ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘धन की निकासी’ एवं उसका परिणाम

ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘धन की निकासी’ एवं उसका परिणाम

ब्रिटेन के आर्थिक हितों को पूर्ण रक्षा प्रदान करने वाला व्यापार, उसके अनुकूल आयात-निर्यात व्यवस्था और कर-व्यवस्था, ब्रिटेन के उद्योगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भारत में कच्चे माल का उत्पादन और कृषि का व्यापारीकरण, रेल तथा यातायात के अन्य साधनों द्वारा ब्रिटेन की मशीनों द्वारा निर्मित वस्तुओं को सम्पूर्ण भारत और उसके गाँवों तक पहुँचाये जाने की व्यवस्था द्वारा व्यापार की प्रगति आदि ऐसे साधन थे जिनके माध्यम से भारत का धन ब्रिटेन जाता था। परन्तु इनके अतिरिक्त भी अन्य ऐसे साधन थे जिनके द्वारा भारत का धन बहुत बड़ी मात्रा में ब्रिटेन जाता था। इन सभी साधनों द्वारा भारत का धन जिस प्रकार ब्रिटेन जाता था, उस क्रिया को ‘धन का निकास’ पुकारा गया है।

अवकाश-प्राप्त ब्रिटिश सैनिक और असैनिक अधिकारी अधिकांशतः ब्रिटेन चले जाते थे। भारत सरकार उन्हें पेंशन प्रदान करती थी। सेवारत-कर्मचारी भी अपने परिवारों और सम्बन्धियों को यहाँ से भेजते थे। भारतीय नरेशों द्वारा अंग्रेज अधिकारियों को भेंट स्वरूप प्रदान की गयी वस्तुएँ और धन भी अधिकांशतः ब्रिटेन जाता था। ब्रिटेन नागरिकों द्वारा भारत की कृषि, उद्योग, यातायात आदि में लगायी गयी पूँजी द्वारा प्राप्त लाभ भी ब्रिटेन जाता था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विवरणों में अनेक ऐसे विवरण प्राप्त होते हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि कलकत्ता के बन्दरगाह से ही बहुत बड़ी मात्रा में हीरों, मोतियों और अन्य विभिन्न बहुमूल्य पत्थरों का निर्यात किया गया था। यह सभी धन ब्रिटिश नागरिकों ने भारत में रहते हुए प्राप्त किया था जिसे वे स्वदेश भेजते थे। 1758 -65 ई. के मध्य के समय में ही ब्रिटिश नागरिकों ने प्रायः 60 लाख पौण्ड की धनराशि ब्रिटेन भेजी थी। इन धन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अर्जित लाभ सम्मिलित था। यह धन ब्रिटिश नागरिकों द्वारा अपने व्यक्तिगत साधनों द्वारा अर्जित किया गया था। कम्पनी द्वारा अर्जित किया गया लाभ तो, निस्सन्देह, इस राशि से कई गुना अधिक होगा।

एक अन्य तरीके से भी भारत के धन का निकास हुआ। कम्पनी ने अपने राज्य-विस्तार के लिए जो धन व्यय किया वह इतना अधिक था कि समय-समय पर उसने ब्रिटेन की सरकार से कर्ज लिया। उस कर्ज को ब्याज सहित कम्पनी ने ब्रिटेन की सरकार को लौटाया। वह धन भी भारत से ही एकत्रित किया गया। 1857 ई. में यह कर्ज 6 करोड़ 90 लाख था जो कम्पनी को ब्रिटेन की सरकार को देना था। दादाभाई नौरोजी के अनुसार, “भारत का धन भारत से बाहर जाता था और फिर वही धन भारत को कर्ज के रूप में दिया जाता था जिसके लिए उसे अतिरिक्त धन उस कर्ज और उस कर्ज की ब्याज के चुकाने के लिए जुटाना पड़ता था। यह एक ऐसा दुष्चक्र था जिसे तोड़ना कठिन था।”

