती तथा साथ ही ब्रिटिश कारखानों हेतु कच्चा मिल सकता था। भारत में कपास, रूई, लोहा, कोयला, मैंगनीज, तांबा आदि अन्य खनिज भी बहुतायत में थे। इसलिये ब्रिटिश सरकार ने अपनी जीवन नवीन व्यापारिक नीति को उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ध्यान में रखकर बनाया था।

सन् 1857 ई. के उपरान्त भारतीय व्यापार तथा उद्योगों की दशा

सन् 1819 ई. में स्वेज नहर के द्वारा जलयानों का आवागमन आरम्भ कर दिया गया। इस नहर के खुल जाने से भारत में इंग्लैण्ड आने-जाने का मार्ग जो अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर काटकर पूरा किया जाता था, अब स्वेज नहर में से होकर भूमध्य सागर द्वारा पार किया जाने लगा। परिणामतः इस व्यापारिक मार्ग में कई हजार किलोमीटर की दूरी कम हो गयी, जिससे भारत से इंग्लैण्ड पहुंचने में समय तथा खर्चे में भी बहुत करोड़ रुपये वार्षिक तक पहुँच गया। इस व्यापार में निर्यात की अपेक्षा आयात ही अधिक होता था। यह व्यापार में सन् 1828 तक 90 करोड़ रुपये वार्षिक से बढ़कर लगभग 700 करोड़ रुपये वार्षिक तक पहुँच गया। भारत में बनी हुई वस्तुयें अब भारत में ही खपने लगीं। इसका यह कारण था कि यहाँ जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही थी। इसके साथ-साथ भारत के नगरों के बाजारों में मशीन द्वारा निर्मित वस्तुयें जो कि भारत के हाथ के कारीगरों द्वारा निर्मित वस्तुओं से अपेक्षाकृत सस्ती होती थीं। तेजी से लोकप्रिय हो गयी। भारत सरकार की मुक्त व्यापार नीति ने भी विदेशी व्यापारियों को और अधिक प्रोत्साहित किया था।

भारतीय लोगों का परिवर्तन दृष्टिकोण

तत्कालीन समय की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इस काल में भारतीय जनता का दृष्टिकोण बदला। इस समय तक ब्रिटिश राज्य भारत में पूर्णतया स्थापित हो गया था। पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता तथा संस्कृति धीरे-धीरे भारतीय जनता को अपनी ओर अधिक आकृष्ट किया। अब भारतीय जनता भारतीय कारीगरों द्वारा निर्मित समान को लेना पसन्द नहीं करती थी। इस कारण भारत के उद्योग-धन्धे धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गये।

भारतीय व्यापार में आयात की वृद्धि

भारतीय विदेशी व्यापार में इस काल के अन्तर्गत आयात की बहुत अधिक वृद्धि हो गयी थी। विदेशों से आयात किये गये माल में विलासिता की सामग्री की प्रधानता थीं। उदाहरणार्थ- रेशमी-सूती कपड़ा, चमड़े की बनी वस्तुएँ, घड़ियाँ, चीनी व काँच से बनी वस्तुएँ स्टेशनरी, कागजी, खिलौने मोटर साइकिलें, साबुन, छतरियाँ, दियासलाई, सिलाई की मशीनें, मिट्टी का तेल, लोहे व अल्यूमीनियम के चमकीले बर्तन, कमरों की सजावट का समान आदि।

भारतीय युवकों में जागृति

भारतीय युवकों में जागृति भी इस काल की प्रमुख विशेषताओं में से एक थी। भारतीय युवकों ने अंग्रेजों की स्वार्थ लिप्सा में लिप्त आर्थिक नीति को पहचान लिया था। उनमें राष्ट्र के प्रति भक्ति तथा अंग्रेजों के प्रति क्रोध की भावना जन्म लेने लगी। वे अपने देश को सुख-समृद्धि की दिशा में, पुनः ले जाने की योजना बनाने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने उद्योग-धन्धों का आधुनिकीकरण करने की योजना बनाई। उन्होंने कपास, चमड़ा, जूट, लोहों आदि पर आधारित उद्योगों को विशाल पैमाने पर संगठित करना प्रारम्भ किया। भारत में औद्योगिक क्रान्ति का यह शुभारम्भ था। सर्वप्रथम कलकत्ते में 1818 ई. में एक सूती कपड़े की मिल की स्थापना की गयी। इसके पश्चात् 1858 ई. तथा सन् 1877 ई. के पश्चात् नागपुर, बड़ोदा, अहमदाबाद आदि भारत के अन्य नगरों में भी सूती कपड़े की मिलों की स्थापना की गयी। इस प्रकार भारत औद्योगीकरण की दिशा में आगे बढ़ने लगा।

20वीं शताब्दी के मध्य तक भारतीय उद्योग तथा व्यापार

बीसवीं शताब्दी प्रारम्भ होने तक जापान, जर्मनी, अमरीका आदि भी भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्धों की स्थापना का प्रयास करने लगे थे। इसलिए इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का जन्म हो गया। जब लार्ड कर्जन भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ तो उसके प्रयासों से अंग्रेज सरकार ने अपनी व्यापारिक नीति को परिवर्तित कर लिया। सन् 1905 ई. में भारतीय नेताओं द्वारा भारत के लिये राजनीतिक अधिकारों की उपलब्धि के उद्देश्य से किये गये आन्दोलन की तीव्र गति प्रदान की गई भारत में उस समय प्रत्येक स्थान पर जनाक्रोश भड़क रहा था। आर्थिक असंतोष के स्पष्ट चिन्ह नजर आ रहे थे। इसी समय एक दुर्भिक्ष ने समस्त जनता की कमर ही तोड़ कर रख दी थी, विवश हो भारत सरकार को उद्योग-धन्धों की उन्नति हेतु एक ‘व्यापार और उद्योग-सम्बन्धी राजकीय विभाग’ नामक विभाग की स्थापना करनी पड़ी। इसके पश्चात् सन् 1971 ई. में इम्यूनिशन बोर्ड की स्थापना की गयी तथा उसे युद्ध सामग्री के तैयार करने तथा क्रय करने के कार्य पर नियंत्रण रखने का अधिकारी घोषित कर आयोग की नियुक्ति की गयी, जो कि औद्योगिक आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट के अंतर्गत भारतीय पूँजी की विविध उपयोगी कार्यों में लगाने की विधियों पर प्रकाश डाला गया तथा औद्योगिक विकास के लिये अनेक योजनायें भी प्रस्तुत की गयीं। आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुये भारत सरकार द्वारा एक अन्य विभाग की स्थापना की गयी। इसका नाम ‘Department of Commercial Intelligence and Statics’ था।

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