औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के विकास के चरण

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के विकास के चरण

भारत में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था मुख्यतः तीन चरणों से गुजरी। ये विभिन्न चरण भारत के आर्थिक अधिशेष को हड़पने के विभिन्न तरीकों पर आधारित है। संक्षेप में, इस तीन चरणों को वाणिज्यिक का नाम दिया जाता है। 17वीं और 18वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशवाद का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ व्यापार तथा भारत की लूट था। 19वीं शताब्दी में भारत का प्रयोग ब्रिटेन में बनी हुई औद्योगिक वस्तुओं के लिए मुख्य बाजार के रूप में किया गया। (हालांकि लूट और व्यापार का पुराना तरीका भी बरकरार रहा।) 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में और 20वीं शताब्दी में भारत में स्थित ब्रिटिश उद्योगपतियों द्वारा भारत में पूँजी-विनियोग की प्रक्रिया आरंभ हुई जिससे भारतीय क्रमिकों का बड़े पैमाने पर शोषण आरंभ हुआ।

पहला चरण- कम्पनी द्वारा भारत की विजय

भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना 1757 से मानी जाती है जब प्लासी की लड़ाई के बाद इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल पर अपना प्रभुत्व जमा लिया था। 17वीं और 18वीं शताब्दी ने जब यूरोपीय देशों के कई व्यापारी भारत के साथ व्यापार एकाधिकार के लिए होड़ कर रहे थे, आर.सी. दत्त के अनुसार 18वीं शताब्दी में भारत एक विशाल कृषि प्रधान और औद्योगिक देश था।

अगर भारतीय समाज का स्वाभाविक विकास होता तो इसमें कोई शक नहीं कि यहाँ का पूँजीपति वर्ग सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से शक्तिशाली बनकर राज्यसत्ता पर अधिकार करता और सामंती राज्य के स्थान पर पूँजीवादी राज्य की स्थापना करता। लेकिन भारतीय पूँजीपति के इतना शक्तिशाली होने से पहले ही फ्रांसीसी, ब्रिटिश तथा अन्य यूरोपीय देशों के सशस्त्र शक्तिशाली पूँजीपतियों के गुट यहाँ आ पहुँचे और भारत पर आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार के लिए उनके बीच भयंकर प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गई। इस प्रतिस्पर्धा में ब्रिटिश पूँजीपति सफल हुए और भारत पर उनका अधिकार हो गया।