इसके अतिरिक्त, भारत के धन का ब्रिटेन जाने का एक अन्य साधन ‘व्यापार में लगी हुई पूँजी से प्राप्त लाभ’ का ब्रिटेन भेजना था। जब से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबों पर अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की तब से उसने भारत में व्यापार हेतु खरीदी जाने वाली वस्तुओं के लिए ब्रिटेन से धन लाना बन्द कर दिया। प्लासी के युद्ध के पश्चात् ही कम्पनी ने बंगाल के नवाबों से भेंटस्वरूप धन प्राप्त करना शुरू कर दिया था। उसी धन से भारत में उन वस्तुओं को खरीदना आरम्भ किया गया जिन्हें कम्पनी निर्यात करके व्यापारिक लाभ अर्जित करती थी। बाद में अपने ऊपर निर्भर करने वाले सभी राजाओं और नवाबों से कम्पनी ने अपनी सैनिक और राजनीतिक सहायता के बदले में पर्याप्त धन प्राप्त किया और उसे व्यापार में लगाया। इस प्रकार कम्पनी ने भारत के धन को ही व्यापार में लगाया और उसे ब्रिटेन से धन लाने की आवश्यकता नहीं रही। बक्सर के युद्ध के पश्चात् जब कम्पनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (लगान वसूल करने का अधिकार) प्राप्त कर ली तब उसकी आय भारत में और भी अधिक हो गयी। इन सूबों से लगान के रूप में प्राप्त की गयी धनराशि को भी कम्पनी ने व्यापार में लगाया। बाद में जैसे-जैसे कम्पनी के राज्य का विस्तार होता गया अथवा उसके प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि होती गयी उसने अन्य भारतीय नरेशों और उनसे प्राप्त हुई भूमि से भी इसी प्रकार धन प्राप्त किया और उसे व्यापार में लगाया। इस प्रकार, कम्पनी ने भारत से प्राप्त हुई पूँजी को ही अपने व्यापार में लगाया तथा उससे व्यापारिक लाभ प्राप्त किया और ऐसा करते हुए उसे ब्रिटेन की पूँजी को हाथ लगाने की आवश्यकता नहीं हुई। ऐसी लाभप्रद स्थिति, सम्भवतः, किसी भी व्यापारिक कम्पनी को प्राप्त नहीं हुई होगी। इससे प्रत्येक प्रकार से प्रचुर मात्रा में भारत का धन ब्रिटेन गया।

कम्पनी की भारत से प्राप्त धन को ही अपने व्यापार में लगाये जाने की नीति से भारत को एक अन्य प्रकार से भी आर्थिक हानि हुई। कम्पनी ने विभिन्न तरीकों से भारत में अपनी आय को अधिकाधिक बढ़ाने के प्रयत्न किये जिससे भारतीयों पर आर्थिक भार पड़ा। उस वृद्धि की जिसका बोझा भारतीय किसानों पर पड़ा। कम्पनी की आय का एक अन्य प्रमुख साधन भारत में नमक के व्यापार पर उसका एकाधिकार था। कम्पनी ने नमक के मूल्य में निरन्तर वृद्धि की, 1883 ई. में ही बाजार में नमक का मूल्य उसके उत्पादन मूल्य से 1,200 से 2,000 रुपये तक अधिक था। नमक एक अत्यन्त आवश्यक उपयोग्य वस्तु है। उसके मूल्य में इतनी अधिक वृद्धि भारतीय जन-साधारण के लिए, निस्संदेह, अत्यधिक कष्टपूर्ण थी। 20वीं सदी में महात्मा गाँधी ने इसी कारण अपने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ नमक-कर को तोड़ने से ही किया था। इसी प्रकार, अंग्रेजों ने अन्य साधनों द्वारा भी अपनी आय में अधिकतम वृद्धि की, उससे प्राप्त धनराशि को भारत से क्रय की जाने वाली वस्तुओं पर व्यय किया और उन वस्तुओं को ब्रिटेन ले जाकर अपने उत्पादन का विकास किया या उन्हें विदेशों में बेचकर लाभ अर्जित किया। इससे भारत के आर्थिक साधनों से प्राप्त हुई धनराशि का उपयोग भारतीयों के लिए नहीं हुआ। उसका अधिकांश भाग ब्रिटेन पहुंच गया और ब्रिटेन के आर्थिक हितों की वृद्धि के लिए उसका उपयोग हुआ। दादाभाई नौरोजी के अनुसार 1894-95 ई. के मध्य भारत ने प्रति वर्ष 40 करोड़ रुपये का सामान ब्रिटेन भेजा जिसके बदले से उसे एक पैसे का भी लाभ नहीं हुआ।

इस प्रकार भारत का धन प्रचुर मात्रा में ब्रिटेन जाता रहा जिसका गम्भीर प्रभाव भारतीयों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा। भारतीयों की असहनीय निर्धनता का एक बड़ा कारण भारतीय धन का विकास भी रहा।

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