भारत के साथ ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मुख्य उद्देश्य ठीक वही था जो व्यापारिक पूँजी की एकाधिकारी कंपनियों का होता है—समुद्रपार के किसी देश के माल और विभिन्न उत्पादनों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करके लाभ कमाना। इसका उद्देश्य ब्रिटिश माल के लिए मंडियों की तलाश नहीं था बल्कि भारत के ऐसे सामान की सप्लाई पर क़ब्जा करना था जो इंग्लैण्ड और यूरोप के देशों में आसानी से बिक सकता हो। कंपनी भारत के साथ व्यापार पर एकाधिकार चाहती थी ताकि इसके साथ प्रतिस्पर्धा करने वाला कोई अन्य ब्रिटिश अथवा यूरोपीय व्यापारी या व्यापारिक कंपनी न हो। कंपनी यह भी नहीं चाहती थी कि भारत में उसकी ख़रीदारी और यूरोप में बिक्री में कोई भारतीय व्यापारी भी उसके साथ प्रतिस्पर्धा करे। दूसरे शब्दों में कंपनी की यह इच्छा थी कि वह अपनी वस्तुओं को अधिक-से-अधिक क़ीमत पर बेचे और भारत में उन वस्तुओं को कम-से-कम कीमत पर खरीदे ताकि वह अधिक-से-अधिक लाभ कमा सके। परंतु व्यापार की आम अवस्था में ऐसा संभव नहीं था जहाँ कई प्रकार की कंपनियाँ और व्यापारी प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। अपना उद्देश्य प्राप्त करने के लिए कंपनी ने कई तरह के तरीके अपनाए। इंग्लैण्ड के व्यापारियों को रिश्वत देकर भारत से दूर रखा गया। कई आर्थिक और राजनीतिक हथकंडों के प्रयोग से ब्रिटिश सरकार को मनाया गया कि वह कंपनी को भारत तथा पूर्वी द्वीप समूह के देशों के साथ व्यापार एकाधिकार प्रदान करे। यूरोप के अन्य राष्ट्रों को भारत से दूर रखने के लिए कंपनी को फ्रांस तथा हॉलैण्ड के साथ भीषण लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं। परंतु इसके बावजूद भारतीय व्यापारियों को भारत में व्यापार करने से वंचित करना बड़ा मुश्किल था क्योंकि उन्हें मुगल शासकों का संरक्षण प्राप्त था। तथापि जैसे-जैसे 18वीं शताब्दी में मुगल शासन का पतन होना आरंभ हुआ, भारत के समुद्रतटीय इलाके मुगल शासकों के नियंत्रण से बाहर होने शुरू हो गए। कंपनी ने इस अवसर का लाभ उठाकर समुद्रतटीय क्षेत्रों में नौसैनिक शक्ति की सहायता से ज़बरदस्ती भारतीय व्यापारियों को विदेश व्यापार से वंचित करना आरंभ कर दिया। व्यापार से एकाधिकार प्राप्त करने, भारत के अंदर तथा खुले समुद्र में भारतीय और विदेशी व्यापारियों को भारत के व्यापार से वंचित रखने और सैनिक शक्ति, किले, व्यापारकेंद्र तथा समुद्री बेड़े बनाए रखने के लिए कंपनी को भारी धनराशि की आवश्यकता थी। इतना धन न तो कंपनी के पास था और न ही ब्रिटिश सरकार के पास। आरंभ में बंबई, कलकत्ता और मद्रास के जिन समुद्री क्षेत्रों पर कंपनी का नियंत्रण था, वहाँ की जनता पर स्थानीय टैक्स लगाकर कंपनी ने अपने ख़जाने को बढ़ाने की कोशिश की। परंतु शीघ्र ही कंपनी की मनोकामना आशा से अधिक पूरी हो गई जब प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल, बिहार, उड़ीसा और दक्षिण भारत के कुछ हिस्से कंपनी के अधीन आ गए। विजित क्षेत्रों की सरकारी आय पर कंपनी का पूरा नियंत्रण हो गया जिससे यह ज़मींदारों, नवाबों और स्थानीय शासकों की जमा पूँजी हड़पने के क़ाबिल हो गई। कंपनी ने इस अभिजात वर्ग के धन और राज्य की आय को, अपने तथा कंपनी के कर्मचारियों की स्वार्थपूर्ति और भारत में अपने प्रभाव के विस्तार के लिए प्रयोग करना आरंभ कर दिया। राजनीतिक शक्ति चूँकि कंपनी के हाथ में थी, अतः विनिमय में पलड़ा भारी रखने के उद्देश्य से न्यूनतम क़ीमत पर अधिक माल हड़पने के लिए कई तरह के बल-प्रयोग के तरीके अपनाए जाने लगे।

इस चरण के शासन के परिणाम भारत के दृष्टिकोण से बड़े ही हानिकारक रहे। भारतीय हस्तकला तथा व्यापार पर ब्रिटिश नियंत्रण के कारण भारतीयों के उत्पादन तथा व्यापारिक परियोजनाओं को हड़प लिया गया। शिल्पकारों को ज़बरदस्ती दी जाने वाली मजदूरी इतनी कम थी कि कई बार उन्हें न्यूनतम जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी भी नहीं दी जाती थी। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय धन का एकमात्र स्रोत कृषि रह गया और अधिकतर जनसंख्या कृषि पर निर्भर रहने लगी। यहाँ भी लगान की राशि प्रत्येक वर्ष बढ़ती ही नहीं रही बल्कि लगान को निर्दयतापूर्वक वसूल भी किया गया। इसके अलावा जहाँ मुग़ल शासन में कर और लगान की रकम भारत में ही ख़र्च होकर दुबारा लोगों तक पहुँच जाती थी जिससे व्यापार और उद्योग -फूलते रहते थे, वहाँ कम्पनी द्वारा वसूल की गई कर और लगान की राशि वस्तुओं और कीमती धातुओं के माध्यम से इंग्लैण्ड और यूरोप में निर्यात कर दी जाती थी। कंपनी लगान से प्राप्त धन द्वारा भारत में व्यापारिक वस्तुएँ खरीदती थी और इंग्लैण्ड और यूरोप में बेचकर मुनाफ़ा कमाती थी। अतः भारत की लूट इंग्लैण्ड में पूँजी-संचय का परोक्ष स्रोत थी जिसने इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटेन की राष्ट्रीय आय का लगभग 2 प्रतिशत हिस्सा भारत से प्राप्त होने वाली आय का ख़िराज था। 18वीं शताब्दी के अंत तक कंपनी ने इंग्लैण्ड को एक समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था।

जैसे ही ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक प्रादेशिक शक्ति बनी, वैसे ही इंग्लैण्ड में इस सवाल को लेकर एक तीव्र संघर्ष छिड़ गया कि भारतीय उपनिवेश किसके हितों या स्वार्थों की पूर्ति करेगा। 1773 के रेगुलेटिंग ऐक्ट, 1774 के पिट्स इंडिया ऐक्ट और ऐडम स्मिथ की पुस्तक वैल्थ ऑफ नेशन्स में व्यक्त विचारों के आधार पर ब्रिटेन के उभरते हुए नए औद्योगिक वर्ग ने 1813 में कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करके मुक्त व्यापार के द्वार खोल दिए जिसके परिणामस्वरूप भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद का दूसरा चरण आरंभ हुआ।

इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति तथा भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद का दूसरा चरण

भारत के आर्थिक अधिशेष का इतनी भारी मात्रा में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के अबाध तथा त्वरित विस्तार के लिए आवश्यक पूँजी प्रदान की । हरग्रीब्ज़ की कताई की मशीन जेम्स वाट का भाप से चलने वाला इंजन, आर्कराइट का वाटर फ्रेम, क्रॉम्पटन का म्यूल तथा कार्टराइट का पावर लूम आदि सारे आविष्कार 1765 से 1785 ई. के बीच हो चुके थे।

उपरोक्त आविष्कारों और इसके परिणामस्वरूप हुई औद्योगिक क्रांति ने इंग्लैण्ड को संसार का प्रधान उत्पादक तथा निर्यातक देश बना दिया। इस औद्योगिक क्रांति से स्वयं इंग्लैण्ड के आंतरिक ढाँचे में काफ़ी परिवर्तन हुए। अब व्यापारियों और दुकानदारों का स्थान औद्योगिक पूँजीपति लेने लगे जो कालांतर में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के प्रधान तत्व के रूप में उबरे। इस तरह ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत में अपनी विजय का आनंद लेना शुरू ही किया था कि ब्रिटेन के उभरते हुए नए औद्योगिक वर्ग ने इसकी व्यापारिक प्रमुखता को सीमित करने तथा इसे ब्रिटिश संसद के अधीन करने का आंदोलन आरंभ कर दिया।

भारत के संदर्भ में ब्रिटिश औद्योगिक पूँजीपतियों की नीति बड़ी स्पष्ट थी। ब्रिटेन के उद्योगों को कच्चे माल की आवश्यकता थी और ब्रिटेन के मज़दूरों को खाद्यान्नों की। ब्रिटिश उपनिवेशवाद अब भारत का उपयोग ब्रिटेन की मशीन निर्मित वस्तुओं के एक बाजार के रूप में तथा ब्रिटेन पर आश्रित एक ऐसे उपनिवेश के रूप में करना चाहता था जो ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल और खाद्यान्नों का उत्पादन एवं पूर्ति करे। 1813 के बाद ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीति इस उद्देश्य की पूर्ति में जुट गई।

इस चरण में भारत द्वारा इंग्लैण्ड को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में तीव्र वृद्धि हुई परंतु इस वृद्धि की प्रकृति सर्वथा भिन्न थी। भारत द्वारा निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में अब कच्चे माल का स्थान प्रमुख हो गया, जैसे रूई, नील, अफ़ीम, जूट, तिलहन, खालें, कॉफ़ी, चाय आदि। 1813 में भारत से 90 लाख पौंड कपास बाहर गया था जो सन् 1833 में बढ़कर 3 करोड़ 20 लाख पौंड और 1844 में 8 करोड़ 80 लाख पौंड हो गया। 1833 में 3.7 3.7 हजार पौंड भेड़ों की ऊन बाहर गई जो 1844 में बढ़कर 3 करोड़ 20 लाख पौंड और 1844 में बढ़कर 27 लाख पौंड हो गई। 1833 में 2,100 बुशल तिलहन बाहर गया जो 1844 में बढ़कर 2,37,000 बुशल हो गया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात थी भारत की ज़रूरतों की अवज्ञा और यहाँ की जनसंख्या को भूखा मारते हुए खाद्यान्नों के निर्यात में बढ़ोत्तरी। 1849 में 8-1/2 लाख पौंड से अधिक कीमत का अनाज निर्यात किया गया जिसमें चावल और गेहूँ मुख्य थे। बागानों में वृद्धि अफ़ीम की बंधुआ मज़दूरी तथा रुई के अधिक उत्पादन का भी खाद्यान्नों के उत्पादन पर असर पड़ा। खाद्यान्नों के निर्यात के परिणामस्वरूप भारत में अकाल की परिस्थितियाँ पैदा हो गईं। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत में सात अकाल पड़े जिनमें अनुमानतः 15 लाख लोग मौत के शिकार हुए। शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 14 बार अकाल पड़े जिनमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अनुमानत 2 करोड़ लोगों की जानें गईं।

इस चरण में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के कुछ अंतर्विरोध भी सामने आए, जैसे किसानों की क्रय-शक्ति बढ़ाने के लिए और कृषि का पूँजीवादी आधार पर विकास करने के लिए कम करों की आवश्यकता बनाम अतिरिक्त धन को हड़पने के लिए तथा दिनोंदिन बढ़ते हुए प्रशासनिक खर्च के लिए अधिक कर लगाने की आवश्यकता। कृषि-वर्ग का विनाश इसका सीधा परिणाम था। हस्तकलाओं के विनाश से ज़मीन पर घातक दबाव शुरू हो गया, कृषि-व्यवस्था अविकसित रही तथा क्रय-शक्ति दिनोंदिन घटती गई। एक अन्य विरोधाभस था प्रशासन और सेना का खर्च बनाम भारत के विकास पर खर्च। इसके अलावा भुगतान संतुलन की समस्या भी सामने आई- अर्थात् यदि उपनिवेशवादी नीति के कारण भारतीय कृषि व्यवस्था की उत्पादन और निवेश करने की क्षमता कम हो जाती है तो ब्रिटेन से आयात किया जाने वाला सामान ख़रीदा कैसे जाएगा।

भारत के आर्थिक शोषण को इस नए उद्देश्य के अनुसार संभव बनाने के लिए एक नए राजनीतिक एवं आर्थिक ढाँचे की आवश्यकता थी। जहाँ पहले चरण में भारत के राजनीतिक और आर्थिक ढाँचे में किसी प्रकार के परिवर्तन नहीं किए गए, वहाँ दूसरे चरण में ये परिवर्तन अनिवार्य हो गए ताकि ब्रिटिश उपनिवेशवाद के रूप में भारत अपनी नई भूमिका निभा सके। भारत में सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए मुक्त व्यापार की नीति तथा ब्रिटिश पूँजीपतियों और व्यापारियों को भारत में आने और बसने की छूट के अलावा, जमींदारी और रैयतवारी व्यवस्थाओं के माध्यम से, लगान इकट्ठा करने के तरीकों में भी परिवर्तन किए गए। प्रशासन को और अधिक व्यापक बनाया गया। कर उगाहने, कानून और व्यवस्था को कड़ा करने तथा व्यापार-मार्गों को सुरक्षित रखने की दिशा में कई कदम उठाए गए।

संक्षेप में उपनिवेशवाद के इस दूसरे चरण में कंपनी तथा ब्रिटिश पूँजीपतियों ने मिलकर भारत के उद्योग-धंधों तथा व्यापार को नष्ट कर दिया और भारतीय वस्तुओं को यूरोप के बाजारों से निष्कासित कर दिया। करघा और चरण पुराने भारतीय समाज की धुरी थे। अंग्रेजों ने भारतीय करघे को तोड़ डाला चरखे को नष्ट कर दिया और भारत को ,जो ‘कपड़े का घर’ कहलाता था, विदेशी कपड़े से भर दिया। भारत की उत्पाद व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया और वह देश, जो किसी समय अपनी समृद्धि के लिए सारे संसार में मशहूर था उसे गरीबी, बीमारी, भुखमरी और अकाल का घर बना दिया। भारत का आर्थिक विकास विदेशी शोषणकारी व्यवस्था का एक भाग मात्र बनकर रह गया।

वित्तीय पूँजी का प्रभुत्व : ब्रिटिश उपनिवेशवाद का तीसरा चरण

ब्रिटिश उपनिवेशवाद का तीसरा चरण 1860 के बाद से माना जा सकता है। यह चरण भारत की आंतरिक और बाह्य घटनाओं का परिणाम था। आंतरिक दृष्टिकोण से भारत के संपूर्ण सामाजिक ढाँचे पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के पहले दो चरणों के विनाशकारी परिणाम सामने आने शुरू हो गये। 19वीं शताब्दी के पहले पचास सालों के मुक्त व्यापार की आवश्यकताओं तथा परिणामों ने भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीति में कुछ परिवर्तन आवश्यक समझे थे। भारत के अधिकाधिक भागों को व्यापारिक दायरे के अंतर्गत लाने के लिए सड़कों, यातायात और रेलवे की आवश्यकता थी। साथ ही सिंचाई के साधनों में भी सुधार की आवश्यकता थी। इससे पहले कि यह संभव हो सके, भारतीय इतिहास में एक सनसनीखेज घटना घट गई जिसने कुछ समय के लिए विकास के इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया परंतु जिसने ब्रिटेन के औद्योगिक हितों के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और कंपनी के भविष्य को सदा क लिए समाप्त करने में सक्रिय सहायता भी की। यह घटना थी 1857 का विद्रोह।

1857 का विद्रोह सिपाही विद्रोह ही नहीं था बल्कि यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विस्तार तथा भारतीय रियासतों के अधिकाधिक क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाने कम्पनी के अधिकारियों की उत्पीड़न लगान व्यवस्था तथा भारतीय हस्त कला उद्योग के विनाश का सीधा परिणाम था।

19वीं शताब्दी के मुक्त व्यापार से उत्पन्न अंतविरोधों और 1857 के विद्रोह के परिणामों ने अंग्रेजों को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वे भारत में अपनी नीति में परिवर्तन लाएँ। व्यापारिक और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अब यह आवश्यक हो गया कि रेल लाइनों का निर्माण किया जाए, सड़कों का विकास किया जाए, सिंचाई के साधनों की ओर ध्यान दिया जाए (जिनकी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूरी तरह उपेक्षा की थी), विद्युत-टेलीग्राफ प्रणाली का विकास किया जाए, देश भर में एक जैसी डाक-व्यवस्था कायम की जाए तथा यूरोप के ढंग की बैंक व्यवस्था आरंभ की जाए। विकास की इस प्रक्रिया के कुछ अवश्यंभावी परिणाम हुए। इन्होंने एक नए दौर की नींव रखी और वह था भारत में ब्रिटिश पूँजी का निवेश। अब यहाँ अंग्रेजों ने अपनी पूँजी लगानी शुरू कर दी। 1869 के बाद ब्रिटिश पूँजी काफ़ी बड़े पैमाने पर भारत में विनियोजित होने लगी। भारत में पूँजी लगाने के मुख्य क्षेत्र थे : सरकार को ऋण, रेल-निर्माण, सिंचाई परियोजनाएँ, चाय, कॉफी और रबड़ के बाग, कोयला खानें, जूट मिलें, जहाज़रानी, ट्राम-वे, बैंकिंग आदि।

ब्रिटिश शासन के आर्थिक आघात ने इस चरण में भारतीय पूँजीपति वर्ग को भी जन्म दिया जिसने आर्थिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में ब्रिटिश उपनिवेशवाद को चुनौती दी। भारतीय हितों और भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति तथा ब्रिटिश उपनिवेशवाद की टक्कर ने एक शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलन को जन्म दिया जो 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण में एक विनम्र-निवेदन से आरंभ हुआ और प्रथम विश्व महायुद्ध तक एक प्रभावशाली शक्ति बन गया।

संक्षेप में, उपनिवेशवाद के इस तीसरे चरण में भारत असली अर्थों में ब्रिटेन का एक उपनिवेश बन गया। भारत ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं के लिए बाज़ार था, कच्चे माल तथा खाद्यान्नों का स्रोत था तथा ब्रिटिश पूँजी के विनियोजन का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था। भारत की यातायात-व्यवस्था, उद्योग-प्रणाली, खाने, विदेशी व्यापार, चाय, कॉफी तथा रबड़ के बागान, तटीय तथा अंतर्राष्ट्रीय जहाज़रानी, बैंकिंग तथा बीमा आदि ब्रिटेन के अधीन थे। भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समाज ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक विकास के हित में ढले हुए थे। औद्योगिक क्रांति के बाद जहाँ ब्रिटेन संसार का प्रमुख विकासशील पूँजीवादी देश बन गया, वहाँ भारत को दिन-प्रतिदिन अविकसित किया गया ताकि वह संसार का अत्यंत पिछड़ा हुआ औपनिवेशिक देश बन सके। वास्तव में ये दोनों प्रक्रियाएँ कारण और परिणाम के संदर्भ में अन्योन्याश्रित थीं। व्यापार, वित्त तथा प्रौद्योगिकी से लैस ब्रिटेन तथा भारत के बीच आर्थिक संबंधों के संपूर्ण ढाँचे ने भारत की औपनिवेशिक निर्भरता और पिछड़ेपन को लगातार बढ़ाया।

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